गुरुवार, 1 मार्च 2018

अनहोनी के डर से यहां कोई होली नहीं मनाता !

जहां कानपुर के झिंझक इलाके के ग्राम रामनगर के निवासी खुद को होलिका का वंशज मानते हुए और उसके साथ घटी घटना को अन्याय मानने के कारण होली नहीं मनाते। वहीँ इसके अलावा झारखंड-प्रदेश के बोकारो जिले के दुर्गापुर तथा वहीं के गुण्डरदेही के एक ग्राम चंदनबिरही; कोरबा, छत्तीसगढ़, के धमनागुड़ी तथा खरहरी ग्रामों के निवासी अपनी अलग-अलग मान्यताओं और कारणों की वजह से होली के पर्व से दूर रहते हैं................!
#हिन्दी_ब्लागिंग
अभी जहां पूरा देश अपने सबसे बड़े पर्वों में से एक होली के खुमार में डूबा हुआ है, वहीँ कुछ स्थान ऐसे भी हैं जहां वर्षों से लोगों ने  इस त्यौहार को नहीं मनाया है। मौज-मस्ती की जगह इस दिन यहां सन्नाटा पसर जाता है, मनहूसियत छा जाती है, चिंता व डर का माहौल बन जाता है।  ऐसी ही एक जगह है,  झारखंड प्रदेश  के  बोकारो 
जिले का करीब 9 हजार की आबादी वाला दुर्गापुर गांव, जो राजधानी से लगभग 100 किलोमीटर दूरी पर खांजो नदी के पास, पहाड़ी की तलहटी में बसा हुआ है। इस गांव के लोग होली पर खुशियां नहीं मनाते, रंगों को हाथ तक नहीं लगाते, क्योंकि एक दशक के ऊपर से चली आ रही एक मान्यता के अनुसार उन्हें डर है कि ऐसा करने से गांव को आपदा या महामारी का प्रकोप झेलना पड़ जाएगा।

इसके पीछे की कथा के अनुसार इस जगह को राजा दुर्गादेव ने बसाया था और उन्हीं का राज था। उस समय सब तीज-त्यौहार मनाए जाते थे। पर कुछ समय बाद राजा के बेटे की होली के दिन ही मौत हो गई। उसके बाद जब भी गांव में होली का आयोजन होता था यहां कभी भयंकर सूखा पड़ जाता था या फिर महामारी का सामना करना पड़ता था, जिससे गांव में कई लोगों की मौत हो जाती थी। फिर एक बार होली के ही दिन पास के इलाके रामगढ़ के राजा दलेल सिंह के साथ हुए युद्ध में राजा दुर्गादेव की भी मौत हो गयी जिसकी खबर सुनते ही रानी ने भी आत्म ह्त्या कर ली ! कहते हैं अपनी मौत से पहले राजा ने आदेश दिया था कि उसकी प्रजा कभी होली न मनाए। तब से उसी शोक और आदेश के कारण यहां के लोगों ने होली मनानी छोड़ दी। 

समय बदला तो कुछ लोगों ने त्यौहार के दिन खुशियां मनाने की कोशिश की तो कुछ बीमार पड़ गए तो कुछ की मौत हो गयी, फिर पहाड़ी पर जा पूजा-अर्चना की गयी जिससे शांति लौटी। उस घटना ने लोगों के दिलों में
इस कदर भय पैदा कर दिया कि आज की युवा पीढ़ी भी राजा के भूत के डर से होली खेलने से कतराती है। एक बार इसी दिन बाहर से आए कुछ मछुआरों ने परंपरा तोड़ी तो गांव में महामारी का प्रकोप फ़ैल गया ! इन सब कारणों से यहां इतना भय है कि दुर्गापुर से लगे अन्य गांवों के ग्रामवासी भी डरते हैं, होली मनाने से। अब इसे अपने राजा के प्रति श्रद्धा कहा जाए, विश्वास माने या फिर अंधविश्वास ! लेकिन इसकी जड़े इतनी गहरी हैं कि यहां से बाहर जाकर काम करने वाले लोग भी अपने घरों में रंग नहीं खेलते। यहां तक की उनके ऊपर फेंके गए रंग का वो जवाब भी नहीं देते हैं। 

कुछ गांव वालों का कहना है कि समय के साथ यहां के लोग भी बदल रहे हैं और अब यहां के युवा दुर्गापुर से बाहर जाकर होली मनाने लगे हैं। एक स्थानीय ने बताया कि जो लोग होली मनाना चाहते हैं वे गांव छोड़कर दूसरे गांव में जा कर अपने परिचितों के साथ होली मनाते हैं।
*चित्र अंतर्जाल से 

10 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (02-03-2017) को "जला देना इस बार..." (चर्चा अंक-2897) पर भी होगी।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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रंगों के पर्व होलीकोत्सव की
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

आभाऱ, शास्त्री जी

राजीव कुमार झा ने कहा…

रोचक जानकारी.

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

राजीव जी,
सदा स्वागत है, कुछ अलग सा पर ।

Kavita Rawat ने कहा…

रोचक प्रस्तुति

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

कविता जी,
हार्दिक धन्यवाद

sweta sinha ने कहा…

गज़ब....ऐसा भी होता है...रोचक जानकारी गगन जी।

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

श्वेता जी,
आभार

Aparna Bajpai ने कहा…

आपका ब्लॉग रोचक जानकारियों से भरा है। आज पहली बार आयी लगा कुछ बहुत मूल्यवान मिला यंहा ।
सुन्दर,ज्ञानपरक ब्लॉग। रोचक और उत्सुकत्ता जगाने वाली रचनाएं।
सादर

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

अपर्णा जी, "कुछ अलग सा" पर सदा स्वागत है

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