गुरुवार, 3 अगस्त 2017

मंदिर, जहां शिवलिंग पर बिजली गिरती है.!

हमारा देश विचित्रताओं से भरा पड़ा है। तरह-तरह के धार्मिक स्थान, तरह-ी तरह के लोग, तरह-तरह के मौसम। यदि अपनी सारी जिंदगी भी कोई इसे समझने, घूमने में लगा दे तो भी शायद पूरे भारत को देख समझ ना पाये। यहां ऐसे स्थानों की भरमार है कि उस जगह की खासियत देख इंसान दांतों तले उंगली दबा लेता है। ऐसा ही एक अद्भुत स्थल है, हिमाचल के कुल्लू क्षेत्र में स्थित बिजलेश्वर महादेव, जिनके दर्शन करते ही आँखें नम हो जाती हैं, मन भाव-विभोर और जिह्वा एक ही वाक्य उच्चारण कराती है, "त्वं-शरणम्"  ..........................सावन के पावन माह पर शिव जी से संबंधित एक लेख का पुन: प्रकाशन    
 #हिन्दी_ब्लागिंग 
हिमाचल, देवभूमि, जहां के कण-कण में देवताओं का निवास है। प्रकृति ने दोनों हाथों से बिखेरी है यहाँ सुंदरता। भले ही कश्मीर को देश-विदेश में ज्यादा जाना जाता हो,पर हिमाचल उससे किसी भी दृष्टिकोण से कम नहीं है। जितना यह प्रदेश खुद सुंदर है उतने ही यहां के लोग सरल, सीधे, निष्कपट, मिलनसार और सहयोगी स्वभाव वाले हैं। शायद इसी लिए पृथ्वी का यह हिस्सा देवताओं को भी प्रिय रहा है। उनसे संबंधित गाथाएं और एक से बढ़ कर एक स्थान यहां देखने को मिलते हैं। कुछ तो इतने हैरतंगेज हैं कि बिना वहाँ जाए-देखे विश्वास ही नहीं होता ! 
श्री मक्खन महादेव 
ऐसा ही एक मंदिर, जिसे बिजली महादेव या मक्खन महादेव के नाम से भी जाना जाता है, यहां कुल्लू शहर से 18 कीमी दूर, 7874 फिट की ऊंचाई पर "मथान" नामक स्थान में स्थित है, शिवजी का यह अति प्राचीन मंदिर है। इसे शिवजी का सर्वोत्तम तप-स्थल माना जाता है। पुराणों के अनुसार जालन्धर दैत्य का वध शिवजी ने इसी स्थान पर किया था। इसे "कुलांत पीठ" के नाम से भी जाना जाता है।

शिवलिंग व पुजारी जी 
इस मंदिर की सबसे विस्मयकारी तथा अपने आप में अनोखी बात यह है कि यहां स्थापित शिवलिंग पर या मंदिर के ध्वज दंड़ पर हर दो-तीन साल में वज्रपात होता है। शिवलिंग पर वज्रपात होने के उपरांत यहां के पुजारीजी बिखरे टुकड़ों को एकत्र कर उन्हें मक्खन के लेप से जोड़ फिर शिव लिंग का आकार देते हैं। इस काम के लिये मक्खन को आस-पास नीचे बसे गांव वाले उपलब्ध करवाते हैं। कहते हैं कि पृथ्वी पर आसन्न संकट को दूर करने तथा जीवों की रक्षा के लिये सृष्टी रूपी लिंग पर यानि अपने उपर कष्ट का प्रारूप झेलते हैं भोले भंडारी। यदि बिजली गिरने से ध्वज दंड़ को क्षति पहुंचती है तो फिर पूरी शास्त्रोक्त विधि से नया ध्वज दंड़ स्थापित किया जाता है।

मणिकर्ण 
मंदिर तक पहुंचने के लिए कुल्लु से बस या टैक्सी उपलब्ध हैं। जो व्यास नदी पार कर 15 किमी का सडक मार्ग 'चंसारी गांव' तक पहुंचा देती हैं। उसके बाद करीब तीन किलोमीटर की श्रमसाध्य, खडी चढ़ाई है जो अच्छे-अच्छों का दमखम नाप लेती है। उस समय तो हाथ में पानी की बोतल भी एक भार सा महसूस होती है। यहां पहुँचाने का एक और मार्ग भी है, जो नग्गर नामक स्थान से लगभग मंदिर के पास तक जाता है पर वह दुर्गम और जटिल तो है ही और उस पर सिर्फ  दुपहिया वाहन से  ही जाया जा सकता है।

