शनिवार, 2 फ़रवरी 2019

भगवान को सरल जन ही प्रिय हैं !

बेचारा दौड़ा-दौड़ा महात्मा जी के पास गया और बोला महाराज आज रसोई ठंडी पड़ी है, कुछ बन नहीं रहा ! महात्मा जी बोले, अरे तुम्हें बताना भूल गया था, आज एकादशी है, ना कुछ बनेगा, नाहीं मिलेगा। सबका उपवास रहेगा। ये बोला, मेरा भी ? महात्मा बोले, हाँ ! सभी का। यह बोला, महाराज आपके इतने चेले हैं, उनसे करवा लो ! महात्मा बोले, नहीं सभी को करना होता है। यह घबड़ाया, बोला महाराज यदि मैंने आज एकादशी कर ली तो मैं तो द्वादशी देख ही नहीं पाऊँगा ! महात्मा समझ गए कि ये भूखा नहीं रह सकता...........!

#हिन्दी_ब्लागिंग 
सरलता का अर्थ है, अंदर-बाहर से एक जैसा होना। मन, वचन और कर्म में समान होना। ऐसे लोगों मे दर्प, दंभ, अहम आदि दुर्गुण नहीं होते ! सरलता में मित्रता है, प्रेम है, अपनापन है, जोड़ने की शक्ति है। यही जोड़ने की शक्ति व्यक्ति को व्यक्ति से, समाज से और फिर परमात्मा तक से जोड़ देती है। पिछले दिनों इसी पर एक कथा पढ़ने को मिली, बहुत अच्छी लगी तो लगा सबसे साझा करनी चाहिए ! कुछ लम्बी जरूर है पर मनोरंजक भी है। 

किसी गांव में एक किसान अपने तीन बेटों के साथ रहा करता था। उसका छोटा बेटा सीधा-सादा, सरल ह्रदय, भोला-भाला था। किसान के दोनों बेटे खेत में अपने पिता का हाथ बटाते थे पर छोटे को भोजन बहुत प्रिय था। उसकी खुराक भी कुछ ज्यादा ही थी। वह खाता था और पड़ा रहता था। समय की मार एक दिन किसान का निधन हो गया। अब दोनों भाइयों को निठ्ठला छोटा भाई भार लगने लगा। काम का ना काज का दुश्मन अनाज का ! उन्होंने उसे एक दिन घर से निकाल दिया। अब वह कहां जाता ! ऐसे ही बिसूरते हुए गांव के बाहर बैठा हुआ था कि उसे एक महात्मा अपने शिष्यों के साथ आते दिखे। सभी हट्टे-कट्टे, स्वस्थ नजर आ रहे थे। इसने सोचा सब मोटे-ताजे, तंदरुस्त नजर आ रहे हैं, यह सब खूब खाते होंगे ! मुझे भी भोजन मिल जाएगा। यही सोच वह महात्माजी के चरणों में लोट गया और अपने को भी चेला बनाने की और साथ ले चलने की विनती करने लगा। महात्मा दयालु थे, उन्होंने उसे तुलसी की माला पहना दी, नाम रख दिया, मंत्र दे दिया ! बोले चलो ! यह ठहरा भोला बंदा, पूछने लगा, करना क्या होगा ? महात्मा बोले, कुछ नहीं, पूजा-आरती में खड़े रहना है। भगवान का नाम लेते रहना है। उनका ध्यान करना है, बस। पर इसको तो अपने भोजन की चिंता थी ! सो फिर पूछा, महाराज खाने को ? महात्मा मुस्कुराए, बोले, दोनों समय प्रेम से, भरपेट ! पर महाराज मेरा दो वक्त से....! महात्मा हंसने लगे, बोले तुम्हें चार बार मिलेगा, अब खुश ! उसको लगा यह तो स्वर्ग मिल गया ! करना कुछ नहीं, खाना भरपूर। वह साथ हो लिया।

