सोमवार, 4 अप्रैल 2016

फिर एक बार सालासर बालाजी यात्रा

माँ अंजनी 
कुछ पर्यटन स्थल या धार्मिक स्थल ऐसे होते हैं जहां बार-बार जाने  के बाद भी वहां फिर से जाने की इच्छा बनी ही रहती है। ऐसा ही एक स्थान है राजस्थान के चुरू जिले के सुजानगढ़ कस्बे से करीब 26-27 की. मी. की दूरी पर स्थित सुप्रसिद्ध सालासर बालाजी धाम, जो नेशनल हाईवे 65 पर पड़ता है। यहां साल भर भक्तों का तांता लगा रहता है। चैत्र और आश्विन पूर्णिमा के समय यहां मेला भरता है जब लाखों लोग अपनी आस्था और भक्ति के साथ यहां आकर हनुमान जी के दर्शन का पुण्य लाभ उठाते हैं। यहां जाने पर एक अलौकिक शांति का अनुभव निश्चित तौर पर होता है। 

सालासर धाम की यात्रा के दौरान दो और धार्मिक स्थलों के दर्शन का सुयोग मिलता है, वह हैं झुंझनू में स्थित रानी सती मंदिर और दूसरा सीकर जिले के खाटू कस्बे में स्थित खाटू श्याम धाम। इसे त्रिकोणी धाम यात्रा भी कहा जाता है। यात्रा के आयोजक या खुद पर्यटक अपना कार्यक्रम इन तीनों जगहों को ध्यान  में रख कर ही बनाते हैं। पर कहते हैं ना कि 'तेरे मन कुछ और है, कर्ता के कुछ और', तो होता वही है जो प्रभू की इच्छा होती है। इस बार हम पांचों के सहयात्री सपत्नीक राजीव जी अपने दोनों बच्चों के साथ थे।पर चाह कर भी समय की पाबंदी के कारण शुक्रवार संध्या चार बजे के पहले निकलना संभव नहीं हो पाया। गाडी ZYLO और चालक संतोष, दो साल पहले की यात्रा वाले सहायक ही थे। पुराने अनुभवों के आधार पर रोहतक-भिवानी-लोहारू-झुंझनु वाला मार्ग ही अपनाया गया। ठहरने के लिए, मंदिर से कुछ दूर होने के बावजूद,  उसी चमेली देवी धर्मशाला को चुना गया
बालाजी महाराज 
जिसने पिछली यात्रा पर बहुत ज्यादा भीड़-भाड़ के बावजूद हमारे रहने  इंतजाम कर दिया था। वैसे भी साफ़-सफाई, भोजन का स्तर और अन्य सुविधाओं को मद्दे नजर रख उसे ही पड़ाव के लिए फिर चुना गया।  वैसे भी जगह जानी-पहचानी थी कहीं और भटकने का मतलब भी नहीं था। रास्ते में ज्यादा न रुकने  के बावजूद 'चेक इन' रात 11.40
 पर ही संभव हो पाया। वहां रात दस बजे तक ही भोजन की व्यवस्था रहती है इसीलिए उदर-पूर्ती का  थोड़ा-बहुत इंतजाम कर रखा गया था। फिर भी बिस्तर पर जाते-जाते 12.30 बज ही गए थे।
सुबह मुझे, अभय, अलका जी और दोनों बच्चों को छोड़ सारे जनों ने सुबह छह बजे की आरती का पुण्यलाभ लिया। दोबारा सब जने फिर 10.30 बजे दर्शन हेतु मंदिर जा डेढ़-दो घंटे में वापस आ गए थे। अप्रैल शुरू होते ही इस बार गर्मी ने भी दस्तक दे दी है। इसलिए फिर कहीं जाने की हिम्मत नहीं पड़ी। कमरे की ठंडक में तीन-चार घंटे गुजारने के बाद अपरान्ह साढ़े चार के करीब सुजान गढ़ के करीब डूंगर बालाजी के दर्शन हेतु बाहर निकले, जिसकी सालासर से दूरी करीब चालीस की. मी. की है। लौटते हुए माँ अंजनी देवी के दर्शन कर करीब साढ़े आठ बजे वापस पड़ाव पर आ गए आ गए। भोजनोपरांत जिन्होंने 
सुबह की आरती में भाग नहीं लिया था उन्होंने रात दस बजे की आरती में दरबार में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई और प्रभु से फिर सकुटुंब आने की हिम्मत और अवसर उपलब्ध करवाने की याचना कर वापसी की अनुमति प्राप्त की।

वापसी में खाटू श्याम जी के दर्शन हेतु जब करीब बारह बजे खाटू पहुंचे तो वहां हज़ारों लोगों को दर्शन हेतु पहले से खड़ा पाया। रविवार का दिन था सो भीड़ पुण्यलाभ के लिए उमड़ी पड़ी थी। दर्शन के लिए कम से कम तीन चार घंटे का समय मामूली बात लग रही थी सो प्रभु से आज्ञा ले वापस दिल्ली की तरफ गाडी का रुख कर दिया और साढ़े सात बजे शाम को शाम घर का दरवाजा खुल चुका था। या सालासर महाराज के दर्शन हेतु मेरी चौथी यात्रा थी।

2 टिप्‍पणियां:

ब्लॉग बुलेटिन ने कहा…

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, " कंजूस की मेहमान नवाज़ी - ब्लॉग बुलेटिन " , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (06-04-2016) को "गुज़र रही है ज़िन्दगी" (चर्चा अंक-2304) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'