काक्रोच या तिलचट्टा। दुनिया के आदिम जीवों में से एक। नाम भी कैसा है तिल-तिल कर हर चीज को चट कर जाने वाला। अपनी इसी लियाकत और हर हाल में "एडजस्ट' कर लेने के गुण के कारण ही यह बड़े-बड़े दिग्गजों के सफाए के बावजूद अपना अस्तित्व बचाए रखने में सफल रहा है। इसका एक ही मूल मंत्र है, कैसे भी हो जिंदा रहना है।
घरों में पाए जाने वाले काक्रोच सब कुछ हजम कर जाते हैं, चाहे वह खाद्य हो चाहे अखाद्य उनके लिये सब भगवान का प्रसाद है। जंगलों में रहने वालों के लिए तो और भी "वैराइटियां" उपलब्ध होती हैं।
इनकी बहुत सारी प्रजातियां पायी जाती हैं पर लाखों वर्षों के बाद भी इनकी आदतों या रूप-रंग में बदलाव नहीं आया है। इनकी त्वचा पर प्राकृतिक तेलों और मोम की परत लगी रहती है इसलिए पानी का इन पर कोई असर नहीं होता। प्रकृति ने इनके मुंह के सामने का भाग बहुत संवेदनशील बनाया है वहां एंटेना की तरह के दो बाल दिये हैं जिनकी सहायता से यह अपना वातावरण पहचानता है। इन्हीं से यहवायु के तापमान को पहचान कर अपने लिए सुरक्षित जगह ढूंढ लेता है। इसके साथ-साथ इसके पैरों में भी एक अनोखी शक्ति होती है जिससे यह सुक्ष्म से सुक्ष्म कंपन को महसूस कर लेता है। जरा सा खतरा भांपते ही यह अपनी ग्रंथियों से एक गंध फैलाता है, आवाज करता है जिससे इसके अन्य साथी चेतावनी पा सुरक्षित जगहों में चले जाते हैं।
इसने भले ही अपने आप को कितना भी सुरक्षित कर रखा हो पर यह मनुष्य जाति को असुरक्षित करने में कोई कसर नहीं छोड़ता। सब कुछ खाने और हर जगह रहने के कारण यह घरों के खाद्य पदार्थों में किटाणु फैलाने का अहम जरिया है। इसके कारण दुषित खाने या पानी को ग्रहण कार हर साल हजारों लोग कालकल्वित हो जाते हैं। तो भले ही यह अपने आप में अजूबा हो इससे बच कर रहने में ही भलाई है।
इस ब्लॉग में एक छोटी सी कोशिश की गई है कि अपने संस्मरणों के साथ-साथ समाज में चली आ रही मान्यताओं, कथा-कहानियों को, बगैर किसी पूर्वाग्रह के, एक अलग नजरिए से देखने, समझने और सामने लाने की ! इसके साथ ही यह कोशिश भी रहेगी कि कुछ अलग सी, रोचक, अविदित सी जानकारी मिलते ही उसे साझा कर ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाया जा सके ! अब इसमें इसको सफलता मिले, ना मिले, प्रयास तो सदा जारी रहेगा !
