विरोध करना हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है फिर भले ही वह किसी अच्छे काम के लिए ही क्यों ना किया जा रहा हो। हमारी परंपरा रही है कि हम विरोध जरूर करते हैं, पर देखभाल कर, हर तरफ से निश्चिंत हो कर, सामने वाले को तौल-ताल कर। यदि राई-रत्ती भर की भी अपने अनिष्ट की आशंका होती है तो दीदे दिखा कर तुरंत पीछे जा खड़े होते हैं।
हमने राम को नहीं छोड़ा बाली वध पर प्रश्न खड़े कर-कर के अपने को विद्वान साबित करते रहे। कृष्ण की लीलाओं को सवालों से बिंधते रहे। ऐसे लोगों की कमी नहीं है जिन्होंने मंगल पाण्ड़ेय की क्रांति को धर्म से जोड़ उसकी अहमियत कम करनी चाही। मूढमतियों ने झांसी की रानी पर दोषारोपण किया कि जब तक झांसी पर आंच नहीं आई उनका विद्रोह उजागर नहीं हुआ। महात्मा गांधी को तो खलनायक ही बना दिया गया। बहूतेरे ऐसे ही उदाहरण मिल जाएंगे। पर किसी ने सत्ताधीश पर सीधे आकर आंख मिला आरोप लगाने की हिम्मत की? फिर चाहे चीनी तिगुने दामों वाली हो गयी हो, खाद्यानों की कीमत आकाश छू रही हो, पेट्रोल बजट में आग लगा रहा हो, शराब की कीमत से पानी का मूल्य ज्यादा हो गया हो और फिर भी साफ ना मिल पाता हो, 1-2 रुपये का नमक 20 का कर दिया गया हो, ईलाज करवाने से लोग ड़रने लगे हों, बच्चों को पढाना मुश्किल हो गया हो यहां तक कि अपने ही पैसे लेने के लिए पैसे देने पड़ते हों, विधवाओं, निराश्रितों, पेंशन याफ्ता लोगों को भी "गिद्ध' नोचने से बाज नही आते हों।
हां, नुक्ताचीनियां जरूर करते रहे, अपना दुखड़ा आपस में रोते रहे, बदहाली में जीते रहे पर ऐसा करने वाला या ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न करने वाला जब बगुला बन कभी "नीले चांद" के दिन सामने आ भी जाता हो तो सड़कों की ऐसी की तैसी कर दसियों द्वार बना, मनों फूल मालाएं लाद, चेहरे पर कृतज्ञता का भाव ला गला फाड़-फाड़ कर उसका स्तुतिगान करते नहीं थके।
इतिहास गवाह है कि जब-जब क्रांतियां हुई हैं उनका विरोध भी हुआ है। फिर उनके पीछे चाहे कार्ल्स रहे हों चाहे लेनिन चाहे सू, चाहे भगत सिंह और चाहे गांधी। उसी तरह आज भी जब एक चौहत्तर साल का इंसान भूखा-प्यासा रह, हर तरह से अघाए, दूध, चीनी, चावल-गेहूं को तो छोड़ दें, लोहा-लक्कड़, सिमेंट, गिट्टी, सड़क, पुल, जमीन, मशीन यहां तक कि देश के गौरव को भी हजम करने वालों के सामने सीना तान खड़ा हुआ है, वह भी अपने लिए नहीं, तो उसी की मंशा पर शक करने, उसकी कार्य पद्दति पर उंगली उठाने वालों की लाईन लग गयी है। गोया कि उसके साथ खड़े सारे देशवासी बेवकूफ हैं और ये जनाब विशेषज्ञ, वह भी छोटे-मोटे नहीं दसियों सालों से शोध करने वाले। ठीक है माना जा सकता है कि 90 प्रतिशत को बिल का मतलब पता नहीं होगा पर वह उसका अर्थ जान कर अपना ज्ञान बढाने नहीं खड़े हुए हैं वह सब आए हैं, तानाशाही, भुखमरी, लूट-खसोट, शांत जीवन की चाह में एकजुट हुए हैं।
राजस्थान में एक कहावत है कुछ ऐसी कि "रोतो जावेगो तो मरे की खबर लावेगो", तो मेरा यही मानना है कि पहले से ही अंजाम को शंका की दृष्टि से क्यों देखना। बनने दीजिए इस आंधी को तूफान जिससे सड़े-गले, सुखे-जर्जर, कंटीले पेड़ जमींदोज हो ही जाएं। वैसे असर शुरू हो गया है, कहते हैं चोरों में हिम्मत नहीं होती तो खबरें आ रही हैं कि हमारे देश के सेवकों की सुरक्षा बढाई जा रही है। जनता के प्रतिनिधियों को जनता से ही डर लगने लगा है इसीलिए उनके घरों को और महफूज किया जा रहा है। जनता के पैसों को हड़पने वालों की सुरक्षा जनता के पैसों से ही की जा रही है।
इस ब्लॉग में एक छोटी सी कोशिश की गई है कि अपने संस्मरणों के साथ-साथ समाज में चली आ रही मान्यताओं, कथा-कहानियों को, बगैर किसी पूर्वाग्रह के, एक अलग नजरिए से देखने, समझने और सामने लाने की ! इसके साथ ही यह कोशिश भी रहेगी कि कुछ अलग सी, रोचक, अविदित सी जानकारी मिलते ही उसे साझा कर ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाया जा सके ! अब इसमें इसको सफलता मिले, ना मिले, प्रयास तो सदा जारी रहेगा !
