शनिवार, 12 मार्च 2011

मैं कुछ नहीं कहना चाहता !! आप भी कुछ न कहें !!!

एक चौथी-पांचवीं का बच्चा भी जब स्कूल में परीक्षा देने जाता है तो पूरी तैयारी से जाता है। उसे पता होता है कि उसे किस विषय की परीक्षा देनी है और क्या लिखना है।

एक युवक जब नौकरी के लिए साक्षात्कार के लिए जाता है तब वह भी काम से संबंधित हर संभावित विषय की पूरी तैयारी कर घर से निकलता है।

इनकी तो छोड़िए, एक साधारण गृहिणी भी घर का सामान लेने बाहर जाती है तो उसके दिमाग में लेने वाली वस्तुओं और अपने बजट का पूरा खाका बना कर ही चलती है।

पर क्या कहेंगें प्रवर्तन निदेशालय (Enforcement Directorate) के जिम्मेदार अफसरों को जो साठ अरब के करीब के घोटाले का पर्दाफाश करने कोर्ट में साठ रुपये का केस भी ना पेश कर सके। कोर्ट की लताड़ तो मिलनी ही थी।
माननीय जज महोदय ने झुंझलाते हुए उनकी जमानत ना देने की अर्जी पर कहा "आप लोग कोई एक, सिर्फ एक केस तक तो बना नहीं पा सके तो किस बिना पर उसे रिमांड पर रखना चाहते हैं? किस बात की तफ्तीश करना चाहते हैं?

फिर पूरे फिल्मी लहजे में घोड़ों और भू-संपत्ति का विवादित व्यवसायी हसन अली खान, जिस पर इस सदी के सबसे बड़े घोटाले का केस दर्ज है, मुस्कुराते हुए अपनी चमचमाती कार में बैठ ये गया वो गया।
अब अंग्रजों के जमाने के जासूस खोजते रहें फिर से सबूत।

8 टिप्‍पणियां:

पद्म सिंह ने कहा…

हद है !

Udan Tashtari ने कहा…

दुर्भाग्यपूर्ण रवैया.

Learn By Watch ने कहा…

बेबकूफी की हद होती है

नीरज जाट जी ने कहा…

ये लोकतन्त्र है।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

यह अच्छी बात नहीं है!

राज भाटिय़ा ने कहा…

यह इस देश का दुर्भाग्य हे, ओर भारत माता आज इन कपूतो की करतुतो को देख कर कही कोने बेठी रो रही होगी

Chetan Sharma ने कहा…

इतना पैसा। यह व्यवहार। संदेह का धूंआ उठना लाजिमी है।

भारतीय नागरिक - Indian Citizen ने कहा…

अभी तक क्या वह ऐसे ही घूम रहा था...