शुक्रवार, 25 दिसंबर 2009

ऊपर से प्रत्यक्ष खबर भेजने का नियम नहीं है.

भरी दोपहर दरवाजे पर दस्तक हुई, घोष बाबू ने दरवाजा खोला तो सामने फटिक खडा था

फटिक घोष गंगा घाट पर बैठे नदी के जल पर उतराती नौकाओं को देख रहे थे। कोई सवारियों को पार ले जाने के लिये लहरों से संघर्ष कर रही थी, तो कोई पानी मे जाल ड़ाले मछली पकड़ने का उपक्रम कर रही थी। बहुत से लोग घाट पर नहा भी रहे थे। बीच बीच में घोष बाबू एक नज़र अपने पोते बापी पर भी ड़ाल लेते थे जो पानी मे कागज की छोटी-छोटी नावें बना तैराने की कोशिश कर रहा था।

घोष बाबू और उनके पोते बापी का यह रोज का अटूट नियम था, संध्या समय गंगा घाट पर आ शीतल, मंद, सुगंध समीर का आनंद लेने का।
अचानक बापी एक ओर देख चिल्लाया, "दादू, देखो केष्टो!!!
"केष्टो"?, "क्या बक रहा है? किधर है"? घोष बाबू अचंभित हो बोले।
"उधर"। घाट के एक ओर अपनी उंगली का ईशारा कर बापी बोला। अपनी आंखों पर हाथ रख उसकी उंगली की सीध में घोष बाबू ने नज़र दौड़ाई, अरे!!! सचमुच वहां घाट पर केष्टो खड़ा था। घोर आश्चर्य, केष्टो उनका पुराना नौकर, जिसकी मृत्यु दो साल पहले हो चुकी थी, वह साक्षात यहां? घोष बाबू ने तुरंत बापी को उसे बुला लाने के लिये दौड़ाया। कुछ ही देर में केष्टो उनके सामने हाथ जोड़े खड़ा था। घोष बाबू आंखे फाड़े उसकी ओर देखे जा रहे थे, फिर बोले, "अरे तू तो मर गया था न? फिर यहां कैसे?" केष्टो ने अपने पुराने मालिक के चरण स्पर्श किये और ऊपर हाथ उठा कर बोला, "मालिक उस दफ्तर में मुझे धरती से लोगों को उपर ले जाने की नौकरी मिल गयी है।"
" अरे!!! तो यहां कैसे आया है?" घोष बाबू ने पूछा।
"हरिदास को लेने।" घाट पर नहा रहे जमिंदार के नौजवान बेटे की ओर उसने ईशारा किया।
"अरे बाप रे!!! हरिदास? अरे वह तो अच्छा खासा तंदरुस्त जवान है, और अभी महीना भर पहले ही तो उसकी शादी हुई है।"
"हां बाबू, पर उसका समय आ गया है। उसे जाना होगा।"

तभी घाट पर जोर का हल्ला मच गया। हरिदास ने जो ड़ुबकी लगायी तो वह फिर पानी के ऊपर ना आ सका। कुछ देर बाद ही उसकी लाश लहरों पर उतराने लगी।
तभी केष्टो बोला, "मालिक चलता हूं।"
घोष बाबू अवाक से यह सब देख रहे थे, केष्टो कि आवाज सुन जैसे होश मे आये, बोले "अरे केष्टो, सुन जरा, ऊपर तो तेरे को सब आने-जाने वालों का पता होता होगा?"
"हां मालिक" केष्टो ने जवाब दिया।
"तो तू मेरा एक काम कर सकेगा"? घोष बाबू ने पूछा।
" हां, क्यों नहीं, बोलिये"।
"जब मेरा समय आए तो मुझे छह महीने पहले बता सकेगा?"
"जरूर, मैं आप को खबर कर दूंगा।" इतना कह केष्टो हरिदास की आत्मा को ले ओझल हो गया।

समय बीतता गया। फटिक घोष निश्चिंत थे कि समय के पहले छह महीने तो मिल ही जायेंगे, कुछ काम बचा होगा तो निपट जायेगा। ऐसे ही गर्मी के दिनों में भरी दोपहर को दरवाजे पर दस्तक हुई। दोपहर के खाने के बाद की खुमारी घोष बाबू पर चढी हुई थी। धीरे-धीरे उठ कर दरवाजा खोला तो सामने केष्टो खड़ा था। इन्हें देख बोला, "बाबू, चलिये।" घोष बाबू के सारे शरीर में सिहरन दौड़ गयी। किसी तरह बोले, "पर तुझे तो कहा था ना, कि मुझे छह महीने पहले बता देना?" " हां बाबू, मैंने ऊपर बात की थी, पर वे बोले कि हमारे यहां प्रत्यक्ष रूप में खबर करने का नियम नहीं है। हमारे यहां से अप्रत्यक्ष रूप से संदेश भेजा जाता है। जब किसी व्यक्ति का शरीर अशक्त हो जाये, चेहरे पर झुर्रियां पड़ जायें, आंखों से दिखना कम हो जाये, दांत गिर जायें, बाल सफेद हो जायें तो समझ लेना चाहिये कि समय आ पहुंचा है।
चलिये....................................

