शनिवार, 18 जून 2016

डाकघर से एक पोस्ट-कार्ड खरीदना नामुमकिन नहीं पर मुश्किल जरूर है

विडंबना देखिए कि सात-सात रुपये का घाटा एक #पोस्टकार्ड पर सह कर जिस गरीब मानुष के लिए इस सेवा की कीमत नहीं बढ़ाई जा रही, वही यदि एक पोस्ट कार्ड लेने जाएगा तो क्या डाकघर वाले उसे उपलब्ध करवाएंगे ? कहाँ से लाएगा वह या डाक-खाने वाले पचास पैसे का सिक्का ?

अपने देश में शायद ही ऐसा कोई इंसान होगा जिसका साबका डाकघर यानि पोस्ट-आफिस से ना पड़ा हो। अठाहरवीं शताब्दी में अंग्रेजों द्वारा रेल की तरह अपने कार्यों को सुचारु रूप से चलाने के लिए डाक सेवा की शुरुआत की गयी थी। आज से कुछ वर्षों पहले तक यह एकमात्र सस्ता व सुलभ जरिया था, लोगों को आपस में जोड़े रखने, दूर-दराज बैठे सगे-संबंधियों की कुशलक्षेम पाने, जानने का, उन्हें आर्थिक मदद पहुंचाने, पाने का। सबसे अच्छी बात यह थी कि नागरिकों का इस सरकारी संस्थान के कर्मचारियों की कर्मठता और ईमानदारी पर अटूट विश्वास था। होना भी चाहिए था क्योंकि लोग देखते जो थे कि, चाहे आंधी हो, बरसात हो, झुलसा देने वाली गर्मी हो, उनके पत्र, जरुरी कागजात, मनी-आर्डर, राखी, बधाई संदेश, निमंत्रण पत्र इत्यादि को बड़ी साज-संभार से डाकिया उनके हाथों तक पहुंचा कर जाता था। गांव-देहात के अनपढ़ पुरुष-महिलाओं के लिए डाक-बाबू द्वारा पत्र बांचना और लिखना आम बात होती थी। ऐसी जगहों में डाक्टर के बाद डाकिया ही ज्यादा सम्मान पाता था।

हालांकि डाक सेव शुरू होने तक, टेलीफोन का परिचय देश के लोगों से हो चुका था, पर वह सेवा बहुत ही कम सरकारी, धनाढ्य और सभ्रांत लोगों तक सिमित थी इसलिए डाक सेवा पर उसका कोई असर नहीं पड़ा था। फिर समय बदला संचार व्यवस्था में अभूतपूर्व क्रान्ति आ गयी। जिसने शहर तो शहर दूर-दराज के गांव-देहात में भी पांव पसार लिए। धीरे-धीरे बच्चे-बच्चे के हाथ में मोबाइल आ गया। लोगों की खतो-किताबत बंद हो गयी। कुछ धक्का बैंकों की सेवाओं ने दिया, रही-सही कसर दूसरे सरकारी विभागों की तरह यहां भी लापरवाही, वयवसायिकता के अभाव, काम के प्रति सुस्ती जैसी बीमारियों के पनपने से पूरी हो गयी। जिसका फ़ायदा निजी कंपनियों ने कुरियर सेवाएं शुरू कर उठाना आरंभ कर दिया और हर निजी संस्थान की तरह इस सरकारी विभाग को मीलों पीछे छोड़ दिया। पर यहां किसी के कान पर जूं नहीं रेंगी। उसी 1898 के एक्ट के तहत काम किया जाता रहा, फलस्वरूप काम धंधा आधे से भी ज्यादा कम हो गया, कई-कई डाकघरों को बंद करने की नौबत आ गयी। तनख्वाह निकलना मुश्किल हो गया। दुर्दशा सुधारने के लिए कोशिशें जरूर हुईं पर पूरी तरह कारगर कोई न हो सकी। लोगों की आस्था व विश्वास पूरी तरह फिर नहीं पाया जा सका।

