शनिवार, 19 मार्च 2016

विद्या ददाति विनयम ???

आज शिक्षण एक व्यवसाय है जहां ज्ञान नहीं, "सूचनाओं" की जानकारी दे बच्चों को मशीनों की तरह परीक्षाओं के लिए तैयार कर उन्हें एक चलता फिरता सूचना संग्रहालय बनाया जाने लगा है। जाहिर है ऐसी उपाधियां नौकरी तो दिला सकती हैं ज्ञान नहीं ! इसीलिए ऐसी शिक्षा में विवेक का अभाव रहता है जिससे विनय के स्थान पर अहंकार की उत्पत्ति होती है। ऐसे तथाकथित विद्वानों में विनय की आशा करना ही बेमानी है।  इनकी तुलना उन पेड़ों से की जा सकती है जिनमें फल नहीं लगते और पेड़ वही झुकता है जिसमें फल लगते हैं .......  

एक बहुत लोकप्रिय सूक्ति है -
"विद्या ददाति विनयम - विनयाद याति पात्रताम | पात्रत्वाद धनमाप्नोती - धनाद धर्मस्तत: सुखं" 
यानी विद्या से विनम्रता, विनम्रता से योग्यता, योग्यता से धन और धन से धर्म और सुख की प्राप्ति होती है।


इस सूक्ति को आजकल कई विद्यालयों-महाविद्यालयों ने अपना आदर्श वाक्य बना दिवालों पर चस्पा तो कर रखा है पर उसपर आचरण कम, दिखावा ज्यादा होता है। क्योंकि जब इस सूक्ति का आभिर्भाव हुआ था, तब और आज की विद्या में आमूलचूल यानी जमीन-आसमान का फर्क आ चुका है। तब गुरु को भगवान से भी ऊँचा स्थान प्राप्त था। वह पूजनीय शख्शियत हुआ करता था तथा अपने शिष्यों और समाज के प्रति पूरी तरह समर्पित हो निष्काम भाव से अपना पूरा ज्ञान सौंप दिया करता था। उनका मुख्य ध्येय ही होता था शिक्षित, ज्ञानवान पीढ़ी का निर्माण। उस समय विद्या और शिक्षा का तकरीबन एक ही मतलब होता था। आज स्थिति पूर्णतया बदल चुकी है। शिक्षा और विद्या पर भी, "जैसा बोओगे वैसा काटोगे, बोया बीज बबूल का तो आम कहां से होय", जैसी कहावतें चरितार्थ होने लगी हैं।   


आज शिष्यों का मूल उद्देश्य केवल पढ़ लेना, या यूं कहिए कि रट लेना, परीक्षा देना और पास होना ही रह गया है। डिग्री-धारी का ठप्पा लग जाना ही सबसे बड़ी उपलब्धि माना जाने लगा है। शिक्षा का उद्देश्य केवल नौकरी या आजीविका का अर्जन हो कर रह गया है जबकि विद्या से मनुष्य को ज्ञान मिलता है। आज के शिक्षक भी यह समझते हैं। इसीलिए विद्यालय दुकानें बन गए हैं और शिक्षण एक व्यवसाय और वह भी ऐसा-वैसा व्यवसाय नहीं बल्कि जिसने अब देश के कई राज्यों की अर्थ-व्यवस्था को अपने ऊपर निर्भर करवा लिया है, जहां जिसे ज्ञान कह कर बेचा जा रहा है, वह केवल सूचना है | मशीनों की तरह बच्चों को परीक्षाओं के लिए तैयार कर उन्हें एक चलता फिरता सूचना संग्रहालय बनाया जाने लगा है। इस अंधी प्रतिस्पर्धात्मक दौड़ में अभिभावक भी पैसा फेंकते जाओ और तरह-तरह की उपाधियां हासिल करते जाओ, जैसी होड़ में मजबूरन शामिल हैं। जाहिर है ऐसी उपाधियां नौकरी तो दिला सकती हैं, ज्ञान नहीं ! इसीलिए ऐसी शिक्षा में विवेक का अभाव रहता है, जिससे विनय के स्थान पर अहंकार की उत्पत्ति होती है। साथ ही यह भी सच है कि ऐसे लोगों को धन तो प्राप्त हो जाता है पर ये लोग सदा अहंकार से ग्रसित रहते हैं। उनमें विनम्रता का सदा अभाव रहता है। इनकी तुलना उन पेड़ों से की जा सकती है जिनमें फल नहीं लगते और पेड़ वही झुकता है जिसमें फल लगते हैं। उसी तरह ऐसे तथाकथित विद्वानों में विनय की आशा करना ही बेमानी है। ऐसी विद्या विनय नहीं अहम को जन्म देती है। 

समाज के हर तबके में ऐसे लोगों की भरमार हो चली है। जिसका उदाहरण रोज ही देखने को मिल जाता है। एक बात जरूर है ऐसे लोग "समदर्शी" हो जाते हैं। अपने अहम के चश्मे के पीछे से इन्हें हर इंसान, जीव-जंतु, कीड़े-मकौड़े से नज़र आने लगते हैं। अपने लिए उठा ज़रा सा विरोध का स्वर इन्हें जहर लगने लगता है। हर प्राणी जो इनके रास्ते में आए या खिलाफत करे वह दुश्मन नज़र आने लगता है। सोचने की बात है कि, क्या हमारी शिक्षा प्रणाली में ही तो कोई ऐसी खामी नहीं पैठ गयी है, जिससे  संस्कारी, विचारवान, विवेकशील, सहनशील, परोपकारी, गुणवान, मानवतावादी इंसानों की खेप आनी ही बंद हो गयी है ?      

1 टिप्पणी:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (20-03-2016) को "लौट आओ नन्ही गौरेया" (चर्चा अंक - 2288) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'