गुरुवार, 15 जनवरी 2009

किसी भी साल की किसी भी तारीख का दिन जाने

किसी भी साल की किसी भी तारीख का दिन बड़ी आसानी से जाना जा सकता है। इसके लिये दो तालिकायों (Tables) की जरूरत पड़ती है :-
1 :- रवीवार - 1, सोम - 2, मंगल - 3, बुध - 4, गुरु - 5, शुक्र - 6, शनि - 0 .
2 :- जनवरी - 1, फरवरी - 4, मार्च - 4, अप्रैल - 7, मे - 2, जून - 5, जुलाई - 7, अगस्त - 3, सेप्टेम्बर - 6, ओक्टूबर - 1, नवम्बर - 4, दिसम्बर - 6.
अब जिस साल का दिन जानना हो उसमें उसी साल का एक चौथाई जोड़ दें। फिर उसमें तारीख तथा महीने का नम्बर, टेबल न. 2 से ले कर जोड़ें और इसमे सात से भाग दे दें। जो भी संख्या आये उसे पहले टेबल से मिला कर देखें। वही दिन होगा। अब जैसे हमें 15 अगस्त 1947 का दिन जानना हो तो -----
47 (साल) + 11 (47/4) + 15 + 3 (टेबल में अगस्त)
____________________________________________
7
= 76/7 = बचा 6. टेबल एक में, 6 = शुक्रवार।
यानि 15 अगस्त 1947 को शुक्रवार था। है ना आसान ?

मंगलवार, 13 जनवरी 2009

रस का गोला "रशोगोल्ला"

"नोवीन दा किछू नुतून कोरो"
1866, कलकत्ता के बाग बाजार इलाके की एक मिठाई की दुकान। शाम का समय, रोज की तरह ही दुकान पर युवकों की अड्डेबाजी जमी हुई थी। मिठाईयों के दोनो के साथ तरह-तरह की चर्चाएं, विचार-विमर्श चल रहा था। तभी किसी युवक ने दुकान के मालिक से यह फर्माइश कर डाली कि नवीन दा कोई नयी चीज बनाओ। (नोवीन दा किछू नुतून कोरो)।
नवीन बोले, कोशिश कर रहा हूं। उसी कुछ नये के बनाने के चक्कर में एक दिन उनके हाथ से छेने का एक टुकड़ा चीनी की गरम चाशनी में गिर पड़ा। उसे निकाल कर जब नवीन ने चखा तो उछल पड़े, यह तो एक नरम और स्वादिष्ट मिठाई बन गयी थी। उन्होंने इसे और नरम बनाने के लिए छेने में 'कुछ' मिलाया, अब जो चीज सामने आयी उसका स्वाद अद्भुत था। खुशी के मारे नवीन को इस मिठाई का कोई नाम नहीं सूझ रहा था तो उन्होंने इसे रशोगोल्ला यानि रस का गोला कहना शुरु कर दिया। इस तरह रसगुल्ला जग में अवतरित हुआ।
कलकत्ता वासियों ने जब इसका स्वाद चखा तो जैसे सारा शहर ही पगला उठा। बेहिसाब रसगुल्लों की खपत रोज होने लग गयी। इसकी लोकप्रियता ने सारी मिठाईयों की बोलती बंद करवा दी। हर मिठाई की दुकान में रसगुल्लों का होना अनिवार्य हो गया। जगह-जगह नयी-नयी दुकानें खुल गयीं। पर जो खूबी नवीन के रसगुल्लों में थी वह दुसरों के बनाये रस के गोलों में ना थी। इस खूबी की वजह थी वह 'चीज' जो छेने में मिलाने पर उसको और नरम बना देती थी। जिसका राज नवीन की दुकान के कारिगरों को भी नहीं था।
नवीन और उनके बाद उनके वंशजों ने उस राज को अपने परिवार से बाहर नहीं जाने दिया। आज उनका परिवार कोलकाता के ध्नाढ्य परिवारों में से एक है, पर कहते हैं कि रसगुल्लों के बनने से पहले परिवार का एक सदस्य आज भी अंतिम 'टच' देने दुकान जरूर आता है। इस गला काट स्पर्द्धा के दिनों में भी इस परिवार ने अपनी मिठाई के स्तर को गिरने नहीं दिया है।
बंगाल के रसगुल्ले जैसा बनाने के लिये देश में हर जगह कोशिशें हुईं, पर उस स्तर तक नहीं पहुंचा जा सका। हार कर अब कुछ शहरों में बंगाली कारिगरों को बुलवा कर बंगाली मिठाईयां बनवाना शुरु हो चुका है। पर अभी भी बंगाल के रसगुल्ले का और वह भी नवीन चंद्र की दुकान के "रशोगोल्ले" का जवाब नहीं।
कभी कोलकाता आयें तो बड़े नामों के विज्ञापनों के चक्कर में ना आ कर बाग बाजार के नवीन बाबू की दुकान का पता कर, इस आलौकिक मिठाई का आनंद जरूर लें।
* छेना :- दूध को फाड़ कर प्राप्त किया गया पदार्थ।
* रशोगोल्ला :- रसगुल्ले का बंगला में उच्चारण।

