मंगलवार, 1 जून 2010

तंग आ कर नूरे ने लड़का किडनैप किया, पर :-)

हमारा नूरा जब से दिल्ली घूम कर अपने पिंड़ लौटा है तब से उसे शहर में कुछ करने का कीड़ा काट गया है। गांव के अपने तीनों लंगोटियों के साथ माथा पच्ची करने के बाद वे चारों इस नतीजे पर पहुंचे कि मां-बाप पर बोझ बनने से अच्छा है कि एक बार चल कर किस्मत आजमाई जाए।
हिम्मत है, लगन है, पैसा है, मेहनती हैं, भगवान जरूर सफल करेगा। पर सामने सवाल था कि करेंगे क्या?
अपने नूरा ने बताया कि दिल्ली में इतनी गाड़ियां हैं कि आदमी तो दिखता ही नहीं। गाड़ी पर गाड़ी चढी बैठी है। समझ लो जैसे अपने खेतों में धान की बालियां। अब जैसे इतने बड़े खेत में एक ही पानी का पंप होता है वैसे ही वहां गाड़ियों के लिए दूर-दूर पेट्रोल पंप होते हैं। अरे लाईनें लग जाती हैं, नम्बर नहीं आता। हम पेट्रोल पंप खोलेंगे।
पर लायसेंस कैसे मिलेगा? एक सवाल उछला।
घबड़ाने की बात नहीं है। वहां सिन्धिया हाऊस में मेरे मामाजी रहते हैं। बहुत पहुंच है उनकी, क्या वे इतना सा काम नहीं करवा पायेंगे। जवाब भी साथ-साथ आया।
बात तय हो गयी। चारों चौलंगे पहुंच गये दिल्ली। दौड़ भाग शुरु हुई, पता चला कि स्वतंत्रता सेनानी कोटे में एक पंप का आवंटन बचा है। सारे खुश। पहुंचे इंटरव्यू देने। पूछा गया कि आपके परिवार में किसने स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया था?
नूरे ने जवाब दिया "जनाब, और परिवारों में तो कोई एक ऐसा बंदा होता है जिसने देश के लिए जान कुर्बान की हो। मेरे परिवार में तो ऐसा बंदा खोजा जाता है, जिसने अपनी मातृभूमि के लिए खून ना बहाया हो.......................

फटाफट सारी औपचारिकताएं निपटा दी गयीं और इन चारों भोले बंदों ने जनता के हित को ध्यान में रख ऐसा इंतजाम किया कि इनके काम से रास्ता वगैरह जाम ना हो और पंप खोल दिया गया।
आश्चर्य हफ्ता भर बीत गया पर एक भी ग्राहक नहीं आया।
क्यूं ? क्योंकि भोले बंदों ने पंप पहली मंजिल पर खोला था।

पर जो हिम्मत हार जाए वह नूरा कैसे कहलाए।
उद्यमी बंदों ने सोच विचार कर उसी जगह एक रेस्त्रां का उद्घाटन कर दिया। पर भगवान की मर्जी यह भी ना चला।
अब क्या हुआ था, कि ये पेट्रोल पंप का बोर्ड़ हटाना भूल गये थे। हां बोर्ड़ बदल कर काम किया जा सकता था। पर जिद। जिस काम ने शुरु में ही साथ नहीं दिया वह काम करना ही नहीं। यह जगह ही ठीक नहीं है। ऐसा सोच सब बेच-बाच कर इस बार चारों ने एक सुंदर सी मंहगी गाड़ी खरीदी जिसे टैक्सी के रूप में चला कर पैसा कमाया जा सके। गाड़ी आ गयी पूजा-पाठ कर सड़क पर उतार दी गयी। पर फिर दिन पर दिन बीत गये एक भी सवारी इन्हें नहीं मिली। कारण ? चारों भोले बंदे, दो आगे, दो पीछे बैठ कर ग्राहक ढूंढने निकलते रहे थे।

हद हो गयी। यह शहर शरीफों का साथ ही नहीं देता। ईमानदारी से इतने काम करने चाहे, किसी में भी कामयाबी नहीं मिली। ठीक है हमें भी टेढी ऊंगली से घी निकालना आता है।
अब चारों मित्रों ने गुनाह का रास्ता अख्तियार करने की ठान ली। दूसरे दिन रात को सारा प्लान बना एक लड़के को अगवा किया गया। एकांत में ले जा उससे कहा कि घर जाए और अपने बाप से चार लाख रुपये देने को कहे ऐसा ना करने पर तेरी जान ले ली जाएगी यह भी बता देना।
लड़का घर गया, अपने बाप को सारी बात बता दी। लड़के के बाप ने पैसे भी भिजवा दिए।
अरे!!!! ऐसा कैसे भाई?
ऐसा इसलिए क्योंकि लडके का बाप भी तो भोला बंदा ही था ना। :-) :-) :-)

8 टिप्‍पणियां:

मो सम कौन ? ने कहा…

चलो जी, नूरा का भोलापन आखिर काम आ ही गया।
बहुत अच्छे।

ललित शर्मा ने कहा…

हा हा हा
इतने भोले पिंडु बंदे शिकारपुर में ही मिलते हैं।:)

संजय कुमार चौरसिया ने कहा…

BHOLAAPAN BHI HAI BADE KAAM KA

http://sanjaykuamr.blogspot.com/

माधव ने कहा…

ha ha ha ha

दिलीप ने कहा…

ha ha ha

Udan Tashtari ने कहा…

भोले से भोला मिला
दोनों भये निहाल!!



-हा हा!!

Udan Tashtari ने कहा…

भोले से भोला मिला
दोनों भये निहाल!!



-हा हा!!

राज भाटिय़ा ने कहा…

:) मजे दार जी