pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

गुरुवार, 15 जुलाई 2010

प्रणय निवेदन पक्षियों का

इंसान ही नहीं पक्षी भी प्रणय निवेदन करते हैं। उनको भी अपनी प्रेमिका को रिझाने के लिए हाड़ तोड़ मेहनत करनी पड़ती है। हालांकि ज्यादातर पक्षियों में नर ही खूबसूरत होता है फिर भी उसे मादा को मनाने के लिए दिन रात एक करना पड़ता है।

सबसे सुंदर पक्षी मोर की बात करें तो जब जोड़ा बनाने का समय आता है तो इतने खूबसूरत नर को भी कुछ-कुछ बदसूरत (नर के मुकाबले) मोरनी के सामने अपने सुंदर पंखों को फैलाए घंटों नाचते इठलाते रहना पड़ता है। तब कहीं जा कर मैड़म का मन पसीजता है।

बया एक कलाकार पक्षी है। उसके बनाए घोंसले को देख इंसान के दांतों तले ऊंगली अपने आप चली जाती है। वर्षा ऋतु के समय वह घोंसला बनाता है। इस कलात्मक काम में वह पूरी तरह ड़ूब जाता है। इतना प्यारा साफ सुथरा और सुरक्षित घर बनाने के बावजूद नखरीली मादा को घर जल्दी पसंद नहीं आता। वह जब तक क्लीयरिंग लायसेंस नहीं दे देती तब तक नर घर को और बेहतर करने में जुटा रहता है। इस घोंसले में अलग-अलग कक्ष होते हैं तथा कभी-कभी रोशनी के लिए जुगनूओं को भी काम में लाया जाता है।

नीलकंठ इतना खूबसूरत पक्षी। इनमें नर और मादा करीब-करीब एक जैसे ही होते हैं। नर अपनी सहेली को खुश करने के लिए हवा में उड़ कर तरह-तरह के करतब दिखाता है। कयी बार तो वह ऊपर से ऐसे पत्थर की तरह नीचे गिरता है जैसे उसकी जान ही निकल गयी हो पर जमीन के पास आते ही फिर वह ऊपर उड़ जाता है। ऐसा कब तक? जब तक अगली मान ना जाए।

कबूतर, सबसे प्रेमिल जीव। अपनी मादा को रिझाने के लिए वह अपने पंख फैलाए उसके चारों ओर गुटरगूं करता चक्कर लगाता रहता है। यह प्राणी एक बार जिससे जोड़ा बना लेता है उसका साथ जीवन भर नहीं छोड़ता। इसीलिए कबूतर सदा जोड़े मे ही दिखाई पड़ता है।

प्रेमी हो तो सारस जैसा। यह अपने प्रेम के लिए जगत प्रसिद्ध है। नर और मादा एक दूसरे के लिए सदा समर्पित रहते हैं। यदि इनमें से किसी एक की भी मृत्यू हो जाए तो दूसरा भी अन्न-जल त्याग कर अपनी जान दे देता है।

सारस के ठीक विपरीत जीवन शैली है हंस की। यह निड़र पर नाजुक पक्षी बहुपत्नी प्रथा को मानने वाला होता है। अपने सौंदर्य और मनलुभावनी चाल के कारण लोकप्रिय हंस की बहुत सारी पत्नियां होती हैं।

पक्षी अनेक पक्षी कथा अनंता। सैंकड़ों जातियों के इन जीव-जंतुओं की अनेकों विचित्रताएं हैं। शुरु करो तो समय खत्म हो जाए।

