सोमवार, 20 मार्च 2017

पतंजलि, बढ़ता मुनाफा, घटता सेवाभाव

आपकी फ्रेंचाइजी वाले दुकानदार तो आपकी वस्तुओं पर पांच से दस प्रतिशत की छूट दे देते हैं पर आप अपने "मेगा-स्टोर" पर पांच रुपये भी नहीं छोड़ते, ऊपर से थैले के पैसे और धरवा लेते हो यह कैसा स्वदेशी प्रेम है ? अरे भाई ! यदि कोई आपके यहां से सात-आठ सौ, जो आपके यहां से खरीदारी की मामूली रकम है, का सामान लेता है तो आप उसे एक  15-20 रुपये का थैला भी नहीं दे सकते ?   गजब है !!    

बाबा रामदेव, एक ऐसा नाम जिसने भारतीय जन-मानस की नब्ज समझ अपने #पतंजलि ब्रांड के व्यापार को ऐसी ऊचाइयों की ओर अग्रसर कर दिया जो नित नए मानक बनाते हुए आसमान की बुलंदियों से आँखें चार करने को तत्पर है। स्वामी जी ने बहुत नपे-तुले अंदाज से धीरे-धीरे लोगों के दिलो-दिमाग में पैठ बनाई। उनको
मालुम था कि आम भारतीय बाहर से चाहे कितना भी आधुनिक हो जाए, मन में कहीं ना कहीं वह अभी भी देशज जरूर है। साथ ही ये आकलन भी हो चुका था कि आजकल लोग अपने स्वास्थ्य को लेकर बहुत जागरूक रहने लगे हैं, बहुतों का अंग्रेजी दवाओं से मोहभंग हो चुका है, लोग स्वदेशी के नाम को प्रमुखता देने लगे हैं।  इसी से उन्होंने अपने व्यापार के भविष्य का सही अंदाजा लगा लिया। बहुत सोच-समझ कर रण-नीति तैयार की गयी। प्रतिस्पर्द्धा में वर्षों से जड़ें जमाए सिर्फ विदेशी ही नहीं कई स्वदेशी कंपनियां भी मजबूती से सामने खड़ी थीं। लोगों के मन से उनके उत्पादनों से मोहभंग करना और योग गुरु द्वारा बनाई वस्तुओं के प्रति आकर्षण उपजाना बहुत कठिन काम था, पर नामुमकिन नहीं। सबसे पहले टी. वी. पर, फिर चुने हुए शहरों में, फिर देश भर में कक्षाएं लगा कर स्वस्थ रहने के नुस्खे सुझाए गए, योग की महत्ता समझाई गयी, स्वदेशी को अपनाने का आह्वान किया गया। इसके साथ ही रोजमर्रा की कुछ गिनी-चुनी आवश्यक वस्तुओं को बाजार में प्रयोग के तौर पर प्रस्तुत भी कर दिया गया। लोगों ने उन्हें हाथों-हाथ लिया, इससे जाहिर है हौसला अफजाई तो होनी ही थी। सो अब व्यापक रूप से लोगों को विदेशी चीजों द्वारा होने वाले देश और जनता के नुक्सान को मुद्दा बनाने के साथ-साथ बाजार में #पतंजलि उत्पादों की बाढ़ ला दी गयी। फ्रेंचाइजी की जगह अपनी दुकानें खुलने
लगीं फिर उनको स्टोर और फिर मेगा-स्टोर में बदलने का काम शुरू हो गया। कमाई ने सारे रेकॉर्ड तोड़ दिए, स्थापित ब्रांडों की ऐसी-की-तैसी होने लगी। पढने-दिखने-सुनने वाले हर मीडिया पर बाबा रामदेव के सहारे पतंजलि छा गया। हम जैसे लोगों को अच्छा लगाने लगा कि अब विदेशी कंपनियों को नानी याद आएगी और नहीं तो कम से कम उचित मूल्य में सही सामान  मिलेगा !

मेरे जैसे बहुत से लोग विदेशी पर स्वदेशी को हावी होने देने की चाह में इस संस्थान से इसके शैशवास्था से ही जुड़े हुए थे। शुरू-शुरू में जब लोग इनकी वस्तुओं पर संशय जाहिर करते थे तो उन्हें अपना उदाहरण दे इन चीजों का प्रयोग करने को उत्साहित करते थे। पता नहीं कितने विदेशी मुरीदों को इस संस्था से जोड़ने के लिए क्या-क्या कहा, किया गया। पर अब आहिस्ता-आहिस्ता यह बात हम सब के दिलों में घर करने लगी है कि कहीं आँख मूँद कर स्वामी जी का अनुसरण कर बेवकूफी तो नहीं कर रहे। इनके प्राकृतिक, शुद्ध, स्वदेशी के चक्कर में भावनात्मक रूप से लुट तो नहीं रहे। इसका कारण भी सामने है। इनके बहुत सारे उत्पाद आर्डर दे कर दूसरी जगह तैयार किए जाते हैं, उनकी प्रमाणिकता का आकलन सही ढंग से होता भी है कि नहीं ? जितनी भारी संख्या में प्राकृतिक जड़ी-बूटियां बाज़ार में उपलब्ध हैं उतनी खुद प्रकृति भी
उपजा पाती है या नहीं ? सबसे बड़ी और अहम बात यदि संस्था को भारत और उसकी जनता से इतना ही लगाव है तो हर चीज इतनी मंहगी क्यों, कि उसे एक गरीब आदमी छू भी ना सके ? क्या बाबाजी या उनके सहयोगियों ने कभी सर्वे किया है कि उनकी औषधियां कितने सर्वहारा तक पहुँच पाती हैं ? क्या फर्क है इनकी स्वदेशी और दूसरों की विदेशी में जबकी दोनों का उद्देश्य तो एक ही रहा........सिर्फ उपार्जन !!!

