शनिवार, 17 अक्टूबर 2015

M.T.N.L. की बलिहारी, तारे दियो दिखाए

पिछले रविवार को श्रीमती जी को नर्सिंग होम में भर्ती करवाना पड़ा था। लगातार दोस्त-मित्र-रिश्तेदारों के फोन आ रहे थे, मोबाइल भी व्यस्त होना ही था, उपर से इस फर्जी की वही टेढ़ी चाल।  हद तो तब हो गयी जब डाक्टर से बात करते-करते ही ये सुप्तावस्ता में चला गया। किसी तरह बात संभाली। एक बार तो मन बना ही लिया था कि उपभोक्ता फोरम में चला जाए पर फिर … 

दूर के ढोल सुहाने लगते हैं, पता नहीं कितने अनुभवों के बाद किसी ने यह निष्कर्ष निकाला होगा। वर्षों तक #भारत संचार निगम लिमिटेड (B.S.N.L.) को झेलते हुए लगता था कि उसके बड़े भाई #महानगर टेलेफोन निगम लिमिटेड (M.T.N.L.) की कार्य कुशलता प्रभू के प्रसाद की तरह उच्च कोटि की और बेहतर होगी। पर छोटे मियाँ तो छोटे मियाँ, बड़े मियाँ सुभान-अल्ला।       

होता यह है कि दिन भर की भागा-दौड़ी और मोबाइल की सुविधा (?) के कारण घर के अचल फोन की गड़बड़ी पर तब तक ध्यान नहीं जाता जब तक कि कोई बड़ा बखेड़ा ही खड़ा न हो जाए। महीनों से तारों से बंधा यह फोन अपनी मर्जी के मुताबिक़ ही काम कर रहा था। रिसीवर उठाने के बाद भी घंटी घनघनाना, उठाने पर बात कम घड़घड़ाहट ज्यादा सुनाई देना, बात करते-करते कनेक्शन कट जाना रोजमर्रा की बात थी। सामने वाले की अक्सर शिकायत होती थी  कि आप बीच में ही फोन काट देते हो, बुरा भी लगता था कि जरूरी बात पूरी नहीं हो पाती। अपनी गलती न होने की बात बार-बार समझाना भी मुश्किल होता था। पर जैसे शरारती बच्चे के सुधरने की उम्मीद  उसके अभिभावक नहीं छोड़ते वैसे ही हम भी इस सरकारी नकचढ़े से जुड़े रहे।

पिछले रविवार को कुछ तकलीफ के कारण श्रीमती जी को नर्सिंग होम में भर्ती करवाना पड़ा था। लगातार दोस्त-मित्र-रिश्तेदारों के फोन आ रहे थे, मोबाइल भी व्यस्त होना ही था, उपर से इस फर्जी की वही टेढ़ी चाल।  हद तो तब हो गयी जब डाक्टर से बात करते-करते ही ये सुप्तावस्ता में चला गया। किसी तरह बात संभाली। एक बार तो मन बना ही लिया था कि उपभोक्ता फोरम में चला जाए पर फिर … क्योंकि उधर कोई असर नहीं पड़ने वाला, जेब से पैसा लगे तो चिंता होती है। सरकारी पैसे के नुक्सान पर किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता। 

ऐसा नहीं है कि शिकायतें नहीं कीं पर इन्हें ना सुधरना था सो नहीं सुधरे ! उधर जले पर नमक तब पड़ जाता है जब इनसे जुड़े लोगों की कॉल आती है, फोन ठीक हो गया ? आज भी पहले फोन पर ऐसा पूछने और मेरे नहीं कहने पर उधर से फोन रख दिया गया। कुछ देर बाद फिर ऐसा ही पूछा गया तो पूरी बात बताते-बताते लाइन कट गयी। घंटे बाद फिर फोन आया कि फॉल्ट क्या है ? आप तो बीच में ही फोन रख देते हैं, ये सुनते ही आपे को बाहर जाने से जबरन रोका और बताया कि यही फॉल्ट है, देखें अब क्या होता है। संबंधित लोग अपने खटिए के नीचे भी सोंटा घुमाते हैं या सिर्फ निजी कंपनियों पर ही नकेल कस अपनी जिम्मेदारी की इतिश्री समझ लेते हैं। 

