प्राचीन काल से ही हमारे पूरे देश में लोक कथाओं, गीतों, पहेलियों तथा लोकोक्तियों इत्यादि द्वारा गूढ से गूढ बातों को सरलता से समझाने की परंपरा रही है। खासकर कथा-कहानियां सदा से रोचक, भावप्रद तथा शिक्षापूर्ण होती हैं। ऐसी ही एक छत्तीसगढी लोक कथा हिंदी में प्रस्तुत है, जिसमें हास्यरस, आस्था, साहस, सूझबूझ और शिक्षा का समावेश है।
एक गांव के बाहर एक वट वृक्ष पर एक भूत रहा करता था। एक दिन कुछ गांव वालों ने पेड़ के आसपास गंदगी फैला दी। भूत इससे नाराज हो गया और उसने सारे गांव वालों को मार ड़ाला। इसी बीच गांव का एक लड़का जो अपने ननिहाल गया हुआ था, लौट कर आया तो उसने सारे गांव को सुनसान पाया। उसे कुछ समझ नहीं आया पर रात हो रही थी सो वह अपने घर के अंदर चला गया। थोड़ी देर बाद भूत घूमता-फिरता वहां आया और लड़के को देख बोला, तू कौन है जो यहां घुस आया है? मैने सारे गांव वालों को मार दिया है। तुम्हें भी मार ड़ालूंगा। मुसीबत सामने देख कर भी लड़का घबराया नहीं अपनी बुद्धी से काम लेते हुए उसने भूत से कहा, मामा मैं बहुत दिनों बाद घर लौटा हूं। थक भी बहुत गया हूं, अपने घर में मुझे थोड़ी सी जगह दे दो। मेरी मां कहा करती थी कि मामा का दिल बहुत बड़ा होता है। मुझ पर दया करो। भूत को लड़के पर तरस आ गया और उसने उसे घर में रहने की अनुमति दे दी।
इधर भूत को रोज ब्रह्माजी के यहां हाजिरी देने जाना पड़ता था। एक दिन लड़के ने उससे पूछा, मामा तुम रोज-रोज कहां जाते हो ?
मुझे रोज हाजिरी देने ब्रह्माजी के दरबार में जाना पड़ता है। भूत ने जवाब दिया।
अच्छा इस बार जाओ तो ब्रह्माजी से कह कर मेरी उम्र बढवा देना। भूत मान गया। पर दूसरे दिन उसने बताया कि वहां कहा गया है कि जिसकी जितनी उम्र होती है वह ना तो कम की जा सकती है नाहीं बढाई जा सकती है। लड़के ने सोचा कि जब दुनिया को बनाने वाले ब्रह्माजी भी किसी की उम्र कम ज्यादा नहीं कर सकते तो यह भूत मुझे कैसे मार सकता है। यह सोच एक दिन जब भूत ऊपर गया हुआ था तो लड़के ने एक मजबूत लाठी ली और भूत का इंतजार करने लगा। भूत के आते ही उसने लाठी से उसको मारना शुरु कर दिया। भूत इस अचानक आक्रमण से ड़र कर जो भागा तो फिर कभी लौट कर नहीं आया।
जैसे उस लड़के के दिन फिरे, सबके फिरैं।
इस ब्लॉग में एक छोटी सी कोशिश की गई है कि अपने संस्मरणों के साथ-साथ समाज में चली आ रही मान्यताओं, कथा-कहानियों को, बगैर किसी पूर्वाग्रह के, एक अलग नजरिए से देखने, समझने और सामने लाने की ! इसके साथ ही यह कोशिश भी रहेगी कि कुछ अलग सी, रोचक, अविदित सी जानकारी मिलते ही उसे साझा कर ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाया जा सके ! अब इसमें इसको सफलता मिले, ना मिले, प्रयास तो सदा जारी रहेगा !
सोमवार, 19 जुलाई 2010
रविवार, 18 जुलाई 2010
कुछ ही.....ही, हा......हा, हो जाए
रविवार का दिन है, आईए कुछ ही..ही.., हा..हा.. हो जाए
@ भाषण चल रहा था। नेताजी बार-बार कह रहे थे कि हमें अपने पैरों पर खड़े होना है। तभी भीड़ के पीछे से कोई चिल्लाया, अरे साहब हम तो कब से कोशिश कर रहे हैं पर यह हवलदार हमें जबरदस्ती बैठा देता है।
@ एक आदमी अपना सर पकड़े डाक्टर के पास आ कर अपनी नकली टांग की तरफ इशारा कर बोला, डाक्टर साहब, इस लकड़ी की टांग के कारण मेरे सर में दर्द हो रहा है।
नकली टांग से सर में कैसे दर्द हो सकता है? डाक्टर ने आश्चर्य से पूछा।
असल में आज मेरी बीवी ने इसे उठा कर मेरे सर पर दे मारा है।
@ दादाजी ने अपने पोते का साधारण ज्ञान परखने के लिए पूछा, बताओ बगुला तालाब में एक टांग पर क्यों खड़ा होकर मछलियां पकड़ता है?
