फिल्मी पर्दे को छोड़ दें, वह तो बहुत बड़ी बात है, टीवी के छोटे पर्दे पर भी अपना चेहरा दिखाने और खुद अवतरित होने के लिए आज की कन्याएं कुछ भी करने को आतुर और लालायित रहती हैं। पर क्या इसकी कल्पना भी की जा सकती है कि जब भारत में फिल्मों के जनक दादा साहब फाल्के को अपनी पहली फिल्म, वह भी धार्मिक, के लिए महिला कलाकार की जरूरत पड़ी तो उन्हें दांतों तले पसीना आ गया था। कोई भी महिला या उसका परिवार अपने घर की युवती को इसकी इजाजत नहीं दे रहा था। थक-हार कर उन्होंने अपनी बेटी से ही वह भूमिका करवाने की सोची पर वह उस भूमिका के लिए काफी छोटी थी। आखिर मजबूर हो उन्हें इस भूमिका के लिए एक होटल में रसोइये का काम करने वाले सालुंके नामक युवक को राजी करना पड़ा था। वैसे उस समय रंगमंच पर स्त्री पात्रों का काम भी पुरुष पात्र निभाया करते थे। क्योंकि उस समय भले और सभ्रांत घर की बहू-बेटियों के लिए ऐसे काम करना अलिखित रूप से वर्जित माना जाता था।
इसी कारण जब दादा साहब ने अपनी दूसरी फिल्म "लंका दहन" बनाई तो उसमें भी पुरुष और महिला किरदारों को सालुंके ने ही निभाया था।
पता नहीं यह स्थिति कब तक बनी रहती यदि उस समय बंबई में दफ्तरों इत्यादि में कार्यरत एंग्लो-इंड़ियन युवतियां फिल्मों में दिलचस्पी लेना शुरु ना कर देतीं।
आज तो यह सुन-पढ कर भी आश्चर्य होगा वर्तमान पीढी को।
इस ब्लॉग में एक छोटी सी कोशिश की गई है कि अपने संस्मरणों के साथ-साथ समाज में चली आ रही मान्यताओं, कथा-कहानियों को, बगैर किसी पूर्वाग्रह के, एक अलग नजरिए से देखने, समझने और सामने लाने की ! इसके साथ ही यह कोशिश भी रहेगी कि कुछ अलग सी, रोचक, अविदित सी जानकारी मिलते ही उसे साझा कर ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाया जा सके ! अब इसमें इसको सफलता मिले, ना मिले, प्रयास तो सदा जारी रहेगा !
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4 टिप्पणियां:
आज भी शर्मा जी इज्जत दार लोग अपने घर की बेटियो ओर बेटो को संस्कार देते है, उन का जिस्म दिखा कर कला के नाम से पेसा नही कमाते, जो यह करते है उन की भगवान जाने...... वेसे आज भी किसी भी इज्जत दार घर मै कोई हिरोईन या यह ड्रामो मै काम करने वाली बहूं बन कर नही आती, ओर इज्जत दार घर जरुरी नही महलो मै आलीशान बिडिंगो मै ही हो.....
आप का आज का लेख बहुत सुंदर लगा, धन्यवाद
वाह-वाह,बहुत बढिया-
सारी बातें तो राज भाई साब ने कह ही दी हैं।
उम्दा पोस्ट के लिए आभार
खोली नम्बर 36......!
पोस्ट तथ्यपूर्ण और दृष्टि-संपन्न, सराहनीय है. माफ कीजिए, 'दांतों तले पसीना' प्रयोग शायद पहली बार पढ़ा, सो अटपटा लगा. अभी तक 'दांतों तले उंगली दबाना' और 'दांतों पसीना आना' प्रयोग से ही परिचित था.
बिलकुल सही कहा आपने हम आपकी बात से सहमत हैं , आजकल तो मीडिया से मुखातिब होने की भीड़ सी लग गई है !
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