pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

गुरुवार, 25 मार्च 2010

तीन टायलेटी चुटकले।

चलती गाड़ी में अपने शरीर का कोई अंग बाहर न निकालें :)

1, ट्रेन में बैठे श्रीमान जी काफी परेशान थे। बार-बार कसमसा कर पहलू बदल रहे थे। चेहरे पर बैचैनी साफ झलक रही थी। उनकी हालत देख सहयात्री ने पूछा, परेशान लग रहे हैं, कोई तकलीफ है?

हां, टायलेट जाना है। श्रीमान जी ने जवाब दिया।

तो जाते क्यों नहीं? साथ वाले ने पूछा ।

ट्रेन जो चल रही है। श्रीमान जी बोले।

तो उससे क्या होता है? सहयात्री कुछ समझ ना पाया।

वहां लिखा है, चलती गाड़ी मे अपने शरीर का कोई अंग बाहर ना निकालें। श्रीमान जी ने अपनी परेशानी का कारण बताया।


2, बंता ट्रेन में टायलेट जाकर लौटा तो बदहवास था। सहयात्री ने पूछा, क्या हो गया?
बंता बोला टायलेट के छेद से मेरा पर्स नीचे गिर गया।
अरे, तो चेन खींचनी थी ना। सहयात्री ने कहा।

दो बार खींची पर हर बार पानी बहने लगा।



3, रेलगाड़ी में एक बुजुर्गवार अपनी सीट से बार-बार उठ कर टायलेट जा रहे थे। कुछ परेशान भी थे। सहयात्री बार-बार उनके आने-जाने से तंग आ चुका था। अंत में उसने चिढ कर कह ही दिया, कि बाबा आपको "चैन" नहीं है?

है तो सही बेटा पर खुल नहीं रही है।

बुधवार, 24 मार्च 2010

सचिन इसीलिए कुछ अलग सा है.

आई पी एल नामक क्रिकेट के तमाशे में सम्मिलित टीमों के नामों पर गौर किया है आपने?

चलिए मान लेते हैं कि ऐसी हुल्लड़ भरी नौटंकियों में भाग लेना है तो नाम भी ऐसे, वैसे, कैसे, कैसे ही होंगे, लोगों को रोमांचित व उत्तेजित करने के लिए, बिल्कुल WWF की कुश्तियों की तरह।

आईए जरा नामों पर गौर करें :- (लिप्यान्तरण पर ज्यादा ध्यान न दें)

1, Chennai Super Kings :- राजाओं के राजा।

२, Bangalore Royal Challengers :- शाही चुन्नौति पेश करने वाले।

3, Deccan Chargers :- तेज तर्रार युद्ध के घोड़े।

4, Delhi Dare Davils :- खतरनाक शैतान।

5, Kings XI Punjab :- राजाओं का जमावड़ा।

6, Kolkata Knight Riders :- नाईट की उपाधि प्राप्त घुड़सवार।

7, Rajasthan Royals :- राजसी लोगों का समूह।

8, Mumbai Indians :- मुम्बई के भारतीय या हिंदोस्तानी।

मुम्बई की टीम भी कोई ऐसा नाम रख सकती थी जैसे - मुम्बई डान, मुम्बई मोनार्क, मुम्बई एलीट, मुम्बई थ्रस्टर या ऐसा ही कुछ।

पर जैसा उसका कप्तान है, धीर, गंभीर, शांत, मितभाषी। वैसा ही उसकी टीम का नाम भी है। जाहिर है नाम रखते समय कप्तान की सहमति भी जरूर ली गयी होगी।

पर इस तमाशे, नौटंकी की चकाचौंध में भी तेंदुलकर ने अपने देश और देशवासियों को याद रखा। यही उसका बड़्ड़पन है, उसकी महानता है। यही सोच उसे औरों से कुछ अलग करती है।

हे श्रीराम, आज हमें तुम्हारा जन्मदिन नहीं, तुम्हारा सान्निध्य चाहिए.