आप भी दादाजी!!!, अरे दोनों पैर उठा लेगा तो गिर नहीं पड़ेगा क्या ?
@ श्रीमतीजी ने पूछा, ए जी, प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कर में क्या अंतर होता है? वही जो तुम्हारे मुझसे मांग कर पैसे लेने और चुपचाप निकाल लेने में होता है।
श्रीमानजी ने जवाब दिया।
@ भाषण चल रहा था। नेताजी बार-बार कह रहे थे कि हमें अपने पैरों पर खड़े होना है। तभी भीड़ के पीछे से कोई चिल्लाया, अरे साहब हम तो कब से कोशिश कर रहे हैं पर यह हवलदार हमें जबरदस्ती बैठा देता है।
@ एक आदमी अपना सर पकड़े डाक्टर के पास आ कर अपनी नकली टांग की तरफ इशारा कर बोला, डाक्टर साहब, इस लकड़ी की टांग के कारण मेरे सर में दर्द हो रहा है।
नकली टांग से सर में कैसे दर्द हो सकता है? डाक्टर ने आश्चर्य से पूछा।
असल में आज मेरी बीवी ने इसे उठा कर मेरे सर पर दे मारा है।
@ दादाजी ने अपने पोते का साधारण ज्ञान परखने के लिए पूछा, बताओ बगुला तालाब में एक टांग पर क्यों खड़ा होकर मछलियां पकड़ता है?
आप भी दादाजी!!!, अरे दोनों पैर उठा लेगा तो गिर नहीं पड़ेगा क्या ?
@ श्रीमतीजी ने पूछा, ए जी, प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कर में क्या अंतर होता है? वही जो तुम्हारे मुझसे मांग कर पैसे लेने और चुपचाप निकाल लेने में होता है।
श्रीमानजी ने जवाब दिया।
शनिवार, 17 जुलाई 2010
"आई सन" ने जो काम कर दिया है वह "माई सन" कभी भी नहीं कर सकता था
मुखर्जी बाबू के रिटायरमेंट का समय नजदीक आ गया था। उनका एक ही लड़का था। अभी-अभी ग्रैजुएशन पूरी की थी। किसी ढंग की नौकरी की तलाश हो रही थी। उन दिनों नौकरी के लिए इतनी मारामारी नहीं होती थी। लियाकत और सिफारिश से काम चल जाता था। यह बात अलग थी कि सिफारिश सिर्फ नौकरी दिलवा सकती थी, बाद में उसे संभालने और तरक्की पाने में लियाकत ही काम आती थी।
सो इधर-उधर घूमने में और समय जाया करने के बजाय मुखर्जी बाबू ने लड़के को खूद जहां मुलाजिम थे वहीं काम दिलाने का फैसला किया। अंग्रेज मैनेजर उनकी लगन और काम पर पकड़ के कारण उन्हें मानता भी बहुत था, पर झिझक तथा संकोच वश उन्होंने अभी तक अपने बेटे के लिए बात नहीं की थी। हो सकता है इसे उन्होंने अंतिम विकल्प के रूप मेँ भी रख छोड़ा हो। जो भी हो एक दिन मुखर्जी बाबू अपने बेटे को ले मैनेजर के सामने जा खड़े हुए।
मैनेजर ने उन्हें देख उनके आने का कारण पूछा। मुखर्जी बाबू ने अपने बेटे की ओर इशारा कर कहा, सर आई सन, नो वर्क। वी पूअर। वांट सर्विस। प्लीज हेल्प।
बेटे ने बाप की तरफ अजीब निगाहों से ताका और सिर झुका लिया।
मैनेजर ने एक नजर लड़के की तरफ देखा जो जमीन की ओर नजरें झुकाए खड़ा था और बोला, वेल, टेल हिम टु ज्वाइन आन मंड़े।
मुखर्जी बाबू ने मैनेजर का शुक्रिया अदा किया और बेटे को ले घर वापस आ गये।
घर आते ही लड़के ने मां से शिकायत की कि आज बाबा ने पूरी बेइज्जती करवा ली है। मां ने पूछा, अरे, हुआ क्या? बता तो सही यूं ही बड़बड़ाए जा रहा है। बेटा बोला कि बाबा को इतनी अच्छी अंग्रेजी आती है पर वहां आफिस में कैसी गलत-सलत, आई सन, आई सन कर के बात कर रहे थे. माई सन नहीं बोल सकते थे, और क्या बताऊं।
लड़के की बात खत्म होते-होते मुखर्जी बाबू ने अपनी पत्नी से बंगला में कहा, ओ के बुजीए दाओ। ओ चाकरी पेये गैचे। आमार आई सन जा कोरे दीएचे ओ माई सन कोक्खोनो कोरते पात्तो ना (उसे समझा दो। उसे नौकरी मिल गयी है। मेरे आई सन ने जो काम किया है वो माई सन कभी भी नहीं कर पाता)