बचपन में पढी कवि गुरु की यह व्यंग रचना अक्सर याद आती रहती है।
कई दिनों से अपना बक्सा बीमार है सो जुगाड़ कर इसे पोस्ट किया है:)

सोमवार, 21 दिसंबर 2009

मेरा एक सुझाव है, सोच कर देखीए.

मेरा एक सुझाव है कि किसी भी दिग्गज ब्लाग पर "गपशप" जैसा कुछ शुरू किया जाय। अब यहां एक से बढ कर एक "पोपुलर" जगहें हैं जहां हर कोई खिंचा चला आता है। इनमें किसी पर भी ऐसा कुछ शुरु किया जाय जिसमें हर ब्लागर अपने क्षेत्र की कोई भी जानकारी, कोई घटना, कोई नयी खबर, कुछ अनोखा यदि हो तो सबके साथ बांटे। और उसकी प्रतिक्रिया भी तुरंत उपलब्ध हो सके। जैसा कि अभी ताऊजी के फर्रुखाबादी खेल में सब बढ-चढ कर भाग लेते हैं, पहेलियों के अलावा भी नोक-झोंक में। उसी तरह दुनिया-जहान की बातें एक ही जगह हो जायें। कहने को तो हर ब्लाग ऐसी ही जानकारी रखता है, पर वहां संजीदगी पीछा नहीं छोड़े रहती। अब इसकी तुलना किसी "ट्वीटर या फेसबुक" से ना कर एक अलग रूप का खिलंदड़ा ब्लाग बन जाये तो कैसा रहे? जिसमे तरह-तरह की जानकारियाँ उपलब्ध हों।
इसके लिये भी मेरी ताऊजी से ही गुजारिश है कि वह एक नया ब्लाग शुरू करें। उनकी चौपाल से ज्यादा मुफीद जगह और कौन सी हो सकती है। यदि ऐसा हो तो चौपाल पर हुक्का गुड़गुड़ाने का समय थोड़ा देर से रखा जाय।

रविवार, 20 दिसंबर 2009

आस्ट्रेलियन दंपति ने बनाया “मन चाहे फल देने वाला पेड़”

घर में एक पेड़ लगा कर आठ तरह के फल पाने का करिश्मा कर दिखाया है आस्ट्रेलियन दम्पति ने

आस्ट्रेलिया के वेस्ट दंपति ने एक अनोखा करिश्मा कर दिखाया है। एक ऐसा करिश्मा जिसका जिक्र किस्से कहानियों में तो सुना पढा गया होगा पर असली जिंदगी में जिसे असंभव ही माना जाता रहा है। जी हां इस युगल ने बारह वर्षों के अथक प्रयास से एक ऐसी विधी खोज निकाली है जिससे एक ही पेड़ पर अपनी पसंद के सारे फल उगाये जा सकते हैं। उन्होंने इसे “फ्रुट सलाद ट्री” का नाम दिया है। जेम्स वेट और उनकी पत्नी कैरी वेट के मन मे, अपने फार्म पर काम करते हुए, कुछ अनोखा करने की इच्छा सदा बनी रहती थी। अखिरकार वर्षों की मेहनत रंग लायी और वे अपने बागीचे में ऐसा पेड़ तैयार करने में सफल हो गये जिस पर अपनी इच्छानुसार फल उगाये जा सकते थे। वेट दंपति ने एक पेड़ पर अलग-अलग प्रकार के फलों की कलमें लगा कर इस अद्भुत कारनामे को अंजाम दिया। किस पेड़ पर किस फल की कलम लगायी जाय, कलम को किस तरह लगाया जाय, उसकी साज-संभार, दिये जाने वाली खाद का प्रकार, यह सब बातों की जानकारी पाते करते तथा उसका सफ़ल परिणाम पाने में उन्होंने अपने जीवन के अमूल्य बारह साल खपा दिये। शुरु-शुरू में तो लोगों को विश्वास ही नहीं होता था तथा वे सोचते थे कि ऐसे ही पेड़ में फल लटका दिये गये हैं। पर धीरे-धीरे लोगों को सच्चाई का पता चलता गया और अब तो उनके ऐसे पेड़ों की इतनी मांग हो गयी है जिसे पूरा करने मे भी उन्हें पसीना आ जाता है।
कैरी का कहना है कि अपने ग्राहक की पसंद के अनुसार मौसम, मिट्टी इत्यादि को ध्यान मे रख वे पेड़ को तैयार करते हैं। इस तरह के “फलों के सलाद वाले पेड़” बोंसाई तरीके से भी बनाये जा सकते हैं। पेड़ के आकार का फलों के स्वाद पर कोई असर नहीं पड़ता है।