अब लोग तरह-तरह के सवाल भी उठाने लगे हैं। किसी भी दूसरी दूकान में आप जाएं, सौदा-सुल्फ लेने के बाद वह दुकानदार कोई झोला-थैली आपको जरूर उपलब्ध करवाता है। जिससे आपको अपना  में आसानी रहे। कहीं-कहीं तो ज्यादा सामान को घर तक पहुंचाने की व्यवस्था भी है। पर #पतंजलि मेगा स्टोर में यदि आप थैला लेंगें तो उसके 25/- अलग से लिए जाते हैं। अब कोई पूछे कि आपकी फ्रेंचाइजी वाले दुकानदार तो आपकी वस्तुओं पर पांच से दस प्रतिशत की छूट दे देते हैं पर आप अपने मेगा-स्टोर पर पांच रुपये भी नहीं छोड़ते, ऊपर से थैले के पैसे और धरवा लेते हो यह कैसा स्वदेशी प्रेम है ? अरे भाई ! यदि कोई आपके यहां से सात-आठ सौ, जो आपके यहां से खरीदारी की मामूली रकम है, का सामान लेता है तो आप उसे एक  20-25 रुपये का थैला भी नहीं दे सकते ?  तो अब क्या धारणा बने लोगों की ?

मंगलवार, 14 मार्च 2017

कुछ वाकये सहसा पुरानी कहानिया याद दिला देते है, जैसे हंस और कौवा

सपनों को पूरा करने में कोई बुराई नहीं है। पर उसके लिए अपनी तैयारी, अपनी क्षमता, अपनी औकात का एहसास होना बहुत जरुरी है। सिर्फ किसी को नीचा दिखाने के लिए ईर्ष्या या द्वेष की भावना से उठाया गया कदम कहीं का भी नहीं छोड़ता...... 

बचपन मे सुनी-पढ़ी कहानियां सदा ही सीख से भरी होती थीं। वे कभी भी अप्रसांगिक नहीं हुईँ । कारण भी है उन्हें यूं ही नहीं गढ़ दिया गया था।  उनमें अनुभवों का निचोड़ होता था। ऐसी ही एक कहानी है हंस और कौवे की।

एक बार कुछ हंसों का दल कहीं से उड़ता हुआ आया और अपने गंतव्य पर जाने के पहले एक वृक्ष पर अपनी थकान मिटाने के लिए उतर गया। वहीँ पर एक कौवा भी बैठा उनको आते हुए देख रहा था।  उसने बिना यह जाने कि वे कितनी दूर से आ रहे हैं, कहाँ जा रहे हैं, उनका मजाक उड़ाते हुए कहा कि तुम लोग एक ही तरह से धीमे-धीमे पंख हिला कर उड़ते हो, फिर भी बड़ी जल्दी थक जाते हो ! मुझे देखो मैं पचीसों तरह की कलाबाजियों के साथ तेज उड़ान भरने के बावजूद तरोताजा रहता हूँ। कभी निढाल नहीं होता।  हंसों के सरदार ने उसे समझाया कि तुम एक सिमित दायरे में रहने वाले पक्षी हो तुम्हें ज्यादा उड़ना नहीं पड़ता और अपनी हैसियत से ज्यादा कोशिश करनी भी नहीं चाहिए। पर हमें दूर-दूर तक उड़ान भरनी होती है, इसीलिए प्रकृति ने हमें उसी के अनुसार क्षमता व् पंख दिए हैं, यदि हम भी करतब दिखाने लगें तो अपने गंतव्य तक कभी भी नहीं पहुँच पाएंगे। पर नासमझ, घमंडी कौवा हंसों को नीचा दिखाने और अपने को श्रेष्ठ साबित करने पर तुला रहा। हंसों ने उसका जवाब ना देते हुए कुछ समय बाद फिर अपनी यात्रा शुरू कर दी। उनको जाते देख कौवा भी उनकी उड़ान का मजाक बनाते हुए और अपने कौशल के प्रदर्शन की नादानी दिखाते हुए उनके पीछे  लग गया। कुछ ही समय बाद वे लोग उड़ते हुए जमीनी हद को छोड़ समुद्र के ऊपर पहुँच गए। कौवा ना कभी लगातार इतना उड़ा था ना ही इतनी दूर आया था, परिणामस्वरूप उस पर इतनी थकान हावी हो गयी कि उसे लगने लगा कि वह कभी भी नीचे पानी में गिर कर अपनी जान गंवा सकता था। मौत को सामने देख उसकी सारी हेकड़ी गायब हो गयी,  उसने हंसों से अपने प्राण बचाने की गुहार लगाईं। उसकी दशा देख हंसों को उस पर दया आ गयी और उन सब ने मिल कर किसी तरह उसको वापस उसके क्षेत्र में पहुंचा दिया।  

सपनों को पूरा करने में कोई बुराई नहीं है। पर उसके लिए अपनी तैयारी, अपनी क्षमता, अपनी औकात का एहसास होना बहुत जरुरी है। सिर्फ किसी को नीचा दिखाने के लिए ईर्ष्या या द्वेष की भावना से उठाया गया कदम कहीं का भी नहीं छोड़ता।   