रविवार, 23 मई 2010
शनिवार, 22 मई 2010
अंडे, अजीब पर गरीब नहीं
पहले मुर्गी आई कि अंड़ा यह सवाल वर्षों से लोगों को सर खुजलाने पर मजबूर करता रहा है। अपन इस पचड़े में ना पड़ आज सिर्फ अंड़ों की बात करते हैं जो अपने-आप में बहुत सारे अजूबे समेटे रहते हैं।
कुछ सालों पहले एक वैज्ञानिक ने कौतुहलवश एक अंडे के चार टुकड़े कर फिर उसे जोड़ कर रख दिया। कुछ दिनों बाद उसे सुखद आश्चर्य का सामना करना पड़ा, जब उसने उस अंड़े से एक चूजे को बाहर निकलते देखा।
एक अंड़े में तकरीबन 1500 छोटे-छोटे छिद्र होते हैं जो उसे (चूजे) आवश्यक आक्सीजन लेने में सहायता करते हैं।
सहारा के रेगिस्तान में एक मक्खी पायी जाती है जो उड़ते-उड़ते ही अंड़े देती है। इन अंड़ों के जमीन पर गिरते ही मक्खियां जन्म ले लेती हैं।
चिली में एक ऐसी मुर्गी की प्रजाति पाई जाती है जो चितकबरे अंड़े देती है।
आस्ट्रेलिया में एक लुप्तप्राय शतुर्मुर्ग का अंड़ा 40 साधारण मुर्गियों के अंड़ों के बराबर होता है, जिसे उबालने में ढाई से तीन घंटे लग जाते हैं तथा इतना मजबूत होता है कि 150 कि.ग्रा. का वजन आसानी से सह लेता है।
अंड़े सिर्फ गोलाई लिए ही नहीं होते। केलिफोर्निया की "हार्नशार्क" नामक मछली के अंडे स्क्रू की तरह के होते हैं।
@ अंड़ों से जुड़ी एक सोलह आने सच्ची घटना :-)
चार सौ मुर्गियों के पौल्ट्री फार्म में रोज अंड़ों की कम होती संख्या से गुस्साए रिटायर्ड़ मेजर ने एलान कर दिया कि कल से किसी भी मुर्गी ने दो अंड़ों से कम दिए तो उसे ही काट कर बेच दिया जाएगा। दूसरे दिन मेजर ने अपने सामने अंड़े गिनवाए तो आठ सौ एक अंड़े मिले। उसने नौकरों से पूछा किस मुर्गी ने एक अंड़ा कम दिया उसे बाहर निकालो। एक नौकर ने जवाब दिया, मालिक सभी मुर्गियों ने दो-दो ही अंड़े दिये हैं यह आठसौ एकवां तो अपने एकलौते मुर्गे ने आपके ड़र के मारे दे दिया है।
कुछ सालों पहले एक वैज्ञानिक ने कौतुहलवश एक अंडे के चार टुकड़े कर फिर उसे जोड़ कर रख दिया। कुछ दिनों बाद उसे सुखद आश्चर्य का सामना करना पड़ा, जब उसने उस अंड़े से एक चूजे को बाहर निकलते देखा।
एक अंड़े में तकरीबन 1500 छोटे-छोटे छिद्र होते हैं जो उसे (चूजे) आवश्यक आक्सीजन लेने में सहायता करते हैं।
सहारा के रेगिस्तान में एक मक्खी पायी जाती है जो उड़ते-उड़ते ही अंड़े देती है। इन अंड़ों के जमीन पर गिरते ही मक्खियां जन्म ले लेती हैं।
चिली में एक ऐसी मुर्गी की प्रजाति पाई जाती है जो चितकबरे अंड़े देती है।
आस्ट्रेलिया में एक लुप्तप्राय शतुर्मुर्ग का अंड़ा 40 साधारण मुर्गियों के अंड़ों के बराबर होता है, जिसे उबालने में ढाई से तीन घंटे लग जाते हैं तथा इतना मजबूत होता है कि 150 कि.ग्रा. का वजन आसानी से सह लेता है।
अंड़े सिर्फ गोलाई लिए ही नहीं होते। केलिफोर्निया की "हार्नशार्क" नामक मछली के अंडे स्क्रू की तरह के होते हैं।
@ अंड़ों से जुड़ी एक सोलह आने सच्ची घटना :-)
चार सौ मुर्गियों के पौल्ट्री फार्म में रोज अंड़ों की कम होती संख्या से गुस्साए रिटायर्ड़ मेजर ने एलान कर दिया कि कल से किसी भी मुर्गी ने दो अंड़ों से कम दिए तो उसे ही काट कर बेच दिया जाएगा। दूसरे दिन मेजर ने अपने सामने अंड़े गिनवाए तो आठ सौ एक अंड़े मिले। उसने नौकरों से पूछा किस मुर्गी ने एक अंड़ा कम दिया उसे बाहर निकालो। एक नौकर ने जवाब दिया, मालिक सभी मुर्गियों ने दो-दो ही अंड़े दिये हैं यह आठसौ एकवां तो अपने एकलौते मुर्गे ने आपके ड़र के मारे दे दिया है।
गुरुवार, 20 मई 2010
"महामृत्युंजय मंत्र"
जैसे देवों के देव् महादेव हैं वैसा ही मंत्रों में सबसे शक्तिशाली उनका मंत्र "महामृत्युंजय मंत्र" है। इसके जाप से भोलेनाथ प्रसन्न हो जाते हैं। मान्यता और आस्था है कि इसका जाप करने से अकाल मृत्यु टल जाती है, मरणासन्न रोगी भी महाकाल शिव की कृपा से जीवन पा लेता है.....