पर उसे क्या पता था की यहां भी मुसीबत आएगी। एक दिन उठ कर देखा तो भंडार में सब वैसे ही पड़ा था, चूल्हे भी ठंडे पड़े थे, कोई हलचल नहीं। बेचारा दौड़ा-दौड़ा महात्मा जी के पास गया और बोला महाराज आज रसोई ठंडी पड़ी है, कुछ बन नहीं रहा ! महात्मा जी बोले, अरे तुम्हें बताना भूल गया था, आज एकादशी है, ना कुछ बनेगा, नाहीं मिलेगा। सबका उपवास रहेगा। ये बोला, मेरा भी ? महात्मा बोले, हाँ ! सभी का। यह बोला, महाराज आपके इतने चेले हैं, उनसे करवा लो ! महात्मा बोले, नहीं सभी को करना होता है। यह घबड़ाया, बोलै महाराज यदि मैंने आज एकादशी कर ली तो मैं तो द्वादशी देख ही नहीं पाऊँगा ! महात्मा समझ गए कि ये भूखा नहीं रह सकता ! बोले नियमानुसार तो भोजन नहीं बन सकता पर भगवान के भोग के रूप में बना लो और उनका भोग जरूर लगाना। जाओ भंडारे से सामान ले कर बाहर जा बना लो। बंदा खुश उसने सामान लिया, नदी किनारे जा, जैसा बन पड़ा बना, भोग लगाने को प्रभु को पुकारने लगा कि आइए भोग लगा लीजिए ! उसे लगा कि यूँ ही बुलाने पर भगवान आते होंगे और भोजन ग्रहण करते होंगे ! पर प्रभू नहीं आए ! इसको लग रही थी भूख ! बार-बार बुलाने पर भी जब प्रभू नहीं आए तो इसे लगा कि इस रूखे-सूखे भोजन को देख वे नहीं आ रहे हैं सो इसने ऊँची आवाज में कहा, सुनो आज मंदिर के भरोसे मत रहना, आज पूरी हलवा नहीं मिलेगा। आज एकादशी है वहां कुछ नहीं बना, भूखे रह जाओगे ! आज तो यही सूखी रोटी और नदी का पानी है। जल्दी आ जाओ, मुझे भी जोरों की भूख लगी है। उसकी इस सरलता पर प्रभू रीझ गए और प्रकट हो गए। पर वे अकेले नहीं आए, उनके साथ सीता माता भी थीं। अब जब इसने प्रभू और सीता माता को देखा तो उनकी सुंदर जोड़ी को देखता ही रह गया, तन-मन आनंद से भर गए पर साथ ही उदास भी हो गया ! सोचने लगा गुरु जी ने एक भगवान के लिए कहा था ये तो दो आ गए ! अब वो कभी भगवान जी को देखता तो कभी भोजन की ओर ! प्रभू भी कौतुक कर रहे थे, बोले क्या हुआ ? बोला, कुछ नहीं एक के इंतजाम की बात थी, आप दो जने आ गए ! थोड़ी एकादशी तो करवा ही दोगे ! चलो कोई बात नहीं ! विराजो। भगवान बैठ गए ! भोजन परोस दिया। बोला, मैं कुछ भूखा तो रहा पर आपको देख कर बहुत अच्छा लगा ! चलो आज का तो हो गया, मैं समझ गया कि आप दो आते हो; अगली एकादशी पर मैं ज्यादा इंतजाम कर के रखुंगा। पर आज की तरह परेशान मत करना जल्दी आ जाना। भगवान ने कहा, ठीक है और चले गए।