गुरुवार, 9 मार्च 2017

हांडी में पकते चावल के एक दाने से अंदाज

लोगों का कहना है कि ये राजनीती वाले बहुत सक्षम और चतुर होते हैं। कांग्रेस पार्टी को अपने हश्र का अंदाज कुछ ही दिनों में लग गया था इसीलिए कोई भी बड़ा नेता प्रचार में नहीं आया एक-दो जगह प्रियंका को भेज उसे भी वापस बुला  लिया गया क्योंकि नतीजों से ख्याति पर असर पड़ता है। राहुल के बारे में आम ख्याल है कि उनको बलि का बकरा बना देती है पार्टी

पिछले दिनों दो बार दिल्ली से लगे उत्तर प्रदेश के दो अलग-अलग इलाकों में जाने का मौका मिला था। चुनावों का समय था तो लगे हाथ कुछ लोगों से उसके परिणाम की जानकारी कुतुहल-वश लेने से खुद को रोका नहीं जा सका। इसे किसी भविष्यवाणी के लिए तो करना नहीं था फिर भी इतना ध्यान जरूर रखा था कि लोग अलग-अलग तबके, उम्र और परिवेश से हों। इस सारे क्रिया-कलाप को ऐसे ही छोड़ दिया था पर जब रोज टी.वी. के चैनलों पर लुटे-पिटे दलों द्वारा भी बढ़-चढ़ कर दावे पेश होते देखे तो सोचा अपनी मेहनत को भी ब्लॉग पर उजागर करते बनता है। भले ही कम ही लोगों से बात-चीत हुई पर कहते हैं ना कि हांडी में पकते चावलों के एक ही दाने से आभास मिल जाता है, पर इसके साथ ही यह भी सच है कि ठेठ यू. पी. और इधर गाजियाबाद, शालीमार गार्डन या नोयडा में जमीन-आसमान का फर्क है फिर भी यहां जो जवाब मिले वे बहुत रोचक थे।

अधिकतर का कहना था कि स्पष्ट बहुमत मुश्किल है। बहुतों का यह मानना था कि भाजपा का बर्चस्व बढ़ेगा और आश्चर्य  नहीं होगा यदि उसकी सरकार बन जाए। भाजपा का प्लस-प्वाइंट मोदी जी हैं। करीब पच्चीस साल बाद केंद्र में उनके बहुमत की सरकार आई जिसने कुछ तो आशा जगाई ही है।   उनकी कार्य-शैली, उनकी मेहनत, उनके खुद को खतरे में डाल कर लिए गए निर्णयों से लोग प्रभावित हैं और उन्हें राज्य की बदहाली को दूर करने में सहायक मानते हैं। जनता में इस बात का भी आक्रोश है कि बाकी के दलों के नेता देश-समाज की
भलाई या विकास की बात न कर बात-बेबात सिर्फ मोदी के पीछे पड़े हुए हैं। सपा की "नौटँकी" और उसका कांग्रेस को साथ लेना भाजपा के लिए फायदेमंद होगा। लोगों का कहना कि मौका पाते ही कांग्रेस धत्ता बता जाएगी।  ऐसे लोगों ने जिन्हें अपने इलाके से बाहर जाने की जरुरत नहीं पड़ती, जैसे चायवाला, सब्जीवाला, जूते गांठने वाला आदि उनसे जब विकास के रूप में यमुना हाइवे के बारे में पूछा तो बोले, साहब हमें उससे क्या लेना-देना, वह तो गाडी-घोड़े वालों के लिए है, हमें तो यहां की सडकों से साबका पड़ता है जिस पर ध्यान से ना चलें तो मुंह के बल गिरें.  सायकिल चालकों की सुविधा के लिए बने मार्ग को चुनाव प्रपंच बताया गया क्योंकि इसके पूरा होने क्र पहले ही उसमें टूट-फूट शुरू हो गयी है। सपा के विपरीत जा रही बातों में उनकी आपसी कलह, कुर्सी की चाहत में कांग्रेस से हाथ मिलाना और  नेताजी की बेरुखी रही। फिर भी बहुत से लोगों को अखिलेश भाते हैं। उनका युवा होना, बाहुबलियों-कट्टरपंथियों से दूरी बनाने की कोशिश आम लोगों को हौसला देती है। बसपा को लोग मौका-परस्त पार्टी मानते हैं। उसके वादों पर भी लोगों को भरोसा नहीं रह गया है पर उसका अपना वोट बैंक भी है यह भी मान्यता है। इसलिए उसे छुपा रुस्तम मानते हैं लोग। ये खबरें भी चौंका गयीं थीं कि यू. पी. के बाबूओं ने अचानक बसपा की सरकार में बनी मूर्तियों को साफ कर चमकाना शुरू कर दिया था।  सबसे बुरी हालात कांग्रेस की है। लोगों का कहना है कि ये राजनीती वाले बहुत सक्षम और चतुर होते हैं। कांग्रेस पार्टी को अपने हश्र का अंदाज कुछ ही दिनों में लग गया था इसीलिए कोई भी बड़ा नेता प्रचार में नहीं आया एक-दो जगह प्रियंका को भेज उसे भी वापस बुला  लिया गया क्योंकि नतीजों से ख्याति पर असर पड़ता है। राहुल के बारे में आम ख्याल है की उनको बलि का बकरा बना देती है पार्टी।

