सोमवार, 25 अप्रैल 2016

पर्यावरण सुधारना है तो सख्ती करनी ही पड़ेगी !

आपको क्यों नहीं सुनाई पड रहा कि सी.एन.जी. के स्टीकरों की काला बाजारी हो रही है ? तो क्यों नहीं ऐसी गाड़ियों को भी इस स्कीम के तहत बंद रखा जाए ? उन जुगाडुओं की पहचान और रोक-थाम का कोई उपाय है जो रोज अपनी नंबर प्लेट बदल अपनी गाडी सड़क पर उतार देते हैं ? या फिर गलियों-गलियों से होते हुए कहीं भी पहुंचने वाले, रोके जाने पर भाग जाने वाले, पैसे के बल पर दोनों नंबर की गाड़ियां रख सड़क पर भीड़ बढ़ाने वालों पर शिकंजा या नकेल डालने का कोई उपाय है ? नहीं ना ! तो सीधी सी बात है, दस दिनों तक समुद्र से प्रार्थना करने के पश्चात तो प्रभु को भी गुस्सा आ गया था !आप तो मनुष्य हो, कब तक फूल भेंट करते रहोगे ?  अब चालान नहीं उनका लायसेंस जब्त करें या फिर गाडी ही जब्त हो, जो भारी जुर्माने के साथ स्कीम ख़त्म होने पर ही मिले। अपनी बड़ी-बड़ी फोटो, इश्तेहार लगाने के बदले लोगों को भविष्य के प्रति चेताएं , जागरूक बनाएं, समझाएं .....

पर्यावरण के सवाल को हल करने के लिए सम-विषम के गणित के फार्मूले को दिल्ली की जनता के सामने परीक्षा के लिए फिर पंद्रह दिनों के लिए रख दिया गया है। मुंडे-मुंडे मतिरिभिन्ना, जाहिर है कुछ जागरूक लोग, जो बढ़ते प्रदूषण को लेकर सचमुच चिंतित हैं वे इसके पक्ष में हैं और कुछ को इसकी सफलता में संदेह है वे इसके विपक्ष में हैं। वेिपक्ष में वे लोग भी हैं जो अपनी निजी जिंदगी में किसी तरह का बंधन स्वीकार नहीं कर पाते। इसके अलावा सक्षम लोग, तथाकथित क्रीमी लेयर, विरोधी दलों के लोग, जिन्हें सत्तारूढ़ दल की किसी भी सफलता से अपना भविष्य खतरे में नज़र आने लगता है, और वे भी जो जुगाड़ में सिद्धहस्त हैं ये सब ऐसी स्कीमों पर विश्वास नहीं रखते। 

बात किसी के मानने ना मानने की नहीं है। इस स्कीम को भी किसी ने जनहित या प्रदूषण की चिंता से तब तक कहां लागू किया गया था, जब तक न्याय-पालिका ने अपना डंडा नहीं खड़खड़ाया। यह सच है कि यह व्यवस्था पूर्णरुपेण खामी रहित नहीं है, पर उन खामियों को दूर करने के लिए विपक्ष में खड़ा जत्था कोई सलाह नहीं दे रहा, उसका एक ही मकसद है कि यह सिस्टम बंद हो। पर पक्ष में खड़े लोगों का मानना है कि चाहे दस प्रतिशत ही सुधार हुआ हो, पर हुआ तो है। क्योंकि यह सभी की जिम्मेदारी बनती है कि अपने बच्चों के लिए, आने वाली पीढ़ी के लिए वातावरण, पर्यावरण, माहौल को इतना बेहतर तो बना दें कि वे खुल कर सांस ले सकें। यह बात भी सच है कि सिर्फ गाड़ियां ही पर्यावरण के प्रदूषण की जिम्मेवार नहीं हैं पर कुछ प्रतिशत तो उनकी भागेदारी तो है ही ! सड़क पर गाड़ियां कम होंगी तो यातायात सुधरेगा, यातायात में सुधार होगा तो पर्यावरण में भी फर्क जरूर पडेगा।  