मंगलवार, 13 अक्टूबर 2015

महाराज अग्रसेन के जन्मदिवस पर विशेष


अग्रवाल समाज के संस्थापक महाराज अग्रसेन एक क्षत्रिय सूर्यवंशी राजा थे। जिन्होंने प्रजा की भलाई के लिए वणिक धर्म अपना लिया था। इनका जन्म द्वापर युग के अंतिम भाग में महाभारत काल में हुआ था। ये      प्रतापनगर के राजा बल्लभ के ज्येष्ठ पुत्र थे। सुप्रसिद्ध लेखक भारतेंदु हरिश्चंद्रजी, जो खुद भी वैश्य समुदाय से थे, ने 1871 में "अग्रवालों की उत्पत्ति" नामक प्रमाणिक ग्रंथ लिखा है जिसमें विस्तार से इनके बारे में  बताया गया है। इसी में 'अग्रवाल का अर्थ भी समझाया गया है कि अग्रवाल यानी "महाराज अग्रसेन के वंशधर या बच्चे"।          
वर्तमान के अनुसार उनका जन्म आज से करीब 5185 साल पहले हुआ था। उनके राज में कोई दुखी या लाचार नहीं था। बचपन से ही वे अपनी प्रजा में बहुत लोकप्रिय थे। वे एक धार्मिक, शांति दूत, प्रजा वत्सल, हिंसा विरोधी, बली प्रथा को बंद करवाने वाले, करुणानिधि, सब जीवों से प्रेम, स्नेह रखने वाले दयालू राजा थे।

समयानुसार युवावस्था में उन्हें राजा नागराज की कन्या राजकुमारी माधवी के स्वयंवर में शामिल होने का न्योता मिला। उस स्वयंवर में दूर-दूर से अनेकों राजा और राजकुमार आए थे। यहां तक कि देवताओं के राजा इंद्र भी राजकुमारी के सौंदर्य के वशीभूत हो वहां पधारे थे। स्वयंवर में राजकुमारी माधवी ने राजकुमार अग्रसेन के गले में जयमाला डाल दी। यह दो अलग-अलग संप्रदायों, जातियों और संस्कृतियों का मेल था। जहां अग्रसेन सूर्यवंशी थे वहीं माधवी नागवंश की कन्या थीं। पर इस विवाह से इंद्र जलन और गुस्से से आपे से बाहर हो गये और उन्होंने प्रतापनगर में वर्षा का होना रोक दिया। चारों ओर त्राहि-त्राही मच गयी। लोग अकाल मृत्यु का ग्रास बनने लगे। तब महाराज अग्रसेन ने इंद्र के विरुद्ध युद्ध छेड दिया। चूंकि अग्रसेन धर्म-युद्ध लड रहे थे तो उनका पलडा भारी था जिसे देख देवताओं ने नारद ऋषि को मध्यस्थ बना दोनों के बीच सुलह करवा दी।
        
कुछ समय बाद महाराज अग्रसेन ने अपने प्रजा-जनों की खुशहाली के लिए काशी नगरी जा शिवजी की घोर तपस्या की, जिससे शिवजी ने प्रसन्न हो उन्हें माँ लक्ष्मी की तपस्या करने की सलाह दी। माँ लक्ष्मी ने परोपकार हेतु की गयी तपस्या से खुश हो उन्हें दर्शन दिए और कहा कि अपना एक नया राज्य बनाएं और वैश्य परम्परा के अनुसार अपना व्यवसाय करें तो उन्हें तथा उनके लोगों या अनुयायियों को कभी भी किसी चीज की कमी नहीं होगी।
  