तो लब्बो-लुआब यही रहा कि जनता भी कंफ्यूज है पर यदि चावल के एक दाने पर विश्वास करें तो भाजपा की राह प्रशस्त दिख रही है।  

शुक्रवार, 3 मार्च 2017

यहां हरे रंग का गुलाब उपलब्ध है

वैज्ञानिकों और यहां के कर्मचारियों की अथक मेहनत और लगन का ही परिणाम है कि आपको यहां पौधों की ऐसी-ऐसी जातियां-प्रजातियां फलते-फ़ूलते मिलेंगी जिनका आपने या तो नाम ही नहीं सुना होगा या फिर नाम ही सुना होगा। कुछ तो ऐसी भी प्रजातियां हैं जिनके पूर्वज लाखों-लाख साल पहले डायनासॉर्स के जमाने में भी अस्तित्व में थे ....

आजकल लगता है कि शरीर धीरे-धीरे शंटिंग करते, माल गाडी के डिब्बे जैसा होता जा रहा है। इंजिन आ कर धकेल दे तो चलते चले जाओ नहीं तो लाख इच्छा होते हुए भी कहीं जाने का समय यूँ ही टल जाता है।  बहुत दिनों से, यह पढने के बाद कि, दिल्ली से लगे यू. पी. के #नोएडा इलाके में बने #बॉटैनिकलगार्डेन में पौधों की अद्भुत किस्में हैं, वहां जाने की इच्छा थी। पर सीधी मेट्रो होने के बावजूद बस ऐसे ही समय निकलता गया ! पर अब जब मौसम ने कोंचा कि भइया देख लो, हफ्ते-दस दिन के बाद मत कहना कि धूप तेज हो गयी है ! तो बिना इंजिन का इंतजार किए, जी को मना, निकल लिया गया।    

मेट्रो स्टेशन 


मेट्रो के बॉटैनिकल गार्डेन स्टेशन से #बी.जी.आई.आर. यानी BOTANICAL GARDEN OF INDIAN REPUBLIC नामक इस वनस्पति उद्यान का मुख्य द्वार बमुश्किल सौ गज की दूरी पर है। जबकि मेट्रो रेल इसके ऊपर से ही आगे जाती है।


महऋषि चरक प्रतिमा 


नोएडा के सेक्टर "38 A" में करीब 160 एकड़ में फैले इस बाग़ पर 2002 में काम शुरू हुआ था। जो कि इस इलाके के मौसम, जलवायु व परिवेश को देखते हुए एक भागीरथ या दुस्साहसिक प्रयत्न ही कहा जाएगा। वैज्ञानिकों और यहां के कर्मचारियों की अथक मेहनत और लगन का ही परिणाम है कि आपको यहां पौधों की ऐसी-ऐसी जातियां-प्रजातियां फलते-फ़ूलते मिलेंगी जिनका आपने या तो नाम ही नहीं सुना होगा या फिर नाम ही सुना होगा। कुछ तो ऐसी भी प्रजातियां हैं जिनके पूर्वज लाखों-लाख साल पहले डायनासॉर्स के जमाने में भी अस्तित्व में थे  जैसे Skeleton fork,  Bare naked, Horse Tail इत्यादि। 

कल्पवृक्ष
सफ़ेद चंदन का पेड़ 


लाखों साल पहले के फर्न का वंशज, हॉर्स टेल 

कदली पादप 
उद्यान को कई भागों में बाँट कर उसी हिसाब से  संरक्षण, रोपण तथा संवर्धन किया गया है।  जिनमें फल, फूल, औषधि और प्राचीन पौधों की देखभाल-सार-संभाल की जाती है। यहीं यदि बेशकीमती चंदन के पेड़ मिलेंगे तो कल्पवृक्ष जैसा अनमोल और दुर्लभ वृक्ष भी दिखाई देगा, यदि 15 से 20 फुट का केले का पादप दिखेगा तो वर्षों-वर्ष पुरानी वंशावली वाला कैक्टस भी नज़र आ जाएगा। सिर्फ यहीं आपको बिलकुल अंजान, दुर्लभ हरे रंग के गुलाब को देखने का सुयोग भी मिल पाएगा। सही पढ़ा "हरे रंग का गुलाब" ! जिसे पौधों की दुनिया में Rosa Chinensis Viridiflora  के नाम से जाना जाता है। कहते हैं इसकी खोज कोई 300-350 वर्ष पहले हुई थी। इस असाधारण पौधे में पंखुडियों की जगह कली के बाहर हरे रंग की पत्तियों की संरचना होती है। सुंगध भी गुलाब जैसी भीनी न होकर कुछ तीखी होती है।  
हरे गुलाब का पौधा 

जैसा कि मुझे बताया गया यहां तकरीबन 250 ऐसे औषधीय पौधों पर अन्वेषण किया 
जा रहा है  जिनका उल्लेख हमारे प्राचीन ग्रन्थों में मिलता हैं और इनसे मनुष्य की करीब आठ श्रेणियों की बिमारियों को ठीक करने में सहायता मिल सकती है। फिलहाल पूरे देश से तरह-तरह के सैकड़ों जातियों-प्रजातियों के पौधे यहां ला उन्हें रोपित कर उनकी देख-भाल की जा रही है और भविष्य में एक वृहदाकार मानव देह का खाका बना, उसके हर अंग में वहां होने वाली बिमारी को ठीक करने वाले पौधे लगाए जाएंगे जिससे लोगों का ज्ञान बढ़ सके।  कुछ ऐसा ही उद्यान से अंदर  आते ही कुछ दूरी पर भारत का 68' x 61.4'  का एक नक्शा बनाया गया है जिसमें हर प्रदेश को विभिन्न रंग के पौधों से अलग-अलग दर्शाया गया है। पर एक कमी रह गयी है कि उसकी स्थिति और बनावट की वजह से उसकी तस्वीर आसानी से नहीं खींची जा सकती।  


