बुधवार, 24 अक्तूबर 2018

वनराज के राज में...

जैसे ही कैंटर का आधा हिस्सा बाहर निकला, अपने आराम में खलल पड़ता देख, वनराज ने खड़े हो कर एक नजर हम पर डाली और फिर करीब ढाई सौ किलो वजनी उस अद्भुत जीव ने पलक झपकने के पहले ही छलांग लगाई और ऊंची झाड़ियों में विलीन हो गया ! पहली बार fraction of a second क्या होता है उसका आभास हुआ ! हालांकि गाडी के चलते ही विडिओ की तैयारी कर ली थी पर जब उसे एकदम सामने पाया तो कहां का कैमरा कहां का विडिओ ! मंत्रमुग्ध सा हो, उस अद्भुत जीव के सम्मोहन में बंध उसको देखने के सिवा और किसी भी चीज का ध्यान नहीं रहा ! जेहन के अलावा कहीं भी कुछ भी रेकॉर्ड नहीं हो पाया...........!

#हिन्दी_ब्लागिंग
कभी-कभी कुछ अप्रत्याशित सा ऐसा घट जाता है कि समय बीतने पर विश्वास ही नहीं होता कि ऐसा भी कुछ हुआ था ! अभी दो-तीन दिन पहले रणथम्भौर की जंगल सफारी पर जाने का अवसर खोज निकाला गया ! सवाई माधोपुर से कैंटर की बुकिंग मिली थी, वह भी दोपहर बाद की। इन दिनों अक्टूबर के ढलान पर होने के बावजूद वहाँ की दोपहर अच्छी-खासी गर्म थी। इसी कारण ख्याल था कि सुबह के फेरे में वनराज के दर्शन होने की शायद ज्यादा संभावना होती होगी ! दोपहर की गर्मी में तो वो कहीं विश्राम करता होगा ! पर अब जो था वही था ! उधर जब सुबह का चक्कर लगा कर लौटने वालों से पूछा तो वे भी निराश थे टाइगर के अलावा अन्य प्राणी ही दिख पड़े थे उन सबको।




अरावली और विंध्य पर्वत श्रृंखलाओं में पूरे 392 वर्ग की.मी. के क्षेत्र में फैला यह टाइगर-प्रोजेक्ट के अंतर्गत आने वाला देश का सुंदर, व्यवस्थित अभ्यारण्य है। जहां प्रकृति की अद्भुत कृति बाघ, बिना किसी भय के विचरण करता है। इसीलिए यहां संतोषजनक रूप से उनकी वंश वृद्धि होती पाई गयी है। बाघ के अलावा यहां सांभर, चीतल, चिंकारा, नीलगाय, भालू, लंगूर, जंगली सूअर, मोर तीतर भी बहुतायाद से पाए जाते हैं। पूरे अभ्यारण्य को दस जोन में बांटा गया है। एक जोन में एक बार में सिर्फ चार कैंटर और चार जीप ही ले जाने की इजाजत है। यात्रा के दौरान वाहन से नीचे उतरना, शोर मचाना और एक कागज का टुकड़ा तक जंगल में फेंकना सख्त मना है। हमें जोन 6 में जाना था, क्योंकि उस ओर ही बाघ के दिखने की खबर थी।

हमारा सफर साढ़े तीन बजे शुरू हुआ, जैसी आशंका थी वैसा ना हो कर मौसम खुशगवार था। हवा में भी कुछ ठंडक थी। पर इस तरफ किसी का ध्यान ना हो कर, सब में एक ही उत्सुकता थी, टाइगर दिखता है कि नहीं ! पर उसके पद चिन्ह, सैंकड़ों हिरन प्रजाति के जीवों, भालू, बंदर, मोर, तीतर इत्यादि तो सब दिखे पर जिसकी तलाश थी उस नायक का कोई अता-पता नहीं था ! अपने इलाके का पूरा चक्कर लगाने के बाद लौटते समय कुछ निराश से दल में कुछ खलबली मची, कारण था रास्ते से हट कर, करीब एक की.मी. की दूरी पर, एक ''भाई साहब'' का आराम फरमाते नजर आना ! पर वे इतनी दूर थे कि सिर्फ अपने होने का आभास ही दे रहे थे। वो दिखना नहीं दिखने के बराबर ही था ! पर था तो बाघ ही ना ! सो उसी तरफ लोग घूरे जा रहे थे और संतोष मना रहे थे कि कुछ नहीं से कुछ तो दिखा। पर आगे जो होने वाला था उसकी ना हीं किसी को कल्पना थी और ना हीं आशा !