रविवार, 21 अगस्त 2011
मंगलवार, 16 अगस्त 2011
पहले स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले से तिरंगा फहराए जाते वक्त महात्मा गांधी कहां थे?
स्वतंत्रता दिवस आता है चला जाता है। पर कभी किसी ने सोचा कि आजादी के पैरोकार महात्मा गांधी क्यों नहीं उपस्थित थे उस समय जब पहली बार लाल किले से तिरंगा फहराया गया। कहां थे वे, क्या कर रहे थे उस समय? सत्ता मिलते ही उन्हीं को उन्हीं के अनुगामियों ने कैसे भुला दिया?
15 अगस्त 1947, सारी धरती, सारा आकाश, स्त्री-पुरुष, अबाल-वृद्ध सब जने ड़ूबे हुए थे आनन्दसागर मे, हर देशवासी सैंकडों सालों से प्रतिक्षित आजादी को अपने सामने पा खुशी के मारे बावरा बन गया था। देश का बच्चा-बच्चा जिस दिन खुशी से पागल हो उठा था, उस दिन इस जश्न का पैरोकार, इस उत्सव का सुत्रधार, इस स्वप्न को मूर्तरूप देने वाला शिल्पी, देश के एक कोने मे स्थित कलकत्ता मे, अमन चैन की रक्षा हेतु उपवास और प्रार्थना कर रहा था।
महात्मा गांधी ने आजादी की खुशी मे मनाए जा रहे किसी भी समारोह मे भाग नहीं लिया। उनके लिये यह 15 अगस्त भी आम दिनों की तरह ही रहा। रमजान का महीना था। लोग बापू के प्रति आदर व्यक्त कर अपना रोजा खोलना चाहते थे। सो बापू अन्य दिनों की अपेक्षा और जल्दी सो कर उठ गये थे। सुबह आने वालों मे हिंदू भी थे। गांधीजी सबसे मिले। फिर गीता का पाठ करने लगे। इसके बाद सदा की तरह प्रात: भ्रमण के लिए निकल पडे। सडकों पर उनके दर्शन के लिए भीड एकत्रित थी। करीब आठ बजे बापू लौटे और एकत्रित जनों से कहा कि आज हमें आजादी मिली है परन्तु इसके साथ ही हमारी जिम्मेदारी भी बढ गयी है। जिस चरखे ने हमें आजादी दिलाई है उसे हमे नहीं भूलना है। उपवास से हमारा शरीर शुद्ध होता है। इस प्रकार हमें शुद्ध होकर प्रभू से प्रार्थना करनी है कि वे हमें आजादी के काबिल बनाएं। यह हमारी परीक्षा की घड़ी है।
गांधीजी का एक अलग ही सपना था, आजादी को लेकर, वे चाहते थे कि सारे भारतवासी अपने आप को आजादी के काबिल बनाएं। उनका कहना था कि हमें प्रभू को धन्यवाद देना चाहिए कि उसने हम गरीब भारतवासियों के बलिदान का फ़ल दिया है। आजादी का दिन हमारी परीक्षा का दिन है। इस दिन सब उपवास रखें। चरखा चलाएं। किसी तरह की गडबडी ना हो। आजादी के लिए रोशनी के द्वारा समारोह करना उचित नहीं है। जबकि देश की जनता के पास प्रयाप्त अनाज, तेल और कपडा नहीं है। बापू नहीं चाहते थे कि 1946 की पुनरावृती हो। फिर भी कलकत्ता अशांत हो गया था और उन्हें आजादी का पहला दिन वहीं बिताना पडा था। अमन-चैन की बहाली के वास्ते। बापू प्रार्थना मे मुश्किल से ध्यान लगा पा रहे थे क्योंकि हजारों लोग उनसे मिलने और यह कहने आ रहे थे कि उन्हीं के कारण देश यह दिन देख सका है। इस कारण वे कुछ नाराज से हो गये और उन्होंने भवन का मुख्य द्वार बंद करवा दिया। बाद मे बंगाल सरकार के मंत्रीगण उनसे मिलने आए तो बापू ने स्पष्ट शब्दों मे उनसे कहा कि आज आपने अपने सर पर कांटों का ताज पहना है। सत्ता बेहद बुरी चीज है। आपको गद्दी पर बैठ कर सदा चौकस रहना होगा। आपको सत्यवादी, अहिंसक, विनम्र तथा सहनशील होना होगा। धन-दौलत-सत्ता के लालच मे नहीं फंसना है। आप गरीबों की सेवा के लिए हैं। अंग्रेजों के शासन की परीक्षा तो खत्म हो गयी है अब हमारी परीक्षा का कोई अंत नही ईश्वर आपकी मदद करे। लाख बुलाने पर भी गांधीजी किसी समारोह मे नहीं गये।
