बुधवार, 23 मई 2012

क्रिकेट का तमाशा या तमाशे का क्रिकेट


एक पुराना गाना है, शोखियों में घोला जाए थोडा सा शबाब , फिर उसमे मिलाई जाए थोडी सी शराब होगा यूं नशा जो तैयार वो प्यार है।  वैसे ही  इस  खेल के रोमांच को बढाने के लिए इसके  नियमों में बदलाव किए गये, पैसों की बरसात कर दी गयी,  ग्लैमर की चाशनी और वैभव की चकाचौंध  मिला एक नशीला वातावरण बना लोगों को आकर्षित किया गया. पर जल्द ही इसका एक और रूप सामने आ गया।    


आखिर एक लम्बे तमाशे का अंत आ ही गया। अगले हफ्ते सबसे विवादास्पद IPL के संस्करण का समापन हो जाएगा। पर यह समापन पिछले चार समापनों से थोडा अलग होगा। जहां पिछले समापन अगले संस्करण का दावा करके जाते थे, इस बार का समापन अपने भविष्य के प्रति सशंकित है। जिसका जिम्मेदार भी यह खुद ही है।

“एक पुराना गाना है, शोखियों में घोला जाए थोडा सा शबाब , फिर उसमे मिलाई जाए थोडी सी शराब होगा यूं नशा जो तैयार वो प्यार है।”
अब वो जैसा प्यार था, था। पर पिछले पांच सालों से भारत के क्रिकेट प्रेमियों के इस खेल के प्रति प्यार का फायदा उठा, IPL के नाम से जो उल्लू सीधा किया जा रहा था उसका शायद चर्मोत्कर्ष आ गया है। वैसे तो इस "फार्मेट" के साथ विवादों का साथ चोली-दामन की तरह इसके जन्म के साथ से ही लगा रहा था। पर अब तो अति हो चुकी है। खेल का कट्टर से कट्टर हिमायती भी अब इस पर उंगली उठाने लगा है क्योंकि अब वह अपने आप को कहीं ना कहीं ठगा जा रहा महसूस करने लगा है।

Indian Premium League, जो अब Indian Prattle League यानि इंडियन बकवास लीग, का रूप ले चुकी है, की शुरुआत इस खेल को और भी लोकप्रिय बनाने के लिए की गयी थी। उसी पुराने गाने की तरह खेल के रोमांच को बढाने के लिए उसके नियमों में कुछ बदलाव किए गये, पैसों की चकाचौंध में ग्लैमर की चाशनी मिला इसे दर्शकों के सामने परोसा गया तो उन्हें भी बहुत आनंद आया। देखते-देखते इसकी लोकप्रियता आसमान छूने लगी। पर इसके साथ ही साथ इसका दूसरा रूप भी सामने आ गया। जिसने खिलाडियों की आपसी रंजिश, पैसों की अनाप-शनाप बरसात से उनके बिगडते दिलो-दिमागी संतुलन, अचानक मिली प्रसिद्धी को संभाल ना पा कर की गयी मर्यादाहीन कारस्तानियां, पैसों के लालच से गैर कानूनी हरकतों को सबके सामने ला खडा किया।

भद्र-जनों के खेल के नाम से  जाने जाने वाले इस खेल की मर्यादा, नैतिकता सब कुछ व्यापारियों और बाज़ार की दखल से गुजरे जमाने की बातें हो कर रह गयीं। पैसे ने हर चीज का माप-दंड बदल कर रख दिया। डेढ-दो महीनों  में ही करोडों के वारे-न्यारे करने वाले खिलाडी अपने आप को किसी और ही ग्रह का वासी मानने लग गये। इसी कारण वे किसी बेजा हरकत को करने से नहीं डरते। यहां तक की बाहर से आने वाले खिलाडियों, जिनसे शालीन व्यवहार की आशा की जाती है, वे भी अभद्रता की सीमा लांघते नहीं हिचकिचाते।