अपने नये राज्य की स्थापना के लिए महाराज अग्रसेन ने अपनी रानी माधवी के साथ सारे भारतवर्ष का भ्रमण किया। इसी दौरान उन्हें एक जगह शेर तथा भेडिये के बच्चे एक साथ खेलते मिले। उन्हें लगा कि यह दैवीय संदेश है जो इस वीरभूमि पर उन्हें राज्य स्थापित करने का संकेत दे रहा है। वह जगह आज के हरियाणा के हिसार के पास थी। उसका नाम अग्रोहा रखा गया। आज भी यह स्थान अग्रवाल समाज के लिए तीर्थ के समान है। यहां महाराज अग्रसेन और माँ वैष्णव देवी का भव्य मंदिर है।

महाराज अग्रसेन के राजकाल में अग्रोहा ने दिन दूनी- रात चौगुनी तरक्की की। कहते हैं कि इसकी चरम स्मृद्धि के समय वहां लाखों व्यापारी रहा करते थे। वहां आने वाले नवागत परिवार को राज्य में बसने वाले परिवार सहायता के तौर पर एक रुपया और एक ईंट भेंट करते थे, इस तरह उस नवागत को लाखों रुपये और ईंटें अपने को स्थापित करने हेतु प्राप्त हो जाती थीं जिससे वह चिंता रहित हो अपना व्यापार शुरु कर लेता था।    

महाराज ने अपने राज्य को 18 गणों में विभाजित कर अपने 18 पुत्रों को सौंप उनके 18 गुरुओं के नाम पर 18 गोत्रों की स्थापना की थी। हर गोत्र अलग होने के बावजूद वे सब एक ही परिवार के अंग बने रहे। इसी कारण अग्रोहा भी सर्वंगिण उन्नति कर सका। राज्य के उन्हीं 18 गणों से एक-एक प्रतिनिधि लेकर उन्होंने लोकतांत्रिक राज्य की स्थापना की, जिसका स्वरूप आज भी हमें भारतीय लोकतंत्र के रूप में दिखाई पडता है।

उन्होंने परिश्रम और उद्योग से धनोपार्जन के साथ-साथ उसका समान वितरण और आय से कम खर्च करने पर बल दिया। जहां एक ओर वैश्य जाति को व्यवसाय का प्रतीक तराजू प्रदान किया वहीं दूसरी ओर आत्म-रक्षा के लिए शस्त्रों के उपयोग की शिक्षा पर भी बल दिया।   

उस समय यज्ञ करना समृद्धि, वैभव और खुशहाली की निशानी माना जाता था। महाराज अग्रसेन ने बहुत सारे यज्ञ किए। एक बार यज्ञ में बली के लिए लाए गये घोडे को बहुत बेचैन और डरा हुआ पा उन्हें विचार आया कि ऐसी समृद्धि का क्या फायदा जो मूक पशुओं के खून से सराबोर हो। उसी समय उन्होंने अपने मंत्रियों के ना चाहने पर भी पशू बली पर रोक लगा दी। इसीलिए आज भी अग्रवाल समाज हिंसा से दूर ही रहता है। अपनी जिंदगी के अंतिम समय में महाराज ने अपने ज्येष्ट पुत्र विभू को सारी जिम्मेदारी सौंप कर वानप्रस्थ आश्रम अपना लिया।

महाराज अग्रसेन के राज की वैभवता से उनके पडोसी राजा बहुत जलते थे। इसलिए वे बार-बार अग्रोहा पर आक्रमण करते रहते थे। बार-बार मुंहकी खाने के बावजूद उनके कारण राज्य में तनाव बना ही रहता था। इन युद्धों के कारण अग्रसेनजी के प्रजा की भलाई के कामों में विघ्न पडता रहता था। लोग भी भयभीत और रोज-रोज की लडाई से त्रस्त हो गये थे।  इसी के साथ-साथ एक बार अग्रोहा में बडी भीषण आग लगी। उस पर किसी भी तरह काबू ना पाया जा सका। उस अग्निकांड से हजारों लोग बेघरबार हो गये और जीविका की तलाश में भारत के विभिन्न प्रदेशों में जा बसे।  पर उन्होंने अपनी पहचान नहीं छोडी।  वे सब आज भी अग्रवाल ही कहलवाना पसंद करते हैं और उसी 18 गोत्रों से अपनी पहचान बनाए हुए हैं। आज भी वे सब महाराज अग्रसेन द्वारा निर्देशित मार्ग का अनुसरण कर समाज की सेवा में लगे हुए हैं।