गुरुवार, 8 जनवरी 2009

गिलहरी का पुल

हजारोँ-हजार साल पहले, रामायण काल में जब राम जी की सेना लंका पर चढ़ाई के लिए सेतु बना रही थी, तब कहते हैं की एक छोटी सी गिलहरी ने भी अपनी तरफ से जितना बन पडा था योगदान कर प्रभू का स्नेह प्राप्त किया था. शायद उस गिलहरी की  वंश परंपरा अभी तक चली आ रही है. क्योंकि फिर उसी देश में, फिर एक गिलहरी ने, फिर एक पुल के निर्माण में सहयोग किया था. प्यार भी उसे भरपूर मिला पर अफ़सोस जिन्दगी नहीं मिल पाई।  
        
अंग्रेजों के जमाने की बात है। दिल्ली – कलकत्ता मार्ग पर इटावा शहर के नौरंगाबाद इलाके के एक नाले पर पुल बन रहा था। सैकड़ों मजदूरों के साथ-साथ बहुत सारे सर्वेक्षक, ओवरसियर, इंजिनीयर तथा सुपरवाईजर अपने-अपने काम पर जुटे कड़ी मेहनत कर रहे थे। इसी सब के बीच पता नहीं कहां से एक गिलहरी वहां आ गयी और मजदुरों के कलेवे से गिरे अन्न-कणों को अपना भोजन बनाने लगी। शुरु-शुरु में तो वह काफी ड़री-ड़री और सावधान रहती थी, जरा सा भी किसी के पास आने या आवाज होने पर तुरंत भाग जाती थी, पर धीरे-धीरे वह वहां के वातावरण से हिलमिल गयी। अब वह काम में लगे मजदुरों के पास दौड़ती घूमती रहने लगी। उसकी हरकतों और तरह-तरह की आवाजों से काम करने वालों का तनाव दूर हो मनोरंजन भी होने लगा। वे भी काम की एकरसता से आने वाली सुस्ती से मुक्त हो काम करने लगे। फिर वह दिन भी आ गया जब पुल बन कर तैयार हो गया। उस दिन उससे जुड़े सारे लोग बहुत खुश थे। तभी एक महिला मजदूर सावित्री की नजर पुल की मुंडेर  पर निश्चेष्ट पड़ी उस गिलहरी पर पड़ी, जिसने महिनों उन सब का दिल बहलाया था। उसे हिला-ड़ुला कर देखा गया पर उस नन्हें जीव के प्राण पखेरु उड़ चुके थे। यह विड़ंबना ही थी कि जिस दिन पुल बन कर तैयार हुआ उसी दिन उस गिलहरी ने अपने प्राण त्याग दिये। उपस्थित सारे लोग उदासी से घिर गये। कुछ मजदुरों ने वहीं उस गिलहरी की समाधी बना दी। जो आज भी देखी जा सकती है।

यह छोटी सी समाधी पुल की मुंड़ेर पर बनी हुई है, इसिलिये इस पुल का नाम भी गिलहरी का पुल पड़ गया। आस-पास के लोग कभी-कभी इस पर दिया-बत्ती कर जाते हैं।

