शुक्रवार, 15 अक्टूबर 2010

जगत जननी माँ महागौरी

आज नवरात्रों का आठवां दिन है। आज के दिन दुर्गा माता के "महागौरी" स्वरूप की पूजा होती है।
पुराणों के अनुसार मां पार्वती ने भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए घोर तपस्या की थी जिसके कारण इनके शरीर का रंग एकदम काला पड़ गया था। शिवजी ने इनकी भक्ति से प्रसन्न होकर खुद इनके शरीर को गंगाजी के पवित्र जल से धोया जिससे इनका वर्ण विद्युत-प्रभा की तरह कांतिमान, उज्जवल व गौर हो गया। तभी से इनका नाम महागौरी पड़ा।
इनकी आयु आठ वर्ष की मानी जाती है। इनके समस्त वस्त्र, आभूषण आदि भी श्वेत हैं। इनकी चार भुजाएं हैं। ऊपर का दाहिना हाथ अभय मुद्रा में है और नीचेवाले दाहिने हाथ में त्रिशुल है। ऊपरवाले बायें हाथ में डमरू और नीचे का बायां हाथ वर मुद्रा में है। मां शांत मुद्रा में हैं। ये अमोघ शक्तिदायक एवं शीघ्र फल देनेवालीं हैं। इनका वाहन वृषभ है।
भक्तजनों द्वारा मां गौरी की पूजा, आराधना तथा ध्यान सर्वत्र किया जाता है। इस कल्याणकारी पूजन से मनुष्य के आचरण से सयंम व दुराचरण दूर हो परिवार तथा समाज का उत्थान होता है। कुवांरी कन्याओं को सुशील वर तथा विवाहित महिलाओं के दाम्पत्य सुख में वृद्धि होती है। इनकी उपासना से पूर्व संचित पाप तो नष्ट होते ही हैं भविष्य के संताप, कष्ट, दैन्य, दुख भी पास नहीं फटकते हैं। इनका सदा ध्यान करना सर्वाधिक कल्याणकारी है।

श्वेते वृषे समारूढा श्वेताम्बरधरा शुचि:।
महागौरी शुभं दद्यान्महादेवप्रमोददा ।।

गुरुवार, 14 अक्टूबर 2010

अतिश्योक्ति ही सही, पर यदि आपको अपने देश से प्यार है तो यह आपको अच्छा लगेगा.

एक पर्यटक पूरी दुनिया घूमने निकला। घूमते-घूमते वह रोम के गिरजा घर जा पहुंचा। वहां उसने एक स्वर्ण जड़ित फोन देखा जिसके पास लिखा हुआ था, एक काल के एक हजार डालर। वह बड़ा अचंभित हुआ कि सिर्फ एक काल के इतने पैसे। उसने वहां पता किया तो उसे बताया गया कि यहां से स्वर्ग में सीधे बात हो सकती है इसीलिए इतनी मंहगी काल है। वहां से वह जर्मनी गया। वहां भी उसे वैसा ही फोन और कीमत दिखी। अमेरिका में भी वही हाल था। योरोप वगैरह घूम वह खाड़ी के देशों में गया तो वहां भी उसे ऐसी व्यवस्था दिखी। अब तो वह जगहों को छोड़ हर देश के धार्मिक स्थलों में ऐसे फोन खोजता फिरा और उसे आश्चर्य हुआ कि चाहे आस्तिक हो या नास्तिक, चीन हो या जापान, अफगानिस्तान हो या पाकिस्तान, चाहे रूस हो या अमेरिका, विज्ञान की तरक्की के कारण अब सब जगह यह सहूलियत मिलने लग गयी थी।

ऐसे ही घूमते-घूमते वह पर्यटक भारत भी आ तिरुपति जा पहुंचा। उसे जिज्ञासा हुई कि यह तो सब धर्मों को मानने वाला, ईश्वर में गहरी आस्था रखने वाला देश है देखें यहां सीधे स्वर्ग से बात करने की सहूलियत है कि नहीं।
मंदिर में जरा सी कोशिश में ही उसे फोन भी दिख गया। पर वह यह देख आश्चर्यचकित हो खड़ा रह गया क्योंकि वहां एक काल का सिर्फ एक रुपया लिखा हुआ था। ऐसा कैसे हो सकता है ? यही सोचता हुआ वह मंदिर के पुजारीजी के पास गया और बोला, सर दुनिया भर में स्वर्ग में सीधे बात करने के हजारों रुपये लगते मैनें देखे हैं, पर यहां सिर्फ एक रुपया लिखा हुआ है, क्या गल्ति से ऐसा हुआ है?
पुजारी मुस्कुराए और बोले, बेटा तुम भारत में हो, जो अपने आप में स्वर्ग है। सो यहां यह लोकल काल है इसीलिए एक रुपया लिखा हुआ है।

सच है प्रकृति की नियामतों से भरपूर ऐसी जगह और कहाँ है।

"माँ कालरात्रि", स्वरूप चाहे कितना भी भयंकर हो, पर सदा शुभ फल देती हैं.