शनिवार, 10 अक्टूबर 2015

ऋषि पतंजलि तो खुश हो रहे होंगे

#ऋषि_पतंजलि तो ख़ुश हो रहे होंगे कि उनके जाने के सैंकड़ों सालों बाद भी कोई उनका नाम जीवित रख रहा है। नहीं तो आज कितने लोगों को "चरक", "वाग्भट" जैसे महान विद्वानों के नाम याद हैं ? स्वर्ग इत्यादि जैसी यदि कोई जगह है तो ये लोग वहाँ बैठे हुए पतंजलि जी को बधाइयां ही देते होंगे कि उनके ज्ञान का उपयोग आज भी लोगों की भलाई के लिए हो रहा है। 


पहले यह साफ़ कर देना जरूरी है कि ना तो मैं बाबा रामदेव का अनुगामी हूँ और नाही उनके दो-चार उत्पादों को छोड़ सब का उपयोग करता हूँ नाही उनके योग शिविरों में आता-जाता हूँ। पर जब तकरीबन रोज लोगों की प्रतिक्रियाएं पढने को मिलती हैं जो बाबा रामदेव के बढ़ते-फैलते  व्यापार पर तंज कसती हैं तो समझ में नहीं आता कि ऐसे लोग चाहते क्या हैं ? उन्हें तकलीफ किस बात की है, क्या उत्पादित वस्तुएं मापदंड पर खरी नहीं उतर रही हैं ? क्या उनके उपयोग से ग्राहक को कोई नुक्सान पहुँचने का खतरा है ? क्या वे बाजार में
बिकने वाली अपनी समकक्ष चीजों से ज्यादा कीमत पर बेचीं जा रही हैं ? क्या उत्पाद करते समय किसी कानून का उललंघन हो रहा है ? क्या इन सब चीजों के लिए विदेशी मुद्रा का नुक्सान हो रहा है ? यदि ऐसा कुछ नहीं है तब तो यही लगता है कि भड़ास सिर्फ मानव सुलभ ईर्ष्या के कारण निकाली जा रही है। यह कुछ लोगों को हजम नहीं हो पा रहा है कि कैसे एक आदमी कुछ ही दिनों में बाज़ार पर कब्जा कर बैठा, वह भी भगवा कपडे पहन कर !  ऐसे लोगों को कोई फर्क नहीं पड़ता जब विदेशी कंपनियां अपने घटिया, हानिकारक और मंहगे उत्पाद हमारे मत्थे मढ़ती जाती हैं और हम खुशी-ख़ुशी खुद तो काम में लेते हैं ही अपने बच्चों को भी उनका उपयोग करवा कर गौरवान्वित महसूस करते हैं। 
      
आज ही फेस बुक पर पढ़ा कि ऊपर बैठे ऋषि पतंजलि भी अपने अनुगामियों द्वारा अपनी विद्या के इस तरह के उपयोग पर दुःखी हो रहे होंगे। ये भी तो संभव है कि उन्हें ख़ुशी हो कि उनके जाने के सैंकड़ों सालों बाद भी कोई उनका नाम जीवित रख रहा है। नहीं तो आज कितने लोगों को "चरक", "वाग्भट" जैसे महान विद्वानों के नाम याद हैं ?  हमारी नई पीढ़ी के अधिकाँश सदस्यों ने तो शायद ये नाम सुने भी नहीं होंगे !  स्वर्ग इत्यादि जैसी यदि कोई जगह होगी तो ये लोग तो पतंजलि जी को बधाइयां ही देते होंगे कि उनके ज्ञान का उपयोग आज भी लोगों की भलाई के लिए हो रहा है। 