शाम को प्रार्थना सभा मे जबरदस्त भीड़ थी। प्रार्थना के बाद उन्होंने फिर जनता को संबोधित कर कहा कि आज आजादी का पहला दिन है। राजाजी गवर्नर हो गए हैं। लोगों ने सोचा कि अब आजादी मिल गयी है, सो उन्होंने राजाजी के घर पर कब्जा जमा लिया। यह अच्छी बात है कि लोग जान गये हैं कि सबको समानता का अधिकार है, पर यह दुख की बात है कि वे सोचने लगे हैं कि उन्हें मनचाहा काम करने, चीजों को तोडने-फ़ोडने और नष्ट करने की भी आजादी मिल गयी है। जनता ऐसा काम ना कर, खिलाफ़त आंदोलन के समय जैसी एकता दर्शाई थी वैसी ही भावनाएं बनाए रखे। उस शाम गांधीजी के साथ सुहरावर्दी भी थे, उन्होने भी बापू के बाद सभा को संबोधित करते हुए हिन्दु-मुसलिम एकता की दुहाई दी, सबने मिल कर जय-हिंद का नारा बुलंद किया। गांधीजी के चेहरे पर उस दिन पहली बार मुस्कान की आभा दिप्त हुई। फिर बहुत अनुरोध करने पर बापू शहर मे की गयी रोशनी देखने निकले। लोगों का सैलाब उनकी ओर उमड पडा। छोटे-छोटे बच्चे बेहद आतुरता से उनके हाथ थामने को लपकते रहे। भीड उन पर गुलाब की पंखुडियों की बौछार करती रही। करीब दस बजे बेहद थक कर गांधीजी लौटे और बिना किसी से बात किए सोने चले गये।
स्वतंत्र भारत की नियती से स्वतंत्रता संग्राम के महानायक की यह पहली मुठभेड थी।
रविवार, 14 अगस्त 2011
भारत के पहले 'इंटरनेट गुरु' शम्मी कपूर नहीं रहे।
अपने समय मे विद्रोही, लीक से हट कर, अपनी विशिष्ट शैली से लाखों लोगों को अपना मुरीद बनाने वाले, अभिनय के दिग्गजों के बीच भी अपनी अलग पहचान बनाए रखने में कामयाब, खिलंदड़े कलाकार के रूप में माने जाने वाले शम्मी कपूर नहीं रहे। उनकी अदाकारी, कलाकारी या अभिनय जैसा भी रहा हो वह अलग बात है पर इंटरनेट को अपनाने वाले वह पहले कलाकार थे। उनका झुकाव नये "गजटों" की तरफ उसी तरह था जैसे एक बच्चे का खिलौनों को लेकर होता है।
बहुत से लोगों को यह जान कर हैरत होगी कि शम्मीजी 1988 से कम्प्यूटर और इंटरनेट का लगातार इस्तेमाल करते आ रहे थे। इस तरह भारत में इस टेक्नोलोजी का सबसे पहले उपयोग करने वाले इने-गिने लोगों में उनका स्थान था।
जब पहली बार वे कम्प्यूटर और प्रिंटर घर लाए थे तो दिन भर उस पर अपने प्रयोग करते रहते थे। एक बार उनके दामाद केतन देसाई के साथ अनिल अंबानी उनके घर आए तो सारा ताम-झाम देख कुछ समझ ना पाये और पूछ बैठे कि क्या शम्मी अंकल ने घर पर ही डेस्क-टाप पब्लिशिंग शुरू कर दी है। इतने बडे ओद्योगिक समूह रिलायंस के अनिल अंबानी द्वारा ऐसा सवाल यह दर्शाता है कि उस जमाने में पर्सनल कम्प्यूटर नाम की किसी चीज से लोग कितने अनभिज्ञ थे। इसीसे यह तथ्य भी पुख्ता होता है कि शम्मीजी भारत में कम्प्यूटर और इंटरनेट के घरेलू उपयोग को बढ़ावा देने वाले रहे हैं। इसीलिए उन्हें भारत का पहला इंटरनेट गुरू या साइबरमैन कह कर पुकारा जाता था।
भगवान उनकी आत्मा को शांति दे और उनके परिवार को इस दुख को सहने का सामर्थ्य।
गुरुवार, 11 अगस्त 2011
स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले से ही तिरंगा क्यों फहराया जाता है ?