माँ दुर्गा जी की सातवीं शक्ति "कालरात्रि" के नाम से जानी जाती हैं। इनके शरीर का रंग घने अन्धकार की तरह एकदम काला है। सर के बाल बिखरे हुए हैं। गले में बिजली की तरह चमकने वाली माला है। इनके तीन नेत्र हैं। नासिका से अग्नी की भयंकर ज्वालायें निकलती रहती हैं। इनके चार हाथ हैं। उपरवाला दाहिना हाथ वरमुद्रा के रूप में उठा हुआ है तथा नीचेवाला अभयमुद्रा में है। उपरवाले बांयें हाथ में कांटा तथा नीचेवाले हाथ में खड़्ग धारण की हुई हैं। यद्यपि इनका स्वरूप अत्यंत भयानक है। परन्तु ये सदा शुभ फल देनेवाली हैं। इसी के कारण इनका एक नाम "शुभंकरी" भी है। इनका वाहन गर्दभ (गधा) है।

मां कालरात्रि दुष्टों का दमन करनेवाली हैं। इनके स्मर्ण मात्र से ही दैत्य, दानव, भूत-प्रेत आदि बलायें भाग जाती हैं। इनकी आराधना से अग्निभय, जलभय, जंतुभय, शत्रुभय यानि किसी तरह का डर नही रह जाता है।
इस दिन साधक को अपना मन 'सहस्त्रार चक्र में अवस्थित कर आराधना करने का विधान है। इससे उसके लिए ब्रह्माण्ड की समस्त सिद्धियों के द्वार खुल जाते हैं। उसके समस्त पापों का नाश हो जाता है और अक्षय पुण्यों की प्राप्ति होती है

एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता ।
लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्तशरीरिणी ।।
वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टकभूषणा।
वर्धनमूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रीर्भयंकारी।।

बुधवार, 13 अक्टूबर 2010

"माँ कात्यायनी" देवी दुर्गा का छठा स्वरूप

पुराणों के अनुसार महर्षि 'कत' के पुत्र 'ऋषि कात्य' के गोत्र में महान 'महर्षि कात्यायन' का जन्म हुआ था। इन्होंने मां भगवती की कठोर तपस्या की थी। जब दानव महिषासुर का संहार करने के लिये, त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश ने अपने तेज का एक-एक अंश देकर देवी को उत्पन्न किया था तब महर्षि कात्यायन ने ही सर्वप्रथम इनकी पूजा की थी। इसी कारणस्वरूप ये कात्यायनी कहलायीं।

इनका स्वरूप अत्यंत ही भव्य व दिव्य है। इनका वर्ण सोने के समान चमकीला तथा तेजोमय है। इनकी चार भुजाएं हैं। मां का उपरवाला दाहिना हाथ अभयमुद्रा में तथा नीचेवाला वरमुद्रा में है। बायीं तरफ के उपरवाले हाथ में तलवार और नीचेवाले हाथ में कमल पुष्प सुशोभित है। इनका वाहन सिंह है।

मां कात्यायनी अमोघ फल देनेवाली हैं। इनकी आराधना करने से जीवन में कोई कष्ट नहीं रहता। इस दिन साधक मन को 'आज्ञा चक्र' में स्थित कर मां की उपासना करते हैं। जिससे उन्हें हर तरह के संताप से मुक्त हो परमांनंद की प्राप्ति होती है।

चन्द्रहासोज्वलकरा शार्दूल वरवाहना ।
कात्यायनी शुभ दद्याद्देवी दानवघातिनी ॥

मंगलवार, 12 अक्टूबर 2010

माँ का पांचवां स्वरूप "स्कन्दमाता", जिनके पूजन से शांति और पराक्रम में वृद्धि होती है।