हे श्री राम,
प्रणाम।

आज तुम्हारा जन्म दिवस है। चारों ओर उल्लास छाया हुआ है। भक्तिमय वातावरण है। पूजा अर्चना जोरों पर है। पर यह सब भी आज के भौतिक युग की बाजारू संस्कृति का ही एक अंग है। एक बहुत छोटा सा प्रतिशत ही होगा जो सच्चे मन से तुम्हें याद कर रहा होगा। आधे से ज्यादा तो आज के अवकाश से खुश हैं। कुछ लोगों की दुकानदारी है और कुछ लोगों की तुम्हारे नाम की आड़ में अपनी रोटी सेकने का बहाना।

तुम्हारे जन्म दिवस का तो सब को याद है, पर तुम्हारे आदर्शों, तुम्हारी मर्यादा, तुम्हारे चरित्र, तुम्हारी बातों का इस देश से तिरोहण होता जा रहा है।
तुमने माँ-बाप की आज्ञा शिरोधार्य की, आज के माँ-बाप ड़रे रहते हैं कि ऐसा कुछ ना हो जाए जिससे उनके कुलदीपक को कुछ नागवार गुजरे। माँ-बाप की बात मानना तो दूर उनकी बात सुननी भी बच्चे गवारा नहीं करते। तुमने नारी के सम्मान करने की बात कही तो आज यहां हालात ऐसे हैं कि जन्म से पहले ही उन्हें परलोकगमन की राह दिखा दी जाती है। नारी उद्धार के पीछे अपना उद्धार करने पर कटिबद्ध हैं आज के समाज के कर्णधार। तुमने भाईयों के लिए सर्वत्याग किया आज अपने लिए लोग भाईयों को त्यागने में नहीं हिचकते। तुमने अपनी शरण में आनेवाले का सदा साथ दिया चाहे उसके लिए कोई भी कीमत चुकानी पड़ी हो पर आज मुसीबत में पड़े लोगों से भी कीमत वसूली जाती है। तुमने दीन-हीन-दुखियारे-पिछड़ों को सदा गले लगाया, उन्हें सम्मान का हकदार बनाया। आज ऐसे ही लोगों के कंधों का सहारा लेकर मतलबपरस्त अपनी पीढीयों का भविष्य सवारने में लगे हैं। तुमने धन-दौलत-एश्वर्य को सदा हेय समझा आज यही प्रतिष्ठा का माध्यम हैं। तुम्हारे समय में तो एक ही रावण था जिसे मार कर तुमने इस धरा को भयमुक्त किया था। पर आज तो घट-घट में रावण विराजमान हैं जो अपनी अभेद्य लंकाओं में बैठे-बैठे जाने कितनी सीताओं को अपमानित, लांछित तथा प्रताड़ित करने के बावजूद समाज में प्रतिष्ठित एवं सम्मानित हैं। तुम्हारे समय में शिक्षा, आध्यात्म, मोक्ष आदि पाने का जरिया होता था ऋषि, मुनियों का सान्निध्य, जिसमें वे आदरणीय पुरुष अपना जीवन लगा देते थे, आज के बाबा अपने एश्वर्य, भोग, लिप्सा के लिए दूसरों का जीवन ले रहे हैं। तुमने तो अपने शत्रु की अच्छाईयों को अपनाने में भी कभी देर नहीं की आज ऐसा करने की कोई सोचता भी नहीं है उल्टा उसके लिए कोई भी बुराई अपनाने में लोग नहीं हिचकते। तुमने अपने धूर विरोधियों को भी सम्मान दिया आज लोग अपने विरोधियों को मिटा देने में विश्वास करते हैं।

हे प्रभू आज हमें तुम्हारी ज्यादा जरूरत है। एक बार सिर्फ एक बार अपने सुंदर, सजीले, उतंग शिखरों वाले मंदिरों से बाहर आकर आप अपनी मातृभूमी की हालत देखो। तुम तो अंतर्यामी हो, दीनदयाल हो, सर्वशक्तिमान हो, तुम्हारे लिए तो कुछ भी अगम नहीं है.