कुछ फिर कभी।

बुधवार, 14 जुलाई 2010

कल फसल जरूर कटेगी

वर्षों से हमारे यहां बच्चों में अच्छे संस्कार ड़ालने के लिए कहानियों का सहारा लिया जाता रहा है। पाठ्य पुस्तकों में भी ऐसी कथाओं को समाहित किया जाता था जिससे बच्चों में प्रेम, करुणा, आदर, क्षमा, निड़रता, स्वाबलंबन जैसे गुण कूट-कूट कर भरे जा सकें।
समय बदल चुका है, विषय बदल गये हैं पर उन कथाओं में सरल भाषा में निहित शिक्षा इस हाई-फाई जमाने मे भी अपना वैसा ही असर बरकरार रख पाने में सक्षम है। ऐसी ही एक कहानी प्रस्तुत है जो अपना काम खुद करने का संदेश देती है।

एक खेत में एक चिड़िया ने घोंसला बना कर उसमें अंड़े दिए। समय के साथ अंडों से बच्चे निकले जो धीरे-धीरे बड़े होने लगे। चिड़िया रोज उन्हें घोंसले में ही रहने की हिदायत दे चुग्गे की तलाश में निकलती थी। ऐसे ही एक दिन जब वह शाम को लौटी तो बच्चे सहमे से बैठे थे। चिड़िया ने उनके ड़रे होने का कारण पूछा तो उन्होंने बताया कि आज खेत का मालिक किसान आया था और कह रहा था कि फसल पक गयी है कल गांव वालों के साथ आ कर काट ले जाऊंगा।
अब हमारा क्या होगा? ड़रे हुए बच्चों ने अपनी माँ से पूछा।
चिड़िया ने शांत स्वर में जवाब दिया, घबड़ाओ नहीं, वह अभी नहीं आएगा।
इस तरह कुछ दिन बीत गये। एक दिन फिर बच्चों ने परेशान हो कर अपनी माँ को बताया कि, आज फिर किसान आया था, कह रहा था गांव वाले तो नहीं आ सके, कल अपने मित्रों-बांधवों को साथ ला फसल काट कर घर ले जाऊंगा।
चिड़िया ने अपने बच्चों को दिलासा दिया कि अभी ऐसा कुछ नहीं होगा चिंता ना करो।
फिर कुछ दिन निकल गये। एक दिन चिड़िया के बच्चों ने उसके आने पर हंसते हुए उसे बताया कि आज वैसे ही फिर किसान आया था उसने कुछ करना-वरना तो है नही, पहले जैसा ही बोल रहा था कि मैं कल खुद अपने लड़कों को लेकर आऊंगा और फसल काटूंगा।
चिड़िया ने तुरंत कहा, बच्चो अब जाने का समय आ गया है, कल सबेरे ही हम उड़ चलेंगे। बच्चों ने आश्चर्य से पूछा कि माँ आज ऐसी क्या बात हो गयी? वह तो पहले भी ऐसा बोल कर जाता था पर फिर फसल काटने कहां आया था? इस बार भी नहीं आएगा।
इस पर चिड़िया ने उनको फर्क समझाया कि पहले दोनों बार वह किसी और के भरोसे काम करने की सोच रहा था। पर इस बार वह अपना काम खुद करने वाला है। इसलिए कल फसल जरूर कटेगी।

कहानीकार ने कितने सरल तरीके से समझाने की कोशिश की है कि जब इंसान दूसरों का भरोसा छोड़ अपना काम खुद करने की ठानता है तो फिर कोई अड़चन उसकी राह में बाधा नहीं बनती।

मंगलवार, 13 जुलाई 2010

सावधान, जरूरी नहीं कि जैसा पहले हुआ था वैसा ही अब भी हो

पहली कहानी काफी पुरानी है। सबने पढी-सुनी होगी।
एक राजकुमारी को उसकी सौतेली माँ बहुत तंग करती थी। एक दिन हैरान परेशान राजकुमारी अपने बागीचे में घूम रही थी कि उसे वहां एक मेढक दिखाए पड़ा। मेढक ने राजकुमारी से कहा कि यदि तुम मुझे चूम लो तो मैं इस योनी से मुक्ति पा जाऊंगा। राजकुमारी को उस पर दया आ जाती है और उसके चूमते ही मेढक एक सुंदर युवक का रूप ले लेता है जो एक राज्य का राजकुमार होता है। दोनों की शादी हो जाती है और वे सुख से रहने लगते हैं।

गंगा में बहुत सा पानी बह गया। वर्षों बीत गये। घटना ने फिर अपने आप को दोहराया और दूसरी कहानी को जन्म दिया, लेकिन !!!!!!!