सो इधर-उधर घूमने में और समय जाया करने के बजाय मुखर्जी बाबू ने लड़के को खूद जहां मुलाजिम थे वहीं काम दिलाने का फैसला किया। अंग्रेज मैनेजर उनकी लगन और काम पर पकड़ के कारण उन्हें मानता भी बहुत था, पर झिझक तथा संकोच वश उन्होंने अभी तक अपने बेटे के लिए बात नहीं की थी। हो सकता है इसे उन्होंने अंतिम विकल्प के रूप मेँ भी रख छोड़ा हो। जो भी हो एक दिन मुखर्जी बाबू अपने बेटे को ले मैनेजर के सामने जा खड़े हुए।
मैनेजर ने उन्हें देख उनके आने का कारण पूछा। मुखर्जी बाबू ने अपने बेटे की ओर इशारा कर कहा, सर आई सन, नो वर्क। वी पूअर। वांट सर्विस। प्लीज हेल्प।
बेटे ने बाप की तरफ अजीब निगाहों से ताका और सिर झुका लिया।
मैनेजर ने एक नजर लड़के की तरफ देखा जो जमीन की ओर नजरें झुकाए खड़ा था और बोला, वेल, टेल हिम टु ज्वाइन आन मंड़े।
मुखर्जी बाबू ने मैनेजर का शुक्रिया अदा किया और बेटे को ले घर वापस आ गये।
घर आते ही लड़के ने मां से शिकायत की कि आज बाबा ने पूरी बेइज्जती करवा ली है। मां ने पूछा, अरे, हुआ क्या? बता तो सही यूं ही बड़बड़ाए जा रहा है। बेटा बोला कि बाबा को इतनी अच्छी अंग्रेजी आती है पर वहां आफिस में कैसी गलत-सलत, आई सन, आई सन कर के बात कर रहे थे. माई सन नहीं बोल सकते थे, और क्या बताऊं।
लड़के की बात खत्म होते-होते मुखर्जी बाबू ने अपनी पत्नी से बंगला में कहा, ओ के बुजीए दाओ। ओ चाकरी पेये गैचे। आमार आई सन जा कोरे दीएचे ओ माई सन कोक्खोनो कोरते पात्तो ना (उसे समझा दो। उसे नौकरी मिल गयी है। मेरे आई सन ने जो काम किया है वो माई सन कभी भी नहीं कर पाता)
शुक्रवार, 16 जुलाई 2010
बेटा, तुम्हारे पिता ने इसे इतनी बार धोया है कि ........
ललित जी की उम्दा कविता पढी तो अपनी यह पुरानी पोस्ट याद आ गयी
एक गांव के बाहर एक घना वट वृक्ष था। जिसकी जड़ों में एक दो फुटिया पत्थर खड़ा था। उसी पत्थर और पेड़ की जड़ के बीच एक श्वान परिवार मजे से रहता आ रहा था।
एक दिन महिलाओं का सामान बेचने वाले एक व्यापारी ने थकान के कारण दोपहर को उस पेड़ के नीचे शरण ली और अपनी गठरी उसी पत्थर के सहारे टिका दी। सुस्ताने के बाद उसने अपना सामान उठाया और अपनी राह चला गया। उसकी गठरी शायद ढीली थी सो उसमें रखे सिंदूर की पुडिया में से थोड़ा सिंदुर उस पत्थर पर गिर गया। सबेरे कुछ गांव वालों ने पत्थर पर गिरे रंग को देखा तो उस पर कुछ फूल चढा दिये। इस तरह अब रोज उस पत्थर का जलाभिषेक होने लगा, फूल मालायें चढने लगीं, दिया-बत्ती होने लग गयी । लोग आ-आकर मिन्नतें मांगने लगे। दो चार की कामनायें समयानुसार प्राकृतिक रूप से पूरी हो गयीं तो उन्होंने इसे पत्थर का चमत्कार समझ उस जगह को और प्रसिद्ध कर दिया। अब लोग दूर-दूर से वहां अपनी कामना पूर्ती के लिये आने लग गये। एक दिन एक परिवार अपने बच्चे की बिमारी के ठीक हो जाने के बाद वहां चढावा चढा धूम-धाम से पूजा कर गया।
यह सब कर्म-कांड श्वान परिवार का सबसे छोटा सदस्य भी देखा करता था। दैव योग से एक दिन वह बिमार हो गया। तकलीफ जब ज्यादा बढ गयी तो उसने उस पत्थर को इंगित कर अपनी मां से कहा, मां तुम भी इन से मेरे ठीक होने की प्रार्थना करो। ये तो सब को ठीक कर देते हैं। मां ने बात अनसुनी कर दी। पर जब श्वान पुत्र बार-बार जिद करने लगा तो मजबूर हो कर मां को कहना पड़ा कि बेटा ये हमारी बात नहीं सुनेंगें। पुत्र चकित हो बोला कि जब ये इंसान के बच्चे को ठीक कर सकते हैं तो मुझे क्यों नहीं ?