सावन के पावन माह का अंतिम सोमवार है। प्रभू शिव का दिवस। जैसे देवों के देव् महादेव हैं वैसा ही मंत्रों में सबसे शक्तिशाली उनका मंत्र "महामृत्युंजय मंत्र" है। इसके जाप से भोलेनाथ प्रसन्न हो जाते हैं। मान्यता मरणासन्न रोगी भी महाकाल शिव की कृपा से जीवन पा लेता है। बीमारी, दुर्घटना, अनिष्ट ग्रहों के प्रभावों से दूर करने, मौत को टालने और आयु बढ़ाने के लिए महामृत्युंजय मंत्र जप करने का विधान है। महामृत्युंजय मंत्र का जप करना परम फलदायी है, लेकिन इस मंत्र के जप में कुछ सावधानियां बरतनी चाहिएं, जैसे -
और आस्था है कि इसका जाप करने से अकाल मृत्यु टल जाती है,
महाम़त्युंजय मंत्र का जाप करते समय उसके उच्चारण ठीक ढंग से यानि शुद्ध रूप से होना चाहिए ।
इस मंत्र का जाप एक निश्चित संख्या का निर्धारण कर करना चाहिए।
मंत्र का जाप करते मन में या धीमे स्वर में करना चाहिए।
मंत्र पाठ के समय माहौल शुद्ध होना चाहिए।
इस मंत्र का जाप रुद्राक्ष की माला से करना अच्छा माना जाता है।
खुद पर पूरा भरोसा ना हो तो किसी विद्वान पंडित से ही इसका जाप करवाया जाए तो लाभप्रद रहता है। कारण हमारे मंत्र और श्लोक इत्यादि अपने में गुढार्थ लिए होते हैं। इनका उपयोग करने की शर्त होती है कि इनका उच्चारण शुद्ध और साफ होना साहिए। बहुत कम लोग ऐसे मिलते हैं जो उन्हें पढने या जाप करने के साथ-साथ उसका अर्थ भी पूरी तरह जानते हों, नहीं तो मेरे जैसे, जैसा रटवा दिया गया या पढ-सीख लिया उसका वैसे ही परायण कर लेते हैं।
रही बात "महामृत्युंजय मंत्र" की तो कादम्बिनी पत्रिका मे डा.एस.के.आर्य जी द्वारा इस मंत्र का भावार्थ पढ़ने को मिला था, सबके हित के लिए उसे यहां दे रहा हूं।
"ओ3म् त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माsमृतात्।।"
भावार्थ :- हम लोग, जो शुद्ध गंधयुक्त शरीर, आत्मा, बल को बढाने वाला रुद्र्रूप जगदीश्वर है, उसी की स्तुति करें। उसकी कृपा से जैसे खरबूजा पकने के बाद लता बंधन से छूटकर अमृत तुल्य होता है, वैसे ही हम लोग भी प्राण और शरीर के वियोग से छूट जाएं, लेकिन अमृतरुपी मोक्ष सुख से कभी भी अलग ना होवें। हे प्रभो! उत्तम गंधयुक्त, रक्षक स्वामी, सबके अध्यक्ष हम आपका निरंतर ध्यान करें, ताकि लता के बंधन से छूटे पके अमृतस्वरूप खरबूजे के तुल्य इस शरीर से तो छूट जाएं, परंतु मोक्ष सुख, सत्य धर्म के फल से कभी ना छूटें।
#हिन्दी_ब्लागिंग
बुधवार, 19 मई 2010
क्या पान खाना स्वास्थ्यप्रद है?