वैसे भी हमें ख़ुशी होनी चाहिए की जो काम अकेले अपने बूते पर टाटा, बिड़ला, अंबानी नहीं कर पाए वह एक भगवाधारी बाबा ने कर दिखाया, भले ही पूरी सफलता नहीं मिली हो, पर शुरुआत तो हुई, कोई तो खड़ा हुआ "मल्टीनेशनल कंपनियों" की हिटलरशाही के विरुद्ध। हम सामान खरीदें या ना खरीदें ये हमारी मर्जी है पर इतना तो कर ही सकते हैं कि फिजूल की बातों से किसी को हतोत्साहित ना करें।  

फोटो के लिए अंतरजाल का आभार 

शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2015

अपने हाथ तो जगन्नाथ बना लिए, पर ……

जिन्न को वापस बोतल में भेजना शायद उतना मुश्किल नहीं होता होगा, जितना बिखरे सामान को समेटना। ऊपर से सामान की मालकिन को अपनी हर चीज जरूरी लगती है, भले ही वर्षों से उसका उपयोग न हुआ हो, पर उनके अनुसार क्या पता कब किस चीज की जरूरत पड जाए ! फिर पंजाबी का वह मुहावरा सुनाने से भी नहीं चूकतीं कि "कक्ख दी बी लोड पै जांदी ए" .  अब उनके इस "कक्ख" के चक्कर में मैं तो चकरघिन्नी बन गया  ना  !!!  
                     
दिल्ली पहुंचने के बाद ठाकुर जी का फोन आया मेरी खोज-खबर-जानकारियों के लिए और इधर अपनी ढिबरी टाइट हुई पड़ी थी, सामान को ठिकाने लगाते-लगाते। यह बात जब उन्हें बताई तो वो भी बोले अरे आप कहां थकते हो ! तो उनसे कहा भाई शरीर की एक सीमा तो है ही। अब पहले जैसा तो रहा नहीं ! पर जब कोई कहता है कि सर आपको देख कर लगता नहीं कि आप साठ पार कर चुके हो, तो यह बताने पर कि भइए साठ नहीं पैंसठ गुजरे भी एक अरसा हो गया है तो अगले का चेहरा देखने पर मजा तो आता ही है। ये अलग बात है कि इन बातों को सुनने के चस्के को बरकरार रखने के लिए रोज कुछ तो पसीना बहाना ही पड़ता है। पर ठाकुर साहब  बाहर के तो ठीक है घर के बच्चे भी अभी तक पापा को बाहुबली ही समझते हैं। कुछ भी हो, पापा हैं ना। पर अपनी हद मुझे  तो मालुम है ना ! सो धीरे-धीरे आराम से निपटाने की कोशिश हो रही है। इधर अभी तक कोई सहायक या सहायिका ना मिल पाने के कारण हाथ तो जगन्नाथ बन गए हैं पर तन-बदन तो वही है ना इसलिए थकान कुछ ज्यादा ही हावी हो गयी है।  

घर के अंदर सिमटे असबाब का पता नहीं चलता पर जब बाहर आ वह अंगड़ाइयां लेना शुरू करता है तो अच्छी भली जगह कम पड़ती दिखती है। जिन्न को वापस बोतल में भेजना उतना मुश्किल नहीं होता जितना बिखरे सामान को समेटना। वैसे भी चालीस साल की गृहस्थी में जरूरी के साथ गैरजरूरी का जुटते चले जाना और फिर यहां बच्चों का अपना जमावडा, सब मिला कर मजाक-मजाक में कुछ ज्यादा ही हो गया लगता है। ऊपर से सामान की मालकिन को हर चीज जरूरी लगती है भले ही सालों से उसका उपयोग न हो रहा हो पर उनके अनुसार क्या पता कब किस चीज की जरूरत पड जाए !  फिर पंजाबी का वह मुहावरा सुनाने से भी नहीं चूकतीं कि "कक्ख दी बी लोड पै जांदी ए".  अब उनके इस "कक्ख" के चक्कर में मैं तो चकरघिन्नी बन गया हूँ। पर ठाकुर जी सर पर पड़ी को निपटाना तो है ही। वैसे मैं अकेले ही नहीं लगा हुआ हूँ, मेरे साथ-साथ आपकी भाभी जी भी अपनी हद से ज्यादा ही साथ दे रही हैं। थकान से दोनों ही लस्त-पस्त हैं। नहाने-खाने का भी ठिकाना नहीं हो पा रहा है।