एक बार सिर्फ एक बार फिर अवतार लो मेरे देवा !!!!!!

मंगलवार, 23 मार्च 2010

कबीर, जिन्हें एक साथ ही अग्नि और धरती में लीन होना पडा. .

कबीर के समय में काशी विद्या और धर्म साधना का सबसे बड़ा केन्द्र तो था ही, वस्त्र व्यवसायियों, वस्त्र कर्मियों, जुलाहों का भी सबसे बड़ा कर्म क्षेत्र था। देश के चारों ओर से लोग वहां आते रहते थे और उनके अनुरोध पर कबीर को भी दूर-दूर तक जाना पड़ता था।

“ मगहर” भी ऐसी ही जगह थी। पर उसके लिए एक अंध मान्यता थी कि यह जमीन अभिशप्त है। कुछ आड़ंबरी तथा पाखंड़ी लोगों ने प्रचार कर रखा था कि वहां मरने से मोक्ष नहीं मिलता है। इसे नर्क द्वार के नाम से जाना जाता था।

उन्हीं दिनों वहां भीषण अकाल पड़ा। ऊसर क्षेत्र, अकालग्रस्त सूखी धरती, पानी का नामोनिशान नहीं। सारी जनता त्राहि-त्राहि कर उठी। तब खलीलाबाद के नवाब बिजली खां ने कबीर को मगहर चल दुखियों के कष्ट निवारण हेतु उपाय करने को कहा। वृद्ध तथा कमजोर होने के बावजूद कबीर वहां जाने के लिए तैयार हो गये। शिष्यों और भक्तों के जोर देकर मना करने पर भी वह ना माने। मित्र व्यास के यह कहने पर कि मगहर में मोक्ष नहीं मिलता, उन्होंने कहा - “क्या काशी, क्या ऊसर मगहर, जो पै राम बस मोरा। जो कबीर काशी मरे, रामहीं कौन निहोरा”।

सबकी प्रार्थनाओं को दरकिनार कर उन्होंने वहां जा लोगों की सहायता करने और मगहर के सिर पर लगे कलंक को मिटाने का निश्चय कर लिया। उनका तो जन्म ही हुआ था रूढियों और अंध विश्वासों को तोड़ने के लिए।

मगहर पहुंच कर उन्होंने एक जगह धूनी रमाई। जनश्रुति है कि वहां से चमत्कारी ढंग से एक जलस्रोत निकल आया, जिसने धीरे-धीरे एक तालाब का रूप ले लिया। आज भी इसे गोरख तलैया के नाम से जाना जाता है। तालाब से हट कर उन्होंने आश्रम की स्थापना की। यहीं जब उन्होंने अपना शरीर त्यागा तो उनकी अंत्येष्टि पर उनके हिन्दु तथा मस्लिम अनुयायियों में विवाद खड़ा हो गया। कहते हैं कि इस कारण उनके चादर ढके पार्थिव शरीर की जगह सिर्फ पुष्प रह गये थे। जिन्हें दोनों समुदायों ने बांट कर अपनी-अपनी धार्मिक विधियों के अनुसार अंतिम संस्कार किया। आश्रम को समाधि स्थल बना दिया गया। आधे पर तत्कालीन काशी नरेश बीरसिंह ने समाधि बनवाई और आधे पर नवाब बिजली खां ने मकबरे का निर्माण करवाया। लखनऊ -गोरखपुर राजमार्ग पर गोरखपुर के नजदीक यह निर्वाण स्थल मौजूद है। पर यहां भी तंगदिली ने पीछ नहीं छोड़ा है। इस अनूठे सांप्रदायिक सौहार्द के प्रतीक के भी समाधि और मजार के बीच दिवार बना कर दो टुकड़े कर दिये गये हैं। वैसे भी यह समाधि स्थल उपेक्षा का शिकार है।

सोमवार, 22 मार्च 2010

चुभ-चुभ कर भीतर चुभे, ऐसे कहे कबीर.