स्वतंत्रता दिवस की पहली सुबह, सारा देश रात भर सो ना पाया था। अंग्रेजों के चंगुल से लहूलुहान स्वतंत्रता को छीन लाने में हजारों-हजार नवजवान मौत का आलिंगन कर चुके थे। उनकी शहादत रंग लाई

थी। सारा देश जैसे सड़कों पर उतर आया था। लोगों की आंखें भरी पड़ी थीं खुशी और गम के आंसूओं से। खुशी आजादी की, गम प्रियजनों के बिछोह का।
दिल्ली तो जैसे पगला गयी थी। होती भी क्यों ना आजाद देश की राजधानी जो थी। हुजूम का हुजूम, ठट्ठ के ठट्ठ बढे जा रहे थे लाल किले की ओर। आज यह एतिहासिक किला भी फूला नहीं समा रहा था अपने भाग्य पर। बहुत उतार-चढाव देख रखे थे इसने अपने जीवन काल में, जबसे शाहजहां, ने उस जमाने में करीब एक करोड़ की लागत से इसे नौ सालों में बना कर पूरा किया था,
तब से आज तक यह अनगिनत घटनाओं का साक्षी रहा था। इसे यह गौरव ऐसे ही नहीं मिल गया था।
1857 की क्रांति में स्वतंत्रता संग्राम के वीरों ने अंग्रेजों को मात दे कर यहीं बहादुर शाह जफर को अपना सम्राट चुना था। किला गवाह है उस इतिहास का कि कैसे बदला लेने के लिए अंग्रेजों ने मौत का तांडव शुरु कर दिया था। हजारों वीर मारे गये थे, कितनों को फांसी पर लटका दिया गया था, सैंकडों को काला पानी नसीब हुआ था। बुढे शेर को कैद कर रंगून भेज दिया गया था।

जहां यह किला मुगलों की शानो-शौकत का गवाह रहा था वहीं दो सौ साल बाद अंतिम बादशाह की दर्दनाक मौत का अभिसाक्षी भी इसे बनना पड़ा। ऐसा नहीं है कि इसके पहले या बाद में इसने जुल्मों-सितम नहीं देखे थे। सालों बाद एक बार फिर 1945 में ब्रिटिश हुकूमत ने आजाद हिंद फौज के जांबाजों, जी एस ढिल्लन, कैप्टन शाहनवाज तथा कैप्टन सहगल पर यहीं मुकदमा चला उन्हें सजा देने की कोशिश की थी पर उस समय सारा देश उनके पीछे खड़ा हो गया था। प्रचंड विरोध छा गया था पूरे देश में और डर के मारे अंग्रेजों को उन वीरों को मुक्त करना पड़ गया था। देश में विजयोत्सव मनाया गया और लाल किला उस विजय का प्रतीक बन गया। इसीलिए जब हमें आजादी मिली तब देश के पहले प्रधान मंत्री जवाहर लाल नेहरु ने सर्वसम्मति से इसे पहले स्वतंत्रता दिवस पर झंडोतोलन के लिए सबसे उपयुक्त स्थल मान यहां से सारे राष्ट्र को संबोधित किया। उसके बाद से आज तक देश का हर प्रधान मंत्री यहां से झंडा फहरा कर अपने आप को गौरवांन्वित महसूस करता है।
आप सभी को, असंख्य विडंबनाओं के बावजूद, यह शुभ दिन मुबारक हो।
जय हिंद।
मंगलवार, 9 अगस्त 2011
सुना है हवाई किराया और कम होगा :-)
सोमवार, 8 अगस्त 2011
एक अनोखा मंदिर, जहां शिवलिंग पर बिजली गिरती है.