एक लड़की कालेज से बंक मार एक पार्क में अपने साथी का इंतजार कर रही थी। तभी उसे एक बड़े से आकार का भद्दा सा चूहा दिखाई दिया। कुछ देर लड़की के आस-पास घूमने के बाद चूहा उस लड़की के पास आ खड़ा हुआ और आश्चर्यजनक रूप से हिंदी में उस लड़की से बोला कि मैं एक मंत्री का बेटा हूं पर जलनखोरों के टोने-टोटके की वजह से चूहा बन गया हूं। क्या तुम मुझसे प्यार करोगी? पहले तो लड़की हड़बड़ा गयी पर फिर उसे पुरानी कहानी याद आयी। उसने सारे “इफ्स और बट्स” को सोचा और भविष्य का ख्याल रखते हुए मन ही मन मान गयी। फिर भी सारी बात साफ करने के लिए उसने चूहे से पूछा कि ऐसा करने से मुझे क्या मिलेगा? चूहे ने जवाब दिया मैं तुमसे शादी कर लूंगा। यह सुन लड़की ने चूहे को गोद में उठा कर उसे जैसे ही प्यार पूर्वक सहलाया, वह चूहिया बन गयी।
पर चूहे ने अपना वचन निभाया। उसने चूहिया बनी लड़की से शादी कर ली।

जय श्री राम। जैसे उसके दिन (किसके) बदले सबके बदलें।

सोमवार, 12 जुलाई 2010

मौका देख चौका मारने की फिराक में मौकापरस्तों के तुक्के

दुनिया में ऐसा वैसा कुछ हो जाता है तो ये चैनल वाले भी एक-दो दिन राहत की सांस ले पाते हैं। बैठा लेते हैं चार जनों को टाइम पास करने के लिए, हालांकि मेहमानों से ज्यादा खुद पर कैमरे का फोकस कर कुछ भी अनाप-सनाप बोलते रहते हैं, आने वाला तो मुंह बाए इनका थोबड़ा ही देखता रहता है। कहीं गलती से कुछ बोलने का मौका मिलता भी है तो बहुत छोटा सा लंबा "ब्रेक" आ जाता है

2010 फुटबाल का विश्व कप तो अपनी जगह था ही पर एक और खबर ने दुनिया को चौंका दिया, वह थी एक ऑक्टोपस की खेल के बारे में भविष्यवाणी ! उसकी दोष रहित सटीक भविष्यवाणियों से जब संसार भर में उसकी तूती बोलने लगी तो इस पेशे से जुड़े बाकी मौकापरस्त लोगों को भी होश आया। हालांकि तब तक काम
बहुत आसान हो चुका था। दो ही टीमें मैदान में रह गयीं थीं। फिर भी मौका हाथ से ना जाने देने के लिए एक तरफ सिंगापुर का तोता दाने की लालच में नीदरलैंड़ के झंडे वाला कार्ड़ उठाने लगा तो सुदूर आस्ट्रेलिया में पानी में पड़े मगरमच्छ को स्पेन की बीन सुहानी लगने लगी। इन सब का नाम रोज अखबारों में छपता देख अपने देश के भोपाली नंदी बैल को भी होश आया उसने सोचा कि इस तरह के तुक्के लगाने में तो हम मशहूर हैं ये विदेशी कहां फुटबाल पर लात मारने कि बजाय हमारे पेट को लतियाने लगे। बस उसे भी जोश आ गया। हर बात का जायजा लिया तो रिस्क नहीं के बराबर और फायदे की असीम संभावनाएं देख वो भी अपनी थूथन उठाए पोज देने लगा।