महाभारत काल में माँ के द्वारा त्यागे जाने और फिर अधिरथ द्वारा पाले जाने वाले कर्ण ने जैसे उस युग में अपनी गौरव गाथा फैलाई थी उसी प्रकार कबीर ने अपनी जननी द्वारा त्यागे जाने और जुलाहा परिवार में परवरिश पाने के बाद भक्ति काव्यधारा में अपने नाम को सूर्य की भांति स्थापित कर दिया।

संसार में ऐसे अनेक साहित्यकार हुए हैं जो अपने युग से प्रभावित ना हो युग को ही प्रभावित करते रहे हैं। निर्गुण संप्रदाय के प्रतिनिधी संत कबीर ऐसे ही लोकचेता कवि थे। जाति संप्रदाय से उपर उठ कर उन्होंने मनुष्य धर्म को प्रतिष्ठित किया। वे युगांतकारी संत, दार्शनिक, कवि एवं समाजसुधारक थे। उनकी सपूर्ण काव्य रचना “ बीजक” नामक ग्रंथ में संकलित है।

कबीर के जन्म पर विद्वान एकमत नहीं हैं। जनश्रुति के अनुसार इनका जन्म 1453 ई। में बनारस में एक विधवा ब्राह्मणी के यहां हुआ था। लोकलाज के ड़र से जननी के द्वारा नवजात शिशु को लहरतारा ताल के पास छोड़ देने के पश्चात नीरू-नीमा जुलाहा दंपत्ति ने वहां से ला कर अपने घर में उनका पालन-पोषण किया। कबीर की शिक्षा घर की हालत और गरीबी के कारण ठीक से नहीं हो पाई थी। उन्हीं के अनुसार “मसि कागद छुओ नहीं, कलम गहि नहीं हाथ”। पर बौद्धिक विलक्षणता उनमें कूट-कूट कर भरी हुए थी। उन पर स्वामी रामानंद के विचारों का बहुत प्रभाव था। कबीर उन्हें ही अपना गुरु मान अपने विचार लोकार्पित करते थे।

कबीर का युग कटु संघर्ष का युग था। जीवन के लगभग सभी क्षेत्रों में कटुता छायी हुए थी। हिन्दु-मुस्लिम के आपसी सिद्धातों का टकराव अपने चरम पर था। इस सबसे कबीर दुखी और व्यथित रहते थे। उन्होंने नयी चेतना जागृत करने, समभाव पैदा करने, वैमनस्य मिटाने के लिए यात्राएं की। कबीर हिन्दु-मुस्लिम एकता के समर्थक थे। इसी विचारधारा के अनुसार उन्होंने अपना पंथ चलाया। उनकी भाषा खड़ी बोली, अवधी, पूर्वी, पंजाबी तथा उर्दू भाषाओं का मिश्रण थी। इसे लोग “सुधक्ड़ी” भाषा कहते हैं।

कबीर ने धर्मों में व्याप्त कुरीतियों और पाखंड़ों पर निर्मम प्रहार किए पर साथ ही उनकी समरसता और एकात्म्यता पर भी जोर दिया। उन्होंने भगवान राम को “अनहदनूर” कह कर हिन्दु-मुस्लिम धर्मों की सभ्यता को रेखाकिंत किया। यह विशाल और शाश्वत भाव किसी और के पास नहीं था। इसीलिए सैकड़ों लोग उनके मुरीद बन गये। हिन्दु मुसलमान समान रूप से उनकी जमात में शामिल हो गये। आज कबीर पंथी भारत में ही नहीं विदेशों में भी फैले हुए हैं। कबीर पंथ सुदूर फीजी तथा मारिशस तक अपनी शाखाओं द्वारा लोगों में धर्म समभाव का प्रसार कर रहा है।