चलिए आप बताइए कैसे हैं ? ठाकुर जी बोले, सोच रहा हूँ, दिवाली के बाद हरिद्वार जाने का, अगर आप साथ चलें तो बहुत अच्छा रहेगा !  मैं बोला वैसे तो कोई ख़ास प्रोग्राम अब तक नहीं है पर तब तक की कह नहीं सकता, पर आप अपने कार्यक्रम के बारे में अवगत जरूर करवा देना।  हो सका तो जरूर चलुंगा।

तभी जैसे ठाकुर जी को मेरे हालात का ख्याल हो आया, बोले अच्छा फिर फोन करता हूँ , आप भी आराम कर लें।मैं तो चाहता ही यही था, सो तुरंत फोन रख बिस्तर पर पसर गया।      

मंगलवार, 6 अक्टूबर 2015

मैंने भी कहा, चलो !!

फिर शनि महाराज को मेरी याद हो आई, बोले बेटा एक बार फिर दिल्ली चलना है ? मैंने कहा आप तो अपनी बात मनवा कर ही रहोगे मेरी कौन सी सुनवाई होनी है ! पर महाराज ! नन्हा सा बीज आसानी से धरती में पनप जाता है। छोटे पौधे भी थोड़ी सी देख-भाल से अपने-आप को संभाल लेते हैं।  पर  विकसित वृक्ष को एक जगह से उखाड़ कर दूसरी जगह लगाने में असीमित खतरे रहते हैं। शनि महाराज मुस्कुराए बोले, मैं हूँ ना ! अब और क्या कहना था मैंने भी कहा,   चलो !!

जिंदगी एक शिक्षक की तरह इंसान को काफी कुछ सिखाती रहती है। उसके शिक्षण से आदमी की कई धारणाएं बदलती रहती हैं और उसकी आशा के विपरीत बनती रहती हैं। जैसे मुझे ज्योतिष या भाग्य पर अविश्वास नहीं था तो विश्वास भी नहीं था। पर इस विधा में दखल रखने वालों का कहना है कि शनि ग्रह की प्रबलता इंसान को एक जगह टिकने नहीं देती। उसका स्थानातंरण होता रहता है। अब वह भले ही अच्छाई के लिए हो या बुराई के लिए यह अलग बात है। आज उम्र के इस पड़ाव पर आ कर  फुरसत में बैठ जिंदगी की रील को दोबारा देखने पर पाता हूँ कि सचमुच ही कितनी-कितनी बार उखड़ाव आया है जिंदगी में। और उसका दर्द वही जान सकता है जो उसे भोगता है। 

