रविवार, 28 जून 2026

मायका नदियों का 🤔

महिलाओं का विवाहोपरांत अपने ससुराल में रचने-बसने और उपनाम बदल जाने के बावजूद भी अपने मायके से नाता नहीं टूटता ! अपनी जिंदगी भर वे वहां आती-जाती रहती हैं ! पर नदियों के साथ ऐसा नहीं है, वे एक बार जो अपने मायके से निकलीं तो जनहित में दोबारा उधर का रुख नहीं करतीं ! उनके नसीब में सिर्फ आगे की ओर बहना लिखा होता है, लौटना नहीं ! पर वे बहते-बहते भी लाखों-करोड़ों प्राणियों की खुशहाली, जीविका का साधन व धरती माता के जीवन के आधार का निरपेक्ष भाव से वायस बनती चली जाती हैं..........!              

#हिन्दी_ब्लॉगिंग 

मा यका यानी माँ का घर ! साधारणतया इसका ताल्लुक इंसानों से खासकर महिलाओं से होता है ! वह घर जहां बच्चियां जन्म लेती हैं, बड़ी होती हैं, कार्य-कुशलता प्राप्त करती हैं और फिर समय आने पर विवाहोपरांत अपने ससुराल या पति के घर चली जाती हैं ! पर उनका मायके से नाता जुड़ा रहता है ! तीज-त्यौहार-उत्सवों के अलावा भी गाहे-बगाहे वे वहां आती-जाती रहती हैं !  

मध्य प्रदेश 

पर क्या नदियों का मायका भी होता है ? जी हाँ ! हमारे देश में मध्य प्रदेश एक ऐसी जगह है, जिसे नदियों का मायका कहलवाने का सौभाग्य प्राप्त है ! क्योंकि यहां से लगभग 6 बड़ी और करीब 14 मध्यम व छोटी नदियां निकलती हैं। यहां से निकलने वाली प्रमुख नदियाँ हैं, नर्मदा, चंबल, ताप्ती, सोन, क्षिप्रा, बेतवा,केन, तवा, काली सिंध, कूनो इत्यादि ! इन नदियों का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व तो है ही इसके साथ ही इनका मध्य प्रदेश के निवासियों के लिए  बहुत बड़ा आर्थिक योगदान भी है। यही कारण है कि इस राज्य को नदियों का मायका कहा जाता है। 

अमरकंटक 

वि डंबना यह है कि इंसानी महिलाओं का विवाहोपरांत अपने ससुराल में रचने-बसने और उपनाम बदल जाने के बावजूद भी अपने मायके से नाता नहीं टूटता ! अपनी जिंदगी भर वे वहां आती-जाती रहती हैं ! पर नदियों के साथ ऐसा नहीं है, वे एक बार जो अपने मायके से निकलीं तो जनहित में दोबारा उधर का रुख नहीं करतीं ! उनके नसीब में सिर्फ आगे की ओर बहना लिखा होता है, लौटना नहीं ! पर वे बहते-बहते भी लाखों-करोड़ों प्राणियों की खुशहाली, जीविका का साधन व धरती माता के जीवन के आधार का निरपेक्ष भाव से वायस बनती चली जाती हैं !

नदियों का मायका 
इस दुनिया में करीब डेढ़ लाख नदियां बहती हैं, जिनमें छोटी-बड़ी मिला कर तकरीबन दो सौ प्रमुख नदियां हमारे देश में लोगों को जीवन प्रदान करती हैं ! मायके से निकलने के बाद जनहित में ये कभी भी पीछे मुड़ कर नहीं देखतीं ! ऐसी जीवन दायिनी, प्रभु की अमूल्य भेंट के प्रति हमारा भी कर्तव्य बनता है कि हम इनका ख्याल रखें ! इनका सम्मान करें ! यदि कुछ ना भी कर सकें तो कम से कम इन्हें ''व्यथित'' तो ना करें ! 

@सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 🙏

4 टिप्‍पणियां:

Admin ने कहा…

नदियों को बेटियों की तरह देखना एक बेहद संवेदनशील और अनोखी सोच है। सचमुच, नदियां अपने उद्गम स्थल से निकलकर लाखों लोगों के जीवन का आधार बन जाती हैं और बिना किसी स्वार्थ के निरंतर बहती रहती हैं।
बहरहाल, मेरा यहाँ आने का एक कारण और भी है। हम लोग मुंशी प्रेमचंद जी की आगामी पुण्यतिथी ३१ जुलाई २०२६ के अवसर पर प्रेमचंद महोत्सव के अंतर्गत "५० दिनों में ५० कहानियाँ" बनाने, सुनाने (और जुटाने की भी!) की ओर प्रयासरत है. अगर आपकी रूचि हो तो इस अभियान में आपका सहर्ष स्वागत है.

अधिक जानकारी आपको यहाँ मिल जाएगी - HindiDiscussionForum dot com
धन्यवाद!

Sweta sinha ने कहा…

हमारा क्या अधिकार बनता है हम ये याद रखते हैं, सिर्फ गाल बजाना आता है हमें सर, कर्तव्य करना तो चुनिंदा पदों पर बैठे लोगों का बनता है।
बेहद गंभीर विषय पर लिखा है आपने सर, पर लोग जागरूक नहीं अब भी शायद।
सादर।
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नमस्ते,
आपकी लिखी रचना मंगलवार ३० जून २०२६ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।

Digvijay Agrawal ने कहा…

बेहतरीन संकलन
वंदन

हरीश कुमार ने कहा…

बहुत सुंदर लेख

विशिष्ट पोस्ट

मायका नदियों का 🤔

महिलाओं का विवाहोपरांत अपने ससुराल में रचने-बसने और उपनाम बदल जाने के बावजूद भी अपने मायके से  नाता नहीं  टूटता ! अपनी जिंदगी भर वे वहां आती...