मंगलवार, 6 जनवरी 2009

बदला

** उसने इंस्पेक्टर को अपनी बाहों में भरा और नीचे छलांग लगा दी ** ___________________________________________________पता नहीं वह कैसे शहर की इस सबसे सुरक्षित समझी जाने वाली इमारत की पांचवीं मंजिल के बाहर खिड़की पर लगे छज्जे पर आ खड़ा हुआ था।सुबह आफिस वगैरह खुलने का समय था, सड़क पर आवाजाही शुरु हो चुकी थी तभी लोगों का ध्यान इस ओर गया। इमारत के नीचे भीड़ जमा होने लगी यातायात अवरुद्ध हो गया। किसी ने पुलिस को खबर कर दी। पुलिस ने इलाके की घेराबंदी कर फायरब्रिगेड वालों को भी बुलवा लिया। उसे हर तरह से समझा बुझा कर देख लिया गया पर वह तो मानो पत्थर के बुत की तरह वहां टंगा रहा। उतारने की हर कोशिश पर लगता कि वह नीचे कूद पड़ेगा। इसी बीच इंस्पेक्टर वर्मा भी वहां पहुंच गया। उसने सारी स्थिति का जायजा लिया, कुछ देर विचार विमग्न रह, अपने साथियों से कुछ कह कर लिफ्ट की ओर बढ गया। पांचवीं मंजिल पर पहुंच उस कमरे की खिड़की के पास गया जिसके बाहर वह खड़ा था। इंस्पेक्टर को देख कर वह खिसक कर खिड़की से कुछ और दूर हट गया। उसे ऐसा करते देख वर्मा बोला कि घबराओ मत मैं कुछ नहीं करुंगा, तुम सिर्फ यह बताओ कि तुम मरना क्यूं चाहते हो? बार-बार पूछने पर भी उस बुत नुमा इंसान ने कुछ नहीं कहा। उसे चुप देख वर्मा ने फिर कहा कि देखो तुम्हारी जो भी शिकायत है उसे दूर करने की पूरी चेष्टा करूंगा। आत्महत्या पाप है। सोचो तुम्हारे इस कदम से तुम्हारे परिवार का क्या होगा। देखो मेरा हाथ पकड़ो और अंदर आ जाओ तुम्हें कोई कुछ नहीं कहेगा। पर उस पर किसी भी बात का कोई असर नहीं हो रहा था। जैसे वह कुछ सुन ही ना रहा हो। फिर भी वर्मा ने हिम्मत नहीं हारी उसे समझाते हुए बोला, सोचा है तुमने कि तुम्हारे नहीं रहने से तुम्हारे बच्चों का क्या होगा, कैसे जी पायेंगें वे? इस बार बच्चों का जिक्र सुन उसकी आंखों से पानी बहने लगा। वर्मा का हौंसला बढा, उसने बात का छोर पकड़ कर बात आगे बढाई, पूछा बच्चों को कोई तकलीफ है, बिमार है, क्या हुआ है बताओ मैं क्या सहायता कर सकता हूं? इस पर उसका बांध टूट गया। उसके आंसूओं की धारा तेज हो गयी। यह देख इंस्पेक्टर भी खिड़की के बाहर आ गया, एक हाथ से खिड़की को थाम दूसरा हाथ उसकी ओर बढा बोला कि पूरी बात बताओ क्या हुआ है मैं पूरी तरह तुम्हारा साथ दूंगा। रोते-रोते वह इंस्पेक्टर की तरफ कुछ खिसका और उसकी बांह थाम कर कहना शुरु किया, सरकार तीन दिन पहले की बात है, मंत्री महोदय का काफिला गुजरने वाला था, सड़क पूरी तरह से बंद कर दी गयी थी। मेरा घर सड़क के किनारे ही है, वहीं मेरी छोटी सी दुकान भी है। उसी समय मेरे आठ साल के बच्चे की गेंद उसके हाथों से छूट कर सड़क पर चली गयी, वह अबोध उसे लेने जैसे ही सड़क के किनारे गया वहां तैनात पुलिस कर्मी ने उसे हटाने के लिये अपना डंडा जोर से घुमाया जो बच्चे के सिर पर जा लगा। बच्चा तड़प कर वहीं गिर गया। पर किसी ने उसकी तरफ ध्यान नहीं दिया। काफिला गुजरने के बाद उसे अस्पताल पहुंचाया जा सका, जहां कल उसने दम तोड़ दिया। मैं और मेरा बेटा इन दो ही जनों का परिवार था मेरा। अब वह नहीं रहा तो मैं भी जी कर क्या करुंगा। इंस्पेक्टर को भी वह घटना याद आ गयी उसीके डंडे की चोट से एक बालक घायल हुआ था। अपने को स्थिरचित्त कर वर्मा ने उससे कहा, जो हो गया सो हो गया तुम उस हादसे को भूल जाओ, चलो नीचे उतरो। इतना कह कर उसे अपनी ओर खींचा। वह भी धीरे से खिड़की की ओर बढा और अचानक इंस्पेक्टर को अपनी बाहों में भर नीचे की ओर छलांग लगा दी !!!