सही मौका था। दो ही टीमें थीं। एक को ही जीतना था। एक भी मैच ना हार कर होड़ में सबसे आगे "पाल बाबा" थे, अपनी पसंद की टीम स्पेन के साथ। इधर नंदी स्वामी ने सोचा कि विपक्षी टीम का पक्ष ले लेते हैं, खुदा-न खास्ता जीत गयी तो दुनिया भर में नाम हो जाएगा और नहीं जीती तो भी अपनी दुकान तो चल ही रही है। भोलेनाथ की कृपा हो गयी तो सारी दुनिया में बल्ले-बल्ले हो जाएगी।

ऐसा ही कुछ खेल एक चैनल ने अपने दफ्तर में भी आयोजित कर ड़ाला। अब क्या करें 24 घंटे क्या परोसें, सुरसा के मुंह रूपी टीवी के पर्दे पर। दुनिया में ऐसा वैसा कुछ हो जाता है तो ये चैनल वाले भी एक-दो दिन राहत की सांस ले पाते हैं। बैठा लेते हैं चार जनों को टाइम पास करने के लिए, हालांकि मेहमानों से ज्यादा खुद पर कैमरे का फोकस कर कुछ भी अनाप-सनाप बोलते रहते हैं, आने वाला तो मुंह बाए इनका थोबड़ा ही देखता रहता है। कहीं गलती से कुछ बोलने का मौका मिलता भी है तो बहुत छोटा सा लंबा "ब्रेक" आ जाता है। खैर मैच के पहले चार ज्योतिषविदों को बुलाया गया था। इधर-उधर की बातें कर उनका पानी उतारने के बाद उनसे भावी विजेता का नाम बताने को कहा गया। तीन ने स्पेन का नाम लिया तो एक महाशय नीदरलैंड़ के पक्ष में हो लिए, ठीक नंदी बाबा के तौर पर।

अब जो होना था वही हुआ। खेल खत्म पैसा हजम। सब अपनी-अपनी राह लग गये अपने अपने मतलबों को पूरा करते हुए। पर एक बात समझ में नहीं आती कि चैनलों पर आ कर जब हर बार फजीहत होती है तो फिर क्यों बार-बार इसका रुख कर लेते हैं लोग ? शायद जेब में रोकड़ा और पर्दे पर थोबड़ा आ जाता है, इसलिए !!!

शनिवार, 10 जुलाई 2010

पचीस किलो का आदमी भी मोटे होने के गुर बताने लगता है.

उपदेश या नसीहत देना बहुत आसान होता है। जरा सा कुछ अप्रिय घटा नहीं, कुछ उल्टा-सीधा हुआ नहीं कि बरसाती मेढकों की टर्राहट की तरह चारों ओर से नसीहतें बरसने लगती हैं। पचीस किलो का आदमी भी मोटे होने के गुर बताने लगेगा और पूरे परिवार के लिए हर महीने दवा खरीदने वाला भी निरोग रहने के नुस्खे लिए चला आएगा।
अब मुझे ही ले लीजिए गुस्सा नाक पर बैठा रहता है, जरा सी बात पर पारा 180 की हद छूने लगता है पर आज मौका मिलते ही मैं आप को गुस्से से होने वाले नुक्सान गिनाने जा रहा हूं। चाहे आप इससे कितना भी गुस्सा हो जाएं।

गुस्से का तात्कालिक असर शरीर पर तुरंत दिखने लगता है। चेहरा विरूप हो जाता है। भूख मर जाती है। अपने पर संयम नहीं रह जाता। आप को पता भी नहीं चलता कि आप कैसे किसी पर अपना क्रोध उतारने लगते हैं। हाथ में आई चीज पटक दी जाती है। कभी-कभी हाथ भी चल जाता है। पैर पटकना आम बात होती है। मुंह से अनाप-शनाप शब्द निकलने लगते हैं। छोटे-बड़े का लिहाज नहीं रह जाता। बाद में भले ही कितना भी पछतावा हो, उससे क्या फायदा।