खेल मनोरंजन के साथ साथ स्वस्थ प्रतिस्प्रद्धा का भी स्वाद देते हैं। पर यह जो हो रहा है वह क्या है?  सिर्फ मनोरंजन, वह भी स्तर हीन। पैसे और ग्लैमर का भौंडा प्रदर्शन मात्र। एक बात जो सबसे ज्यादा अखरने वाली या संदेह पैदा करने वाली है वह है, बी.सी.सी.आई. के सदस्य का ही किसी टीम का मालिक होना। जब की आयोजन भी यही संस्था करवा रही है।

यदि सही, कठोर और सकारात्मक कदम जल्दी ना उठाए गये तो IPL की साख पर तो बट्टा लगना ही है क्रिकेट की लोक-प्रियता पर भी आंच आनी निश्चित है। 

मंगलवार, 15 मई 2012

"बाबू मोशाय" .....यह कैसा विज्ञापन है रे


वर्षों पहले प्रसिद्ध फिल्म-निर्माता ऋषिकेश मुखर्जी ने एक बहुचर्चित क्लासिक फिल्म "आनंद" बनाई थी। इसके मुख्य कलाकार राजेश खन्ना तथा सहायक किरदार में अमिताभ बच्चन थे। फिल्म में राजेश अमिताभ को "बाबू मोशाय" कह कर संबोधित करते हैं। यह संबोधन उस समय काफी लोकप्रिय हुआ था। आज भी लोगों को यह याद है। 

मुखर्जी साहब ने अपनी अगली फिल्म "नमकहराम" में भी इन दोनों कलाकारों को दोहराया। थोडा सा "ग्रे शेड" होने के बावजूद अमिताभ, राजेश खन्ना पर भारी पडे और यहीं से उनका भाग्य भी अपने सहकर्मी पर  हावी  होता चला गया.  यहां तक कि राजेश खन्ना को धीरे-धीरे नेपथ्य में जाने पर  मजबूर होना पडा। 

समय बीतता गया। ना जाने कितना पानी गंगा में बह गया। राजेश खन्ना पूरी तरह से परिदृष्य से गायब हो गये। पर अमिताभ द्वारा अपने सिंहासन को हस्तगत कर अपने को अपदस्त करने का गम कभी भी भुला नहीं पाए। फांस की तरह यह बात उनके दिलो-दिमाग को सालती रही। अमिताभ ने भी काफी उतार-चढाव देखे। तन-मन पर चोटें खाईं। पर वक्त से समझौता कर जैसा भी काम मिला उसे बिना किसी हील-हवाले, बिना किसी हीन प्रवृत्ति का शिकार हुए, बिना किसी हीन ग्रंथी का शिकार हुए पूरे मनोयोग से पूरा किया। जिसका फल सबके सामने है। इसी सफलता को देख बहुत सारे भूतपूर्वों ने वर्तमान में हाजिरी लगाने की कोशिश की पर वैसी सफलता से महरूम ही रहे। 

आज का व्यवसाई बहुत चतुर हो गया है। संबंध, नैतिकता, जीवन मूल्य जैसी बातें उसके लिए कोई मायने नहीं रखतीं। वह हर काम, हर बात को सिर्फ अपने फायदे को ध्यान में रख करता है। ऐसे ही एक विज्ञापन और फिल्म निर्माता ने, जिसने अमिताभ को एक अनोखे किरदार में पेश कर नाम और दाम दोनों कमाए हैं, राजेश खन्ना को लेकर 'पंखों' की एक विज्ञापन फिल्म बनायी है। जिसमें खन्ना साहब अपने पुराने अंदाज में कबूतर की तरह गर्दन मटका कर विज्ञापन का अंतिम डायलाग बोलते हैं, "बाबू मोशाय मेरे 'फैन्स' को कोई मुझसे छीन  नहीं सकता।"  

"बाबू मोशाय", यह शब्द उनके दिल मे सालों से जमे नैराश्य, वैमनस्य, कुंठा, कुढन, ईर्ष्या जैसी भावनाओं को फिर जग के सामने ला खडा करता है। निर्माता द्वारा ऐसा जान-बूझ कर, सोच समझ कर पुराने द्वेष को भुनाने के लिए किया गया प्रयास है। नहीं तो 'अमर प्रेम' का "पुष्पा वाला डायलाग" भी काम में लाया जा सकता था। 

आज की पीढी को ना इन दोनों सुपर-स्टारों के इतिहास में दिलचस्पी है नाहीं उन दिनों की इनकी टकराहट की जानकारी। इसीलिए यह विज्ञापन निर्माता की भूल साबित हो कोई असर पैदा नहीं करता।






सोमवार, 7 मई 2012

अपने-आप में सिमटा एक गाँव, मलाणा.