शनिवार, 3 जनवरी 2009

जल-प्रलय हुई थी

जल प्रलय एक ऐसी घटना, जिसका जिक्र वेद, कुर्आन तथा बाईबिल में है। तीनों ग्रन्थों का दुनिया के अलग-अलग धर्मों और क्षेत्रों से संबंध है फिर भी तीनों ग्रन्थों में इसके ब्योरे में इतनी समानता है कि विश्वास हो जाता है कि ऐसी घटना जरूर हुई होगी।
पहले वेद की कथा को देखें तो इसमें मनु को प्रभू ने स्वप्न में निर्देश दिये कि आज से सातवें दिन सारी पृथ्वी जलमग्न हो जायेगी तुम सज्जनों के साथ नाव में बैठ जाना। मनु ने कहना मान कर तीन सौ हाथ लंबी, पचास हाथ चौड़ी और तीन सौ हाथ गहरी नौका बनाई और समस्त पशु, पक्षियों, जीव, जंतुओं के जोड़ों और अपने कुटुंब के साथ उसमें बैठ कर प्रभू के ध्यान में लीन हो गये। चालीस दिनों तक पानी बरसता रहा, सारी धरती पानी में डूब गयी सारे समुंद्र एक हो गये। पर प्रभू की कृपा से मनु और उनके साथी बच गये और धरती पर फिर से जीवन शुरु हो सका।
बाइबिलके अनुसार नोहा को ईश्वर ने कहा कि सारे मनुष्यों का अंत आ चुका है उनके अत्याचार से पृथ्वी त्रस्त है। मैं उन्हें नष्ट करने जा रहा हूं । तुम अपने लिये एक नौका तैयार करो जिसकी लंबाई तीन सौ हाथ, चोड़ाई पचास हाथ और ऊंचाई तीस हाथ हो, उसमें तीन खंड़ हों। तुम उसमें अपनी पत्नि, पुत्र और पुत्रों की पत्नियों तथा हर जीव-जंतुओं की प्रजातियों में से दो-दो को अपने साथ ले लेना। नोह ने ऐसा ही किया। उसके बाद ऐसा हुआ कि समुद्र के सारे स्रोत फूट पड़े, आकाश मानो फट पड़ा हो, चालीस दिन और चालीस रातों तक बरसात होती रही। सारी सृष्टि नष्ट हो गयी सिर्फ नोहा और उसके साथी बच पाये। उनकी नौका अरारात की पहाड़ियों पर टिक गयी। वहां से उसने एक कबूतर को छोड़ा ताकि पता लग सके कि पानी घटा कि नही। जब पृथ्वी बिल्कुल सूख गयी तब सारे जने बाहर आये और धरती पर फिर से जीवन लौट सका।
कुर्आन मे भी इसी तरह की कथा मिलती है। उसके अनुसार वाणी की गयी नूह कि ओर कि तेरी कौम में कोई ईमान नहीं लायेगा, मात्र उन्हें छोड़ जो ईमान ला चुके हैं। इसलिये जो दुर्जन हैं वे अवश्य जलमग्न कर दिये जायेंगे। तू हमारी देख-रेख में एक नौका बना। उसमें प्रत्येक प्रजाति के जानवारों के नर-मादा के जोड़े सवार कर और उन्हें भी साथ ले जो ईमान लाये। नूह ने नौका तैयार की। तभी जल उबलने लगा, पहाड़ जैसी मौजें उठने लगीं। सारी धरती डूब गयी। फिर आदेश हुआ कि हे पृथ्वी अपना जल पी जा और हे आकाश थम जा। तुरंत जल घट गया। नौका जूदी पर्वत पर टिक गयी। फिर सबको उतरने का आदेश हुआ। धरती फिर गुलजार हो गयी।
यहां उल्लेखित जूदी पहाड़ी अरारात पर्वत का ही एक हिस्सा है, जो इराक के आर्मीनिया क्षेत्र में स्थित है।
इस प्रकार देखा जाये तो हम पाते हैं कि जल-प्रलय का विवरण तीनों धर्म-ग्रन्थों मे करीब-करीब एक जैसा है जो इस तरफ इशारा करता प्रतीत होता है कि ऐसी कोई घटना जरूर हुई होगी। संसार का भी ऐसे ही नवीनीकरण होता रहता होगा।