डाकघर की कुछ सेवाएं ऐसी हैं जो सदा घाटे में रही हैं। जिसमें पहला नंबर है पोस्टकार्ड का ! इस विभाग के अनुसार इन्हें एक कार्ड पर सात रुपये से ऊपर का नुक्सान होता है। तो आज के परिवेश में उसे बंद ही क्यों नहीं कर दिया जाता या फिर उसकी कीमत क्यों नहीं बढ़ाई जाती ? कहने को उसे गरीब तबके के लिए जारी रखा गया है ! सवाल है किस गरीब के लिए ? उसके लिए जिसे आटा या चावल खरीदना मजबूरी बन गया हो, दाल,सब्जियां जिसके लिए देखने की चीजें हो गईं हों, नमक तक पहुँच के बाहर होता जा रहा हो, एक समय की चाय तक पीना जिसके लिए मुहाल हो गया हो उसके लिए एक #पोस्टकार्ड की कीमत ना बढ़ा कर क्या एहसान किया जा रहा है ? विडंबना देखिए कि वही गरीब मानुष, जिसके लिए इस सेवा की कीमत नहीं बढ़ा रहे, यदि एक पोस्ट कार्ड लेने जाएगा तो क्या डाकघर वाले उसे उपलब्ध करवाएंगे ? कहाँ से लाएगा वह या डाक-खाने वाले पचास पैसे का सिक्का ? आज तो इसका अत्यंत उपाय है कि प्रार्थी से लिखा हुआ मैटर लेकर, उसे स्कैन कर संबंधित जगह भिजवा दें, इससे खर्चा और समय दोनों की बचत हो जाएगी।
ऐसी ही एक सेवा है "बुक-पोस्ट" की, जिसे अंग्रेजों ने पुस्तकों, छपी हुई सामग्री, जिसमें अखबारें शामिल नहीं थीं, को सस्ती दर पर भिजवाने के लिए शुरू किया था। इसमें शर्त यह होती थी कि सामग्री यदि लिफ़ाफ़े में है तो लिफाफा खुला होना चाहिए, बंद या सील किए हुए लिफाफे को बुक-पोस्ट के तहत नहीं भेजा जा सकता था। आजादी के बाद इसका खूब दुरुपयोग हुआ, लोगों ने सामग्री को अंदर चिपका कर लिफाफा खुला भेजना शुरू कर दिया। पर आज तक इस विभाग के किसी कर्मचारी ने इस पर शायद ही ध्यान दिया हो, क्योंकि सरकारी काम में कोई दर्द नहीं पालता। आज भी यदि आप एक डेढ़ सौ ग्राम का पत्र भेजना चाहेंगे तो खुले लिफ़ाफ़े के लिए दस रुपये, बंद के लिए चालीस रुपये और स्पीड-पोस्ट के लिए पैंतालीस रुपये के करीब चुकाने पड़ेंगे ! तो कोई क्यों साधारण डाक का इस्तेमाल करेगा ? जिसमें पत्र के सही-सलामत पहुँचाने की गारंटी भी नहीं है। तो इस घाटे की सेवा को ख़त्म कर साधारण डाक के बराबर कर देना चाहिए।

रही बात अखबारों की तो आज अधिकतर पेपर वाले अपना भार उठाने में सक्षम हैं, सब्सिडी पर कागज, जमीन तथा दूसरी सुविधाओं का चुपचाप उपयोग करते जा रहे हैं तो कम से कम वर्षों से चली आ रही पोस्टल छूट तो बंद कर ही देनी चाहिए। समय आ गया है रोना छोड़, ठोस उपाय अपनाने का चाहे वह पोस्ट लिए हो, अंतरदेशीय पत्र के लिए हो या अखबारों के लिए हो।

आज जब हर जगह प्रतिस्पर्द्धा गहराती जा रही है तो कोई तुक नहीं है कि हम जबरदस्ती घाटे को अपने ऊपर थोपवाते रहें। क्योंकि वह घाटा तो हमारी ही जेब से बिना हमें बताए पूरा किया जाता है !

10 टिप्‍पणियां:

Madhulika Patel ने कहा…

बहुत अच्छी पोस्ट है ।

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

मधुलिका जी,
धन्यवाद

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (20-06-2016) को "मौसम नैनीताल का" (चर्चा अंक-2379) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

शास्त्री जी,
हार्दिक धन्यवाद

HARSHVARDHAN ने कहा…

आपकी ब्लॉग पोस्ट को आज की ब्लॉग बुलेटिन प्रस्तुति अंतरराष्ट्रीय योग दिवस और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। सादर ... अभिनन्दन।।

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

Harshvardhan ji
Aabhar

sunita agarwal ने कहा…

बिलकुल सही | अभी गरीब लोगो के पास भी मोबाइल है और पचास पैसे दीखते कहा आजकल | पर सरकार का तंत्र इतना चुस्त दुरस्त कहा की इस पर विचार करे इसको सुधारने की कोशिश करे :)

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

Always Welcome, Sunita ji

रश्मि शर्मा ने कहा…

Bahut achhi post..sochne yogya

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

रश्मि जी,
धन्यवाद

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