बाँध की दिवार पर 


यात्रा का अंतिम चरण आ पहुंचा था, जो दिख गया था उसी को उपलब्धि मानते हुए हम सब जैसे हीअंतिम द्वार पर पहुंचे तब जो हुआ उसकी कल्पना भी किसी ने नहीं की थी !! अचानकआगे की जीप ठिठक कर खड़ी हो गयी। सबको लगा कि गाडी खराब हो गयी है। दिन ढल रहा था, अब सभी यहां से निकलने को बेचैन थे ! सो सभी उसे जल्दी करने को कहने लगे। पर तभी बताया गया कि आगे टाइगर बैठा हुआ है और वह कुछ उत्तेजित व आक्रोशित भी है।
पहली झलक 
आक्रोश 



यह अंदर जाते समय की फोटो है, द्वार के साथ लगा चबूतरा दिख रहा है, जिस पर वनराज विश्रामित थे  
शांति 
अभ्यारण्य के इस द्वार की बाहरी तरफ उसके साथ ही लगा हुआ एक चबूतरा सा बना हुआ है, जिसके पास से निकलते वक्त गाड़ियों की दूरी महज दो फिट रह जाती होगी, उसी पर एक भारी-भरकम, कद्दावर, पूर्ण विकसित, वयस्क वनराज विराजमान था ! वह तो जब पहली जीप निकलने लगी तो गुर्रा कर खड़े होने पर उसके इतने नजदीक होने का पता चला ! झट से जीप पीछे की गयी और बाकी गाड़ियों में बैठे लोगों को भी बाएं से हट कर दाहिने किनारे आ जाने को कहा गया ! करीब बीस मिनट तक सब वहीं निशब्द खड़े रहे ! शाम भी घिरने लगी थी। कुछ देर बाद वनराज के हाव-भाव और गतिविधियों से वाहनों के अनुभवी चालक और स्टाफ को जब कुछ ख़तरा कम लगा तो उन्होंने पहली जीप धीरे से निकाल ली। उसी के पीछे हमारा कैंटर था, जैसे ही उसका आधा हिस्सा बाहर निकला, अपने आराम में खलल पड़ता देख, महाराज ने खड़े हो कर एक नजर हम पर डाली और फिर करीब ढाई सौ किलो वजनी बाघ ने पलक झपकने के पहले ही छलांग लगाई और ऊंची झाड़ियों में विलीन हो गया ! पहली बार fraction of a second क्या होता है उसका आभास हुआ !

हालांकि गाडी के चलते ही विडिओ की तैयारी कर ली थी पर जब उसे एकदम सामने पाया तो कहां का कैमरा कहां का विडिओ ! मंत्रमुग्ध सा हो, उस अद्भुत जीव के सम्मोहन में बंध उसको देखने के सिवा और किसी भी चीज का ध्यान नहीं रहा ! जेहन के अलावा कहीं भी कुछ भी रेकॉर्ड नहीं हो पाया ! पर यह जीवन का अभूतपूर्व, अविस्मरणीय, यादगार पल था, जिसको शायद ही कभी भुलाया जा सकना संभव हो ! 

4 टिप्‍पणियां:

HARSHVARDHAN ने कहा…

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन विश्व पोलियो दिवस और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

हर्ष जी, आप बुलाएं और हम ना आएं, ऐसा कैसे हो सकता है !

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (26-10-2018) को "प्यार से पुकार लो" (चर्चा अंक-3136) (चर्चा अंक-3122) पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
--
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

शास्त्री जी, हार्दिक धन्यवाद

विशिष्ट पोस्ट

कारूं का खजाना ¡ एक बतकही, कारूं पर

भानुमति का पिटारा, छज्जू का चौबारा जैसी अपनी विशेषताओं के लिए मुहावरों और लोकोक्तियों के अति प्रसिद्ध पात्रों की श्रृंखला की तीसरी कड़ी क...