शुक्रवार, 2 जनवरी 2009

चपत लगाने से चैतन्यता बढती है।

हमारा शरीर एक अजूबा है। यह इतना जटिल और विचित्र है कि इसके रहस्यों को समझ पाना अभी तक संभव नहीं हो पाया है। धन्य हैं वे सर्जन, डाक्टर और वैज्ञानिक जो दिन रात एक कर जुटे हुए हैं मानव शरीर के अंगों की पूर्ण जानकारी पाने के लिये जिससे आने वाले समय में मानव रोगमुक्त जीवन जी सके।
आज कान की तरफ कान देते हैं। यह हमारे शरीर की महत्वपूर्ण ज्ञानेन्द्री है। इसका संबंध आंख, नाक, गले तथा मस्तिष्क से होता है। इस पर काफी शोध हो चुका है, पर अभी भी भीतरी कान का इलाज पूर्णतया संभव नहीं हो पाया है। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के एस.एस. स्टीवेंस के अनुसार कान के पास करीब 27000 नर्व-फाइबर्स का जमावड़ा होता है। इसीलिये कान की मालिश बहुत उपयोगी मानी जाती है। कहते हैं कि यदि आप पूरे शरीर की मालिश ना कर पायें तो सिर्फ सिर, कान और पैर के तलवों की मालिश जरूर कर लें खास कर जाड़ों में। इससे भी शरीर को स्वस्थ रहने में काफी सहायता मिलती है।
हमारे यहां तो प्राचीन काल से ही कानों में बालियां पहनने का रिवाज रहा है। इससे कान विभिन्न तरह के रोगों से बचे रहते थे। चीन के चिकित्सकों ने भी इस ओर काफी शोधकार्य कर 'एक्यूपंचर' पद्धति का प्रचलन शुरु किया था। चूंकि कान के पास की बारीक नसों का संबंध दिमाग से होता है, सो स्कूलों में जाने-अनजाने अध्यापकगण चपतियाकर, कान उमेठ कर या कान पकड़ कर उठक-बैठक करवा कर हमारी बुद्धी को चैतन्य करने में सहायक ही होते थे।
वैसे आजकल सौंदर्य विशेषज्ञ सुंदरता बढाने के लिये भी स्लैप-थेरेपी (थप्पड़ चिकित्सा) का उपयोग भी करने लग गये हैं। कहा जाता है कि इस तरह चपतियाने से खून का दौरा बढता है।
तो क्या इरादा है ? सुंदर दिखने के साथ-साथ बुद्धिमान भी कहलवाना चाहते हैं तो शुरु हो जायें आज से ही। वैसे किसी ने अपने ही कान उमेठ कर अपने ही मुंह पर चपतियाते देख लिया तो पता नहीं हम बुद्धिमान बने ना बने पर उसकी नज़र में तो कुछ और ही बन जायेंगे। सो जरा देख-भाल कर चिकित्सा शुरु करें।

