मंगलवार, 5 सितंबर 2017

#एक्सिस_बैंक.....परिवारों को जोड़ने का काम कीजिए, तोड़ने का नहीं !!

#एक्सिस_बैंक_अपने_विज्ञापन_को_सकारात्मक_नजरिये_से_भी_बनवा_सकता_था, जिससे बैंक की बात और माँ की दूरदर्शिता दोनों परिलक्षित हो जातीं। माँ अपने बेटे को ऐसे भी समझा सकती थी कि शादी के पहले अपने घर की बची हुई  किश्तों को चुका देना चाहिए क्योंकि ब्याज दरें बहुत कम हैं। इस तरह ब्याहोपरांत तुम अच्छी तरह बिना चिंता के लाइफ एंज्वॉय कर सकोगे। पर यहाँ इश्तहार निर्माता और #बैंक_बिना_सोचे-समझे #उल्टी_सीख देने पर उतारू हैं ! 
                       
आए दिन टूटते परिवारों, बिगड़ते संबंधों, दरकते रिश्तों की ख़बरें पढ़ते-सुनते-देखते हुए मन बेचैन सा हो जाता है। पर जहां इस ओर परिवार, समाज व सरकारों को ध्यान देने की जरुरत है वहीँ कुछ संस्थाएं अपने  जरा से लाभ के लिए जाने-अनजाने इस किले में सेंध लगाने से नहीं चूकतीं ! इन दिनों #एक्सिस_बैंक का एक इश्तहार टी.वी. पर आ रहा है जिसमें एक माँ अपने अविवाहित बेटे को भविष्य में शादी के बाद घर में होने वाली पारिवारिक कलह का डर दिखा पहले ही अपना अलग घर लेने की सलाह देती है !  माँ होते हुए भी सिर्फ इसलिए 
क्योंकि अभी बैंक की होम-लोन पर ब्याज दरें  बहुत कम हैं ! सतही तौर पर एड ठीक लगता है; माँ-बेटे का प्यार भी जाहिर होता है; पर संदेश क्या है ? क्या माँ को अपने या अपने बेटे पर विश्वास नहीं है ? क्या वह अपने साम्राज्य में किसी और का दखल नहीं चाहती ? क्यों उसके दिमाग में सास-बहू के झगड़ों का डर बना हुआ है ? क्यों वह घर बसने से पहले उसे तोड़ना चाहती है ? आज जैसे परिवार टूट रहे हैं उसमें कमी लाने की बजाए ऐसे विचार तो आग में और घी का ही काम करेंगे ! 

एक्सिस बैंक अपने इस विज्ञापन को सकारात्मक नजरिये से भी बनवा सकता था ! इससे बैंक की बात और माँ की दूरदर्शिता दोनों परलक्षित हो जातीं। वह अपने बेटे को समझा सकती थी कि शादी के पहले अपने घर की बची हुई  किश्तों को चुका देना चाहिए क्योंकि ब्याज दरें बहुत कम हैं। इस तरह ब्याहोपरांत तुम अच्छी तरह बिना चिंता के लाइफ एंज्वॉय कर सकोगे। पर यहाँ इश्तहार निर्माता और बैंक बिना सोचे-समझे उलटी सीख देने पर उतारू हैं !

आजकल के माहौल में एकल परिवार के बढ़ते चलन, उसके परिणाम  अंजाम को देख जब अपने ददिहाल और ननिहाल के परिवारों की ओर नजर डालता हूँ तो किसी भी तरफ दूर-दूर तक कोई भी ऐसा कुटुंब नहीं दिखता जिसमें बड़े-बुजुर्गों का साथ न हो, उनका प्रेमल साया घर के सदस्यों पर ना हो। यहां तक कि मेरे दोस्त-मित्रों में भी कोई ऐसा नहीं है जिनके माता-पिता परिवार से अलग रहते हों; यदि घर का कोई सदस्य मजबूरीवश, रोजगार के सिलसिले में कहीं दूर भी चला गया है तब भी बड़ों का ख्याल रखने के लिए घर का कोई ना कोई सदस्य उनके साथ ही रहता है। ऐसे संयुक्त परिवारों से मिल, उनके साथ समय गुजार , पग-पग पर उनकी सलाह, उनके आशीर्वाद, उनकी ममता से सकून तो मिलता ही है साथ ही एक ,मानसिक संबल भी बना रहता है। हमें तो गर्व होना चाहिए अपनी संस्कृति पर, अपने संस्कारों पर, अपने ऋषि-मुनियों-गुरुओं पर जिन्होंने संयुक्त परिवार की महत्ता को समझते हुए ऐसी सामाजिक व्यवस्था बनाई। रोजगार की मजबूरीवश घर के सदस्यों के बाहर जाने से तो रोका नहीं जा सकता पर सिर्फ अहम, संपत्ति या आपसी तालमेल ना बैठने के कारण लाचार वयोवृद्धों को उनके हाल पर छोड़ देना अत्यंत दुखद है। क्योंकि अपनी पारी खेल चुकी इस पीढ़ी के पास अपने अनुभवों की वह अनमोल संपत्ति है जो अपने खजाने से हमें हमारी जिंदगी में आने वाली हर मुश्किलों, हर अड़चनों, हर कठिनाइयों का सामना करने की राह और हौसला प्रदान करने की क्षमता रखती है। समाज को इनके अनुभवों की सदा सहायता लेनी चाहिए।   
#हिन्दी_ब्लागिंग    

4 टिप्‍पणियां:

ब्लॉग बुलेटिन ने कहा…

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, बिन गुरु ज्ञान कहाँ से पाऊँ - शिक्षक दिवस की ब्लॉग बुलेटिन “ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

प्रविष्टि को स्थान प्रदान करने का आभार

sweta sinha ने कहा…

सूक्ष्म दृष्टि और गहन विश्लेषण गगन जी। मानव मन के भाव समझ पाना आसान कहाँ और आकर्षक विज्ञापन बस ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाने के लिए बनाये जाते है उसको गढ़ने वाले नफा नुकासान तोलकर देखते है न कि इंसान के मनोभाव।

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

सही कहा आपने, पैसे के आगे सब कुछ गौण हो जाता है !

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