गर्मियों का मौसम आते ही अधिकाँश लोग पहाड़ों का रुख करते हैं। स्वाभाविक भी है कहाँ मैदानों की चिलचिलाती गरमी और कहाँ बर्फ से ढके  पर्वतों की शीतल वादियाँ। लोग जाते हैं और सैर-गाहों का लुत्फ ले लौट आते हैं। कुछ ही लोग होंगे जो वहाँ के रहन-सहन, रीति-रिवाजों, वहाँ के रहवासियों की कठिन जिन्दगी को जानने की रूचि रखते होंगे। पहाड़ों का एक-एक गाँव तथा उसके वाशिंदे अपने आप में ऐसा  इतिहास समेटे बैठे हैं, जिसकी कल्पना भी देश का आम इंसान नहीं कर सकता।  

ऐसा ही एक गाँव है  मलाणा.  हिमाचल के सुरम्य पर दुर्गम पहाड़ों की उचाईयों पर बसा वह गांव जिसके ऊपर और कोई आबादी नहीं है। यहाँ जाना कोइ आसान काम नहीं है।  कुल्लू-मनीकर्ण के रास्ते पर एक छोटा सा गाँव है, जरी, जहां तक वाहन के द्वारा जाया जा सकता है।  यहाँ से 9 कीमी की दुर्गम चढ़ाई और करीब 12000 फिट की ऊंचाई पर 500-550 परिवारों से  बसा है मलाणा.

आत्म केन्द्रित से यहां के लोगों के अपने रीति रिवाज हैं, जिनका पूरी निष्ठा तथा कड़ाई से पालन किया जाता है, और इसका श्रेय जाता है इनके ग्राम देवता जमलू को जिसके प्रति इनकी श्रद्धा, खौफ़ की हद छूती सी लगती है। अपने देवता के सिवा ये लोग और किसी देवी-देवता को नहीं मानते। यहां का सबसे बडा त्योहार फागली है जो सावन के महिने मे चार दिनों के लिये मनाया जाता है। इन्ही दिनों इनके देवता की सवारी भी निकलती है, तथा साथ मे साल मे एक बार बादशाह अकबर की स्वर्ण प्रतिमा की पूजा भी की जाती है। कहते हैं एक बार अकबर ने अपनी सत्ता मनवाने के लिये जमलू देवता की परीक्षा लेनी चाही थी तो उसने अनहोनी करते हुए दिल्ली मे बर्फ़ गिरवा दी थी तो बादशाह ने कर माफी के साथ-साथ अपनी सोने की मूर्ती भिजवाई थी। इस मे चाहे कुछ भी अतिश्योक्ति हो पर लगता है उस समय गांव का मुखिया जमलू रहा होगा जिसने समय के साथ-साथ देवता का स्थान व सम्मान पा लिया होगा। सारे कार्य उसी को साक्षी मान कर होते हैं। शादी-ब्याह भी यहां, मामा व चाचा के रिश्तों को छोड, आपस मे ही किए जाते हैं।