इधर इसने आ कर गुरु जी से कुछ नहीं बताया क्योंकि इसे लग रहा था भगवान ऐसे ही आते होंगे, गुरु जी को मालुम ही होगा, इसमें बताने वाली बात ही क्या है। इतना सरलचित्त ! अगली एकादशी आई तो महात्मा जी से बोला, गुरूजी कुछ सामान बढ़वाओ ! उन्होंने पूछा, क्यों ? तो बोला, वहां दो भगवान आते हैं। गुरूजी समझे इस बार भूखा रह गया होगा; इसी से ऐसा कह रहा है। उन्होंने सामान बढ़वा दिया। अब इसने सारा सामान ले, नदी किनारे पहुंच, भोजन बना, प्रभू को पुकारा ! भगवान तो इंतजार ही कर रहे थे। प्रकट हो गए। पर इस बार साथ में लक्ष्मण जी भी थे ! अब इसने जो तीन को देखा तो बोला, हद हो गयी; एक को बुलाओ तो दो आते हैं; दो का इंतजाम करो तो तीन आते हैं ! अब यह कौन है ? प्रभू बोले, ये मेरे छोटे भाई लक्ष्मण हैं। भोले बंदे को शक ! पूछने लगा, सच कह रहे हो या ऐसे ही पकड़ लाए हो ? प्रभू मुस्कुराते हुए बोले, नहीं-नहीं, सच में मेरे छोटे भाई हैं। ये परेशान, बोला, गुरु जी ने तो सिर्फ ठाकुर जी को भोग लगाने को कहा था, यहां तो पूरा परिवार ही आ गया ! उसकी बात पर प्रभू और सीता मैया तो खूब हँसे पर लक्ष्मण जी सोचने लगे, प्रभू कहाँ ले आए ! क्या स्वागत हुआ है। बंदा बोला, चलो कोई बात नहीं, भूखा भले ही रह जाऊं, पर आपलोगों को देख कर मुझे अच्छा बहुत लगता है। चलिए विराजिए, एक ही तो ज्यादा है, हो जाएगा। सबने भोग लगाया। प्रभू जब चलने लगे तो इसने बार-बार उनके चरणों में सर नवाया, बोलने लगा, आप लोग बहुत अच्छे लगते हो, बहुत सुंदर हो ! कहते-कहते उसकी आँखों में आंसू भर आए। तभी अचानक उसने भगवान से कहा, प्रभू , अगली एकादशी का अभी से बता जाओ कितने आओगे, ताकि मैं उतने का इंतजाम कर रखूँ। यही एक बात है पहले से बता दिया करो कितने आओगे ! और कोई परेशानी नहीं है। प्रभू तो कौतुक कर ही रहे थे, बोले, तुम चिंता मत करो, सब ठीक हो जाएगा, हम आ जाएंगे !

इस बार भी इसने महात्मा जी को कुछ नहीं बताया। अगली एकादशी भी आ गयी। अब गुरु जी से सामान कैसे बढ़वाऊं यह सोच कर परेशान था। इसे कुछ उदास सा देख महात्मा जी ने ही पूछ लिया, क्या बात है बच्चा ? कोई परेशानी हो तो बताओ ! जब उन्होंने पूछ ही लिया तो इसने कहा, क्या बताएं, वहाँ बहुत से भगवान आते हैं, हर बार भोजन कम पड जाता है। राशन दोगुना करवा दें। महात्मा जी ने सोचा, इतना तो यह खा नहीं सकता ! जरूर बेच देता होगा। पर बोले कुछ नहीं और उसके कहे मुताबिक़ राशन दिलवा दिया। पर करता क्या है यह देखने उसके पीछे-पीछे जाने की ठानी। यह सरल ह्रदय सामान ले जा पहुंचा नदी तट पर। पर इस बार उसने भोजन बनाया नहीं, सोचा पहले बुला कर देख लूँ, कितने आते हैं, फिरउसी हिसाब से बनाऊंगा। सो इसने प्रभू को पुकारा ! इसके पुकारते ही भगवान भी आ गए। पर अकेले नहीं इस बार लक्ष्मण जी के साथ-साथ भरत जी, शत्रुघ्न जी तथा हनुमान जी भी साथ थे, यानी पूरा राम दरबार ! इसने देखा तो परेशान, बोला, प्रभू यह तो हद है ! एक को बुलाया तो दो आए, फिर तीन आज तो इतने सारे ! इंसान तो इंसान आप तो वानर को भी साथ ले आए। तो सुन लो मैंने भी भोजन नहीं बनाया है ! प्रभू ने पूछा,  ऐसा क्यों ? तो बोला, जब मुझे मिलना ही नहीं, तो मैं क्यों बनाऊँ ? यह सारा सामान पड़ा है, बनवा लो और भोग लगा लो ! इतना कह वो एक किनारे पेड़ के नीचे जा कर बैठ गया। भगवान भी भक्त के वश ! भोजन व्यवस्था संभाल ली गयी। भरत जी और हनुमान जी ने सफाई वगैरह की, लक्ष्मण जी लकड़ी-पानी ले कर आए। शत्रुघ्न जी ने सामान व्यवस्थित किया और सीता जी ने रसोई संभाली। अब जब साक्षात अन्नपूर्णा को भोजन बनाते देखा तो जितने ऋषि-मुनि-संत-महात्मा थे वे सब भी आ उपस्थित हुए, माँ के हाथों का प्रसाद पाने को। उधर इतना कुछ हो रहा था और इधर हमारा भक्त आँख बंद किए बैठा था। जब प्रभू ने पूछा, भाई आँख क्यों मूँदे बैठे हो ? तो बोला, पहले तो कुछ मिल भी जाता था आज इतनी भीड़ में जब कुछ मिलना ही नहीं है तो देखने से क्या फायदा !

