शुक्रवार, 6 जनवरी 2017

बिल लेने को ही नहीं देने को भी कहा जाए, सार्वजनिक तौर पर

यह नोटबंदी की तंगी के दौरान की घटना है। डॉक्टर साहब की फीस हजार रुपये थी। परामर्श के बाद उनको कार्ड द्वारा भुगतान की पेशकश की गयी तो उन्होंने  साफ़ इनकार कर दिया और नगद भुगतान करने को कहा, जबकि उनके स्वागत-कक्ष के टेबल पर स्वाइप मशीन रखी हुई थी..क्या कृतज्ञ, सहमा हुआ सा मरीज बिल माँगने की हिम्मत कर सकता है  

पिछले कुछ हफ़्तों से देश में जो कोहराम मचा हुआ है उसके पक्ष-विपक्ष में हो रही लगातार बयानबाजी थमने का नाम नहीं ले रही। उसके अलावा रोज ही कहीं ना कहीं, कोई ना कोई, किसी ना किसी घोटाले के तहत छोटे-बड़े लोगों को पकड़े जाने की खबरें भी आती ही जा रही हैं। जाहिर है कुछ भी हो जाए, कितनी भी कड़ाई कर ली जाए, कैसा भी दंड निर्धारित कर दिया जाए कुछ लोग अपनी हरकतों से बाज नहीं आते।

अपने देश के मध्यम वर्ग का अधिकांश भाग परिस्थिति या मजबूरीवश सदा कमजोर तथा भीरु रहा है और इसी आबादी पर ही सरकारें अपना जोर भी दिखाती हैं। इन्हीं से सबसे ज्यादा ईमानदारी और देशभक्ति की अपेक्षा की जाती है। इन्हीं से सब्सिडी छोड़ने, बढ़ते किराए को झेलने, आने-जाने, रहने, खाने पर ज्यादा शुल्क चुकाने, सरकार के अमले और उसके खर्चों को निपटाने की आशा की जाती है वह भी बिना हील-हवाले, विपरीत परिस्थितियों में बिना किसी शिकायत के।  

अब जैसे सरकार लगातार लोगों से अपील कर रही है किसी भी सेवा या खरीद के बदले बिल लेने की। यह और बात है कि आम आदमी इसे अभी अपनी आदत नहीं बना पाया है और इसका फ़ायदा व्यापारी वर्ग पूरी तरह से उठा रहा है। इसको मद्दे नज़र रख क्या सरकार ने उस वर्ग पर भी जोर डाला है, जो सेवा देता है या सामान बेचता है, कि आप को भी कोई मांगे या ना मांगे, बिल जरूर दो या आपको देना पडेगा ? वैसे दो व्यवसाय ऐसे भी हैं जहां आम आदमी हिम्मत ही नहीं जुटा पाता पैसे को ले कर कुछ बोलने की ! वह हैं डॉक्टर और वकील का दरबार। जहां जब भी किसी को मजबूरीवश जाना पड़ता है तो वह सदा सहमा, आशंकित, कृतज्ञ सा और डरा हुआ ही जाता है। दोनों ही जगहें ऐसी हैं जहां उसकी जान पर बनी होती है और वह भूल कर भी पैसे को ले मोल-भाव नहीं करता, बिल मांगना तो दूर की बात है।

इसी संदर्भ में दो वाकये याद आ रहे हैं। मेरे "कानूनी भाई" के दाएं पैर के टखने में काफी दिनों से दर्द बना हुआ था। पहले इसे हल्के तौर पर लेते रहे, एक-दो जगह दिखाया पर कोई विशेष लाभ नहीं हुआ। जब दर्द तकरीबन स्थाई हो गया और चलने में भी दिक्कत आने लगी तो हड्डी के विशेषज्ञ, अति व्यस्त चिकित्सक से समय ले उनका परामर्श लिया गया। चिकित्सा की अलग बात है। असल बात यह है कि यह नोटबंदी की तंगी के दौरान की घटना है। डॉक्टर साहब की फीस हजार रुपये थी। परामर्श के बाद उनको कार्ड द्वारा भुगतान की पेशकश की गयी तो उन्होंने  साफ़ इनकार कर दिया और नगद भुगतान करने को कहा, जबकि उनके स्वागत-कक्ष के टेबल पर स्वाइप मशीन रखी हुई थी।
ऐसे ही एक और वाकये का चश्मदीद गवाह बनने का मौका तब मिला जब मेरे मित्र ठाकुर जी के साथ मुझे एक वकील साहब का तमाशा देखने को मिला था। बात कुछ पुरानी है,  ठाकुर जी दुर्भाग्यवश एक केस में उलझ गए थे जिसको एक तेजतर्रार वकील की देख रेख में लड़ा जा रहा था। एक बार मुझे भी वे अपने साथ ले गए। जैसे ही वकील के दफ्तर  में हमने प्रवेश किया उसने ऐसा समा बांधा जैसे आज ठाकुर जी अंदर ही हो जाते यदि उसने बचाया ना होता। आतंकित से करने वाले माहौल में फ़टाफ़ट उसने इधर-उधर के दसियों कागजों पर उनसे दस्तखत करवाए और तीस हजार रुपये धरवा लिए। जाहिर है उपर्युक्त दोनों मौकों में घबड़ाहट ऐसी थी कि पैसे पर कोई ध्यान ही नहीं दे पा रहा था। सो ना देने वाले ने कुछ कहा और दूसरे पक्ष ने तो कहना ही क्या था !

ये तो महज दो उदाहरण हैं। इस तरह के सैंकड़ों लेन-देन इन जैसी दोनों जगहों के साथ-साथ अनेकों और भी जगहों  पर रोज होते हैं ! क्या इन पर कभी नकेल कसी जा सकेगी ? या जैसा एक-दो दिन पहले होटल के बिल पर सर्विस चार्ज के मामले में सरकार ने अस्पष्ट सा बयान जारी कर कि, आप को होटल की सर्विस पसंद ना आए तो सर्विस चार्ज ना दें,  अपना पल्ला झाड़ कलह की स्थिति बना दी है, वैसा ही यहां भी होता रहेगा ?     

4 टिप्‍पणियां:

HARSHVARDHAN ने कहा…

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन ब्लॉग बुलेटिन - हमारे बीच नहीं रहे बेहतरीन अभिनेता ~ ओम पुरी में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

हर्षवर्धन जी, आभार

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (07-01-2017) को "पढ़ना-लिखना मजबूरी है" (चर्चा अंक-2577) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
नववर्ष 2017 की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

शास्त्री जी, स्नेह बना रहे

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