पान का सेवन हमारे यहां सैकड़ों वर्षों से होने के प्रमाण मिलते हैं। खास-खास अवसरों पर या आदर-सत्कार में तो इसका चलन तो है ही। किसी बड़े या कठिन काम के लिए भी इसका बीड़ा दिया जाता रहा है। पर कहीं-कहीं यह व्यसन की सीमा तक भी जा पहुंचा है।
आयुर्वेद में भी इसके उपयोग का जिक्र मिलता है जहां इसे "तांबूल या नागरबेल" का नाम दिया गया है। इसके अनुसार इसके खाने से मुख की स्वच्छता, खाने में रुचि तथा मुंह दुर्गंध रहित रहता है।
आजकल तो पान में तरह-तरह के मसाले, तंबाकू, किमाम और ना जाने किन-किन चिजों का इस्तेमाल होने लगा है जिनका दीर्घकाल तक सेवन स्वास्थ्य पर विपरीत असर डालता है। पान का सेवन बिना किसी नशीले पदार्थ के होना चाहिए। इसमें चूने, कत्थे की उचित मात्रा के साथ-साथ जायफल, सुपारी, इलायची और लौंग का उपयोग किया जा सकता है। इसे मुंह में रख धीरे-धीरे चबाना चाहिए तथा इससे जो रस बने उसे निगलते रहना चाहिए। सुपारी का भी ज्यादा उपयोग ना ही हो तो बेहतर है।
पान का सेवन बेस्वाद मुख को ठीक करता है, जीभ साफ रखता है, दांतों व जबड़ों के लिए फायदेमंद रहता है तथा गले के लिए भी उपयोगी है। इसका उपयोग सुबह मुंह साफ करने के बाद भोजनोपरांत तथा रात के खाने के बाद किया जाना चाहिए।
पर कुछ परिस्थितियों में पान खाना निषिद्ध कहा गया है -
जब नाक, मुंह, कान, गुदा से खून आता हो।
अत्यधिक थकान में।
गश आते हों तो।
गले में या शरीर में सूजन हो तो।
आंखें आयी हुई हों तो।
तथा गरम प्रकृति के व बहुत कृशकाय व्यक्ति को इसके सेवन से बचना चाहिए।
तो चलिए एक पान हो जाए.....
आयुर्वेद में भी इसके उपयोग का जिक्र मिलता है जहां इसे "तांबूल या नागरबेल" का नाम दिया गया है। इसके अनुसार इसके खाने से मुख की स्वच्छता, खाने में रुचि तथा मुंह दुर्गंध रहित रहता है।
आजकल तो पान में तरह-तरह के मसाले, तंबाकू, किमाम और ना जाने किन-किन चिजों का इस्तेमाल होने लगा है जिनका दीर्घकाल तक सेवन स्वास्थ्य पर विपरीत असर डालता है। पान का सेवन बिना किसी नशीले पदार्थ के होना चाहिए। इसमें चूने, कत्थे की उचित मात्रा के साथ-साथ जायफल, सुपारी, इलायची और लौंग का उपयोग किया जा सकता है। इसे मुंह में रख धीरे-धीरे चबाना चाहिए तथा इससे जो रस बने उसे निगलते रहना चाहिए। सुपारी का भी ज्यादा उपयोग ना ही हो तो बेहतर है।
पान का सेवन बेस्वाद मुख को ठीक करता है, जीभ साफ रखता है, दांतों व जबड़ों के लिए फायदेमंद रहता है तथा गले के लिए भी उपयोगी है। इसका उपयोग सुबह मुंह साफ करने के बाद भोजनोपरांत तथा रात के खाने के बाद किया जाना चाहिए।
पर कुछ परिस्थितियों में पान खाना निषिद्ध कहा गया है -
जब नाक, मुंह, कान, गुदा से खून आता हो।
अत्यधिक थकान में।
गश आते हों तो।
गले में या शरीर में सूजन हो तो।
आंखें आयी हुई हों तो।
तथा गरम प्रकृति के व बहुत कृशकाय व्यक्ति को इसके सेवन से बचना चाहिए।
तो चलिए एक पान हो जाए.....