कहिये कैसा लगेगा जब आप एक पेड़ उगायेंगे और उसीसे संतरा, चकोतरा, मौसम्बी आदि इसी जाति के फल पा सकेंगे। या फिर एक पेड़ से आड़ू, खुबानी, आलूबुखारा, बेर जैसे एक जाति के फल ले सकेंगे।

यदि ऐसा "मुह मांगा फल" देने वाला पेड़ लगायें तो मुझे फल भेजना मत भूलियेगा। अधिक जानकारी के लिये वेट दंपति की वेब साईट को भी देखा जा सकता है।

शनिवार, 19 दिसंबर 2009

आपके साथ भी ऐसा होता है क्या ? (:

* जब आप घर में अकेले हों और नहा रहे हों तभी फ़ोन की घंटी बजती है।

* जब आपके दोनों हाथ तेल आदि से सने हों तभी आपके नाक में जोर की खुजली होती है।

* जब भी कोई छोटी चीज आपके हाथ से गिरती है तो वहाँ तक लुढ़क जाती है जहाँ से उसे उठाना कठिन होता है।

* जब भी आप गर्म चाय या काफ़ी पीने लगते हैं तो कोई ऐसा काम आ जाता है जिसे आप चाय के ठंडा होने से पहले पूरा नहीं कर पाते।

* जब आप देर से आने पर टायर पंचर का बहाना बनाते हैं तो दूसरे दिन सचमुच टायर पंचर हो जाता है।

* जब आप यह सोच कर कतार बदलते हैं कि यह कतार जल्दी आगे बढेगी तो जो कतार आपने छोडी होती है वही जल्दी बढ़ने लगती है।

क्यों -----होता है क्या ? (: (: (:

शुक्रवार, 18 दिसंबर 2009

उस्ताद बिस्मिल्ला खां को बालाजी का आशीर्वाद प्राप्त था.

उस्ताद बिसमिल्ला खां, संगीत की दुनिया का एक बेमिसाल फनकार, सुरों का बादशाह। जिन्होंने सिर्फ शादी-ब्याह के मौकों पर बजने वाली शहनाई को एक बुलंद ऊंचाई तक पहुंचा दिया। उन्हीं के जीवन से जुड़ी एक अनोखी और अलौकिक घटना उन्हीं की जुबानी :-

मेरा बचपन मेरे मामू के घर ही बीता था। वही मेरे प्रारंभिक गुरु भी थे। वे घंटों बालाजी के मंदिर में बैठ कर रियाज किया करते थे। जब मैं कुछ बड़ा हुआ तो उन्होंने मुझे भी वहीं बैठ कर सुर साधने का आदेश दिया। मैं भी मंदिर में बिना दिन रात की परवाह किये रियाज करने लगा। इसमें कभी-कभी आधी रात भी हो जाती थी। करीब ड़ेढ-दो साल बाद एक दिन मामू साहब ने मुझे अकेले में बुला कर कहा कि यदि मंदिर में तुम कुछ देखो तो उसका जिक्र किसी से भी नहीं करना। बात मेरी समझ में कुछ आयी कुछ नहीं आयी पर मैं तन-मन से शहनाई पर सुर साधने में लगा रहा। ऐसे ही एक दिन काफी रात हो गयी थी मैं एकाग्रचित हो गहरे ध्यान में डूबा शहनाई बजा रहा था कि अचानक मंदिर एक अलौकिक सुगंध से भर गया। मैं उस सुगंध का ब्यान नहीं कर सकता। मुझे लगा शायद किसी ने गंगा किनारे लोबान आदि जलाया होगा, पर धीरे-धीरे वह सुगंध तेज होती गयी। मेरी आंखें खुल गयीं। मैंने देखा मेरे सामने साक्षात बालाजी खड़े हैं। ठीक मंदिर में लगी तस्वीर के रूप में। मैं पसीने-पसीने हो गया। उन्होंने आशीर्वाद स्वरूप हाथ उठाया और बोले, बेटा बजाओ। मेरी तो घीघ्घी बंध गयी थी। फिर वे मुस्कुराये और अदृश्य हो गये। ड़र के मारे मेरा सारा बदन कांप रहा था। मैं वहीं सब कुछ छोड़-छाड़ कर घर की ओर भागा और मामू को जगा सारी बात बतानी शुरू की ही थी कि उन्होंने कस कर एक थप्पड़ मुझे जड़ दिया और कहा कि तुम्हें मना किया था ना कि कुछ भी घटित हो किसी को मत बताना। फिर उन्होंने मुझे पुचकारा और कभी भी ना घबड़ाने की हिदायत दी।
इसके बाद मैं वर्षों एकांत में शहनाई बजाता रहा और अपने ऊपर बालाजी का आशीर्वाद और मामू के प्यार का एहसास महसूस करता रहा।