  उद्यान के ऑफिस से प्राप्त पौधों द्वारा बनाया गया नक्शा 



उस दिन धूप तो तेज थी ही वहां कोई सेमीनार भी चल रहा था, जिससे किसी जानकार का साथ नहीं मिल पा रहा था, गार्डों की जानकारी भी सिमित थी। बीते ठंड के मौसम के कारण पूरे उद्यान में जैसे सूखा पसरा पड़ा था पर मुख्य भाग को बड़े जतन से सँभाला जा रहा है यह साफ़ दिखलाई पड़ रहा था। कुछ देर बाद वहीँ के एक सज्जन श्री मानवर सिंह ने वहां के प्रमुख "केयर टेकर" श्री राजपाल सिंह से मिलवाया जिन्होंने घूम-घूम कर तरह-तरह के पौधों की जानकारी से अवगत करवाया। उनका तहे-दिल से शुक्रगुजार हूँ।  

देश के अन्य पुराने वनस्पति उद्यानो से तो अभी इसकी तुलना नहीं की जा सकती क्योंकि यह बाग़ अभी अपने शैशव काल में ही है, जिसे विकसित होने में दसियों वर्षों का सहयोग चाहिए होगा। उस पर विपरीत जलवायू भी इसकी बढ़त में कहीं ना कहीं अड़चन तो डालेगी ही पर यहां कार्यरत समर्पित कर्मचारी-गण हर परिस्थिति का सामना करने को तत्पर  दिखते हैं जिससे साफ़ मालुम पड़ता है कि आने वाले समय में यह उद्यान अपने-आप में एक खासियत होगा।   

शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2017

सिनेमा घरों में राष्ट्रगान

बात सम्मान की है, यदि कोई जबरदस्ती खड़ा हो भी जाता है पर उसका ध्यान कहीं और होता है तो उसका क्या फ़ायदा ! अभी दो दिन पहले फिल्म देखने जाना हुआ था, शुरू होने के पहले जब राष्ट्रगान बजा तो सब खड़े तो हुए पर दसियों लोग अपने मोबाइल में ही उलझे दिखे। मेरी सामने वाली कतार में भी एक युवक अपने मोबाइल पर झुका हुआ था, गान के दौरान तो मैंने उससे कुछ न कहा, उचित भी नहीं था, पर गान ख़त्म होने पर रहा नहीं गया और सिर्फ यही कहा कि सिर्फ 52 सेकेंड की अवधि का ही होता है नेशनल सांग....

अपने यहां तर्क-वितर्क बहुत होते हैं। हर आदमी हर चीज का विशेषज्ञ बना हुआ है। कोई भी बात हो उसमें कमी खोजना फैशन बन गया है। आए दिन एक विवाद ख़त्म होता नहीं दूसरा शुरू हो जाता है। नयी बहस सिनेमा हॉलों में फिल्म शुरू होने के पहले राष्ट्रध्वज दिखलाने के साथ-साथ राष्ट्रगान बजाते समय उत्पन्न होने वाली परिस्थितियों पर  कर हुई है। जिस दिन न्यायालय ने सिनेमाघरों में फिल्म के पहले राष्ट्रगान बजाने का नियम लागू किया उसी दिन से कुछ लोगों में असमंजस की स्थिति बन गयी। कुछ जगह इस बात को ले लोगों
में विवाद हो गया कि कहानी के अनुसार यदि फिल्म में राष्ट्रध्वज और गान हो तो खड़े होना है कि नहीं ! बात बढ़ते देख न्यायालय ने फिर आदेश पारित किया कि फिल्म के बीच में बजने वाले गान के दौरान खड़ा होना जरुरी नहीं है। पर बात यहां ख़त्म नहीं हुई हमारे कुछ ज्यादा पढ़े-लिखे लोगों ने, जिनमें सिनेमा घरों के मैनेजर तक हैं, फिल्म के बीच का अर्थ निकाल लिया कि अब राष्ट्र गान मध्यांतर के समय बजेगा ! उन्होंने आपत्ति दर्ज कर दी कि उस समय लोग कुछ खा-पी रहे होते हैं और हॉल के डिलीवरी बॉय भी कुछ न कुछ वितरित करते रहते हैं, इससे फिर अव्यवस्था फ़ैलाने की पूरी गुंजाइश हो सकती है। बिना सोचे-समझे, बिना पूरी जानकारी हासिल किए कुछ भी समझ कर कुछ भी बोल देना हमारी आदत में शुमार हो चुका है। इसमें देश का हर वर्ग शामिल है। 

कुछ वर्षों पहले ऐसे ही फिल्म के खत्म होने पर राष्ट्रगान बजाया जाता था। जिसे लोग अनमने ढंग से सुनते थे। दरवाजों तक आ पहुंचे बाहर निकलने को आतुर दर्शकों को द्वार बंद कर एक तरह से जबरदस्ती गान सुनवाया जाता था। फिर अनचाही परिस्थितियों के कारण उसे बंद कर दिया गया। अब फिर एक आदमी की याचिका पर इसे शुरू किया गया है।