हार कर मां को सच बताना पड़ा, बेटा जब यहाँ यह सब कुछ नहीं होता था तब तुम्हारे पिता जी ने इसे अपनी "प्रकृति की पुकार" से इतनी बार धोया है कि अब तो मुझे यहाँ रहते हुए भी डर लगता है।
श्वान पुत्र कुछ समझा कुछ नहीं समझा, पर चुप हो गया।
एक गांव के बाहर एक घना वट वृक्ष था। जिसकी जड़ों में एक दो फुटिया पत्थर खड़ा था। उसी पत्थर और पेड़ की जड़ के बीच एक श्वान परिवार मजे से रहता आ रहा था।
एक दिन महिलाओं का सामान बेचने वाले एक व्यापारी ने थकान के कारण दोपहर को उस पेड़ के नीचे शरण ली और अपनी गठरी उसी पत्थर के सहारे टिका दी। सुस्ताने के बाद उसने अपना सामान उठाया और अपनी राह चला गया। उसकी गठरी शायद ढीली थी सो उसमें रखे सिंदूर की पुडिया में से थोड़ा सिंदुर उस पत्थर पर गिर गया। सबेरे कुछ गांव वालों ने पत्थर पर गिरे रंग को देखा तो उस पर कुछ फूल चढा दिये। इस तरह अब रोज उस पत्थर का जलाभिषेक होने लगा, फूल मालायें चढने लगीं, दिया-बत्ती होने लग गयी । लोग आ-आकर मिन्नतें मांगने लगे। दो चार की कामनायें समयानुसार प्राकृतिक रूप से पूरी हो गयीं तो उन्होंने इसे पत्थर का चमत्कार समझ उस जगह को और प्रसिद्ध कर दिया। अब लोग दूर-दूर से वहां अपनी कामना पूर्ती के लिये आने लग गये। एक दिन एक परिवार अपने बच्चे की बिमारी के ठीक हो जाने के बाद वहां चढावा चढा धूम-धाम से पूजा कर गया।
यह सब कर्म-कांड श्वान परिवार का सबसे छोटा सदस्य भी देखा करता था। दैव योग से एक दिन वह बिमार हो गया। तकलीफ जब ज्यादा बढ गयी तो उसने उस पत्थर को इंगित कर अपनी मां से कहा, मां तुम भी इन से मेरे ठीक होने की प्रार्थना करो। ये तो सब को ठीक कर देते हैं। मां ने बात अनसुनी कर दी। पर जब श्वान पुत्र बार-बार जिद करने लगा तो मजबूर हो कर मां को कहना पड़ा कि बेटा ये हमारी बात नहीं सुनेंगें। पुत्र चकित हो बोला कि जब ये इंसान के बच्चे को ठीक कर सकते हैं तो मुझे क्यों नहीं ?
हार कर मां को सच बताना पड़ा, बेटा जब यहाँ यह सब कुछ नहीं होता था तब तुम्हारे पिता जी ने इसे अपनी "प्रकृति की पुकार" से इतनी बार धोया है कि अब तो मुझे यहाँ रहते हुए भी डर लगता है।
श्वान पुत्र कुछ समझा कुछ नहीं समझा, पर चुप हो गया।
गुरुवार, 15 जुलाई 2010
प्रणय निवेदन पक्षियों का
इंसान ही नहीं पक्षी भी प्रणय निवेदन करते हैं। उनको भी अपनी प्रेमिका को रिझाने के लिए हाड़ तोड़ मेहनत करनी पड़ती है। हालांकि ज्यादातर पक्षियों में नर ही खूबसूरत होता है फिर भी उसे मादा को मनाने के लिए दिन रात एक करना पड़ता है।
सबसे सुंदर पक्षी मोर की बात करें तो जब जोड़ा बनाने का समय आता है तो इतने खूबसूरत नर को भी कुछ-कुछ बदसूरत (नर के मुकाबले) मोरनी के सामने अपने सुंदर पंखों को फैलाए घंटों नाचते इठलाते रहना पड़ता है। तब कहीं जा कर मैड़म का मन पसीजता है।
बया एक कलाकार पक्षी है। उसके बनाए घोंसले को देख इंसान के दांतों तले ऊंगली अपने आप चली जाती है। वर्षा ऋतु के समय वह घोंसला बनाता है। इस कलात्मक काम में वह पूरी तरह ड़ूब जाता है। इतना प्यारा साफ सुथरा और सुरक्षित घर बनाने के बावजूद नखरीली मादा को घर जल्दी पसंद नहीं आता। वह जब तक क्लीयरिंग लायसेंस नहीं दे देती तब तक नर घर को और बेहतर करने में जुटा रहता है। इस घोंसले में अलग-अलग कक्ष होते हैं तथा कभी-कभी रोशनी के लिए जुगनूओं को भी काम में लाया जाता है।