मंगलवार, 18 मई 2010
कृत्य है जिनका दानव सा, कहते तुम उनको मानव हो?
यह कोई कविता नहीं है, क्योंकि मुझे कविता लिखनी आती ही नहीं, नाही उसकी समझ है। जब दिलो-दिमाग आक्रोशित हों, बेकाबू होती परिस्थितियों से, कुछ ना कर पाने की कशमकश हो, जो कुछ कर पा सकते हैं वे भी आग में आहूती देते दिखें तो ऐसे में उपजे उद्वेग से निकला यह शब्द समुह है। जो सवाल कर रहा है उन सभी से जो इस रोज होते नर संहार के घिनौने प्रकरण को खत्म ना कर अपनी-अपनी पुरियां तले जा रहे हैं। एक शांत प्रदेश को ज्वालामुखी बना कर धर दिया है।
उनका खून, खून है, इनकी जिंदगी बे-मानी है?
इनकी जान की कोई कीमत नहीं, उनकी मौत कुर्बानी है?
कृत्य है उनका दानव सा, कहते तुम उनको मानव हो?
किसके किस अधिकार की बातें तुम करते हो?
ममता, स्वामी, दिग, यश, अरुन्धती,
आंखें खोलो ना बनो गांधारी,
निष्पक्ष हो बात करो छोड़ो फैलाना बिमारी।
पूछो अपने जमीर से हो रहा क्या सब ठीक है?
उजड़ रहे हैं घर, साया छिन रहा बच्चों का, बेसहारा हो गये मां-बाप, क्या कसूर था इन बेवाओं का?
त्यागो अपनी हठधर्मिता, जाओ जाकर उनसे पूछो, कहां से आए, क्या चाहते हैं? बहाते क्यों खून निर्दोषों का? बात करते किस न्याय की, वैर निभाते किस बैरी का?
आग है इतनी सीने में, धधक रही है ऐसी ज्वाला,
तो जा रक्षा करें सरहद की उस मिट्टी की जिसने है इनको पाला।
पर देश की रक्षा करना है इतना आसान नहीं। यह काम है वीर जवानों का।
वहां दाल ना गलती बुजदिलों की। ना बचाने खड़े होते हैं मौका परस्त।
वहां खेल होता है फर्रुखाबादी, धरे रह जाते हैं सारे बंदोबस्त।
उनका खून, खून है, इनकी जिंदगी बे-मानी है?
इनकी जान की कोई कीमत नहीं, उनकी मौत कुर्बानी है?
कृत्य है उनका दानव सा, कहते तुम उनको मानव हो?
किसके किस अधिकार की बातें तुम करते हो?
ममता, स्वामी, दिग, यश, अरुन्धती,
आंखें खोलो ना बनो गांधारी,
निष्पक्ष हो बात करो छोड़ो फैलाना बिमारी।
पूछो अपने जमीर से हो रहा क्या सब ठीक है?
उजड़ रहे हैं घर, साया छिन रहा बच्चों का, बेसहारा हो गये मां-बाप, क्या कसूर था इन बेवाओं का?
