pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

सोमवार, 27 सितंबर 2010

नए भवनों पर बहुधा लगी "बजरबट्टू" की आकृति आखिर है किस की ?

अधिकांश नये और सुंदर बने भवनों पर एक ड़रावना कले रंग का चेहरा किसी हांडी या तख्ती पर बना छत के पास टंगा नजर आता है। जिसमें बड़ी-बड़ी मूंछें, लाल-लाल आंखें और बाहर निकले दांत दर्शाए गये होते हैं। ऐसी सोच है कि यह नये बने भवन को बुरी नजर से बचाता है। इसे ज्यादातर बजरबट्टू के नाम से जाना जाता है।
कौन है यह बजरबट्टू ? और कैसे यह बचाता है बुरी नजर से, यदि होती है तो?

पुराणों में इसके बारे में एक कथा है। जालंधर नाम का एक दैत्य हुआ करता था। उसने ब्रह्माजी को अपने तप द्वारा प्रसन्न कर असीम बल प्राप्त कर लिया था। जिसकी बदौलत उसने देवताओं को भी पराजित कर स्वर्ग पर अपना अधिकार जमा लिया था। इससे उसे अत्यधिक घमंड़ हो गया था और वह अपने समक्ष सबको तुच्छ समझने लग गया था। अहंकारवश वह नीति अनीती सब भुला बैठा था। हद तो तब हो गयी जब उसने अपने दूत के द्वारा भगवान शिव को पार्वतीजी को अपने हवाले कर देने का संदेश भिजवाया। स्वभाविक ही था शिवजी भयंकर रूप से क्रुद्ध हो उठे और उन्होंने अपना तीसरा नेत्र खोल दिया। नेत्र से भीषण तेज की ज्वाला निकली जिससे एक भयंकर दानव की उत्पत्ति हुई। उस ड़रावनी आकृति ने जैसे ही दूत पर आक्रमण किया वह तुरंत शिवजी की शरण में चला गया। इससे उसकी जान तो बच गयी पर उस दानव की जान पर बन आयी जो भूख से बुरी तरह व्याकुल था। उसने भगवान शिव से अपनी क्षुधा शांत करने की विनती की। तत्काल कोई उपाय ना हो पने के कारण शिवजी ने उसे अपने ही अंग खाने को कह दिया। भूख से विचलित उस दानव ने धीरे-धीरे अपने मुख को छोड़ अपना सारा शरीर खा ड़ाला।

वह आकृति शिवजी से उत्पन्न हुए थी इसलिए प्रभू को बहुत प्रिय थी। उन्होंने उससे कहा, आज से तेरा नाम कीर्तीमुख होगा और तू सदा मेरे द्वार पर रहेगा। इसी कारण पहले कीर्तीमुख सिर्फ शिवालयों पर लगाया जाता था। धीरे-धीरे फिर इसे अन्य देवालयों पर भी लगाया जाने लगा। समयांतर पर इसे बुराई दूर करने का प्रतीक मान लिया गया और यह आकृति बुराई या बुरी नजर से बचने के लिए भवनों पर भी लगाई जाने लगी। पता नहीं कब और कैसे यह मुखाकृति हड़िंयों या तख्तियों पर उतरती चली गयी। जैसा कि आजकल मकानों पर टंगी दिखती हैं। जिनकी ओर नजर पहले चली जाती है। इनके लगाने का आशय भी यही होता है।

इसी का बिगड़ा रूप ट्रकों या गाड़ियों के पीछे लटकते जूते भी हो सकते हैं।

शनिवार, 25 सितंबर 2010

कहते हैं तस्वीरें बोलती हैं, पर कौन सी भाषा :-)

कहते हैं तस्वीरें बोलती हैं। लो कर लो बातआप तो आनंद लीजिए इन बेंगलुरू तस्वीरों का। समझ में आए तो समझाने का कष्ट करें :-)





आज इतनी ही पचाईये कल कुछ और गरीष्ट का इंतजाम करता हूँ।



शुक्रवार, 24 सितंबर 2010

वृक्ष अकडा था या अन्याय के सामने तना था ?

