शुक्रवार, 11 अक्तूबर 2019

एक ठो खेला है, नाम है ''कौबक''..... यानी कौन बनेगा करोड़पति

कुछेक हिंदी के शब्द, नाम या चीजें अंग्रेजी में ज्यादा प्रचलित, सहज स्वीकार्य और कुछ-कुछ कर्णप्रिय सी हो जाती हैं। उदाहरण स्वरुप जैसे ''महाशयां दी हट्टी,'' एम.डी.एच. के रूप में ज्यादा प्रचलित और जाना-माना है। युवाओं द्वारा बहु प्रयोगी  ''शिट, हगीज, बम'' जैसे शब्दों को शायद ही कोई भद्र-लोक  हिंदी में सुनना या बोलना पसंद करे ! इसीलिए टी.वी. पर चल रहे एक खेल ''कौन बनेगा करोड़पति'' के हिंदी में संक्षिप्त रूप ''कौबक'' को लोग बुडबक ना कहने लगें इसलिए उसे अंग्रेजी के अक्षरों से उच्चारित कर केबीसी के नाम से प्रचारित किया जाता है। अब किसी को अच्छा लगे या बुरा पर एक बात तो साफ़ है कि साधारण मनई लोग अमीर बने ना बने पर चैनल, खेल की टीम और बच्चन साहब, इन सब की तकदीर तो इस खेल ने बदल ही दी है। अच्छी बात है ! इसमें कोई खराबी भी नहीं है, आज के समय में हर कोई पहले अपना  फटा कुर्ता सीना चाहता है.....................!

#हिन्दी_ब्लागिंग
KBC, कभी-कभी तो लगता है कि यह खिलाड़ी के खिलाफ रचा गया एक षड्यंत्र है ! खेल में येन-केन-प्रकारेण जब कोई इस लायक होता है कि वह दूसरे प्रतियोगियों की बद्दुआओं और चैनल की ढेर सारी हिदायतों यथा, आपको कब उछलना है, कितनी देर रोना है, पैर छूना है या गले लगना है, क्या कहना है, बच्चन जी की कब प्रशंसा करनी है, उन्हें कैसे संबोधित करना है इत्यादि, इत्यादि के साथ जब सहमा हुआ प्रतियोगी बीच मंच तक पहुंचता है तो सामने बैठे, तेजोमय प्रभामंडल, भव्य व्यक्तित्व, सिनेमा जगत की सबसे बड़ी और महान हस्ती की धीर-गंभीर वाणी से और भी हतप्रभ, भौंचक्क व ऐंड बैंड हो जाता है ! फिर ऊपर से टिकटिकाती घडी से रिसते समय का डर उसका ध्यान भटकाए रखता है ! तिस पर  गर्म सीट की बेचैनी सर पर हावी रहती है ! फिर ऐसे में वो क्या तो सवाल सुनेगा, उसे समझेगा, कब सोचेगा और क्या उत्तर देगा ! एक बात और जो समझदानी के बाहर है कि प्रतिभागी जब झटपट ऊँगली वाला बैरियर पार कर जब खेल में शरीक होता है तो उसको ''गरम आसन'' क्यों सौंपा जाता है ! देश में किसी-किसी जगह किसी अविश्वसनीय इंसान को ले कर एक कहावत है कि वह ''गर्म तवे पर बैठ कर बोलेगा तो भी उसका विश्वास नहीं है !''  खैर यहां गर्म सीट पर होने के बावजूद उसका कहा मान लिया जाता है। इसके बावजूद कई मंच-वल्लभ तमाम कठिनाइयों के बावजूद भी यहां परचम लहरा जाते हैं।