इंसान की फ़ितरत है कि बिना मजबूरी के, वह किसी के कहने या थोपे गए आदेश के चलते, सहज नहीं रहता, जैसे कि अपनी मर्जी से भले ही वह एक जगह घण्टों बैठा रहे पर किसी के कहने पर वह दस मिनट में ही ऊब जाता है। वैसा ही हाल राष्ट्रगान के बजाने का है।  पर क्या किसी में जबरदस्ती राष्ट्र-प्रेम की भावना भरी जा सकती है। यह नहीं कहा सकता कि गान के दौरान खड़ा ना होने वाला वाला इंसान देश विरोधी है पर उसके ऐसा करने पर माहौल तो असहज हो ही जाता है।  

बात सम्मान की है, यदि कोई जबरदस्ती खड़ा हो भी जाता है पर उसका ध्यान कहीं और होता है तो उसका क्या फ़ायदा ! अभी दो दिन पहले फिल्म देखने जाना हुआ था, शुरू होने के पहले जब राष्ट्रगान बजा तो सब खड़े तो हुए पर दसियों लोग अपने मोबाइल में ही उलझे दिखे। मेरी सामने वाली कतार में भी एक युवक अपने मोबाइल पर झुका हुआ था, गान के दौरान तो मैंने उससे कुछ न कहा, उचित भी नहीं था, पर गान ख़त्म होने पर रहा नहीं गया और सिर्फ यही कहा कि सिर्फ 52 सेकेंड की अवधि का होता है नेशनल सांग, उसने तो बात  समझ कर सॉरी कहा, पर सवाल वही रहा कि क्या जबरदस्ती खड़ा करवा कर किसी से सम्मान करवाया जा सकता है ? वह तो दिल से होना चाहिए !  इन सब को मद्दे नज़र रख क्या राष्ट्रगान को सिनेमा हॉल में दिखाए जाने वाले नियम पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए ?

बुधवार, 15 फ़रवरी 2017

इतने अपशब्द तो महाभारत में भी नहीं बोले गए होंगे

हमारे देश में अनेकों भाषाएं बोली जाती हैं। सब का अलग-अलग लहजा और उच्चारण हैं। इसी कारण लाखों लोग अभी भी शुद्ध हिंदी नहीं बोल पाते हैं। उनका तो हम बुरा नहीं मानते। कहना तो नहीं चाहिए पर हमारे कुछ राष्ट्रपति भी कहां साफ़ हिंदी बोल पाते थे। अभी भी कई  कलाकार हैं जिन्होंने जिंदगी फिल्मों में गुजारने के बावजूद भाषा पर काबू नहीं पाया है। पर उनकी फिल्मों का ना कोई बायकॉट हुआ नाहीं उनका विरोध किया गया....

लगता नहीं, कि हमें बोलने की कुछ ज्यादा ही आजादी मिल गयी है। ख़ासकर इस चुनावी माहौल में तो हर हद पार कर दी गयी है। हर मर्यादा तोड़ दी गयी है। नाहीं किसी की उम्र का लिहाज बचा है नाहीं किसी पद की गरिमा। महिलाओं तक की बेइज्जती करने से ये तथाकथित नेता बाज नहीं आए !!!

आजादी के बाद काफी लंबे  समय तक नेताओं ने अपनी गरिमा बनाए रखी, एक दूसरे का मान-सम्मान  करते रहे। एक दूसरे अच्छाइयों की कदर की जाती रही। पर धीरे-धीरे धर्म-जाति-परिवारवाद का समीकरण रंग लाने लगा। राज्यों में येन-केन-प्रकारेण सत्ता का वरण करने के लिए, उल्टे-सीधे, मर्यादाहीन, उसूल विहीन, क्षणभंगुर गठबंधनों का चलन शुरू हो गया। जाहिर है यह मौका बन गया, स्तरहीन, अशिक्षित, असमाजिक तत्वों  का अपने बाहुबल, जातिबल, परिवारबल, संपर्कबल, धनबल के सहारे संकरी गलियों से होते हुए राजनीती में प्रवेश करने का। राज्यों की राजनीती केंद्र में भी पहुंचनी ही थी जिसके साथ ही अनियंत्रित भाषा और आचरण ने भी वहां स्थान बना, आरक्षण प्राप्त कर लिया।

नैतिकता को परछत्ती पर फेंक, किसी की अच्छाई की ओर ना ताकने की कसम खा, शुरू हो गया खोज-खोज कर एक-दूसरे की जानी-अनजानी, कमियों-विफलताओं-दोषों को बढ़ा-चढ़ा, घुमा-फिरा कर उजागर कर जनता के सामने उसकी छवि धूमिल करने का दौर !  किसी को विदेशी बता उसका अपमान किया जाने लगा, किसी की भाषा का मजाक बनाया जाने लगा, किसी के हाव-भाव की खिल्ली उड़ाई जाने लगी, किसी की पारिवारिक स्थिति की सरेआम तौहीन की जाने लगी तो किसी के भूतपूर्व पेशे को ही बहस का मुद्दा बना दिया गया। अब जिस पर हमला हुआ उसके चाटुकारों, चापलूसों ने भी उसका उसी रूप में जवाब दे-दे कर वातावरण में कडुवाहट घोलने से परहेज नहीं किया। सहनशीलता, सहिष्णुता, क्षमाशीलता सब तिरोहित हो गयीं।