आज यह महान आत्मा हमारे बीच नहीं हैं। पर क्या उनके अनुभवों से हम कुछ सीख सकते हैं ?

यह सब सच है !!!

* नीलगिरि के जंगलों में पाये जाने वाले गिरगिट की जीभ उसके शरीर की लंबाई से तीन गुनी लंबी होती है।          इसका कद करीब 45 से।मी। होता है जबकि जीभ 1.25 मी. लंबी होती है। अफ्रीका और मेडागास्कर के जंगलों    में पाये जाने वाले गिरगिटों की जीभ तो दो मीटर लंबी पायी गयी हैं।

* पेंसिल को लेड़ पेंसिल के नाम से जाना जाता है, पर वह ग्रेफाइट और चिकनी मिट्टी के मिश्रण से बनती है।

* अंग्रेजों के समय में “कोर आफ गाइड्स” नामक पल्टन के कर्नल ने सबसे पहले खाकी रंग के कपड़ों को              अपनाया था, क्योंकि उसके अनुसार इसे पहन कर जमीन पर लेटा आदमी दूर से नज़र नहीं आ पाता।

* बुड़ापेस्ट, एक नगर नहीं, बल्कि दो शहरों के नाम से मिल कर बना है। ड़ेन्यूब नदी के एक किनारे बुडा तथा        दूसरी ओर पेस्ट नगर बसे हुए हैं।

* इसी तरह बिस्कुट जिसे रोज लाखों लोग खाते हैं, वह भी दो शब्दों से मिल कर बना है। बिस और कुट जो फ्रेंच      भाषा के शब्द हैं, जिनका अर्थ है दो बार पकाया हुआ।

* “ट्रैफिक जाम” आधुनिक युग की देन नहीं है। इसके कारण जूलियस सीजर को भी आदेश पारित करना पड़ा       था कि रोम में दिन के समय कोई पहियेदार वाहन नहीं चलेगा।

रविवार, 13 दिसंबर 2009

कथा का "री मंचन" पर अब सुधार के साथ

मूषकराज ने कहा, देवी मुझे क्षमा करें। सच बहुत कटु होता है। आपकी अस्थिर बुद्धि और चंचल मन सुयोग्य पात्रों को भी नहीं पहचान पाए। मैं तो एक तुच्छ जीव हूँ..........................

कहते हैं ना कि इतिहास अपने आप को दोहराता है, सच मानिये सब कुछ वैसे ही हुआ जैसा वर्षों पहले घटा था बस घटना का अंत जरा बदल गया है। आज कल की नारियों की प्रचंड़ सफलता की आंधी में हमारे इस नायक के फैसले का पता भी नहीं चलना था यदि दंड़कारण्य के बीहड़ जंगलों का दौरा ना किया होता। कहानी पूरानी है पर उसका अंत अप्रत्याशित है।

घूमने का शौक फिर एक बार दंड़कारण्य के जंगलों तक ले आया था। दैवयोग से एक सुबह नदी किनारे एक साधू महाराज के दर्शन हो गये। उनसे कुछ ज्ञान पाने की गरज से मैं उनके साथ हो लिया। उन्होंने मुझसे पिंड़ छुड़ाने की बहुत कोशिश की पर अंत में वे मुझे अपने साथ अपनी कुटिया में ले गये। वहां एक सुलक्षिणी कन्या को देख मैंने, अपनी जिज्ञासा को रोक ना पा, उसका परिचय जानना चाहा। साधू महाराज एक अनजान को कुछ बताने से झिझक रहे थे पर कुछ देर बाद शायद सुपात्र समझ उन्होंने जो बताया वह आश्चर्य जनक था। उन्हीं के शब्दों में पूरी कथा सुनिये............