कहने-सुनने में बुरा लगता है, पर हमारी आदत है कि डर के बिना, सीधे शब्दों में कहें तो लतियाये बिना, हम किसी काम को नहीं करते। शायद इसी लिए अंग्रेजों के समय कानून-व्यवस्था चाक-चौबंद थी। अब तो एक कानून बनता है तो उसके दस तोड़ पहले ही सामने ला दिए जाते हैं। और कुछ नहीं तो सौ-पचास लोग आ जुटेंगे नारे-धरने के साथ। कइयों को तो अपना जन-बल दिखाने का मौका मिल जाता है। अब इसी सम-विषम के जोड़-घटाव को लें। सरकार यदि पूर्णतया कटिबद्ध हो पर्यावरण के सुधार के लिए तो क्या नहीं हो सकता ! इसके लिए क्यों किसी को भी छूट दी जाए। सदा बराबरी की रट लगाने वाली महिलाओं को भी पुरुषों की बजाय ज्यादा छूट दे दी गयी तो क्या जब महिला गाडी चलाती है तो कार धूआं कम छोड़ती है ? चलो ठीक है, दे दी तो दे दी, पर फिर उस गाडी में पुरुष के बैठने में आपत्ति क्यों ? उन भले लोगों को भी तो किसी ना किसी तरह अपने गन्तव्य तक पहुँचना ही है, यदि महिला गाड़ीवान के साथ तीन पुरुष चले भी गए तो उस एक वाहन की तो बचत हो ही जाएगी जिसमें ये लोग जाते। 

दुनिया जानती है हमारी फितरत को, हमारे जुगाडपन को, तो आप क्यों आँख बंद किए बैठे हैं ? आपको क्यों नहीं सुनाई पड रहा कि सी.एन.जी. के स्टीकरों की काला बाजारी हो रही है ? क्या कोई उपाय है जो इस धांधली को रोक या पहचान सके ? तो क्यों नहीं ऐसी गाड़ियों को भी इस स्कीम के तहत बंद रखा जाए ? एक बात और उन जुगाडुओं की पहचान और रोक-थाम का कोई उपाय है जो रोज अपनी नंबर प्लेट बदल अपनी गाडी सड़क पर उतार देते हैं ? या फिर गलियों-गलियों से होते हुए कहीं भी पहुंचने वाले, रोके जाने पर भग लिए जाने वाले, पैसे के बल पर दोनों नंबर की गाड़ियां रख सड़क पर भीड़ बढ़ाने वालों पर शिकंजा या नकेल डालने का कोई उपाय है ? नहीं ना ! तो सीधी सी बात है, दस दिनों तक समुद्र से प्रार्थना करने के पश्चात तो प्रभु को भी गुस्सा आ गया था।  आप तो मनुष्य हो, कब तक फूल भेंट करते रहोगे ? अब चालान नहीं उनका लायसेंस जब्त करें, या फिर गाडी ही जब्त हो जो भारी जुर्माने के साथ स्कीम ख़त्म होने पर ही मिले। इस दायरे में ज्यादा से ज्यादा लोगों को लाया जाए। अपनी बड़ी-बड़ी फोटो, इश्तेहार लगाने के बदले लोगों को भविष्य के प्रति चेताया जाए, जागरूक बनाया जाए, समझाया जाए। यह भी सच्चाई है कि बदलाव तुरंत तो नहीं आएगा पर धीरे-धीरे ही सही लोगों को समझ में आएगा, जागरुकता बढ़ेगी तो फर्क जरूर पड़ेगा।       

3 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (27-04-2016) को "हम किसी से कम नहीं" (चर्चा अंक-2325) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

HARSHVARDHAN ने कहा…

आज की बुलेटिन जोहरा सहगल जी की जयंती और ब्लॉग बुलेटिन में आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है। सादर ... अभिनन्दन।।

जमशेद आज़मी ने कहा…

बहुत ही बेहतरीन पोस्‍ट। पर्यावरण संबंधी प्रश्‍नों को हम सबके सम्‍मुख लाने के लिए आपका धन्‍यवाद।