बिजलेश्वर महादेव , जिनके दर्शन करते ही आँखें नम हो जाती हैं, मन भावविभोर हो जाता है। जिव्हा एक ही वाक्य उच्चारण करती है - त्वं शरणम ।
पिछली बार फोटो नहीं लगा पाया था उसी कमी को पूरा कर रहा हूं सावन माह के इस चौथे पावन सोमवार को।
हमारा देश विचित्रताओं से भरा पड़ा है। तरह-तरह के धार्मिक स्थान, तरह-तरह के लोग, तरह-तरह के मौसम। यदि अपनी सारी जिंदगी भी कोई इसे समझने, घूमने में लगा दे तो भी शायद पूरे भारत को देख समझ ना पाये। यहां ऐसे स्थानों की भरमार है कि उस जगह की खासियत देख इंसान दांतों तले उंगली दबा लेता है।
ऐसा ही एक अद्भुत स्थल है, हिमाचल में बिजलेश्वर महादेव। जिसे बिजली महादेव या मक्खन महादे
व के नाम से भी जाना जाता है। हिमाचल के कुल्लू शहर से 18 कीमी दूर, 7874 फिट की ऊंचाई पर "मथान" नामक स्थान में स्थित है, शिवजी का यह प्राचीन मंदिर। इसे शिवजी का सर्वोत्तम तप स्थल माना जाता है। पुराणों के अनुसार जालन्धर दैत्य का वध शिवजी ने इसी स्थान पर किया था। इसे "कुलांत पीठ" के नाम से भी जाना जाता है।
इस मंदिर की सबसे विस्मयकारी तथा अपने आप में अनोखी बात यह है कि यहां स्थापित शिवलिंग पर या मंदिर के ध्वज दंड़ पर हर दो-तीन साल में वज्रपात होता है। शिवलिंग पर वज्रपात होने के उपरांत य
हां के पुजारीजी बिखरे टुकड़ों को एकत्र कर उन्हें मक्खन के लेप से जोड़ फिर शिव लिंग का आकार देते हैं। इस काम के लिये मक्खन को आस-पास नीचे बसे गांव वाले उपलब्ध करवाते हैं। कहते हैं कि पृथ्वी पर आसन्न संकट को दूर करने तथा जीवों की रक्षा के लिये सृष्टी रूपी लिंग पर यानि अपने उपर कष्ट का प्रारूप झेलते हैं भोले भंडारी। यदि बिजली गिरने से ध्वज दंड़ को क्षति पहुंचती है तो फिर पूरी शास्त्रोक्त विधि से नया ध्वज दंड़ स्थापित किया जाता है।
मंदिर तक पहुंचने के लिए कुल्लु से बस या टैक्सी उपलब्ध हैं। व्यास नदी पार कर 15 किमी का सडक मार्ग 'चंसारी गांव' तक जाता है। उसके बाद करीब तीन किलोमीटर की श्रमसाध्य, खडी चढ़ाई है जो अच्छे-अच्छों का दमखम नाप लेती है। उस समय तो हाथ में पानी की बोतल भी एक भार सा महसूस होती है।
मथान के एक तरफ़ व्यास नदी की घाटी है, जिस पर कुल्लु-मनाली इत्यादि शहर हैं तथा दूसरी ओर पार्वती नदी की घाटी है जिस पर मणी
कर्ण नामक प्रसिद्ध तीर्थ स्थल है। उंचाई पर पहुंचने में थकान और कठिनाई जरूर होती है पर जैसे ही यात्री चोटी पर स्थित वुग्याल मे पहुंचता है उसे एक दिव्य लोक के दर्शन होते हैं। एक अलौकिक शांति, शुभ्र नीला आकाश, दूर दोनों तरफ़ बहती नदियां, गिरते झरने, आकाश छूती पर्वत श्रृंखलाएं किसी और ही लोक का आभास कराती हैं। जहां आंखें नम हो जाती हैं, हाथ जुड जाते हैं, मन भावविभोर हो जाता है तथा जिव्हा एक ही वाक्य का उच्चारण करती है - त्वं शरणं।
कण-कण मे प्राचीनता दर्शाता मंदिर पूर्ण रूप से लकडी का बना हुआ है। चार सीढियां चढ़, दरवाजे से एक बडे कमरे मे प्रवेश मिलता है जिसके बाद गर्भ गृह है जहां मक्खन मे लिपटे शिवलिंग के दर्शन होते हैं।
जिसका व्यास करीब ४ फ़िट तथा उंचाई २.५ फ़िट के लगभग है।