नीलकंठ इतना खूबसूरत पक्षी। इनमें नर और मादा करीब-करीब एक जैसे ही होते हैं। नर अपनी सहेली को खुश करने के लिए हवा में उड़ कर तरह-तरह के करतब दिखाता है। कयी बार तो वह ऊपर से ऐसे पत्थर की तरह नीचे गिरता है जैसे उसकी जान ही निकल गयी हो पर जमीन के पास आते ही फिर वह ऊपर उड़ जाता है। ऐसा कब तक? जब तक अगली मान ना जाए।
कबूतर, सबसे प्रेमिल जीव। अपनी मादा को रिझाने के लिए वह अपने पंख फैलाए उसके चारों ओर गुटरगूं करता चक्कर लगाता रहता है। यह प्राणी एक बार जिससे जोड़ा बना लेता है उसका साथ जीवन भर नहीं छोड़ता। इसीलिए कबूतर सदा जोड़े मे ही दिखाई पड़ता है।
प्रेमी हो तो सारस जैसा। यह अपने प्रेम के लिए जगत प्रसिद्ध है। नर और मादा एक दूसरे के लिए सदा समर्पित रहते हैं। यदि इनमें से किसी एक की भी मृत्यू हो जाए तो दूसरा भी अन्न-जल त्याग कर अपनी जान दे देता है।
सारस के ठीक विपरीत जीवन शैली है हंस की। यह निड़र पर नाजुक पक्षी बहुपत्नी प्रथा को मानने वाला होता है। अपने सौंदर्य और मनलुभावनी चाल के कारण लोकप्रिय हंस की बहुत सारी पत्नियां होती हैं।
पक्षी अनेक पक्षी कथा अनंता। सैंकड़ों जातियों के इन जीव-जंतुओं की अनेकों विचित्रताएं हैं। शुरु करो तो समय खत्म हो जाए।
कुछ फिर कभी।
सबसे सुंदर पक्षी मोर की बात करें तो जब जोड़ा बनाने का समय आता है तो इतने खूबसूरत नर को भी कुछ-कुछ बदसूरत (नर के मुकाबले) मोरनी के सामने अपने सुंदर पंखों को फैलाए घंटों नाचते इठलाते रहना पड़ता है। तब कहीं जा कर मैड़म का मन पसीजता है।
बया एक कलाकार पक्षी है। उसके बनाए घोंसले को देख इंसान के दांतों तले ऊंगली अपने आप चली जाती है। वर्षा ऋतु के समय वह घोंसला बनाता है। इस कलात्मक काम में वह पूरी तरह ड़ूब जाता है। इतना प्यारा साफ सुथरा और सुरक्षित घर बनाने के बावजूद नखरीली मादा को घर जल्दी पसंद नहीं आता। वह जब तक क्लीयरिंग लायसेंस नहीं दे देती तब तक नर घर को और बेहतर करने में जुटा रहता है। इस घोंसले में अलग-अलग कक्ष होते हैं तथा कभी-कभी रोशनी के लिए जुगनूओं को भी काम में लाया जाता है।
नीलकंठ इतना खूबसूरत पक्षी। इनमें नर और मादा करीब-करीब एक जैसे ही होते हैं। नर अपनी सहेली को खुश करने के लिए हवा में उड़ कर तरह-तरह के करतब दिखाता है। कयी बार तो वह ऊपर से ऐसे पत्थर की तरह नीचे गिरता है जैसे उसकी जान ही निकल गयी हो पर जमीन के पास आते ही फिर वह ऊपर उड़ जाता है। ऐसा कब तक? जब तक अगली मान ना जाए।
कबूतर, सबसे प्रेमिल जीव। अपनी मादा को रिझाने के लिए वह अपने पंख फैलाए उसके चारों ओर गुटरगूं करता चक्कर लगाता रहता है। यह प्राणी एक बार जिससे जोड़ा बना लेता है उसका साथ जीवन भर नहीं छोड़ता। इसीलिए कबूतर सदा जोड़े मे ही दिखाई पड़ता है।
प्रेमी हो तो सारस जैसा। यह अपने प्रेम के लिए जगत प्रसिद्ध है। नर और मादा एक दूसरे के लिए सदा समर्पित रहते हैं। यदि इनमें से किसी एक की भी मृत्यू हो जाए तो दूसरा भी अन्न-जल त्याग कर अपनी जान दे देता है।
सारस के ठीक विपरीत जीवन शैली है हंस की। यह निड़र पर नाजुक पक्षी बहुपत्नी प्रथा को मानने वाला होता है। अपने सौंदर्य और मनलुभावनी चाल के कारण लोकप्रिय हंस की बहुत सारी पत्नियां होती हैं।
पक्षी अनेक पक्षी कथा अनंता। सैंकड़ों जातियों के इन जीव-जंतुओं की अनेकों विचित्रताएं हैं। शुरु करो तो समय खत्म हो जाए।
कुछ फिर कभी।
बुधवार, 14 जुलाई 2010
कल फसल जरूर कटेगी