त्यागो अपनी हठधर्मिता, जाओ जाकर उनसे पूछो, कहां से आए, क्या चाहते हैं? बहाते क्यों खून निर्दोषों का? बात करते किस न्याय की, वैर निभाते किस बैरी का?
आग है इतनी सीने में, धधक रही है ऐसी ज्वाला,
तो जा रक्षा करें सरहद की उस मिट्टी की जिसने है इनको पाला।
पर देश की रक्षा करना है इतना आसान नहीं। यह काम है वीर जवानों का।
वहां दाल ना गलती बुजदिलों की। ना बचाने खड़े होते हैं मौका परस्त।
वहां खेल होता है फर्रुखाबादी, धरे रह जाते हैं सारे बंदोबस्त।
रविवार, 16 मई 2010
आज तोता नहीं, कौवा है :-)
# संता और संतानी गोवा घूमने गये। वहां संता ने एक मोटर सायकिल किराए पर ली और दोनों घूमने निकल पड़े। अब संता तो संता ऊपर से पीछे बैठी बीवी उसने बीवी पर रौब ड़ालने के लिये उल्टी-सीधी बिना नियम कानून देखे गाड़ी चलाई फलस्वरूप एक चौराहे पर ट्रैफिक पुलिस ने रोक कर चालान कर दिया। संता बोला सरजी आगे तो कोई और नहीं रोकेगा? पुलिसवाले ने कहा कोई रोके तो कह देना "तोता"।
संता के हाथ चिराग लग गया। दिन भर बेतहाशा गाड़ी दौड़ाता रहा। दूसरे दिन भी अपनी हरकतों से बाज नहीं आया। नतीजतन एक जगह यातायात नियमों को तोड़ते फिर रोका गया। जैसे ही पुलिस वाला पास आया उसने अकड़ कर कहा "तोता"।
पुलिस वाले ने कहा पांच सौ रुपये निकालो, आज "कौवा" है।
# संतानी बंतानी से, तुम तो अपने कुत्ते की बहुत बड़ाई कर रही थी कि यह बहुत चतुर है, कैसे भला?जब भी मेरे पति आल्मारी खोलने लगते हैं, यह जोर-जोर से भौंकने लगता है।
बंतानी ने बात साफ की।
संता रात पी कर लौटा। पत्नी की नाराजगी से ड़र चुपचाप अपने कमरे मे जा एक बड़ी सी किताब उठा पढने लगा। पत्नी ने कमरे मे आते ही पूछा, आज फिर पी कर आए हो?
संता बोला नहीं तो।
तो फिर यह ब्रीफकेस मुंह के सामने रख क्या कर रहे हो? पत्नी ने पूछा।
संता के हाथ चिराग लग गया। दिन भर बेतहाशा गाड़ी दौड़ाता रहा। दूसरे दिन भी अपनी हरकतों से बाज नहीं आया। नतीजतन एक जगह यातायात नियमों को तोड़ते फिर रोका गया। जैसे ही पुलिस वाला पास आया उसने अकड़ कर कहा "तोता"।
पुलिस वाले ने कहा पांच सौ रुपये निकालो, आज "कौवा" है।
# संतानी बंतानी से, तुम तो अपने कुत्ते की बहुत बड़ाई कर रही थी कि यह बहुत चतुर है, कैसे भला?जब भी मेरे पति आल्मारी खोलने लगते हैं, यह जोर-जोर से भौंकने लगता है।
बंतानी ने बात साफ की।
संता रात पी कर लौटा। पत्नी की नाराजगी से ड़र चुपचाप अपने कमरे मे जा एक बड़ी सी किताब उठा पढने लगा। पत्नी ने कमरे मे आते ही पूछा, आज फिर पी कर आए हो?