वहां ऊपर पहाड़ की चोटी पर रोशनी तथा पानी का इंतजाम है। आपात स्थिति मे रहने के लिये कमरे भी बने हुए हैं। परन्तु बहुत ज्यादा ठंड हो जाने के कारण रात मे यहां कोई नहीं रुकता है। सावन के महीने मे यहां हर साल मेला लगता है। दूर-दूर से ग्रामवासी अपने गावों से अपने देवताओं को लेकर शिवजी के दरबार मे हाजिरी लगाने आते हैं। वे भोले-भाले ग्रामवासी ज्यादातर अपना सामान अपने कंधों पर लाद कर ही यहां पहुंचते हैं। उनकी अटूट श्रद्धा तथा अटल विश्वास का प्रतीक है य
ह मंदिर जो सैकडों सालों से इन ग्रामिणों को कठिनतम परिस्थितियों मे भी उल्लासमय जीवन जीने को प्रोत्सहित करता है। कभी भी कुल्लु-मनाली जाना हो तो शिवजी के इस रूप के दर्शन जरूर करें।
पर एक बात जो सालती है मन को कि जैसे-जैसे यहां पहुंचने की सहूलियतें बढने लगी हैं वैसे-वैसे कुछ अवांछनीयता भी वहां स्थान पाने लगी है। कुछ सालों पहले तक चंसारी गांव के बाद मंदिर तक कोई दुकान नहीं होती थी। पर अब जैसे-जैसे इस जगह का नाम लोग जानने लगे हैं तो पर्यटकों की आवा-जाही भी बढ गयी है। उसी के फलस्वरूप अब रास्ते में दसियों दुकानें उग आयीं हैं। धार्मिक यात्रा के दौरान चायनीज और इटैलियन व्यंजनों की दुकानें कुछ अजीब सा भाव मन में उत्पन्न कर देती हैं। पर क्या कहेंगे, गंदा है पर धंधा है।
नोट :- U-tube पर सुंदर विडिओ उपलब्ध है।
सारी फोटो नहीं डाली गयीं, बार-बार "टंग" हो कर तंग कर रहा था।
पिछली बार फोटो नहीं लगा पाया था उसी कमी को पूरा कर रहा हूं सावन माह के इस चौथे पावन सोमवार को।
हमारा देश विचित्रताओं से भरा पड़ा है। तरह-तरह के धार्मिक स्थान, तरह-तरह के लोग, तरह-तरह के मौसम। यदि अपनी सारी जिंदगी भी कोई इसे समझने, घूमने में लगा दे तो भी शायद पूरे भारत को देख समझ ना पाये। यहां ऐसे स्थानों की भरमार है कि उस जगह की खासियत देख इंसान दांतों तले उंगली दबा लेता है।
ऐसा ही एक अद्भुत स्थल है, हिमाचल में बिजलेश्वर महादेव। जिसे बिजली महादेव या मक्खन महादे
व के नाम से भी जाना जाता है। हिमाचल के कुल्लू शहर से 18 कीमी दूर, 7874 फिट की ऊंचाई पर "मथान" नामक स्थान में स्थित है, शिवजी का यह प्राचीन मंदिर। इसे शिवजी का सर्वोत्तम तप स्थल माना जाता है। पुराणों के अनुसार जालन्धर दैत्य का वध शिवजी ने इसी स्थान पर किया था। इसे "कुलांत पीठ" के नाम से भी जाना जाता है।
इस मंदिर की सबसे विस्मयकारी तथा अपने आप में अनोखी बात यह है कि यहां स्थापित शिवलिंग पर या मंदिर के ध्वज दंड़ पर हर दो-तीन साल में वज्रपात होता है। शिवलिंग पर वज्रपात होने के उपरांत य
हां के पुजारीजी बिखरे टुकड़ों को एकत्र कर उन्हें मक्खन के लेप से जोड़ फिर शिव लिंग का आकार देते हैं। इस काम के लिये मक्खन को आस-पास नीचे बसे गांव वाले उपलब्ध करवाते हैं। कहते हैं कि पृथ्वी पर आसन्न संकट को दूर करने तथा जीवों की रक्षा के लिये सृष्टी रूपी लिंग पर यानि अपने उपर कष्ट का प्रारूप झेलते हैं भोले भंडारी। यदि बिजली गिरने से ध्वज दंड़ को क्षति पहुंचती है तो फिर पूरी शास्त्रोक्त विधि से नया ध्वज दंड़ स्थापित किया जाता है।
मंदिर तक पहुंचने के लिए कुल्लु से बस या टैक्सी उपलब्ध हैं। व्यास नदी पार कर 15 किमी का सडक मार्ग 'चंसारी गांव' तक जाता है। उसके बाद करीब तीन किलोमीटर की श्रमसाध्य, खडी चढ़ाई है जो अच्छे-अच्छों का दमखम नाप लेती है। उस समय तो हाथ में पानी की बोतल भी एक भार सा महसूस होती है।