मथान के एक तरफ़ व्यास नदी की घाटी है, जिस पर कुल्लु-मनाली इत्यादि शहर हैं तथा दूसरी ओर पार्वती नदी की घाटी है जिस पर मणीकर्ण नामक प्रसिद्ध तीर्थ स्थल भी  है। उंचाई पर पहुंचने में थकान और कठिनाई जरूर होती है पर जैसे ही यात्री चोटी पर स्थित वुग्याल मे पहुंचता है उसे एक दिव्य लोक के दर्शन होते हैं। एक अलौकिक शांति, शुभ्र नीला आकाश, दूर दोनों तरफ़ बहती नदियां, गिरते झरने, आकाश छूती पर्वत श्रृंखलाएं किसी और ही लोक का आभास कराती हैं। जहां आंखें नम हो जाती हैं, हाथ जुड जाते हैं, मन भावविभोर हो जाता है तथा जिव्हा एक ही वाक्य का उच्चारण करती है - त्वं शरणं।
मंदिर 

कण-कण मे प्राचीनता दर्शाता मंदिर, पूर्ण रूप से लकडी का बना हुआ है। चार सीढियां चढ़, जहां परिक्रमा करने के लिए करीब तीन फुट का गलियारा भी है, दरवाजे से एक बडे कमरे मे प्रवेश मिलता है, जिसके बाद गर्भ गृह है, जहां मक्खन मे लिपटे शिवलिंग के दर्शन होते हैं। जिसका व्यास करीब 4 फ़िट तथा उंचाई 2.5 फ़िट के लगभग है।

वहां ऊपर पहाड़ की चोटी पर रोशनी तथा पानी का इंतजाम है। आपात स्थिति मे रहने के लिये कमरे भी बने हुए हैं। परन्तु बहुत ज्यादा ठंड हो जाने के कारण रात मे यहां कोई नहीं रुकता है। सावन के महीने मे यहां हर साल मेला लगता है। दूर-दूर से ग्रामवासी अपने गावों से अपने देवताओं को लेकर शिवजी के दरबार मे हाजिरी लगाने आते हैं। वे भोले-भाले ग्रामवासी ज्यादातर अपना सामान अपने कंधों पर लाद कर ही यहां पहुंचते हैं। उनकी अटूट श्रद्धा तथा अटल विश्वास का प्रतीक है यह मंदिर जो सैकडों सालों से इन ग्रामिणों को कठिनतम परिस्थितियों मे भी उल्लासमय जीवन जीने को प्रोत्सहित करता है। कभी भी कुल्लु-मनाली जाना हो तो शिवजी के इस रूप के दर्शन जरूर करें।
घाटी 

पर एक बात जो सालती है मन को कि जैसे-जैसे यहां पहुंचने की सहूलियतें बढने लगी हैं वैसे-वैसे कुछ अवांछनीयता भी वहां स्थान पाने लगी है। कुछ सालों पहले तक चंसारी गांव के बाद मंदिर तक कोई दुकान नहीं होती थी। पर अब जैसे-जैसे इस जगह का नाम लोग जानने लगे हैं तो पर्यटकों की आवा-जाही भी बढ गयी है। उसी के फलस्वरूप अब रास्ते में दसियों दुकानें उग आयीं हैं। धार्मिक यात्रा के दौरान चायनीज और इटैलियन व्यंजनों की दुकानें कुछ अजीब सा भाव मन में उत्पन्न कर देती हैं। 

6 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (04-08-2017) को "राखी के ये तार" (चर्चा अंक 2686) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

आभार, शास्त्री जी

sweta sinha ने कहा…

बहुत ही मनमोहक चित्रण। सुंदर लेखन।

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

बहुत-बहुत धन्यवाद, श्वेता जी

HARSHVARDHAN ने कहा…

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन जन्म दिवस : किशोर कुमार और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

हर्षवर्धन जी
आप बुलाएँ मैं ना आउ ऐसा कैसे हो सकता है

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कोई तो कारण होगा, धर्म स्थलों में प्रवेश के प्रतिबंध का !!

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