शुक्रवार, 10 अक्तूबर 2014

वह सांड को सर के ऊपर उठा कसरत करता था

बढ़ती उम्र के बावजूद उसे अपने शारीरिक बल पर बहुत भरोसा और नाज था। इसी अति-आत्मविश्वास और  ताकत के घमंड के कारण उसे अपनी जान से भी हाथ धोना पड़ा।

सोच के बाहर है कि अपने शारीरिक बल को बढ़ाने के लिए कोई इंसान एक सांड को अपने सर के ऊपर उठा कर कसरत करता होगा। पर ऐसा हुआ है।  करीब 600 साल ईसा पूर्व, इटली के क्रोटोन में एक बालक का जन्म हुआ।  बचपन में साधारण कद-काठी का  बच्चा ही था।  पर उसकी इच्छा दुनिया का सबसे ताकतवर इंसान बनने की थी।  परंपरागत तरीके की कसरतों से उसका मन नहीं भरता था।  एक दिन उसने अपने घर के पास मार्ग के बीचो-बीच एक नवजात बछड़े को पड़े देखा तो वह उसे उठा किनारे ले गया।  फिर पता नहीं उसे क्या सूझा वह रोज बिना नागा, बिना किसी की परवाह के निश्चित समय पर उस बछड़े को अपने सर के ऊपर उठाने लगा। समय बीतता गया दिन हफ्ते में और हफ्ते महीनों में बदलते गए पर उसने, आंधी हो, तूफान हो, गरमी हो, सर्दी हो, अपना नियम कभी नहीं बदला। उस बालक का नाम था मिलो। 

उधर बछड़ा भी  सांड बन गया था पर मिलो उसे ही उठा कर अपना रियाज पूरा करता था। देखने वाले
जब दांतों तले उंगलियां दबाते थे तो उसे और भी आनंद आता था।उसके शरीर में मानों ताकत का सागर ठाठें मारता था।  अपनी ताकत का प्रदर्शन करना उसका शौक था।  इसके लिए वह अपनी मुट्ठी में एक अनार रख लोगों से उसे छीनने को कहता था पर इसमें कोई सफल नहीं होता था। आश्चर्य की बात तो यह थी कि ताकत से मुट्ठी भींचने के बावजूद कभी फल को नुक्सान नहीं पहुंचता था।  ऐसे ही कभी वह एक तैलीय फर्श पर खड़ा हो अपने को धकेल कर पर करने की चुन्नोती देता था पर इसमें भी कोई उसे हरा नहीं पाता था।  उसके हाथ में इतनी ताकत थी कि वह अपने मुक्के के एक ही प्रहार से अच्छे खासे भैंसे को मार गिराता था।  अपने एक पसंदीदा करतब में वह अपने माथे पर बंधी रस्सी को अपने सर की शिराओं को  फुला कर तोड़ डालने की क्षमता रखता था।  ऐसे महाबली और महान खिलाड़ी ने प्राचीन ओलंपिक खेलों में भी भाग लिया था और एक या दो बार नहीं छह-छह बार विजेता घोषित किया गया था।  अपने चौबीस वर्षीय खेल जीवन में वह कभी भी पराजित नहीं हुआ था।   

कहते हैं कि मिलो ने एक बार महान ग्रीक दार्शनिक और गणितज्ञ पाइथागोरस की जान बचाई थी, जिससे प्रभावित हो पाइथागोरस ने अपनी लड़की की शादी मिलो से करवा दी थी। अपनी ताकत के बलबूते पर उसने अपने देश की सेना में भी जगह बना ली थी और कई युद्धों में भाग लेकर जीत भी दिलवाई थी। 

बढ़ती उम्र के बावजूद उसे अपने शारीरिक बल पर बहुत भरोसा और नाज था। इसी अति-आत्मविश्वास और  ताकत के घमंड के कारण उसे अपनी जान से भी हाथ धोना पड़ा। एक बार घूमते-घूमते मिलो को एक मजबूत वृक्ष दिखाई पड़ा, जिसके तने में दरार पड़ी हुई थी।  मिलो ने उसे उखाड़ने  ली। उसने पेड़ को जड़ से हिला तो दिया पर इस जोर आजमाईश में उसके हाथ बुरी तरह पेड़ की दरार में फस गए और लाख कोशिशों के बाद भी मिलो उन्हें छुड़ा नहीं पाया और उसकी बेबसी का फ़ायदा जंगली जानवरों ने उसे मार कर उठाया।  इस तरह एक विश्व विजेता का दारूण अंत हो गया।       

3 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
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आपकी इस' प्रविष्टि् की चर्चा आज शनिवार (11-10-2014) को पथिक हूँ मैं (चर्चा मंच: 1763) पर भी है !
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सौभाग्य और सुहाग की प्रतीक
करवाचौथ की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

शास्त्री जी, आभार

Lekhika 'Pari M Shlok' ने कहा…

Rochak aalekh ...umdaaa !!