वैसे तो यहां आठवीं तक स्कूल,डाक खाना तथा डिस्पेंसरी भी है पर साक्षरता की दर नहीं के बराबर होने के कारण इलाज वगैरह मे झाड-फ़ूंक का ही सहारा लिया जाता है।भेड पालन यहां का मुख्य कार्य है, वैसे नाम मात्र को चावल,गेहूं, मक्का इत्यादि की फसलें भी उगाई जाती हैं पर आमदनी का मुख्य जरिया है भांग की खेती। यहां की भांग जिसको मलाणा- क्रीम के नाम से दुनिया भर मे जाना जाता है, उससे बहुत परिष्कृत तथा उम्दा दरजे की हिरोइन बनाई जाती है तथा विदेश मे इसकी मांग हद से ज्यादा होने के कारण तमाम निषेद्धों व रुकावटों के बावजूद यह बदस्तूर देश के बाहर कैसे जाती है वह अलग विषय है।

   

रविवार, 6 मई 2012

आज के समय में किसी का बीमार पडना एक अपराध है।

कुछ वर्षों पहले बुजुर्गों से आशीर्वाद मिला करता था 'जुग-जुग (युग-युग)जीयो' यानि जीवेम शरद: शतम। उस समय स्वस्थ रहना एक आम बात थी, जो शुद्ध जल, वायु तथा अन्न का प्रदाय थी। हमारे पौराणिक नायक अपने उत्कर्ष के समय में 80-100 साल के होते थे ऐसा वर्णन मिलता है, तो उस समय औसत आयु 150-200 साल की होती होगी। जो आज सिमट कर औसतन 60-65 के आस-पास आ गयी है। वह भी दवा-दारू के भरोसे।

उम्र का सीधा संबंध तन से है और तन को स्वस्थ रखने के लिए शुद्ध आहार की अति आवश्यकता होती है। पर आज जैसा हाल और माहौल है उसमें तो शुद्धता का अर्थ ही बदल गया है। कहावत है कि "जैसा अन्न वैसा मन" पर इसमें आज संशोधन की जरूरत आन पडी है, जिससे अब यह "जैसा अन्न वैसा तन" हो जानी चाहिए। ऐसा दिख भी तो रहा है। आज शायद ही कोई ऐसा घर हो जहां आए दिन कोई मिलावटी खाद्य पदार्थ से अस्वस्थता महसूस ना करता हो। विडंबना तो यह है कि हमारे देश में मिलावटी भोज्य पदार्थ खा कर बीमार हुए इंसान को दवा भी नकली मिलती है, जो करेले की बेल को नीम के पेड पर चढा दोहरी मार दिलवाती है। इस जघन्य अपराध का खात्मा होना तो दूर पहुंच वालों की मिली-भगत से दिन प्रति दिन बढोत्तरी होती ही दिखती है। इसी कारण आम इंसान की बात ही क्या, साधू-संत और नियम-बद्ध जीवन यापन करने वाले स्त्री-पुरुष भी रोगों की चपेट से खुद को नहीं बचा पाते।

आदमी तंदरुस्त रहता है तो स्वयं की देख-रेख में हर पैथी, हर नुस्खा या सुझाव उसे स्वस्थ रहने में सहायक होते हैं। पर इतने बडे शरीर रुपी यंत्र का एक अदना सा पुर्जा भी बेकाबू हो जाए तो फिर उसके तन और धन का भगवान ही मालिक होता है। क्योंकि आज के समय में किसी का बीमार पडना एक अपराध के ताई हो गया है। बीमारी के दौरान दवा-दारू का अतिरिक्त बोझ संभालना अब सब के वश की बात नहीं रह गयी है। सरकारी अस्पतालों की हालत तो जग जाहिर है, जहां अच्छा-भला आदमी बीमार सा लगने लगता है तो दूसरी ओर निजी क्लिनिकों में बीमारी का कम जेब का सफाया ज्यादा होने लगा है। चार-पांच दिन की दवाएं ही आधे महीने के राशन का बजट बिगाड कर रख देती हैं।

इसी सब को ध्यान में रखते हुए अब एहतियात बरतना जरूरी हो गया है कि हम अपनी दिनचर्या और खान-पान का पूरा ख्याल रखें जिससे बीमार पडने के अपराध से बचे रहें।