कबीर ने कविताएं नहीं लिखीं अपने विचार प्रकट किये हैं। वे मस्त मौला थे, जो दिल में आता था स्पष्ट कह देते थे। तभी तो कहते हैं “चुभ-चुभ कर भीतर चुभे ऐसे कहे कबीर”। उनके लिये सब बराबर थे। सभी खुदा के बंदे थे। उनका चिंतन लोकहित में होता था – “सांई के सब जीव हैं, कीरी कुंजर दोय। का पर दया कीजिए, का पर निर्दय होय।”

उन्हें सभी धर्मों के लोग प्रेम करते थे। वे मुसलमान नहीं थे, हिन्दु हो कर हिन्दु नहीं थे, साधू हो कर गृहस्थ नहीं थे, योगी हो कर भी योगी नहीं थे। पर विड़ंबना यह रही कि कुछ तंगदिल अनुयायियों ने सांप्रदायिक सौहार्द के इस प्रतीक के अवसान के बाद उनके हिन्दु मुस्लिम होने को ले संघर्ष शुरु कर दिया। कहते हैं कि उनका शव फूलों के ढेर में तब्दील हो गया जिसे आधा आधा बांट हिन्दु तथा मुस्लिम रस्मों के अनुसार अंतिम रूप दिया गया। इसके बाद भी आपसी वैमनस्य खत्म नहीं हुआ तो मजार और समाधि के बीच दिवार खड़ी कर दी गयी। ऐसे ही लोगों के लिए कबीर अपने जीवन काल में ही कह गये थे -
“कबीरा तेरी झोपड़ी गलकटियन के पास, करनगे सो भरनगे तू क्यों होत उदास"।

साहेब बंदगी साहेब।

रविवार, 21 मार्च 2010

अंकल, कन्या खिलाओगे ?

आज सुबह दरवाजे की घंटी बजी। द्वार खोल कर देखा तो पांच से दस साल की चार-पांच बच्चियां लाल रंग के कपड़े पहने खड़ी थीं। छूटते ही उनमें सबसे बड़ी लड़की ने सपाट आवाज में सवाल दागा, 'अंकल, कन्या खिलाओगे'?
मुझे कुछ सूझा नहीं, अप्रत्याशित सा था यह सब। अष्टमी के दिन कन्या पूजन होता है, पर वह सब परिचित चेहरे होते हैं, और आज वैसे भी षष्ठी है। फिर सोचा शायद छुट्टी का दिन होने की वजह से गृह मंत्रालय ने कोई अपना विधेयक पास कर दिया हो इसलिये इन्हें बुलाया हो। अंदर पूछा तो पता चला कि ऐसी कोई बात नहीं है। मैं फिर कन्याओं की ओर मुखातिब हुआ और बोला, बेटा आज नहीं, हमारे यहां अष्टमी को पूजा की जाती है।
"अच्छा कितने बजे"? फिर सवाल उछला, जो सुनिश्चित भी कर लेना चाहता था, उस दिन के निमंत्रण को। मुझसे कुछ कहते नहीं बना, कह दिया, बाद में बताऐंगे। तब तक बगल वाले घर की घंटी बज चुकी थी।

मैं सोच रहा था कि बड़े-बड़े व्यवसायिक घराने या नेता आदि ही नहीं आम जनता भी चतुर होने लग गयी है। सिर्फ दिमाग होना चाहिये। दुह लो मौका देखते ही, जहां भी जरा सी गुंजाईश हो। बच ना पाए कोई।
जाहिर है कि ये छोटी-छोटी बच्चियां इतनी चतुर सुजान नहीं हो सकतीं। यह सारा खेल इनके माँ, बाप, परिजनों का रचा गया है। जोकि दिन भर टी.वी. पर जमाने भर के बच्चों को उल्टी-सीधी हरकतें करते और पैसा कमाते देख हीन भावना से ग्रसित होते रहते हैं अपने नौनिहालों को देख कि दुनिया कहां से कहां पहुंच गयी और हमारे बच्चे घर बैठे सिर्फ रोटियां तोड़े जा रहे हैं। ऐसे ही किसी कुटिल दिमाग में बच्चों को घर-घर जीमते देख यह योजना आयी और उसने इसका कापी-राइट कोई और करवाए, इसके पहले ही, दिन देखा ना कुछ और, बच्चियों को नहलाया, धुलाया, साफ सुथरे कपड़े पहनवाए, एक वाक्य रटवाया, "अंकल/आंटी, कन्या खिलवाओगे? और इसे अमल में ला दिया।
इनको पता है कि इन दिनों लोगों की धार्मिक भावनाएं अपने चरम पर होती हैं। फिर बच्ची स्वरुपा देवी को अपने दरवाजे पर देख कौन मना करेगा। सब ठीक रहा तो सप्तमी, अष्टमी और नवमीं तीन दिनों तक बच्चों और हो सकता है कि पूरे घर के खाने का इंतजाम हो जाए। ऊपर से बर्तन, कपड़ा और नगदी अलग से। वैसे भी इन तीन दिनों तक आस्तिक गृहणियां चिंतित रहती हैं कन्याओं की आपूर्ती को लेकर। जरा सी देर हुई और अघाई कन्या ने खाने से इंकार किया और हो गया अपशकुन।