संता बोला नहीं तो।
तो फिर यह ब्रीफकेस मुंह के सामने रख क्या कर रहे हो? पत्नी ने पूछा।
शनिवार, 15 मई 2010
तोला, माशा, रत्ती
पुरानी चीजों की तरह पुराने नाप-तौल भी चलन के बाहर होते चले गए। कभी-कभी मुहावरों में या किसी ख़ास खरीद फरोक्त वगैरह में उन्हें भले ही याद कर लिया जाता हो नहीं तो आज की पीढी को तो वे अजूबा ही लगते होंगे। चलिए एक बार उन्हें याद ही कर लेते हैं :-
पुराने भारतीय नाप-तौल :-
8 खसखस = 1 चावल,
8 चावल = 1 रत्ती,
8 रत्ती = 1 माशा,
4 माशा =1 टंक, 12 माशा = 1 तोला,
5 तोला = 1 छटांक,
4 छटांक = 20 तोला या 1 पाव,
8 छटांक या 40 तोला = 1 अधसेरा,
16 छटांक या 80 तोला = 1 सेर,
5 सेर = 1 पसेरी,
8 पसेरी = 40 सेर या 1 मन,
1 केजी = 86 तोला या 1 सेर 6/5 छटांक,
100 केजी = 1 क्विंटल या 2 मन 27 5/2 सेर।
विभिन्न प्रदेशों के जमीन के नाप :-
उत्तर प्रदेश -
1 लाठा = 99 इंच या 8 फुट 3 इंच।
20 अनवांसी = 1 कचवांसी,
20 कचवांसी = 1 बिस्वांसी,
20 बिस्वांसी = 1 बिस्वा,
20 बिस्वा = 1 बीघा या 3025 वर्गगज,
8 बीघा = 5 एकड़ या 24200 वर्गगज।
बंगाल -
1 वर्ग हाथ = 1 गण्ड़ा,
20 गण्ड़ा = 1 छटांक,
16 छटांक = 1 काठा = 80 वर्गगज,
20 काठा = 1 बीघा,
121 बीघा = 40 एकड़ ( 1 एकड़ = 3 बीघा 8 छटांक)
1936 बीघा = 1 वर्गमील,
पंजाब -
1 करम = 3 हाथ,
9 वर्ग करम या सरसांई = 1 मरला,
20 मरला = 1 कनाल,
4 कनाल = 1 बीघा,
2 बीघा = 1 घूमा या 3240 वर्गगज।
पुराने भारतीय नाप-तौल :-
8 खसखस = 1 चावल,
8 चावल = 1 रत्ती,
8 रत्ती = 1 माशा,
4 माशा =1 टंक, 12 माशा = 1 तोला,
5 तोला = 1 छटांक,
4 छटांक = 20 तोला या 1 पाव,
8 छटांक या 40 तोला = 1 अधसेरा,
16 छटांक या 80 तोला = 1 सेर,
5 सेर = 1 पसेरी,
8 पसेरी = 40 सेर या 1 मन,
1 केजी = 86 तोला या 1 सेर 6/5 छटांक,
100 केजी = 1 क्विंटल या 2 मन 27 5/2 सेर।
विभिन्न प्रदेशों के जमीन के नाप :-
उत्तर प्रदेश -
1 लाठा = 99 इंच या 8 फुट 3 इंच।
20 अनवांसी = 1 कचवांसी,
20 कचवांसी = 1 बिस्वांसी,
20 बिस्वांसी = 1 बिस्वा,
20 बिस्वा = 1 बीघा या 3025 वर्गगज,
8 बीघा = 5 एकड़ या 24200 वर्गगज।
बंगाल -
1 वर्ग हाथ = 1 गण्ड़ा,
20 गण्ड़ा = 1 छटांक,
16 छटांक = 1 काठा = 80 वर्गगज,
20 काठा = 1 बीघा,
121 बीघा = 40 एकड़ ( 1 एकड़ = 3 बीघा 8 छटांक)
1936 बीघा = 1 वर्गमील,
पंजाब -
1 करम = 3 हाथ,
9 वर्ग करम या सरसांई = 1 मरला,
20 मरला = 1 कनाल,
4 कनाल = 1 बीघा,
2 बीघा = 1 घूमा या 3240 वर्गगज।
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