आगे प्रभू राक्खा।

बुधवार, 25 अप्रैल 2012

कलकत्ते की शान, हावडा पुल



कलकत्ता  के स्मारकों की अंतिम किस्त  - 
आज जब कहीं ना कहीं कुछ साल पुराने पुलों के टूटने, नवनिर्मित या बनने के दौरान ही गिर जाने वाले पुलों की खबर आती है तो इस पुल को इस उम्र में भी सीना ताने, अथक मेहनत करते देख इसके बनाने वालों के प्रति आदर से सर झुक जाता है।

हावडा पुल। वर्षों-वर्ष इस अनूठे अजूबे के ऊपर से दिन में दो बार गुजरना होता रहा। कभी बस से, कभी ट्राम से     और कभी-कभी पैदल भी, पर कभी इसको ध्यान से नहीं देखा था। अलबत्ता नवागंतुकों को हावडा स्टेशन से निकलते ही पूरा सर उठा कर इसे देखना ध्यान में जरूर आ जाता था। पर अब दूर रह कर इसकी अहमियत समझ में आती है।  

कस्बे हावडा की खुशकिस्मति थी कि दुनिया के व्यस्ततम कैंटीलीवर पुलों में से एक यह पुल यहां बना जिससे वह भी संसार भर में मशहूर हो गया, नहीं तो दुनिया के विशाल और व्यस्ततम रेल स्टेशनों में से एक होते हुए भी शायद उसका इतना नाम नहीं होता।  

हुगली नदी के दोनों किनारों पर पसरा, हावडा और कलकत्ते को जोडता, बाहर से आने वालों के लिए प्रवेश-द्वार सरीखा, विश्व का अनोखा कैंटिलीवर पुल, कब कलकत्ते की एक पहचान बन गया पता ही नहीं चला। यह सिर्फ एक पुल ही नहीं कलकत्ते की जीवन रेखा है। रोज हजारों-हज़ार लोग कलकत्ते के आस-पास के इलाकों से काम करने, अपनी रोजी-रोटी कमाने और शहर की जरूरतों को पूरा करने के लिए इस पर से गुजरते हैं। देश के कोने-कोने के विभिन्न स्थानों से लोग हावडा स्टेशन पर उतर शहर जाने से पहले इसी के दर्शन करते हैं। 

इसके पहले इस जगह पर एक पुराना पुल हुआ करता था, पर नदी में रोज दो बार तेज ज्वार-भाटे के कारण खतरे की आशंका  सदा बनी रहती थी। इसीलिए तत्कालीन सरकार ने एक मजबूत और ऊंचा पुल बनवाने का निर्णय लिया। जिसके फलस्वरूप 1939 में बनना शुरु हो कर 1943 में इस नये पुल का स्वरूप सामने आया। 

करीब सात सालों में पूरे हुए इस 8 लेन के 705 मीटर लम्बे और 71 फुट चौडे पुल के दोनों तरफ 15-15 फुट के दो पैदल पथ पद-यात्रियों के लिए बने हुए हैं। इस पूरी बनावट का भार इसके दोनों सिरों पर 90 मीटर ऊंचे दो विशाल जल-रोधक स्तभों ने उठा रखा है। उनके अलावा बीच में कोई सहारा या खंभा नहीं है। इसे बनाने में करीब 26500 टन लोहे की खपत हुई थी। एक आश्चर्यजनक तथ्य यह भी है कि इसमें कहीं भी "नट-बोल्ट" का इस्तेमाल नहीं किया गया है। सारी की सारी जुडाई "रिवेट" के द्वारा हुई है। उस जमाने में इसके बनने में 2,5000000 रुपये का खर्च आया था। आज तो इतने पैसे पर बिचौलिए भी नहीं मानते।  

आज इसके ऊपर से करीब 60 से 70 हजार विभिन्न तरह की गाडियां और अनगिनत लोग आवाजाही करते हैं। आजादी के बाद इसका नाम "रविंद्र सेतु" कर दिया गया है। पर ज्यादातर लोग अभी भी इसे "हावडा ब्रिज" के नाम से ही जानते हैं। इसकी खूबसूरती को निहारना हो तो नदी में नौका में या स्टीमर में बैठ इसके बीचो-बीच जा कर देखें, एक अद्भुत नजारा पेश आएगा। तभी समझ भी आएगा कि क्यों इसका अनगिनत, विभिन्न भाषाओं की फिल्मों में फिल्माकन किया गया है। 