अस्सी के दशक की याद आती है। दिल्ली में अपनी कालोनी में, खास कर अष्टमी के दिन, कैसे आस-पडोस की अभिन्न सहेलियों में भी अघोषित युद्ध छिड़ जाता था। सप्तमी की रात से ही कन्याओं की बुकिंग शुरु हो जाती थी। फिर भी सबेरे-सबेरे हरकारे दौड़ना शुरु कर देते थे। गृहणियां परेशान, हलुवा कडाही में लग रहा है पर चिंता इस बात की है कि "पन्नी" अभी तक आई क्यूं नहीं। "खुशी" सामने से आते-आते कहां गायब हो गयी? कोरम पूरा नहीं हो पा रहा है।
इधर काम पर जाने वाले हाथ में लोटा, जग लिए खड़े हैं कि देवियां आएं तो उनके चरण पखार कर काम पर जाएं। देर हो रही है, पर आफिस के बास से तो निपटा जा सकता है {वैसे आज के दिन तो वह भी लोटा लिए खड़ा होता था :)} घर के इस बास से कौन पंगा ले, वह भी तब जब बात धर्म की हो।

आज इन रायपुरियन ने कितना आसान कर दिया सब कुछ, पूरे देश को राह दिखाई है, घर पहुंच सेवा प्रदान कर।

"जय माता दी"

शुक्रवार, 19 मार्च 2010

एक ई-मेलीय सवाल, माँ का हाल पूछने की फुरसत कहाँ है?

क्या जिंदगी इसी का नाम हैं.....?

शहर की इस दौड़ में, दौड़ के करना क्या है?

जब यही जीना है दोस्तों तो फ़िर मरना क्या है?

पहली बारिश में ट्रेन लेट होने की फ़िक्र है भूल गये भीगते हुए टहलना क्या है?

सीरियल्स् के किर्दारों का सारा हाल है मालूम पर माँ का हाल पूछ्ने की फ़ुर्सत कहाँ है?

अब रेत पे नंगे पाँव टहलते क्यूं नहीं?

108 हैं चैनल् फ़िर दिल बहलते क्यूं नहीं?

इन्टरनैट से दुनिया के तो टच में हैं, लेकिन पडोस में कौन रहता है जानते तक नहीं।

मोबाइल, लैन्डलाइन सब की भरमार है, लेकिन जिग्ररी दोस्त तक पहुँचे ऐसे तार कहाँ हैं?

कब डूबते हुए सुरज को देखा था, याद है?

कब जाना था शाम का गुज़रना क्या है?

तो दोस्तों शहर की इस दौड़ में दौड़् के करना क्या है जब् यही जीना है तो फ़िर मरना क्या....???

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नकारों को नकारते नवयुवा

हमारे देश की यह बदनसीबी है कि यहां अपने स्वार्थ, अपने वर्चस्व, स्वहित के लिए किसी भी हद तक जाने वालों की कभी कमी नहीं रही है !  अभी कुछ दि...