नवरात्रि के पांचवें दिन मां दुर्गा के "स्कन्दमाता" स्वरुप की आराधना की जाती है।

स्कन्द, भगवान कार्तिकेय का ही एक नाम है। इन्हीं की माता होने के कारण मां दुर्गा को स्कन्दमाता के नाम से भी जाना जाता है। इनकी चार भुजाएं हैं। अपनी दाहिनी भुजा में इन्होंने भगवान् कार्तिक को बाल रुप में उठा रखा है, दुसरी भुजा अभय मुद्रा में उठी हुई है तथा बाकि दोनों हाथों में कमल-पुष्प है। इनका वर्ण शुभ्र है। ये कमल के आसन पर विराजमान रहती हैं। सिंह भी इनका वाहन है।इनकी उपासना से भक्त की सारी इच्छाएं पूरी हो जाती हैं तथा उसे परम शांति और सुख की प्राप्ति होती है। स्कन्दमाता की आराधना से बालरुप स्कन्द भगवान की भी उपासना अपने आप हो जाती है।

नवरात्रि की पंचमी को स्कन्दमाता की आराधना करते समय साधक का मन विशुद्ध चक्र में अवस्थित होना चाहिए। सूर्यमंडल की अधिष्ठात्री देवी होने के कारण इनका उपासक भी अलौकिक तेज व कांति से संपन्न हो जाता है।

सिंहासनम्ता नित्यं पद्माश्रितकरद्वया।
शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी।।

सोमवार, 11 अक्टूबर 2010

जिनके सहयोग से ब्रह्मांड की रचना संभव हो सकी, "माँ कूष्मांडा"

जब सृष्टि का अस्तित्व नहीं था, चारों ओर सिर्फ़ अंधकार ही अंधकार था, तब "मां कूष्माण्डा" के सहयोग से ही ब्रह्माण्ड की रचना संभव हो पायी थी।

इनकी मंद हंसी द्वारा ब्रह्माण्ड के उत्पन्न होने के कारण इनका नाम कूष्माण्डा देवी अभिहित किया गया। यही सृष्टि की आदि शक्ति हैं। इनका निवास सूर्य लोक में माना जाता है। इनके शरीर की कांति, रंगत व प्रभा सूर्य के समान ही तेजोमय है। कोई भी देवी-देवता इनके तेज और प्रभाव की समानता नहीं कर सकता। इन्हीं के तेज से दसों दिशाएं प्रकाशमान होती हैं। इनके आठ हाथ हैं, जिनमें कमण्डल,धनुष, बाण, कमल, कलश, चक्र तथा गदा हैं। आठवें हाथ में सिद्धियां प्रदान करने वाली जप माला है। इनका वाहन सिंह है। इनकी आराधना से यश,बल आयु तथा आरोग्य प्राप्त होता है। सभी प्रकार की सिद्धियां इनके आशिर्वाद से सुलभ हो जाती हैं।

चूंकि ये ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति का कारण हैं इसलिए संतान प्राप्ति की कामना रखने वाले को मां कूष्माण्डा की पूजा अर्चना करने से लाभ होता है। इस दिन साधक का मन 'अनाहत चक्र' में अवस्थित होता है। सच्चे मन से इनकी शरण में जाने से मनुष्य को परमपद प्राप्त हो जाता है।

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सुरासम्पूर्णकलशं रूधिराप्लुतमेव च।
दधाना हरतपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे।।
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रविवार, 10 अक्टूबर 2010

परम शान्तिदायक तथा कल्याणकारी " माँ चंद्रघंटा"

नवरात्रि के तीसरे दिन, मां दुर्गा की तीसरी शक्ति "मां चंद्रघंटा" की आराधना की जाती है। इनका यह स्वरुप परम शांति तथा कल्याण प्रदान करने वाला है। इनके शरीर का रंग स्वर्ण के समान है तथा मस्तक पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र है, इसीसे इनका नाम "मां चंद्रघंटा" पड़ा। इनके दस हाथ हैं जिनमें अस्त्र-शस्त्र विभुषित हैं। इनका वाहन सिंह है।आज के दिन साधक का मन मणिपुर चक्र में प्रविष्ट होता है। मां की कृपा से उसे अलौकिक वस्तुओं के दर्शन तथा दिव्य ध्वनियां सुनाई देती हैं। पर इन क्षणों में साधक को बहुत आवधान रहने की जरुरत होती है। मां चंद्रघण्टा की दया से साधक के समस्त पाप और बाधाएं दूर हो जाती हैं। इनकी आराधना से साधक में वीरता, निर्भयता के साथ-साथ सौभाग्य व विनम्रता का भी विकास होता है। मां का ध्यान करना हमारे इहलोक और परलोक दोनों के लिए परम कल्याणकारी और सद्गति देनेवाला होता है ************************************************
पिण्डजप्रवरारूढा चण्कोपास्त्रकैर्युता।
प्रसादं तनुते मह्मां चंद्रघण्टेति विश्रुता।।
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