गुस्सा आता क्यूं है? वैज्ञानिक कहते हैं कि गुस्सा आता है, चला जाता है। उसे गले लगा कर मत रखिए। कारण खोजिए कि क्रोध आता क्यूं है।

आपको लगता है कि सामने वाला आप का अनादर कर रहा है। व्यक्तिगत रूप से आपको परेशान किया जा रहा है। रास्ता चलते लोग सड़क के नियमों का पालन नहीं कर रहे। पड़ोसी के कारण आपकी सफाई प्रभावित हो रही है। ऐसा ही कुछ भी या बहुत कुछ भी क्रोध भड़काने के कारण हो सकते हैं।

पर सोचिए, इससे मिलता क्या है? अशांति, उच्च रक्तचाप, दिल की तेज धड़कन, बढा हुआ कोलोस्ट्रोल, कम होती रोग प्रतिरोधक क्षमता और ना जाने क्या क्या।

थोड़ा सा अपने को बदलें। पड़ोसी से बात कर हल निकालने की कोशिश करें। सड़क पर शांत रहें। कोई लापरवाही कर रहा है तो खुद रुक जाएं। आप सब को नहीं ना सुधार सकते। पूरानी बातों, रंजिशों को भूलने की कोशिश करें। छोटी-छोटी बातों को दिल पर ना लें। जिन बातों से गुस्सा आता हो उनसे बचने की कोशिश करें। क्योंकि गुस्से से कुछ हासिल नहीं होता उल्टे खोना बहुत कुछ पड़ जाता है।

X @ % & $ XX %

यह बार-बार नेट, डिस्कनेक्ट हो रहा है। मन तो करता है कि उठा कर पटक दूं ..... :-)

शुक्रवार, 9 जुलाई 2010

यह "जबुलानी बाल" का दोष है या हमारे दृष्टि तंत्र की कमजोरी ?

इस बार का विश्वकप फुटबाल जितना अपने सफल आयोजन, उल्टफेर, आक्टोपस को लेकर चर्चा में रहा वहीं खेल में प्रयुक्त बाल के कारण भी खबरों में छाया रहा।
इस बार उपयोग में लाई गयी जबुलानी बाल के खांचों की वजह से अच्छे से अच्छे खिलाड़ी को भी उसकी चाल समझने में नाकामयाबी हासिल हुई। इसी वजह से बाल की काफी आलोचना भी होती रही है।
पर वैज्ञानिकों का कुछ और ही कहना है। यू. के. के क्वीन्स विश्व्विद्यालय की कैथी क्रैग का कहना है कि हमारा दृष्टि तंत्र साइड में घूमती चीजों का आकलन करने में असमर्थ होता है। प्रयोग क तौर पर उन्होंने बहुतेरे अनुभवी खिलाड़ियों को ऐसे शाट का अवलोकन करने को कहा जिसमें गेंद करीब 600 चक्कर प्रति मिनट घूम रही थी। खिलाड़ियों को यह अंदाज लगाना था कि गेंद कहां गिरेगी पर निष्णात खिलाड़ी भी सही अनुमान नहीं लगा सके।
क्रैग ने अपने इन प्रयोगों का विवरण "नेचर विसेनशाफ्टेन" नामक पत्रिका में प्रकाशित करवाया था। उनके अनुसार गेंद के स्पिन से एक बल पैदा होता है, जिसे मैग्नस बल कहते हैं। इस बल से गैंद कौन सी दिशा अख्तियार करेगी यह जानना हमारी दृष्टि तंत्र के लिए बहुत मुश्किल होता है। उनका कहना है कि हमें अपने चारों ओर चलती, गिरती चीजं का अनुभव तो मिलता रहता है पर प्रकृति में घूमती वस्तुओं का अभाव होने के कारण कुदरत ने हमें उनके विश्लेषण करने की शक्ति भी नहीं दी है। इसीलिए हम तेजी से घूमती चीजों का सही आकलन नहीं कर पाते हैं। इसी कारण फुटबाल में गोलकीपर घूमती गेदों से गच्चा खा जाते हैं, बेस बाल और क्रिकेट में भी स्पिन होती गेंद का अंदाज बल्लेबाज ठीक से नहीं लगा पाते।