वर्षों से एक कहानी पढाई/सुनाई जाती है कि एक घना वृक्ष था। विशाल, मजबूत, जिसकी छाया में इंसान हो या पशु सभी गर्मी से राहत पाते थे। उसकी ड़ालियों पर हजारों पक्षियों का बसेरा था। उस पर लगने वाले फल बिना भेदभाव के सब की क्षुधा शांत करते थे।

पर समय का फेर। एक बार भयंकर तूफान आया। ऐसा लगता था कि सारी कायनात ही खत्म हो कर रह जाएगी। लागातार पानी बरसता रहा। हवाओं ने जैसे सब कुछ उड़ा ले जाने की ठान रखी थी। प्रकृति के इस प्रकोप को वह वृक्ष भी सह नहीं पाया और जड़ से उखड़ गया।

दूसरे दिन उधर से एक ज्ञानी पुरुष अपने शिष्यों के साथ निकले। वृक्ष का हश्र देख उन्होंने अपने शिष्यों को उसे दिखा कर कहा कि देखो अहंकारी का अंत ऐसा ही होता है। घमंड़ के कारण यह विनाशकारी तूफान के सामने भी अकड़ा खड़ा रहा और मृत्यु को प्राप्त हुआ। उधर वह कोमल घास विपत्ति के समय झुक गयी और अब लहलहा रही है। इसे कहते हैं बुद्धिमत्ता।

बहुत बार मन में आया कि उस ज्ञानी पुरुष ने अपने शिष्यों को जो सबक सिखाया क्या वह सही था। वह यह भी तो बता सकते थे कि इसे कहते हैं वीरता, बहादुरी, अन्यायी के सामने ना झुकने का संकल्प। देखो और सीखो इस वृक्ष से। जिसने मरना मंजूर किया पर अन्याय के सामने झुका नहीं। वहीं यह मौकापरस्त घास है, जो लहलहा तो रही है पर हर कोई उसे रौंदता चला जाता है।

बुधवार, 22 सितंबर 2010

कामनवेल्थ खेल? नहीं जी, कामन-वेल्थ यानी सार्वजनिक धन

लगता है राष्ट्रमंडल खेलों को आयोजित करने की जबरन कोशिश गले की हड़्ड़ी बन गयी है। ठीक सांप-छछुंदर की दशा हो गयी है ना निगलते बनता है ना उगलते। हड़बड़ी का काम शैतान का होता है कहावत सही होती लग रही है। कभी कोई कमी उजागर होती है तो कभी कोई। आज पुल गिरा, कल सड़क उधड़ी थी, परसों पानी भर गया था। मुझे तो ड़र है कि बेचारा कोई जिमनास्ट अपनी हड़्ड़ी ना तुड़वा बैठे किसी कमजोर उपकरण पर करतब दिखाते हुए।

ये कामनवेल्थ खेल ना होकर सिर्फ कामन-वेल्थ यानी सार्वजनिक धन रह गया है। मौका है जो जहां है बटोर ले। बदनामी का क्या है, लोगों की यादाश्त बहुत कमजोर होती है, साल-छह महीनों में सब भूल भाल जाएंगे। नहीं भी भूले तो कौन किसका क्या बिगाड़ लेगा?