हिंदीं को कमोबेश राष्ट्रभाषा का दर्जा मिल ही गया है। पर हमारे देश में अनेकों भाषाएं बोली जाती हैं। सब का अलग-अलग लहजा और उच्चारण हैं। इसी कारण लाखों लोग अभी भी शुद्ध हिंदी नहीं बोल पाते हैं। उनका तो हम बुरा नहीं मानते। कहना तो नहीं चाहिए पर हमारे कुछ राष्ट्रपति भी कहां साफ़ हिंदी बोल पाते थे। अभी भी कई  कलाकार हैं जिन्होंने जिंदगी फिल्मों में गुजारने के बावजूद भाषा पर काबू नहीं पाया है। पर उनकी फिल्मों का ना कोई बायकॉट हुआ नाहीं उनका विरोध किया गया। ऐसे ही किसी की सभा में हुई अफरा-तफरी को मजाक का विषय बनाने में किसी को झिझक नहीं हुई। खुद ऐसे लोग जो जिम्मेदारी के बावजूद किसी ना किसी बहाने अपना राज्य छोड़ दूर-दराज के प्रदेश में छुट्टियां मनाने में नहीं शर्माते, वही विरोधी दल के किसी सदस्य, जिस पर कोई बोझ भी नहीं है, की विदेश यात्रा को गुनाह का रूप देते नहीं हिचकते !

इसी संदर्भ में कम से कम उन तीन बातों का जिक्र जरुरी है जिनका प्रयोग लाक्षणिक रूप से हुआ था। पहली कुछ रकम का लोगों की जेब में आने का जिक्र था जिसका मंतव्य था कि यदि बाहर से सारा धन आ जाए तो इतनी-इतनी रकम हर आदमी के हिस्से आ सकती है इस बात का बतंगड़ बना यह प्रचार होने लगा कि उतनी रकम देने का वादा किया गया था। इसी को नाकामियों का मुद्दा बना दिया गया !  दूसरी बात अपने देश की हर एक प्राणी के प्रति लगाव रखने की थी; कि यदि कुत्ते का बच्चा भी गाडी से कुचल जाए तो हमें तकलीफ होती है इस बात का भी गलत अर्थ लगा लोगों की भावनाओं को भड़काने की कोशिश की जाने लगी। तीसरी स्नानागार से ताल्लुक रखने वाली बात का भी बतंगड़ बना जनता को भरमाने की कुत्सित चेष्टा शुरू कर दी गयी। जबकि असलियत बच्चे-बच्चे को पता है !!

वैसे ही कुछ लोग सिर्फ विरोध करने के लिए ही विरोध करते हुए एक ही जगह लक्ष्य साध अपनी दूकान चलाने में प्रयासरत हैं। कुछ लोग जान-बूझ कर कुछ ख़ास मौकों पर, जैसे अभी चुनाव के माहौल में तनाव पैदा करने वाले विवादास्पद बयान दे सुर्ख़ियों में बने रहना चाहते हैं। इन सब को देखना-समझना चाहिए कि कुछ लोग कुछ देर के लिए ही सब को बेवकूफ बना सकते हैं, सदा के लिए नहीं। अधिकतम लोग समझदार हैं जो इनकी बातों को सुनते तो हैं पर अपना काम सोच-समझ कर करते हैं पर अधिकांश अभी भी अशिक्षा और जागरूकता की कमी के कारण जाति-धर्म के साथ-साथ मुफ्त की चीजों के चक्कर में पड़ अपने हाथ कटवा बैठते हैं। इन्हीं की बदौलत अवसरवादी अपना खेल, खेल जाते हैं। यह कहना भी गलत नहीं होगा कि अधिकाँश जनता की बदहाली ऐसे ही कारण है क्योंकि ये लोग जानते हैं कि जिस दिन अवाम शिक्षित हो गया वही दिन इनकी आकांक्षाओं का अंतिम दिन होगा।

वैसे भी इतिहास गवाह है कि जब-जब एक ही आदमी को लक्ष्य कर उसको बदनाम करने की कोशिश की गयी है, तब-तब उसी खास इंसान को जनता की सहानुभूति मिली है। दलों का राजनितिक मतभेद हो सकता है, होना भी चाहिए पर व्यक्तिगत आक्षेप करना कतई स्वागत योग्य नहीं है।  

मंगलवार, 14 फ़रवरी 2017

वेलेंटाइन दिवस पर वह कहानी, जो प्रेम की पराकाष्ठा है

पहली बार बचपन में जब "उसने कहा था" कहानी को पढने और फिल्म देखने का मौका मिला तो ना कुछ महसूस हुआ नाहीं उसकी गहराई समझ में आई थी, सब सर के ऊपर से गुजर गया था। पढाई के दौरान इस कहानी के कोर्स में होने के कारण फिर बहुत बार इसे पढने का मौका मिला तब जाकर समझ में आया कि कैसे और क्यूं इस एक कहानी से ही गुलेरीजी अमर हो गये........ 

आज वेलेंटाइन दिवस है। पश्चिम से आयातित इस त्यौहार को बाज़ार ने प्रेम दिवस के रूप में भी खूब प्रचारित किया है । जिसने भारतीय युवाओं को भी खूब लुभाया है। सब इसे अपने-अपने अर्थ लगा, अपनी-अपनी समझ के अनुसार, अपने-अपने तरीके से मनाने की होड़ या कोशिश करते हैं। पर कितनों में अपने प्रिय के प्रति सच्चे प्रेम या त्याग की भावना रहती है ?   