जैसे हर चीज में कोई न कोई अच्छाई भी जरूर होती है, उसी तरह इस खेल का शुक्रवार को प्रसारित होने वाला कर्मवीर एपिसोड एक सार्थक पहल है जो दिल को छू जाता है ¡ इसमें कर्मठ, समर्पित, दृढ प्रतिज्ञ, अभावों के बावजूद संघर्षरत, देश समाज के लिए कुछ भी कर जाने को उद्यत, निरपेक्ष, किसी चाहत-लालसा-कामना से परे सिर्फ जनहित में जुटे लोगों को मंच प्रदान किया जाता है। उसके लिए सारी टीम को साधुवाद ¡¡
कर्मवीर 
वैसे मामला एकदम्मे ना उखड जाए, इसलिए थोड़ा-बहुत हेल्प करने का भी यहां इंतजाम किया गया है वह अलग बात है कि उसमें इक्के-दू ठो ही थोड़ा काम लायक हैं। उसी हेल्पाइन में एक है वहां उपस्थित महानुभाव लोगों की राय ! पर इसके लिए कहा गया और दिया गया समय वर्षों से दर्शक वगैरह को आंकड़ों के ''पंभलपुस्से'' में डालता आ रहा है। सालों-साल से चली आ रही एक ऐसी चूक, जिस पर अयोजकों, संचालकों, उपस्थित दर्शकों, प्रतिभागियों यहां तक कि अमिताभ बच्चन जी का भी ध्यान या तो गया नहीं है या फिर कोई देना ही नहीं चाहता ! जबकि ऐसे प्रोग्राम काफी जांच-पड़ताल के बाद प्रस्तुत किए जाते हैं। इस बात पर ध्यान दिलाने की कोशिश सालों पहले भी की थी पर सबका ध्यान सिर्फ उपार्जन में ही है, यही प्रतीत होता है -
शुक्रवार, 19 नवंबर 2010
जैसा कि बहुत से लोग जानते ही होंगे कि इस खेल की ''गरम कुर्सी'' पर बैठने वाले को सही उत्तर ना मालुम होने पर सहायता के रूप में शुरु में तीन "हेल्प लाईनों" की सुविधा दी जाती है जिनमें से एक है "आडियंस पोल" इसके लिए दर्शकों को उत्तर देने के लिए दस सेकेण्ड का समय दिया जाता है। पर #अमिताभ_जी हर बार "इसके लिए आपको मिलेंगे तीस सेकेण्ड" कहते आ रहे हैं।  
शुक्रवार, 11-10-2019      
आज नौ साल बाद स्थिति कुछ सुधरी है ! "आडियंस पोल" में दर्शकों को तो अभी भी दस सेकेण्ड ही मिलते हैं पर #अमित_जी तीस की बजाए पंद्रह सेकेण्ड कहने लगे हैं ! शायद अगले साल तक दस के लिए दस मिलने लग जाऐं..............! 
चलिए छोड़िये ! अपुन ने कौन सा इसमें हिस्सा लेना है या कोई आस लगा रखी है ! खेल चल रहा है, अवाम सम्मोहित है ! गरीब देश का मनई लोगन को जबरिया करोड़पति बनाने, देश को खुशहाल बनाने की पुरजोर कोशिश की जा रही है ! अब ये तो समझ के बाहर की बात भी नहीं है कि कौन खुशहाल हो रहा है ! कोई तो हो ही रहा है ना ! अच्छी बात है ! जितने ज्यादा लोग अमीर होंगे, उतने और टी.वी. बिकेंगे ! और ज्यादा लोग उसे  देखेंगे ! और ज्यादा विज्ञापन झोंका जाएगा ! और ज्यादा बेकार, प्रयोजनहीन चीजों की बिक्री बढ़ेगी ! बाज़ार की सुरसा रूपी भूख को और ज्यादा खुराक मिलेगी ! पैसा बरसेगा ! एक करोड़, पांच करोड़, सात करोड़................
इस बार की धन राशि है दस करोड़ !!!

6 टिप्‍पणियां:

विकास नैनवाल 'अंजान' ने कहा…

रोचक आलेख। करोड़पति देखते हुए सभी को यह अहसास होता है कि शायद वो भी कभी बन जाएँ। इस बार तो प्रसिद्ध व्यक्तियों की बेवकूफियाँ भी लोगों को देखने को मिल रही है। उससे उन्हें उनसे बेहतर होने का अहसास भी हो रहा है। इससे ज्यादा जनता को और चाहिए ही क्या?

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

विकास जी, सहमत ¡ यह जरा सी आशा ही उसे खींच लाती है टीवी के सामने

Digvijay Agrawal ने कहा…

आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज रविवार 13 अक्टूबर 2019 को साझा की गई है......... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

Onkar ने कहा…

मज़ेदार लेख

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

दिग्विजय जी, आप बुलाएं और हम ना आऐं ऐसा कैसे हो सकता है ¡ आभार

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

ओंकार जी, हार्दिक आभार

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