शुक्रवार, 5 जून 2015

सेहत पर भारी पड़ते दो मिनट

काम के बोझ के बढ़ने के बावजूद उसे बांटने का समय तो वही रहना था, सो शुरू हुई कुछ कामों में लगने वाले समय की कटौती।  मैगी ने जो भी सफलता पाई वह सिर्फ इसलिए थी कि इससे लोगों को अपने समय को बचाने का मौका मिल जाता था।  ज्ञातव्य है कि मैगी और निरमा इन दोनों की सफलता सिर्फ और सिर्फ विज्ञापनों की धुंआधार गोलाबारी के कारण ही संभव हो पाई थी नाकि उनकी गुणवत्ता के।  

कुछ सालों पहले तक अपने यहां जिंदगी में ऐसी आपा-धापी या दौड़-भाग नहीं होती थी। पापा लोग घर  के बाहर की जिम्मेदारी संभालते थे और माँ घर और बच्चों की। खान-पान की सफाई और शुद्धता का सारा जिम्मा घर की
महिलाएं सफलता पूर्वक वहन करती थीं। जिसका असर अभी भी उस समय के बाल से युवा और अधेड़ हुए स्वस्थ रहते लोगों की सेहत पर देखा जा सकता है। समय बदला, बेहतर जिंदगी की तलाश में लोग महानगरों, मेट्रो शहरों की ओर मुखातिब होते चले गए। स्थापित होने के बाद, मजबूरी के तहत ही सही, संयुक्त परिवारों का विघटन हुआ। फिर बढती मंहगाई, नई-नई सुख-सुविधाओं को बटोरने और महंगे माहौल के भंवर में फंसे पति-पत्नी दोनों को घर का बजट संभालने के लिए निकलना पड़ा  रोजी-रोटी की तलाश में।  अब काम का बोझ तो कई गुना बढ़ा पर उसे बांटने के लिए समय उतना ही रहा। सो शुरू हुई कुछ कामों में लगने वाले समय की कटौती। गाज गिरी भोजन बनाने-पकाने वाले, अपनी सेहत पर व्यतीत होने वाले और कुछ अपने आराध्य की ओर ध्यान देने वाले समय पर।  इसका पूरा फायदा बाजार ने उठाया संचार माध्यम का सहारा लेकर। ज्ञातव्य है कि मैगी और निरमा इन दोनों की सफलता सिर्फ और सिर्फ विज्ञापनों की धुंआधार गोलाबारी के कारण ही संभव हो पाई थी। बिना उचित गुणवत्ता के बावजूद। 

यही वह समय था जब समय की तंगी से त्रस्त लोगों ने बिना गुणवत्ता की जांच किए, बिना हानि-लाभ को परखे, मैगी जैसे तुरंत तैयार होने वाले खाद्य पदार्थों के जाल में अपने-आप फंसवा लिया। समय कहां था किसी चीज को परखने का, यहां तो सवाल था सिर्फ पेट को भरा-भरा महसूस करवाने का। इसी का फायदा उठा  'मैगी' नामक कंपनी ने, जो जूलियस मैगी को 1872 में स्विट्जरलैंड में अपने पिता से विरासत के रूप में मिली थी, भारत में भी अपने पैर पसार लिए। जूलियस ने अपनी कंपनी द्वारा पहली बार प्रोटीन से भरपूर खाद्य-पदार्थों 1886 में परिचित करवाया था।  जिसका 1947 में "नेस्ले" में विलय हो गया। 1982 में पहली बार जब भारत में मैगी ने अपने बहुचर्चित स्लोगन "बस दो मिनट" के साथ पदार्पण किया तो उसकी पहचान घर-घर में सबसे सस्ते और तुरंत खाए जाने वाले पदार्थ के रूप में ऐसी बनी कि लोग किसी भी तरह के "नूडल" को मैगी के नाम से ही पुकारने लग गए। इसी लोकप्रियता के चलते फ़िल्मी सितारों ने भी बिना किसी जांच-परख के इसकी बिक्री में अपना योगदान दे डाला। अपने-आप को बाज़ार की गला-काट प्रतिस्पर्धा में बनाए रखने के लिए वह समय-समय पर तरह-तरह के स्वाद लोगों को पेश करती रही। इसी चक्कर में लोगों की सेहत की आधारभूत बात कहीं गुम होती चली गयी।  जिसके लिए पहली आवाज 2008 में बांग्ला देश में तब उठी जब कंपनी ने टी. वी. पर एक भ्रामक विज्ञापन प्रसारित कर दिया था। जिससे बड़ी मुश्किल से कंपनी को निजात मिल पाई थी । अब 2015 में उत्तर प्रदेश के 'सैम्पल' में लेड धातु और नमक की कई गुना अधिकता ने इसकी लापरवाही फिर उजागर कर दी है। जिसका खामियाजा जगह-जगह से इस पर पाबंदी के रूप में सामने आ रहा है। पर इस जैसी और कंपनियां अभी भी बेधड़क अपने विज्ञापन जारी रखे हुए हैं। उनकी जांच होना भी जरूरी है।                                             

मैगी ने जो भी सफलता पाई वह सिर्फ इसलिए थी कि इससे लोगों को अपने समय को बचाने का थोड़ा समय मिल जाता था। सो इससे होने वाली हानि को जानते-बूझते हुए भी लोग उस पर ध्यान नहीं देते थे। इसीलिए इसकी सफलता से प्रभावित इस जैसे दसियों "प्रोडक्ट" आज बाजार में उपलब्ध हैं। उसके साथ ही कई ऐसे बड़े रेस्त्रां ने अपनी "चेन" की ऐसी श्रृंखला भारत में स्थापित कर डालीं जिनका लोगों के स्वास्थ्य से कोई सरोकार नहीं है बस अपने "इंस्टैंट" स्वरुप और तीखे चटक मसालेदार स्वाद के कारण वे लोकप्रिय बने हुए हैं। जो हानिप्रद होते हुए भी बच्चों पर अपनी पकड़ बना चुके हैं।

अब यह तो अभिभावकों का फर्ज है कि वे अपने बच्चों को सही और गलत का भेद समझा उनको अपने स्वास्थ्य से खिलवाड़ न करने दें। पर क्या यह संभव है जबकि खुद अपने आप को  "माडर्न" दिखाने और समझने वाले अभिभावक ही उस स्वाद के शिकंजे में जकड़े हुए हों !!!

8 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (06-06-2015) को "विश्व पर्यावरण दिवस" (चर्चा अंक-1998) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
विश्व पर्यावरण दिवस की
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

Jitendra tayal ने कहा…

सटीक

Jitendra tayal ने कहा…

सटीक

ब्लॉग बुलेटिन ने कहा…


ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, आज विश्व पर्यावरण दिवस है - ब्लॉग बुलेटिन , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

महेश कुशवंश ने कहा…

सामयिक विश्लेषणात्मक रचना बधाई

Onkar ने कहा…

सामयिक प्रस्तुति

Kavita Rawat ने कहा…

मैगी तो गयी लेकिन अब कहीं पिज्जा बर्गर का नंबर न आ जाए
क्योंकि ....
पिज्जा बर्गर और चाउमिन!
पेट के दुश्मन है ये तीन!!

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

समय की कमी और जीभ की गुलामी कुछ भी करावा सकती है :-(