इधर गुरु जी भी यह देखने पहुँच गए कि देखें ये सामान का करता क्या है ! तो देखते क्या हैं कि ये आँखें मूंदे बैठा है और सामने सामान यूँ ही पड़ा हुआ है ! अचरज में पड़ वे बोले, क्यों बच्चा, क्या हो रहा है ? उनकी आवाज सुन ये उठा और बोला आपने तो अच्छी मुसीबत में डाल दिया ! देखिए कितने भगवान आए हुए हैं ! गुरु जी ने इधर-उधर देखा उन्हें कुछ भी दिखाई नहीं दिया, बोले, यहाँ तो कोई भी नहीं है ! तुम दिख रहे हो और सामान दिख रहा है बस ! सामने खड़े प्रभू मुस्कुरा रहे थे। इसने सामने खड़े भगवान से कहा, गुरु जी ने तो मुझसे एक भी एकादशी नहीं करवाई, तुमने पूरी करवा दी और उन्हें पता भी नहीं लगने दे रहे हो ! इनको क्यों नहीं दिखते ? इनको भी दिखो ! प्रभू बोले, मैं इनको नहीं दिख सकता ! क्यों नहीं दिख सकते ? ये मेरे गुरु हैं, विद्वान हैं, नेक हैं, महान हैं। प्रभू बोले, इसमें कोई संदेह नहीं, तुम्हारे गुरु बहुत महान हैं, विद्वान हैं, योग्य हैं, भजनानंदी हैं फिर भी मैं उन्हें नहीं दिखूंगा ! आँखों में आंसू ला वह बोला, इतना सब है फिर क्यों नहीं दिखोगे ? इसलिए क्योंकि वे तुम्हारी तरह सरल नहीं हैं। मैं तो सरल के लिए सरलता से मिलता हूँ। उसको बड़बड़ाते देख गुरूजी ने पूछा, क्या हुआ बच्चा ? क्यों रो रहे हो ? तो बोला, भगवान् कह रहे हैं कि आप सरल नहीं हो ! इतना सुनते ही गुरु जी की आँखों से अविरल जल बहने लगा ! बोले, सचमुच सब कुछ जीवन में मिला पर सरलता नहीं मिल पाई ! जिससे भगवान् के दर्शन होते थे वही नहीं मिला तो मेरा तप-पूजा-पाठ यहां तक कि जीवन भी व्यर्थ है ! उनके आंसू थमते नहीं थे ! उनका ऐसा पश्चाताप देख प्रभू भी पिघल गए और उन्हें भी दर्शन दे कृतार्थ किया।          

8 टिप्‍पणियां:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (03-02-2019) को "चिराग़ों को जलाए रखना" (चर्चा अंक-3236) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Digvijay Agrawal ने कहा…

सरलता से सब सधे...
जय श्रीराम..
सादर..

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

शास्त्री जी, हार्दिक धन्यवाद

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

दिग्विजय जी, "कुछ अलग सा" पर सदा स्वागत है

शिवम् मिश्रा ने कहा…

ब्लॉग बुलेटिन की दिनांक 02/02/2019 की बुलेटिन, " डिप्रेशन में कौन !?“ , में आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

शिवम जी, आपका और ब्लॉग बुलेटिन का हार्दिक धन्यवाद

मन की वीणा ने कहा…

सुंदर और सार्थक संदेश देती रचना।

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

कुसुम जी, सदा स्वागत है

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