सोमवार, 20 सितंबर 2010

एक अनोखा संग्रहालय, शौचालयों का




दुनिया के हर देश मे तरह-तरह के संग्रहालय हैं। जिनमें कोशिश की गयी है अपने-अपने देश के इतिहास, विज्ञान, कला-संस्कृति को सहेज कर रखने की। पर कभी आपने किसी ऐसी चीज के म्यूजियम के बारे में सुना है जो जिंदगी तो क्या रोजमर्रा में काम आने वाली अहम वस्तु है। शायद सुना भी हो।
"शौचालयों का म्यूजियम।" जिसे अंजाम दिया है देश में इंसान को अपने सर पर ‘मैला’ ढोने के अभिशाप से मुक्ति दिलवाने के लिये “सुलभ शौचालयों” की श्रृंखला बनाने वाले डा विंधेश्वरी पाठक ने। अपने एन.जी.ओ. द्वारा।
बिहार से शुरुआत कर सारे देश में धीरे-धीरे स्वच्छता का विस्तार करने वाले पाठकजी के मन में एक ऐसा संग्रहालय बनाने की बात आई जिसमें इस अहम वस्तु के इतिहास और समय-समय पर हुए बदलाव के बारे में पूरी जानकारी हासिल हो। इस योजना को मूर्त रूप देने में इनको अपना अमूल्य समय और ऊर्जा खपानी पड़ी। उन्होंने देश विदेश में आधुनिक और पुरातन काल में काम मे आने वाले शौचालयों के बारे में छोटी से छोटी जानकारी हासिल की। इसके लिये वह जगह-जगह विशेषज्ञों, जानकारों के अलावा अलग-अलग देशों के दूतावासों, उच्चायुक्तों से मिले जिन्होंने उनकी पूरी सहायता कर उन्हें इस क्षेत्र में समय-समय पर आए बदलाव, तकनिकी और शोध की विस्तृत जानकारी तथा फोटो वगैरह उपलब्ध करवाए। जो दिल्ली में "पालम-दाबड़ी मार्ग पर स्थित महावीर एन्कलेव" मे बने संग्रहालय में आम जनता के लिए उपलब्ध हैं। इस अजायबघर का उद्देश्य है, इस क्षेत्र में समय-समय पर आए बदलाव और विकास की लोगों को जानकारी देना । जिससे इस क्षेत्र से सम्बंधित लोगों को अपनी वस्तुएं बनाने में उपयोगी जानकारी मिल सके। जिससे वातावरण को दुषित होने से बचाया जा सके और प्रकृति को स्वच्छ रखने मे मदद मिल सके।
इस जगह का उचित प्रचार नहीं हो पाया है। यही कारण है कि दुनिया के इस एकमात्र अजूबे को देश-विदेश की तो क्या ही कहें, अधिकाँश दिल्ली वासियों को भी इसकी खबर नहीं है।










रविवार, 19 सितंबर 2010

पढ़िए, गुदगुदाएंगे जरूर,

आज सबेरे की अखबार में छपे कुछ चुटकुले गुदगुदा गए। सोचा खुशी बाँट ली जाए।

# पति - हमारी शादी को इतने साल हो गये पर तुम्हारा तेरा-मेरा खत्म नहीं हुआ। हर समय यह मेरे पैसे, मेरे गहने, मेरे बच्चे मेरा घर करती हो। कभी तो यह हमारा है, कहा करो।अब इतनी देर से क्या खोज रही हो अलमारी मे?हमारा पेटीकोट। पत्नी ने जवाब दिया।

# शर्माजी ने अपने पोते से कहा, बेटा एक ग्लास पानी ले आ। पोता बोला मैं अपना काम कर रहा हूं, मैं नहीं जाता।पास बैठा दूसरा पोता बोला, दादू ये बहुत बदतमीज है, बात नहीं सुनता। आप खुद ही जा कर ले लीजिए।

# छेदी लाल अपनी कार के लोन की किस्त नहीं चुका पाया था जिसके फलस्वरूप बैंक वाले उसकी कार उठा कर ले गये थे। वह बैठा-बैठा सोच रहा था कितना अच्छा होता यदि उसने अपनी शादी के लिए लोन लिया होता।

क्या आपने किसी ऐसे संग्रहालय के बारे में सुना है जो सिर्फ शौचालयों को समर्पित हो? वह भी अपने देश में? कल देखते हैं, कैसा है यह अनोखा, अनूठा म्यूजियम जिसमे प्राचीन काल से लेकर आधुनिक काल तक का इतिहास समेट रखा है दिनचर्या की इस अहम् वस्तु का।

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इन दोनों देशभक्ति से ओत-प्रोत संगीत रचनाओं में एक समानता यह है कि इनकी रचना बंगाल में, वहां की दो महान विभूतियों के द्वारा की गई है ! हमारा ...