गुरुवार, 8 जुलाई 2010

आक्टोपस, हमारे भविष्यवक्ताओं के लिए खतरे की घंटी

जय हो पाल बाबा की।

सारे संसार में फ़ुटबाल का जादू जितना सर चढ का बोल रहा है उससे इस पाल बाबा की चर्चा कम नहीं है। जिन्हें इस खेल से कोई मतलब नहीं है उनके कानों में भी इससे जुड़ी खबरें "गोल" बनाती जा रही हैं। अब तो गली-गली इस भविष्यकर्ता की चर्चा है। फिर भी एक बार इस आक्टोपसानंद के बारे में बता देना सामयिक रहेगा।

जर्मनी के चिड़ियाघर में रह रहे एक आक्टोपस "पाल" से यह सब कैसे शुरु हुआ उसकी मेरे को जानकारी नहीं है। इसके द्वारा भविष्य जानने की कैसे और किसे उत्सुकता हुई या मजाक-मजाक में कुछ शुरु हुआ और सच होता गया कह नहीं सकता। पर यह पाल बाबा अब जो भी बताते हैं वह आश्चर्यजनक रूप से सही होता चला जा रहा है।
जर्मनी-स्पेन के मैच के पहले इन महाशय ने स्पेन की जीत की भविष्यवाणी कर दी थी तो बहुतों को लगा था कि इस बार यह गलत साबित हो जाएगी पर नतीजा सबके सामने है।

भविष्य जानने के लिए इसके जार में जिनका मैच होने वाला होता है उन देशों के झंड़े लगे दो ड़िब्बे उतार दिए जाते हैं यह योगी बाबा जिस डिब्बे पर बैठ जाते हैं उसी टीम को इनका आशीर्वाद मिल गया समझा जाता है।

शुरू-शुरू में जर्मनी और सर्बिया के मैच में जब इसने सर्बिया की जीत की भविष्यवाणी की थी तो सभी ने इसे बहुत हल्के से लिया था। पर सर्बिया से जर्मनी की हार ने इसके प्रति लोगों की उत्सुकता बढा दी और पाया कि इसका कहना शत-प्रतिशत सही हो रहा है। फिर भी खिताब के प्रबल दावेदार अर्जेंटिना की जर्मनी के हाथों हार की इसकी भविष्यवाणी पर औरों को तो छोड़ें खुद जर्मनी के प्रशंसकों को भी विश्वास नहीं हो पा रहा था पर सब सच होता चला गया।
तो क्या कहेंगे आप इस पालास्वामी के तुक्कों के बारे में :-)

यह जो हो रहा है, वह जो कुछ भी है पर एक आश्चर्य की बात और है कि अपने यहां बात-बात को अंधविश्वास कहने और आस्था का मजाक उड़ाने वालों की कोई प्रतिक्रया योरोप वासियों के इस कृत्य पर, जिस पर सट्टा भी लगना शुरू हो गया है, सामने नहीं आ रही है।

चलिए छोड़िए सब, आगे क्या होता है फायनल में देखते हैं।

विशिष्ट पोस्ट

व्यक्ति पूजा

मैं अमित जी के ब्लॉग को फॉलो नहीं करता, पर उस दिन  उस दिन उन महाशय के आक्षेप के बाद,  मैं जिज्ञासावश उनके ''बिग-अड्डे'' पर ग...