शुक्रवार, 12 अगस्त 2016

तिरोहित होती भावनाएं

हम सब चाहते हैं कि हमें हर तरह की सहूलियत मिले, हमें हर तरह की आजादी हासिल हो, हम पर किसी तरह की बंदिश न हो, हम पर किसी भी तरह की कड़ाई लागू न हो, हमारे हक़ को छीना ना जाए। पर  हम चाहते हैं कि हमारे लिए कोई और लड़े, ताकि मुसीबत आने पर हम पर कोई आंच ना आए। यानी स्वर्ग सभी जाना चाहते हैं पर मरना कोई नहीं चाहता ! मतलबपरस्ती के इस आलम में इरोम भी सोच रही होगी कि अपनी जिंदगी के बीसियों साल मैंने किनके लिए बर्बाद कर दिए !!   

असहिष्णुता पर तो कई दिनों से देश में बहसबाजी जारी है। उस पर नाहीं कोई टिपण्णी करनी है और नाहीं उसके पक्ष-विपक्ष में जाना है। पर कड़वी सच्चाई तो यही है कि धीरे-धीरे समाज में असहिष्णुता के साथ-साथ संवेदनहीनता और खुदगर्जी तेजी से पनप रही है। किसी भी दिन का, किसी भी प्रदेश का, किसी भी भाषा का अखबार उठा कर देख लीजिए, नफ़रत का अजगर हर जगह जहर उगलता नजर आएगा। ज़रा-ज़रा सी बात पर तोड़-फोड़, मार-पीट, खून-खराबा आम बात हो गयी है। एक दस बोलता है तो दूसरा सौ सुनाता है। रिश्ते-नाते, पद-मर्यादा, छोटे-बड़े किसी का लिहाज नहीं बचा है। सड़क से लेकर उच्चतम सदनों तक एक जैसा हाल हो गया है। मतलबपरस्ती का आलम है। 

संवेदनहीनता का आलम यह है कि इंसान की कीमत मोबायल फोन से भी कम हो गयी है। एक-दो दिन पहले की ही तो बात है एक शख्स को धक्का मार कर टेंपो चालक फरार होता है, एक रिक्शावाला उस घायल इंसान को
नजरंदाज कर उसका मोबायल फोन उठा यूं चल पड़ता है जैसे उसीका गिरा हो, उधर पुलिस की गाडी पता नहीं अपनी कौन सी ड्युटी पूरी करने की जल्दी में उस आदमी को देख ही नहीं पाती या देखना नहीं चाहती। बाद में पता चलता है कि यह पुलिस की नहीं उस घायल आदमी की ही गलती थी जिसने गिरते वक्त यह ध्यान नहीं रखा कि उसे एक ही थानाक्षेत्र में गिरना है। फिर जो होता है, तड़फते हुए उस घायल बदनसीब इंसान ने सड़क पर ही दम तोड़ दिया। वैसे इस अमानवता के पीछे पुलिस की छीछालेदर से बचना भी एक कारण है जिसे आम आदमी झंझट मान बैठा है।  जबकी हादसे ना पूछ कर आते हैं नाहीं पहचान कर ! और यह इस तरह की अकेली घटना भी नहीं है, देश भर में महीने में ऐसे सैंकड़ों वाकये घटते रहते है जिनमें दर्जनों व्यक्ति संवेदनहीनता की वजह से अपनी जान गवां बैठते हैं।
 
कहने-सुनने में बुरा जरूर लगता है पर खुदगर्जी की भावना भी हम में कूट-कूट कर भरी हुई है। हम सब चाहते हैं कि हमें हर तरह की सहूलियत मिले, हमें हर तरह की आजादी हासिल हो, हम पर किसी तरह की बंदिश न हो, हम पर किसी भी तरह की कड़ाई लागू न हो, हमारे हक़ को छीना ना जाए। पर इन सब के लिए हम खुद लड़ना या आवाज बुलन्द करना या विरोध जताना नहीं चाहते। हम चाहते हैं कि हमारे लिए कोई और लड़े, हमारी ओर से कोई और आवाज उठाए, हमारे लिए कोई और विरोध जताए ताकि मुसीबत आने पर हम पर कोई आंच ना आए। यानी स्वर्ग सभी जाना चाहते हैं पर मरना कोई नहीं चाहता !! 

इतिहास गवाह है, सदियों से ऐसा होता चला आया है। अपने लिए खड़े होने वाले को हम हीरो बना देते हैं, पर काम निकल जाने पर या अधूरा रह जाने पर उसे ज़ीरो बनाने या उसी का विरोध करने से भी नहीं चूकते। फिर चाहे कोई गांधी हो या अन्ना हो। इसका ताजा उदाहरण मणिपुर की शर्मिला है, जो जब तक कष्ट, विरोध, ताड़ना सहती रही तब तक वह वहाँ के लोगों के लिए पूज्यनीय-आदरणीय, नायिका बनी रही, पर जैसे ही उसने अपने व्यक्तिगत निर्णय लिए उसे खलनायिका का रूप दे दिया गया। यहां तक कि वहाँ की महिलाएं भी उसे अपने मौहल्ले में रहने देने के खिलाफ हो गयीं। अब तक उसका नाम जपने वाले, उसके सहारे अपनी दुकान चलाने वाले रातों-रात ग़ायब हो गए। इरोम भी सोच रही होगी कि अपनी जिंदगी के बीसियों साल मैंने किनके लिए बर्बाद कर दिए !!   

सो हमें भी अपने मन की बात न होने या सुनाई देने से आक्रोशित होने के बजाय सोचना जरूर चाहिए कि जैसे हमारी अपनी एक सोच है तो जरूरी नहीं कि सामने वाले की भी वैसी ही हो। उसका अपना व्यक्तित्व है, अपनी मानसिकता है, अपने विचार हैं। जरूरी नहीं कि मेल खाएं ही !                     

2 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (14-08-2016) को "कल स्वतंत्रता दिवस है" (चर्चा अंक-2434) पर भी होगी।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

Hardik Dhanywad, Shastri ji