वर्षों पहले श्री चंद्रधर शर्मा गुलेरीजी की अमर कहानी "उसने कहा था" उसी प्रेम की पवित्रता और गहराई के कारण खुद और अपने लेखक को अमर कर गयी है। पहली बार बचपन में जब "उसने कहा था" कहानी को पढा और फिर फिल्म भी देखी तो ना कुछ महसूस हुआ था नाहीं उसकी गहराई समझ में आई थी, सब सर के ऊपर से गुजर गया था। पढाई के दौरान इस कहानी के कोर्स में होने के कारण फिर बहुत बार इसे पढने का मौका मिला तब जाकर समझ में आया कि कैसे और क्यूं इस एक कहानी से ही गुलेरीजी अमर हो गये। लगता नहीं कि आज के अधिकांश युवा इससे परीचित होंगे। पहले तो कोर्स वगैरह में भी यह होती थी। पर धीरे-धीरे सब कुछ बदल ही तो रहा है। इस अमर कहानी का सार देने की कोशिश करता हूं। जो बताती है कि "वेलेंटाइन" कैसा होना चाहिए ।   

अमृतसर में अपने मामा के घर आए दस-ग्यारह साल के लहनासिंह का बाज़ार में अक्सर एक सात-आठ साल की लडकी से सामना हो जाता है। ऐसे ही छेड़-छाड़ के चलते लहना उससे पूछता रहता है "तेरी कुड़माई (सगाई)हो गयी" और लड़की "धत्" कह कर भाग जाती है। पर एक दिन वह बालसुलभ खुशी से जवाब देती है "हां, हो गयी। देखता नहीं मेरा यह रेशमी सालू"।

वह तो चली जाती है, पर लहना पर निराशा छा जाती है। दुख और क्रोध एक साथ हावी हो, बहुतों से लड़वा, भिड़वा, गाली खिलवा कर ही उसे घर पहुंचवाते हैं। पच्चीस साल बीत जाते हैं। फौज में लहना सिंह जमादार हो जाता है। उसका अपनी बटालियन के सूबेदार हज़ारा सिंह के साथ अच्छा दोस्ताना है। एक ही तरफ के रहनेवाले हैं। हज़ारा सिंह का बेटा बोधा सिंह भी इनके साथ उसी मोर्चे पर तैनात है। कुछ दिनों पहले छुट्टियों में ये घर गये थे। तभी पहला विश्वयुद्ध शुरु हो जाता है। सबकी छुट्टियां रद्द हो जाती हैं। हज़ारा सिंह खबर भेजता है, लहना सिंह को
कि मेरे घर आ जाना, साथ ही चलेंगे। लहना वहां पहुंचता है तो सूबेदार कहता है कि सूबेदारनी से मिल ले, वह तुझे जानती है। लहना पहले कभी यहां आया नहीं था, चकित रह जाता है कि वह मुझे कैसे जानती होगी। दरवाजे पर जा मत्था टेकता है। आशीष मिलती है। फिर सूबेदारनी पूछती है "पहचाना नहीं?  मैं तो देखते ही पहचान गयी थी....तेरी कुड़माई हो गयी.......धत्.....अमृतसर"

सब याद आ जाता है लहना को। सूबेदारनी रोने लगती है। बताती है कि चार बच्चों में अकेला बोधा बचा है। अब दोनों लाम पर जा रहे हैं। जैसे तुमने एक बार मुझे तांगे के नीचे आने से बचाया था, वैसे ही इन दोनों की रक्षा करना। तुमसे विनती है।

मोर्चे पर बर्फबारी के बीच बोधा सिंह बिमार पड़ जाता है। खंदक में भी पानी भरने लगता है। लहना किसी तरह बोधे को सूखे में सुलाने की कोशिश करता रहता है। अपने गर्म कपड़े भी बहाने से उसे पहना खुद किसी तरह गुजारा करता है। इसी बीच जर्मन धोखे से हज़ारा सिंह को दूसरी जगह भेज खंदक पर कब्जा करने की कोशिश करते हैं पर लहना सिंह की चतुराई से हज़ारा सिंह की जान और खंदक दोनों बच जाते हैं। पर वह खुद बुरी तरह घायल होने पर भी चिकित्सा के लिये बाप-बेटे को पहले भेज देता है, हज़ारा सिंह से यह कहते हुए कि घर चिठ्ठी लिखो तो सूबेदारनी से कह देना उसने जो कहा था मैने पूरा कर दिया है। उनके जाने के बाद वह अपने प्राण त्याग देता है।

यह तो कहानी का सार है। पर बिना इसे खुद पढे इसकी मार्मिकता नहीं समझी जा सकती।  गुलेरीजी के शब्दों मे ही, अमृतसर के तांगेवालों की चाकू से भी तेज धार की जबान, दोनों बच्चों की चुहल, खंदक की असलियत, लड़ाई की विभीषिका, सूबेदारनी की याचिका, लहना की तुरंत-बुद्धि और फिर धीरे-धीरे करीब आती मौत के साये में स्मृति के उभरते चित्र, वह सब बिना पढे महसूस करना मुश्किल है।

यदि कभी भी मौका मिले तो इसी नाम पर बनी पुरानी फिल्म "उसने कहा था" देखने से ना चूकें।  जिसमें स्व. सुनील दत्त और नंदा जी ने काम किया था।

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