आज जब कहीं ना कहीं कुछ साल पुराने पुलों के टूटने, नवनिर्मित या बनने के दौरान ही गिर जाने वाले पुलों की खबर आती है तो इस पुल को इस उम्र में भी सीना ताने, अथक मेहनत करते देख इसके बनाने वालों के प्रति आदर से सर झुक जाता है।


# सारे  आंकड़े  और चित्र अंतरजाल से साभार

शनिवार, 21 अप्रैल 2012

कोलकाता की शहीद मीनार

कलकत्ता/कोलकाता से संबंधित चौरंगी, विक्टोरिया मेमोरियल के बाद यह तीसरी किस्त है.  शहीद मीनार भी कोलकाता में अपनी विशिष्ट पहचान रखती है तथा अच्छे-बुरे समय की गवाह रही है.  
  
कलकत्ता/कोलकाता की पहचान बताने वाले स्मारकों में एक मीनार भी शामिल है। जो कोलकता के दिल चौरंगी के पास स्थित है। यह भी दिल्ली की कुतुब मीनार की तर्ज पर जंग में फतह की निशानी के तौर पर बनाई गयी थी। सन 1848 में सर डेविड आक्टरलोनी ने नेपाल की लडाई में अपनी विजय को यादगार बनाने के लिए इसे बनवाया था। इसी लिए पहले इसे "आक्टरलोनी मौन्यमंट" के नाम से जाना जाता  था। पर सन 1969 से इसे एक नया नाम दे दिया गया, "शहीद मीनार"। जो देश की आजादी के लिए शहीद हुए देशभक्तों की याद में रखा गया था। 

आजकल यहां, दिल्ली के 'जंतर-मंतर' की तरह, विभिन्न दलों के जुलुसों की शुरुआत, ऐतिहासिक समारोहों का आयोजन या दलों द्वारा विरोध प्रदर्शन के लिए बैठकें आयोजित की जाती हैं। यहां हुई ऐसी सबसे पहली बैठक का ब्योरा 1931 का मिलता है, जब कवि-गुरु रविंद्रनाथ टैगोर ने एक दिक्षांत समारोह का सभापतित्व करते हुए अंग्रेज सरकार के कार्यों के प्रति विरोध प्रगट किया था।               
     
इस मीनार की ऊंचाई 158 फिट है तथा ऊपर की तरफ दो छज्जे, खडे होने के लिए बने हुए हैं। ऊपर जाने के लिए मीनार की गोलाई के साथ-साथ अंदर की ओर सीढियां बनी हुई हैं जिनकी संख्या 223 है। मीनार के ऊपर से शहर की खूबसूरती को बखूबी निहारा जा सकता है। पर कुछ वर्षों पहले कुछ दुखद हादसों के कारण इस पर निर्बाध चढना बंद करवा दिया गया है। अब इस पर चढने के लिए कोलकाता पुलिस से इजाजत लेनी पडती है।

गुरुवार, 19 अप्रैल 2012

तीन टन की मूर्ति, जो हवा के झोंके से घूमती है


इस  इमारत की  सबसे   अनोखी,   आश्चर्यजनक,   अनूठी  तथा   हैरतंगेज वस्तु है,  मेमोरियल  के सिरे पर स्थापित एक परी की मूर्ति, जिसके एक हाथ में बिगुल है।  काले  कांसे से  बनी   इस मूर्ति  का वजन तीन टन है। इसे ऐसे स्थापित किया गया है कि 15 की.मी. की  गति से  हवा के  चलते ही यह उसकी दिशा में घूम जाती है। इंजीनियरिंग का यह बेजोड़ और अनूठा कमाल है