मथान के एक तरफ़ व्यास नदी की घाटी है, जिस पर कुल्लु-मनाली इत्यादि शहर हैं तथा दूसरी ओर पार्वती नदी की घाटी है जिस पर मणी
कण-कण मे प्राचीनता दर्शाता मंदिर पूर्ण रूप से लकडी का बना हुआ है। चार सीढियां चढ़, दरवाजे से एक बडे कमरे मे प्रवेश मिलता है जिसके बाद गर्भ गृह है जहां मक्खन मे लिपटे शिवलिंग के दर्शन होते हैं।
जिसका व्यास करीब ४ फ़िट तथा उंचाई २.५ फ़िट के लगभग है।
वहां ऊपर पहाड़ की चोटी पर रोशनी तथा पानी का इंतजाम है। आपात स्थिति मे रहने के लिये कमरे भी बने हुए हैं। परन्तु बहुत ज्यादा ठंड हो जाने के कारण रात मे यहां कोई नहीं रुकता है। सावन के महीने मे यहां हर साल मेला लगता है। दूर-दूर से ग्रामवासी अपने गावों से अपने देवताओं को लेकर शिवजी के दरबार मे हाजिरी लगाने आते हैं। वे भोले-भाले ग्रामवासी ज्यादातर अपना सामान अपने कंधों पर लाद कर ही यहां पहुंचते हैं। उनकी अटूट श्रद्धा तथा अटल विश्वास का प्रतीक है य
पर एक बात जो सालती है मन को कि जैसे-जैसे यहां पहुंचने की सहूलियतें बढने लगी हैं वैसे-वैसे कुछ अवांछनीयता भी वहां स्थान पाने लगी है। कुछ सालों पहले तक चंसारी गांव के बाद मंदिर तक कोई दुकान नहीं होती थी। पर अब जैसे-जैसे इस जगह का नाम लोग जानने लगे हैं तो पर्यटकों की आवा-जाही भी बढ गयी है। उसी के फलस्वरूप अब रास्ते में दसियों दुकानें उग आयीं हैं। धार्मिक यात्रा के दौरान चायनीज और इटैलियन व्यंजनों की दुकानें कुछ अजीब सा भाव मन में उत्पन्न कर देती हैं। पर क्या कहेंगे, गंदा है पर धंधा है।
नोट :- U-tube पर सुंदर विडिओ उपलब्ध है।
सारी फोटो नहीं डाली गयीं, बार-बार "टंग" हो कर तंग कर रहा था।
शनिवार, 6 अगस्त 2011
"झंडा ऊंचा रहे हमारा", किसने इस गीत की रचना की ?
विजयी विश्व तिरंगा प्यारा,
झंडा ऊंचा रहे हमारा।
उस समय तक कोई झंड़े को सम्मान देने वाला ऐसा गीत नहीं बन पाया था जिसे सुन मन उद्वेलित हो सके। गणेश शंकरजी इनकी प्रतिभा से बहुत प्रभावित थे सो उन्होंने ही इन्हें कोई ऐसा गीत लिखने की जिम्मेदारी सौंप दी जो सीधा दिल तक पहुंचे। श्याम लालजी के सामने बहुत बड़ी चुन्नौती थी। काफी मेहनत और लगन से आखिर उन्होंने गीत लिखा। उसे बड़े-बड़े नेताओं ने सुना, पढा और उन सब के अनुमोदन के बाद उसे गांधीजी को दिखाया गया उन्होंने गीत को कुछ छोटा करने का परामर्श दे इसे झंडा गीत बनने का गौरव प्रदान कर दिया।
पूरा गीत इस प्रकार है :-
विजयी विश्व तिरंगा प्यारा,
झंडा ऊंचा रहे हमारा।
मातृभूमि का तन-मन-सारा
झंडा ऊंचा रहे हमारा।
लाल रंग भारत जननी का,
हरा अहले इस्लाम वली का,
श्वेत सभी धर्मों का टीका,
एक हुआ रंग न्यारा-न्यारा
झंडा ऊंचा रहे हमारा।
है चरखे का चित्र संवारा,
मानो चक्र सुदर्शन प्यारा,
हरे देश का संकट सारा,
है यह सच्चा भाव हमारा,
झंडा ऊंचा रहे हमारा।
इस चरखे के नीचे निर्भय,
होवे महाशक्ति का संचय,
बोलो भारत माता की जय,
सबल राष्ट्र है ध्येय हमारा
झंडा ऊंचा रहे हमारा।
आओ प्यारे वीरो आओ,
राष्ट्र ध्वज पर बलि-बलि जाओ
एक साथ सब मिल कर गाओ
प्यारा भारत देश हमारा,
झंडा ऊंचा रहे हमारा।