वर्षों से हमारे यहां बच्चों में अच्छे संस्कार ड़ालने के लिए कहानियों का सहारा लिया जाता रहा है। पाठ्य पुस्तकों में भी ऐसी कथाओं को समाहित किया जाता था जिससे बच्चों में प्रेम, करुणा, आदर, क्षमा, निड़रता, स्वाबलंबन जैसे गुण कूट-कूट कर भरे जा सकें।
समय बदल चुका है, विषय बदल गये हैं पर उन कथाओं में सरल भाषा में निहित शिक्षा इस हाई-फाई जमाने मे भी अपना वैसा ही असर बरकरार रख पाने में सक्षम है। ऐसी ही एक कहानी प्रस्तुत है जो अपना काम खुद करने का संदेश देती है।
एक खेत में एक चिड़िया ने घोंसला बना कर उसमें अंड़े दिए। समय के साथ अंडों से बच्चे निकले जो धीरे-धीरे बड़े होने लगे। चिड़िया रोज उन्हें घोंसले में ही रहने की हिदायत दे चुग्गे की तलाश में निकलती थी। ऐसे ही एक दिन जब वह शाम को लौटी तो बच्चे सहमे से बैठे थे। चिड़िया ने उनके ड़रे होने का कारण पूछा तो उन्होंने बताया कि आज खेत का मालिक किसान आया था और कह रहा था कि फसल पक गयी है कल गांव वालों के साथ आ कर काट ले जाऊंगा।
अब हमारा क्या होगा? ड़रे हुए बच्चों ने अपनी माँ से पूछा।
चिड़िया ने शांत स्वर में जवाब दिया, घबड़ाओ नहीं, वह अभी नहीं आएगा।
इस तरह कुछ दिन बीत गये। एक दिन फिर बच्चों ने परेशान हो कर अपनी माँ को बताया कि, आज फिर किसान आया था, कह रहा था गांव वाले तो नहीं आ सके, कल अपने मित्रों-बांधवों को साथ ला फसल काट कर घर ले जाऊंगा।
चिड़िया ने अपने बच्चों को दिलासा दिया कि अभी ऐसा कुछ नहीं होगा चिंता ना करो।
फिर कुछ दिन निकल गये। एक दिन चिड़िया के बच्चों ने उसके आने पर हंसते हुए उसे बताया कि आज वैसे ही फिर किसान आया था उसने कुछ करना-वरना तो है नही, पहले जैसा ही बोल रहा था कि मैं कल खुद अपने लड़कों को लेकर आऊंगा और फसल काटूंगा।
चिड़िया ने तुरंत कहा, बच्चो अब जाने का समय आ गया है, कल सबेरे ही हम उड़ चलेंगे। बच्चों ने आश्चर्य से पूछा कि माँ आज ऐसी क्या बात हो गयी? वह तो पहले भी ऐसा बोल कर जाता था पर फिर फसल काटने कहां आया था? इस बार भी नहीं आएगा।
इस पर चिड़िया ने उनको फर्क समझाया कि पहले दोनों बार वह किसी और के भरोसे काम करने की सोच रहा था। पर इस बार वह अपना काम खुद करने वाला है। इसलिए कल फसल जरूर कटेगी।
कहानीकार ने कितने सरल तरीके से समझाने की कोशिश की है कि जब इंसान दूसरों का भरोसा छोड़ अपना काम खुद करने की ठानता है तो फिर कोई अड़चन उसकी राह में बाधा नहीं बनती।
समय बदल चुका है, विषय बदल गये हैं पर उन कथाओं में सरल भाषा में निहित शिक्षा इस हाई-फाई जमाने मे भी अपना वैसा ही असर बरकरार रख पाने में सक्षम है। ऐसी ही एक कहानी प्रस्तुत है जो अपना काम खुद करने का संदेश देती है।
एक खेत में एक चिड़िया ने घोंसला बना कर उसमें अंड़े दिए। समय के साथ अंडों से बच्चे निकले जो धीरे-धीरे बड़े होने लगे। चिड़िया रोज उन्हें घोंसले में ही रहने की हिदायत दे चुग्गे की तलाश में निकलती थी। ऐसे ही एक दिन जब वह शाम को लौटी तो बच्चे सहमे से बैठे थे। चिड़िया ने उनके ड़रे होने का कारण पूछा तो उन्होंने बताया कि आज खेत का मालिक किसान आया था और कह रहा था कि फसल पक गयी है कल गांव वालों के साथ आ कर काट ले जाऊंगा।
अब हमारा क्या होगा? ड़रे हुए बच्चों ने अपनी माँ से पूछा।
चिड़िया ने शांत स्वर में जवाब दिया, घबड़ाओ नहीं, वह अभी नहीं आएगा।
इस तरह कुछ दिन बीत गये। एक दिन फिर बच्चों ने परेशान हो कर अपनी माँ को बताया कि, आज फिर किसान आया था, कह रहा था गांव वाले तो नहीं आ सके, कल अपने मित्रों-बांधवों को साथ ला फसल काट कर घर ले जाऊंगा।
