बुधवार, 28 दिसंबर 2016

माँ का जाना

4 दिसम्बर 2016, रविवार सुबह पौने बारह बजे के करीब माँ ने अंतिम सांस ली। पिछले दो-तीन महीने से उम्र का बोझ शरीर पर भारी पड़ता जा रहा था, जिसके चलते तन की सारी क्रियाएं-प्रतिक्रियाएं शिथिल पड़ती जा रही थीं। रायपुर से फोन कम ही आता था, मैं ही समय-समय पर फोन कर हालात की जानकारी लिया करता था। इन दिनों वहाँ से फोन का आना दिल धड़का जाता था। इसीलिए उस सुबह भी जब पौने नौ के आसपास फोन की घँटी बजी तो मन आशंका से भर उठा था। पूनम का फ़ोन था, तबियत ज्यादा ही बिगड़ रही है, आ जाइये ! उसी समय निकल कर एयरपोर्ट पहुँचने पर पता चला कि पौने एक की उड़ान में जगह नहीं है, शाम साढ़े सात की उड़ान में जगह मिल सकती है। छोटे भाई को यही बताने फोन किया तो उसी समय फोन पर बातों के दौरान ही माँ के ना रहने की खबर मिल गयी । रात नौ बजे घर पहुँचने पर पार्थिव शरीर ही इंतजार कर रहा था। जिसका ध्यान सदा मेरी तरफ लगा रहता था, मेरे दुःख, परेशानी, कठिन समय में जो अपनी वृद्धावस्था को अनदेखा कर सशरीर, मन-धन से सदा मेरी सहाई होती थीं, आज मेरे अविरल बहते आसुओं, रुंधते गले, बंधती हिचकियों के बावजूद निश्चेष्ट पड़ी थीं। उस शरीर में जो मेरी तकलीफ की कल्पना कर ही काँप जाता था आज उसमें एक जुंबिश तक नहीं हो रही थी। एक अध्याय समाप्त हो चुका था, बची थीं सिर्फ यादें, बचपन से लेकर अब तक की !

किसी के देहावसान पर उस परिवार को सांत्वना देते समय अक्सर कहा-सुना जाता है कि सबको जाना है, किसके माँ-बाप सदा बैठे रहते हैं या इनका साथ यहीं तक था इत्यादि-इत्यादि, पर किसी अपने के बिछड़ने का गम वही समझता है जिसके घर से कोई विदा हुआ हो !  देस-विदेश में दूर बसे किसी सदस्य के बारे में एक निश्चिंतता तो उसके बने रहने की होती है पर दिवंगत हुए किसी अपने के बारे में यह सोच कर ही कि अब उससे कभी भी, कहीं भी, कैसे भी मिलना संभव नहीं हो सकेगा और तिस पर जब कि माँ बिछुड़ी हों, दिल काँप कर आँखों में पानी भर लाता है !  होगा समय बहुत बड़ा कारगर मल्हम, पर वह भी ऊपरी जख्म को ठीक करता है, अंदर की टीस को समय-समय पर सालने से तो वह भी नहीं रोक पाता।

दिवंगत इंसान के शोकग्रस्त परिवार को संबल देने, उबरने, समझाने के लिए तरह-तरह की बातें और रीति-रिवाज  बनाए गए हैं, इन्हीं के तहत कुछेक दिनों के लिए नाते-रिश्तेदार घर पर जुटते हैं, कुछ रस्में पूरी की जाती हैं जिसमें व्यस्त हो इंसान यादों को कुछ दूर रख सके, अपना गम भुला सके, दुःख भरा माहौल कुछ हल्का हो सके। पर मानव के साथ जिंदगी भर जुड़े रहने वाली ये नियामत इतनी कमजोर नहीं होती कि ऐसे उपायों से उन्हें भुलाया या दूर रखा जा सके। जैसे ही अकेलेपन के कोहरे का साथ उन्हें मिलता है वे फिर आ घेरती हैं, हर बार, बार-बार। अच्छा ही है उनके कारण माँ सदा बनी रहेंगी अपने वात्सल्य के साथ, मेरे आस-पास, मेरे इर्द-गिर्द मुझे संबल देते, ममता बरसाते, स्नेह लुटाते।                

8 टिप्‍पणियां:

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

मैं समझ सकता हूँ । मेरी माँ को गुजरे आज 16 वर्ष हो चुके हैं फिर भी लगता है आसपास है कहीं । आप को इस दुख:को सहने की ईश्वर शक्ति प्रदान करे यही कामना है । दिवंगत माँ को नमन और श्रद्धांजलि ।

शिवम् मिश्रा ने कहा…

माँ को सादर नमन और हार्दिक श्रद्धांजलि । अपना और परिवार का ख़्याल रखें |

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

सुशील जी,
बस यही लगता है कि सदा उनकी निगहबानी में हूँ

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

शिवम जी,
कितना भी अपने आप को समझाया जाए, कमी कहाँ पूरी होती है !

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (30-12-2016) को "महफ़ूज़ ज़िंदगी रखना" (चर्चा अंक-2572) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

Aabhar Shastri ji

Digamber Naswa ने कहा…

माँ की कमीं पूरे जीवन भर नहीं हो पाती ... बस सब्र ही करना होता है इंसान को ...
मेरी मौन श्रधांजलि माँ को ...

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

नासवा जी, सब्र के अलावा उपाय भी तो नहीं है कोई