एक सुबह मैं नदी मे स्नान करने के पश्चात सूर्यदेव को अर्ध्य दे रहा था, तभी आकाशगामी एक चील के चंगुल से छूट कर एक छोटी सी चुहिया मेरी अंजली मे आ गिरी। वह बुरी तरह से घायल थी। मैं उसे अपने आश्रम में ले आया तथा मरहम-पट्टी कर उसे जंगल मे छोड़ देना चाहा पर शायद ड़र के मारे या किसी और कारणवश वह जाने को राजी ही नहीं हुई। मैने भी उसकी हालत देख उसे अपने पास रहने दिया। समय बीतता गया और कब मैं उसे पुत्रीवत स्नेह करने लग गया इसका पता भी नहीं चला और इसी मोहवश एक दिन अपने तपोबल से उसे मानव रूप दे दिया। कन्या जब बड़ी हुई तो उसके विवाह के लिए मैने एक सर्वगुण सम्पन्न मूषक के बारे मे उसकी राय जाननी चाही तो उसने अपनी पसंद दुनिया की सबसे शक्तिशाली शख्सियत को बताया। बहुत समझाने पर भी जब वह ना मानी तो उसे मैने सूर्यदेव के पास भेज दिया, जो मेरी नजर मे सबसे तेजस्वी देवता थे। चुहिया ने उनके पास जा अपनी इच्छा बतायी। इस पर सूर्यदेव ने उसे कहा कि मुझसे ताकतवर तो मेघ है, जो जब चाहे मुझे ढ़क लेता है तुम उनके पास जाओ। यह सुन मुषिका मेघराज के पास गयी और अपनी कामना उन्हें बताई। मेघराज ने मुस्कुरा कर कहा बालिके तुमने गलत सुना है। मुझ से शक्तिशाली तो पवन है जो अपनी मर्जी से मुझे इधर-उधर डोलवाता रहता है। इतना सुनना था कि चुहिया ने पवनदेव को जा पकड़ा। पवनदेव ने उसकी सारी बात सुनी और फिर उदास हो बोले कि वह तो सदियों से पर्वत के आगे नतमस्तक होते आए हैं जो उनकी राह में सदा रोड़े अटकाता रहता है। इतना सुनना था कि चुहिया मुंह बिचका कर वहां से सीधे पहाड़ के पास आई और उनसे अपने विवाह की इच्छा जाहिर की। अब आज के युग मे छोटी-छोटी बातें तेज-तेज चैनलों से पल भर में दुनिया मे फैल जाती हैं तो पर्वतराज को चुहिया की दौड़-धूप की खबर तो पता लगनी ही थी, वह भी तब जब उनके शिखर पर एक विदेशी कंपनी का टावर लगा हुअ था। सैकड़ों वर्षों पहले की तरह उन्होंने फिर उसे वही बताया कि चूहा मेरे से भी ताकतवर है क्योंकि वह अपने मजबूत पंजों से मुझमे भी छिद्र कर देता है। यह कह उन्होंने अपना पीछा छुड़वाया। इतना सुन चुहिया ने वापस मेरे पास आ चूहे से अपने विवाह की स्विकृति दे दी। मैने मूषकराज को खबर भेजी और यहीं इतिहास भी धोखा खा गया। मूषकराज मेरे घर आए और सारी बातें सुन कर कुछ देर चुप रहे फ़िर बोले देवी क्षमा करें। मैं आपसे विवाह नहीं कर सकता। सच कटू होता है। आपकी अस्थिर बुद्धी तथा चंचल मन, इतने महान और सुयोग्य पात्रों की काबलियत और गुण ना पहचान सके। मैं तो एक अदना सा चूहा हूं। मेरे साथ आपका निर्वाह ना हो सकेगा। इतना कह साधू महाराज उदास हो चुप हो गये। कुछ देर बाद मैने पूछा कि वह आज कल क्या कर रही है। तो ठंड़ी सांस ले मुनि बोले कि लेखिका हो गयी है और पानी पी-पी कर पुरुष वर्ग के विरुद्ध आग उगलती रचनाएं लिखती रहती है।

अब आप सब यह बतायें कि मेरी जंगल यात्रा सफल रही कि नहीं।

विशिष्ट पोस्ट

जिसने सबसे ज्यादा विभिन्न रोगग्रस्त पात्रों का किरदार निभाया

अनेकों बार  Autism, Dyslexia, Progeria, Paraplegia, Alzheimer, Amnesia, Schizophrenia जैसी अनेक  बीमारियों पर, जिनका नाम भी आम लोगों ने सुना...