चिड़िया ने अपने बच्चों को दिलासा दिया कि अभी ऐसा कुछ नहीं होगा चिंता ना करो।
फिर कुछ दिन निकल गये। एक दिन चिड़िया के बच्चों ने उसके आने पर हंसते हुए उसे बताया कि आज वैसे ही फिर किसान आया था उसने कुछ करना-वरना तो है नही, पहले जैसा ही बोल रहा था कि मैं कल खुद अपने लड़कों को लेकर आऊंगा और फसल काटूंगा।
चिड़िया ने तुरंत कहा, बच्चो अब जाने का समय आ गया है, कल सबेरे ही हम उड़ चलेंगे। बच्चों ने आश्चर्य से पूछा कि माँ आज ऐसी क्या बात हो गयी? वह तो पहले भी ऐसा बोल कर जाता था पर फिर फसल काटने कहां आया था? इस बार भी नहीं आएगा।
इस पर चिड़िया ने उनको फर्क समझाया कि पहले दोनों बार वह किसी और के भरोसे काम करने की सोच रहा था। पर इस बार वह अपना काम खुद करने वाला है। इसलिए कल फसल जरूर कटेगी।
कहानीकार ने कितने सरल तरीके से समझाने की कोशिश की है कि जब इंसान दूसरों का भरोसा छोड़ अपना काम खुद करने की ठानता है तो फिर कोई अड़चन उसकी राह में बाधा नहीं बनती।
मंगलवार, 13 जुलाई 2010
सावधान, जरूरी नहीं कि जैसा पहले हुआ था वैसा ही अब भी हो
पहली कहानी काफी पुरानी है। सबने पढी-सुनी होगी।
एक राजकुमारी को उसकी सौतेली माँ बहुत तंग करती थी। एक दिन हैरान परेशान राजकुमारी अपने बागीचे में घूम रही थी कि उसे वहां एक मेढक दिखाए पड़ा। मेढक ने राजकुमारी से कहा कि यदि तुम मुझे चूम लो तो मैं इस योनी से मुक्ति पा जाऊंगा। राजकुमारी को उस पर दया आ जाती है और उसके चूमते ही मेढक एक सुंदर युवक का रूप ले लेता है जो एक राज्य का राजकुमार होता है। दोनों की शादी हो जाती है और वे सुख से रहने लगते हैं।
गंगा में बहुत सा पानी बह गया। वर्षों बीत गये। घटना ने फिर अपने आप को दोहराया और दूसरी कहानी को जन्म दिया, लेकिन !!!!!!!
एक लड़की कालेज से बंक मार एक पार्क में अपने साथी का इंतजार कर रही थी। तभी उसे एक बड़े से आकार का भद्दा सा चूहा दिखाई दिया। कुछ देर लड़की के आस-पास घूमने के बाद चूहा उस लड़की के पास आ खड़ा हुआ और आश्चर्यजनक रूप से हिंदी में उस लड़की से बोला कि मैं एक मंत्री का बेटा हूं पर जलनखोरों के टोने-टोटके की वजह से चूहा बन गया हूं। क्या तुम मुझसे प्यार करोगी? पहले तो लड़की हड़बड़ा गयी पर फिर उसे पुरानी कहानी याद आयी। उसने सारे “इफ्स और बट्स” को सोचा और भविष्य का ख्याल रखते हुए मन ही मन मान गयी। फिर भी सारी बात साफ करने के लिए उसने चूहे से पूछा कि ऐसा करने से मुझे क्या मिलेगा? चूहे ने जवाब दिया मैं तुमसे शादी कर लूंगा। यह सुन लड़की ने चूहे को गोद में उठा कर उसे जैसे ही प्यार पूर्वक सहलाया, वह चूहिया बन गयी।
पर चूहे ने अपना वचन निभाया। उसने चूहिया बनी लड़की से शादी कर ली।
जय श्री राम। जैसे उसके दिन (किसके) बदले सबके बदलें।
एक राजकुमारी को उसकी सौतेली माँ बहुत तंग करती थी। एक दिन हैरान परेशान राजकुमारी अपने बागीचे में घूम रही थी कि उसे वहां एक मेढक दिखाए पड़ा। मेढक ने राजकुमारी से कहा कि यदि तुम मुझे चूम लो तो मैं इस योनी से मुक्ति पा जाऊंगा। राजकुमारी को उस पर दया आ जाती है और उसके चूमते ही मेढक एक सुंदर युवक का रूप ले लेता है जो एक राज्य का राजकुमार होता है। दोनों की शादी हो जाती है और वे सुख से रहने लगते हैं।
गंगा में बहुत सा पानी बह गया। वर्षों बीत गये। घटना ने फिर अपने आप को दोहराया और दूसरी कहानी को जन्म दिया, लेकिन !!!!!!!
