बुधवार, 22 नवंबर 2017

यहां 15-20 की.मी. के लिए 1000/- तक मांगने वाले वाहन चालकों से बचें !!

पर्यटकों को होने वाली असुविधाओं को देखते हुए देश के दक्षिणी हिस्से से आए दो युवाओं को उत्तराखंड के इस हिस्से में "ओला कैब" जैसी सुविधा प्रदान करने का ख्याल आया और उन्होंने इस तरह की सेवा का भविष्य भांप एक टैक्सी सेवा #GO-9 के नाम से शुरू कर दी। उनके अनुसार उत्तराखंड में यह पहली टैक्सी सेवा है जिसे आप सिर्फ एक फोन कर या उनकी वेब-साइट पर जा बुक कर सकते हैं......... 
#हिन्दी_ब्लागिंग   
कुछ सालों पहले तक किसी नई, अनजानी जगह जाने के पहले लोग दस बार सोचते थे। क्योंकि वहाँ के बारे में उसके नाम या छोटी-मोटी जानकारी को छोड़ और कुछ भी खबर नहीं रहती थी। इसलिए ज्यादातर लोग वहीँ जाना पसंद करते थे जहां या तो उनके परिचित रहते हों या फिर कोई जान-पहचान का जा-आया हो। क्योंकि नई जगह में परिवार के साथ जाने में थोड़ी हिचकिचाहट होती ही थी। संचार क्रान्ति के बाद आज देश-विदेश की सारी जानकारी हमें घर बैठे उपलब्ध हो जाती है। प्रसिद्ध जगहों में रहने-ठहरने, आने-जाने की सारी बुकिंग चलने के पहले ही की जा सकती है। निर्धारित स्थल पर पहुँचने पर किसी तरह की चिंता नहीं रहती। पर अभी भी ऐसे अनेक पर्यटन स्थल हैं, जहां होटल वगैरह में भले ही पहले से बुकिंग हो जाए पर घूमने के लिए वाहन इत्यादि के लिए वहाँ के वहां-चालकों की गोलबंदी से जूझना ही पड़ता है। भले ही आपको रूट या किराए का अंदाज हो पर वहाँ जेब ढीली होने से बचा नहीं जा सकता। नेट की जानकारी भी पूरी तरह खरी नहीं उतरती। 

अभी पिछले महीने अल्मोड़ा जाना हुआ था। उसके लिए काठगोदाम उतरना हुआ। सुबह जब अल्मोड़ा के लिए वाहन की खोज शुरू हुई तब नेट की सारी जानकारी धरी की धरी रह गयी। जहां नेट पर काठगोदाम से अल्मोड़ा की दूरी 60-70 की.मी. बताई गयी थी वह 96 की.मी. निकली, आभासी जानकारी में जहां सड़कों की हालत अच्छी बताई जा रहा थी, वहीँ एक जगह कच्चे पहाड़ों के बीच करीब दस की.मी. की सड़क तकरीबन गायब ही थी और किराया 1400-1500/- की जगह 1800/- से 2000/- के बीच; कोई-कोई तो 3000/- तक को सही ठहरा रहा था, इनके अनुसार  वापस लौटने में सवारी नहीं मिलती और इन्हें खाली आना पड़ता है। हालांकि इनकी आपस में सब सेटिंग होती है पर ग्राहकों को यही बताया जाता है। हाँ यदि किसी लौटने वाले वाहन से सम्पर्क हो जाए तो 1000-1200 में बात बन जाती है। पर यह बात अनजान मुसाफिर को कोई क्यूँ और कौन बताए ? और फिर घूमने-फिरने आए पर्यटक 400-500/- के लिए अपनी छुट्टियों को बेमजा नहीं करना चाहते और सौ-सवा सौ कम करवा खुश हो लेते हैं क्योंकि टैक्सी के बिना घूमने के लिए और कोई  ढंग की सुविधा भी उपलब्ध नहीं है। बसें तो हैं पर उनका कोई ख़ास फायदा घूमने आए पर्यटक के लिए नहीं है।

यही मोनोपली, परिस्थितियां, परेशानियां नए उद्योगों की प्रेरणा बनती हैं और जोखिम उठा हिम्मत करने वालों के लिए नई राहें खोल देती हैं। ऐसे ही देश के दक्षिणी हिस्से से आए दो युवाओं को उत्तराखंड के इस हिस्से में "ओला कैब" जैसी सुविधा प्रदान करने का ख्याल आया और उन्होंने पर्यटकों की असुविधाओं को ध्यान में रख एक टैक्सी सेवा #GO-9 के नाम से शुरू कर दी। उनके अनुसार उत्तराखंड में यह पहली टैक्सी सेवा है जिसे आप सिर्फ एक फोन कर या उनकी वेब-साइट पर जा बुक कर सकते हैं। अभी यह शैशवावस्था में ही है और कम ही टैक्सी चालक इनसे जुड़े हैं पर धीरे-धीरे इनका ग्राफ ऊपर की ओर उठ रहा है। शुरुआत में इन्होंने नौ जिलों नैनीताल, रानीखेत, हल्द्वानी, कसौनी, पिथौरगढ़, रुद्रपुर, बागेश्वर और भीमताल से अपना काम शुरू किया है इसीलिए अपना नाम भी #GO-9 रखा है। इनका पता हमें अल्मोड़ा पहुँचने पर ही लगा। इनकी मिलनसारिता, पेशेवर अंदाज और सहयोग के कारण अगले तीन दिन इन्हीं ने हमारी यात्रा का बंदोबस्त किया। कहने का अभिप्राय यह है कि जब भी किसी ऐसी जगह जाना हो; जहां यातायात का पुख्ता इंतजाम न हो; तो ऐसी किसी सेवा का जरूर पता कर लें। नहीं तो 20-30 की.मी. आने-जाने का किराया 1000/- तक मांगने वाले वाहन चालकों की कहीं कोई कमी नहीं है !!  

5 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (24-11-2017) को "लगता है सरदी आ गयी" (चर्चा अंक-2797) पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (24-11-2017) को "लगता है सरदी आ गयी" (चर्चा अंक-2797) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

शास्त्री जी,
स्नेह बना रहे

sweta sinha ने कहा…

जी,बहुत.बढ़िया जानकारी गगन जी,अगर विश्वसनीयता और सुरक्षा की दृष्टि से आम जेब पर भी सही लगे तो ये सराहनीय यातायात सेवा का विकल्प हो सकता है।

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

श्वेता जी, मेरे तीन दिन का अनुभव कमो-बेस ठीक ही रहा था। सफलता सम्भालना अब उन पर है!

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