मंगलवार, 30 दिसंबर 2008

ज्ञान भी सुपात्र को ही देना चाहिए

एक बहुत विद्वान ब्राह्मण थे। उनकी ख्याति दूर-दूर तक फैली हुई थी। वे घूम-घूम कर लोगों में ज्ञान बांटा करते थे। एक बार इसी तरह विचरण करते हुए वह एक राजा के यहां जा पहुंचे। राजा ने उनका बहुत आदर सत्कार किया। उन्हें अपने महल में ठहराया। रोज ही उनके सत्संग रूपी प्रकाश से राज्य की जनता अपना अज्ञान रूपी अंधकार मिटाती रही। इसी तरह कुछ दिन व्यतीत होने पर ब्राह्मणदेव ने अपनी यात्रा जारी करने की इच्छा जाहिर की। जाते समय राजा ने उनसे गुरुमंत्र देने को कहा। इस पर उन्होंने राजा से कहा कि सदा आलस्य रहित होकर, शान्ति, मित्रता, दया और धर्म से अपने राज्य का संचालन करते रहना। इस पर राजा ने प्रसन्न होकर उन्हें एक गांव भेंट करना चाहा पर ब्राह्मणदेव ने उसे लेने से इंकार कर दिया और अपनी राह चल पड़े।
चलते-चलते वे एक नदी किनारे आ पहुंचे। वहां का मल्लाह निपट मूर्ख था। उसे सिर्फ अपने पैसों से मतलब था। उसने आज तक किसी को भी बिना पैसा लिये पार नहीं उतारा था। पैसे के लिये वह लड़ाई-झगड़ा करने से भी बाज नहीं आता था। अब ब्राह्मण को उस पार जाना था सो उन्होंने नाविक से पूछा कि क्या भाई मुझे उस पार ले जाओगे ? नाविक ने कहा क्यों नहीं, किराया क्या दोगे? पंडितजी ने कहा मैं तुम्हें ऐसा उपाय बताउंगा जिससे तुम्हारे धन और धर्म दोनों की वृद्धि होगी। यह सुन कर मल्लाह ने उन्हें पार उतार दिया और उधर जा पैसे की मांग की। पंडितजी ने कहा कि तू पार उतारने के पहले ही यात्रियों से पैसा ले लिया कर, बाद में उनका मन बदल सकता है। यह धन की वृद्धि का उपाय है। नाविक ने सोचा कि इस सलाह के बाद ये पैसे भी देगा, सो उसने फिर किराया मांगा। पंडितजी ने कहा अभी तुझे धन की वृद्धि का उपाय बताया अब तू धर्म वृद्धि का उपाय भी जान ले, कैसा भी समय हो जगह हो कभी क्रोध मत करना इससे तेरा धर्म बढ़ेगा और तू सदा सुखी रहेगा। पर इस शिक्षा का मल्लाह पर कोई असर नहीं हुआ उसने कहा क्या यही तेरा किराया है? इससे काम नहीं चलनेवाला पैसे निकालो। पंडितजी ने कहा भाई मेरे पास तो शिक्षा ही है और कुछ तो है नहीं। मल्लाह चिल्लाया कि अरे भिखारी तेरे पास पैसे नहीं थे तो तू मेरी नाव में क्यूं चढ़ा, इतना कह उसने पंडितजी को नीचे गिरा पीटना शुरु कर दिया। इसी बीच नाविक की पत्नि आ गयी और उसने किसी तरह पंडितजी को छुड़ाया।
पंडितजी जाते-जाते सोच रहे थे कि इसी शिक्षा को सुनकर राजा मुझे गांव देने को तैयार था और उसी शिक्षा को सुन यह जाहिल मेरी जान के पीछे पड़ गया था।

विशिष्ट पोस्ट

जिसने सबसे ज्यादा विभिन्न रोगग्रस्त पात्रों का किरदार निभाया

अनेकों बार  Autism, Dyslexia, Progeria, Paraplegia, Alzheimer, Amnesia, Schizophrenia जैसी अनेक  बीमारियों पर, जिनका नाम भी आम लोगों ने सुना...