एक लड़की कालेज से बंक मार एक पार्क में अपने साथी का इंतजार कर रही थी। तभी उसे एक बड़े से आकार का भद्दा सा चूहा दिखाई दिया। कुछ देर लड़की के आस-पास घूमने के बाद चूहा उस लड़की के पास आ खड़ा हुआ और आश्चर्यजनक रूप से हिंदी में उस लड़की से बोला कि मैं एक मंत्री का बेटा हूं पर जलनखोरों के टोने-टोटके की वजह से चूहा बन गया हूं। क्या तुम मुझसे प्यार करोगी? पहले तो लड़की हड़बड़ा गयी पर फिर उसे पुरानी कहानी याद आयी। उसने सारे “इफ्स और बट्स” को सोचा और भविष्य का ख्याल रखते हुए मन ही मन मान गयी। फिर भी सारी बात साफ करने के लिए उसने चूहे से पूछा कि ऐसा करने से मुझे क्या मिलेगा? चूहे ने जवाब दिया मैं तुमसे शादी कर लूंगा। यह सुन लड़की ने चूहे को गोद में उठा कर उसे जैसे ही प्यार पूर्वक सहलाया, वह चूहिया बन गयी।
पर चूहे ने अपना वचन निभाया। उसने चूहिया बनी लड़की से शादी कर ली।
जय श्री राम। जैसे उसके दिन (किसके) बदले सबके बदलें।
सदस्यता लें
संदेश (Atom)
विशिष्ट पोस्ट
किले का दरवाजा अंदर से ही खुलता है
वैसे तो सच की फितरत है कि वह सामने आता जरूर है ! चाहे जैसे भी हो ! इसके लिए उसकी सहायता करते हैं कुछ ऐसे लोग जो इतिहास की असलियत जग-जाहिर कर...
-
कल रात अपने एक राजस्थानी मित्र के चिरंजीव की शादी में जाना हुआ था। बातों ही बातों में पता चला कि राजस्थानी भाषा में पति और पत्नी के लिए अलग...
-
शहद, एक हल्का पीलापन लिये हुए बादामी रंग का गाढ़ा तरल पदार्थ है। वैसे इसका रंग-रूप, इसके छत्ते के लगने वाली जगह और आस-पास के फूलों पर ज्याद...
-
आज हम एक कोहेनूर का जिक्र होते ही भावनाओं में खो जाते हैं। तख्ते ताऊस में तो वैसे सैंकड़ों हीरे जड़े हुए थे। हीरे-जवाहरात तो अपनी जगह, उस ...
-
चलती गाड़ी में अपने शरीर का कोई अंग बाहर न निकालें :) 1, ट्रेन में बैठे श्रीमान जी काफी परेशान थे। बार-बार कसमसा कर पहलू बदल रहे थे। चेहरे...
-
युवक अपने बच्चे को हिंदी वर्णमाला के अक्षरों से परिचित करवा रहा था। आजकल के अंग्रेजियत के समय में यह एक दुर्लभ वार्तालाप था सो मेरा स...
-
कहते हैं कि विधि का लेख मिटाए नहीं मिटता। कितनों ने कितनी तरह की कोशीशें की पर हुआ वही जो निर्धारित था। राजा लायस और उसकी पत्नी जोकास्टा। ...
-
हनुमान जी के चिरंजीवी होने के रहस्य पर से पर्दा उठाने के लिए पिदुरु के आदिवासियों की हनु पुस्तिका आजकल " सेतु एशिया" नामक...
-
"बिजली का तेल" यह क्या होता है ? मेरे पूछने पर उन्होंने बताया कि बिजली के ट्रांस्फार्मरों में जो तेल डाला जाता है वह लगातार ...
-
विजयी विश्व तिरंगा प्यारा, झंडा ऊंचा रहे हमारा। हमारे तिरंगे के सम्मान में लिखा गया यह गीत जब भी सुनाई देता है, रोम-रोम पुल्कित हो जाता ...
-
अपनी एक पुरानी डायरी मे यह रोचक प्रसंग मिला, कैसा रहा बताइयेगा :- काफी पुरानी बात है। अंग्रेजों का बोलबाला सारे संसार में क्यूं है? क्य...