शान ना इसकी जाने पाए
चाहे जान भले ही जाए
विश्व विजय कर के दिखलाये
तब होवे प्रण पूर्ण हमारा
झंडा ऊंचा रहे हमारा।
जय हिंद।
झंडा ऊंचा रहे हमारा।
हमारे तिरंगे के सम्मान में लिखा गया यह गीत जब भी सुनाई देता है, रोम-रोम पुल्कित हो जाता है, हर भारतीय का दिल इसके प्रति श्रद्धा विभोर हो उठता है। पर इस गीत की रचना किसने की यह शायद बहुत से लोगों को मालुम नहीं है।
इस राष्ट्रीय झंडा गीत के रचनाकार थे स्वर्गीय श्री श्याम लाल गुप्त। इनका जन्म कानपुर के नरवल गांव में 16 सितंबर 1893 को हुआ था। इनके पिता का नाम श्री विश्वेश्वर गुप्त तथा माता का नाम कौश्लया देवी था। परिवार के आर्थिक संकट से जुझने के कारण श्याम लालजी बचपन से ही पढाई के साथ-साथ पिता का हाथ भी बटाया करते थे। बड़े होने के साथ-साथ इनका रुझान पत्रकारिता की ओर होता चला गया और इनकी देश भक्ति से ओत-प्रोत कविताएं तथा लेख अखबारों इत्यादि में छपने लगे जो काफी लोक प्रिय भी होते चले गये। इसी के कारण धीरे-धीरे नेताओं का ध्यान इनकी ओर गया और श्री गणेश शंकर विद्यार्थीजी की प्रेरणा से ये कांग्रेस के सक्रीय कार्यकर्ता बन गये और अपनी मेहनत और लगन के सहारे 1920 में फतेहपुर जिला कांग्रेस के अध्यक्ष पद पर पहुंच गये।
उस समय तक कोई झंड़े को सम्मान देने वाला ऐसा गीत नहीं बन पाया था जिसे सुन मन उद्वेलित हो सके। गणेश शंकरजी इनकी प्रतिभा से बहुत प्रभावित थे सो उन्होंने ही इन्हें कोई ऐसा गीत लिखने की जिम्मेदारी सौंप दी जो सीधा दिल तक पहुंचे। श्याम लालजी के सामने बहुत बड़ी चुन्नौती थी। काफी मेहनत और लगन से आखिर उन्होंने गीत लिखा। उसे बड़े-बड़े नेताओं ने सुना, पढा और उन सब के अनुमोदन के बाद उसे गांधीजी को दिखाया गया उन्होंने गीत को कुछ छोटा करने का परामर्श दे इसे झंडा गीत बनने का गौरव प्रदान कर दिया।
फिर तो यह गीत सार्वजनिक सभाओं, जुलुसों, प्रभात फेरियों के अवसर पर गाया जाने लगा और जब 1938 में हरिपुरा के ऐतिहासिक कांग्रेस के अधिवेशन के अवसर पर नेताजी सुभाष चंद्र बोस के ध्वजारोहण करते ही वहां पांच हजार लोगों ने देश के सभी महत्वपूर्ण नेताओं की उपस्थिति में भाव-विभोर हो इसे गाया तो इसे राष्ट्रीय झंड़ा गीत होने का गौरव भी मिल गया।
पूरा गीत इस प्रकार है :-
विजयी विश्व तिरंगा प्यारा,
झंडा ऊंचा रहे हमारा।
सदा शक्ति सरसानेवाला
वीरों को हर्षानेवालामातृभूमि का तन-मन-सारा
झंडा ऊंचा रहे हमारा।
लाल रंग भारत जननी का,
हरा अहले इस्लाम वली का,
श्वेत सभी धर्मों का टीका,
एक हुआ रंग न्यारा-न्यारा
झंडा ऊंचा रहे हमारा।
है चरखे का चित्र संवारा,
मानो चक्र सुदर्शन प्यारा,
हरे देश का संकट सारा,
है यह सच्चा भाव हमारा,
झंडा ऊंचा रहे हमारा।
इस चरखे के नीचे निर्भय,
होवे महाशक्ति का संचय,
बोलो भारत माता की जय,
सबल राष्ट्र है ध्येय हमारा
झंडा ऊंचा रहे हमारा।
आओ प्यारे वीरो आओ,
राष्ट्र ध्वज पर बलि-बलि जाओ
एक साथ सब मिल कर गाओ
प्यारा भारत देश हमारा,
झंडा ऊंचा रहे हमारा।
शान ना इसकी जाने पाए
चाहे जान भले ही जाए
विश्व विजय कर के दिखलाये
तब होवे प्रण पूर्ण हमारा
झंडा ऊंचा रहे हमारा।
जय हिंद।
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