विक्टोरिया मेमोरियल, कोलकाता की शान और पहचान। जिसे अंग्रेजों ने अपनी साम्राज्ञी रानी विक्टोरिया और अंग्रेजों के स्वर्णिम शासन काल की याद में उस समय की भारत की राजधानी में इस भव्य इमारत को बनवाया था। उनकी इच्छा थी कि यह इमारत आगरे के ताजमहल से भी ज्यादा भव्य हो। संसार के कुशलतम शिल्पी विलियम एमर्सम के अथक प्रयास और देश के सबसे उत्तम मकराना के संगमरमर से सजने के बावजूद, अपने आप में शिल्प और कला का यह नायाब नमूना ताज की बराबरी तो नहीं कर पाया पर संसार की सुंदरतम इमारतों में अपने आप को शुमार जरूर करवा लिया। इसके अंदर एक छोटा सा पर बहुत खूबसूरत सलीके से सजाया गया म्यूजियम भी है जहां विक्टोरिया युग के आयुध, पेंटिंग, मुर्तियां, सिक्के, डाक-टिकट, कपडे, कलाकृतियां आदि बडे आकर्षक तरीके से लोगों के ज्ञानार्जन के लिए रखे गये हैं।       

ऐसा हो ही नहीं सकता कि कोलकाता आने वाला कोई भी पर्यटक इस 338x228 और 184 फिट की कलाकृति को देखे बिना वापस चला जाए। बाहर से आने वालों को छोडिए बंगवासी यहां के रहवासी भी यहां बार-बार आने का मोह छोड नहीं पाते हैं। 

पर इस इमारत की सबसे अनोखी, आश्चर्यजनक, अनूठी तथा हैरतंगेज वस्तु है, मेमोरियल के सिरे पर स्थापित एक परी की मूर्ति जिसके एक हाथ में बिगुल है। इसे "एंजल आफ़ विक्टरी" के नाम से जाना जाता है। काले कांसे से बनी 16 फिट की इस मूर्ति का वजन तीन टन है। 23 बाल-बेयरिंगों की सहायता से इसे ऐसे स्थापित किया गया है कि 15 की.मी. की गति से हवा के चलते ही यह उसकी दिशा में घूम जाती है। यानि यह हवा की दिशा बतलाने वाला यंत्र यानि  "Weather-Cock"  है। इतने ज्यादा वजन के बावजूद हवा के झोंके से घूम जाने वाला इंजिनियरिंग का कमाल। जो पूरे ३६० डिग्री तक घूमने की क्षमता रखता है.   

1921 में बनाया गया यह अजूबा वर्षों-वर्ष बिना किसी खराबी के अपनी कसौटी पर खरा उतरता रहा। पहली बार 1985 में इसके घूमने में रुकावट आयी थी, वह भी इमारत का रख-रखाव करते हुए धूल-मिट्टी के कारण इसके बेयरिंग के जाम होने से। उसे तुरंत ठीक भी कर लिया गया था। पर 1999 में आकाशीय बिजली के गिरने से इसका घूमना बिल्कुल बंद हो गया था। पर 6 सालों की अथक मेहनत से इसे फिर अपनी पूर्वावस्था में लाने में कामयाबी हासिल कर ली गयी।  पूरा काम बहुत जोखिम भरा था जरा सी चूक इस ऐतिहासिक  इमारत को मंहगी पड सकती थी। इसी लिए बहुत सावधानी पूर्वक हर कदम को फूंक-फूंक कर रखते हुए सारे काम को अंजाम दिया गया था। 

बंगवासी बेहद संवेदनशील होते हैं। मूर्ति  भले ही अंग्रेजों की देन हो पर उससे सारे बंगाल के रहवासियों को हार्दिक लगाव था तभी तो उसके खराब होने पर पूरे बंगाल में जैसे शोक की लहर दौड गयी थी। पर उसका ठीक होना भी किसी उत्सव से कम नहीं रहा।




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यूपी का रहस्यमयी मंडुक मंदिर

ओयल कस्बे में स्थित लगभग 200 साल पुराने नर्मदेश्वर महादेव मंदिर को सुख-समृद्धि का प्रतीक माना जाता है, इसके साथ ही यहां एक और आश्चर्यजनक बात...