पंजाब के फगवाड़ा शहर में जन्म के पश्चात तीन साल की आयु में कलकत्ता ले जाया गया, जहां मेरे बाबूजी कार्य करते थे। जगह थी कोन-नगर। आठ-नौ वर्षों के बाद उनके कार्यक्षेत्र के बदलाव के कारण मुझे अपने स्कूल के चलते कलकत्ते में अपने काकाजी के पास रहना पड़ा।  जब समझा गया कि अब मैं लोकल ट्रेनों में अकेले सफर कर सकता हूँ तो फिर कलकत्ते से करीब पैंतीस की. मी. दूर कांकीनाडा, जहां पिताजी कार्यरत थे, आने-जाने की इजाजत मिल गयी। पर सात-आठ साल बीतते-बीतते जैसे ही स्नातक हुआ प्रभू की अनुकंपा से कलकत्ते के पास कमरहट्टी नामक स्थान पर इसी नाम की जूट मील में कार्य करने का मौका मिलते ही फिर एक बार जगह छोड़नी पड़ी। वहीँ गृहस्थाश्रम में प्रवेश किया और जब एक स्थायित्व का अनुभव होने लगा तो कुछ ऐसी परिस्थितियां बनी कि डोरी-लोटा ले कर दिल्ली जाना पड़ गया। घर तो था वहां पर बाकी जरूरतों के लिए, नई जगह नए परिवेश में मशक्कत तो करनी ही पड़ती है। अच्छा, ऐसा भी नहीं लग रहा था कि कोई अनहोनी हो रही है। सब नॉर्मल तरीके से होता गया और हम उसे स्वीकारते रहे। पर कितने दिन, वही दस-ग्यारह साल का अरसा बीतते न बीतते फिर इतिहास ने दोहराना शुरू किया अपने आप को और इस बार बहाना बना अभिभावकों का आग्रह और जिद। जगह हिस्से में आई तब के मध्य प्रदेश के रायपुर शहर की। पर इस बार जिंदगी मुस्कुराई नहीं बल्कि किसी के भी बुरे ना होते हुए भी एक कड़वाहट भाग्य की लकीर बन साथ में चस्पा हो गई। 

हालांकि रायपुर में पच्चीस-सत्ताईस साल की उम्र और गुजर गयी  पर इन सालों में स्थायित्व और मैं आगे-पीछे होते भागते रहे।  इन ढेर सारे सालों में छह बार अपना बोरिया-बिस्तर उठाना और लगाना पड़ा। इसी बीच शहर तरक्की करता गया, राजधानी बन गया छत्तीसगढ़ प्रदेश की। उसके साथ ही पिछले आठ-नौ साल ठीक-ठाक गुजरे।  बच्चे बड़े हो गए और इस लायक हो गए कि किसी भी तरह का भार उठा सकें तो फिर शनि महाराज को मेरी याद हो आई, बोले बेटा एक बार फिर दिल्ली चलोगे ? मैंने कहा आप तो अपनी बात मनवा कर ही रहोगे मेरी कौन सी सुनवाई होनी है ! पर महाराज ! नन्हा सा बीज आसानी से धरती में पनप जाता है। छोटे पौधे भी थोड़ी सी देख-भाल से अपने-आप को संभाल लेते हैं।  पर  विकसित वृक्ष को एक जगह से उखाड़ कर दूसरी जगह लगाने में असीमित खतरे रहते हैं। शनि महाराज मुस्कुराए बोले, मैं हूँ ना ! अब और क्या कहना था मैंने भी कहा,   चलो !! जब तुगलक बना ही दिया है। 

इस तरह एक बार फिर  "मुड़-मुड़ खोती, बौड़ हेठां" . "जहाज का पंछी फिर जहाज पर" . "सुबह का भुला................."  . घर के   ..................."   आदि मुहावरों को चरितार्थ किया और सोचा कौन जा सकता है दिल्ली की गलियां छोड़ कर !!!         

बुधवार, 30 सितंबर 2015

बलिहारी #BSNL की, अंतिम बार

लंच टाइम में तो सरकारी आदमी अपनी भी नहीं सुनता ! वह तो अच्छा है कि "भ्रामरी प्राणायाम" से दिमाग थोड़ा शांत रहने लग गया है। सज्जन ने  दो बजे की बजाए  पौने तीन बजे आ कर लोगों को उपकृत किया। पर इसी बीच वहां बैठी समय की पाबंद महिला ने मेरे काम की, जो महज दो-तीन मिनट का था, खानापूर्ति कर दी थी। कोहनी से हाथ जोड़ कर वापस आ गया..... 

#BSNL के भूमि-पकड़, अचल फोन को नमस्ते भेज दी है। हाथ जोड़ने का कारण जानने के लिए उन्होंने जो फॉर्म दिया उसमे वही सारे कारण थे जिनसे उपभोक्ता हलकान रहता है। आश्चर्य होता है और हंसी भी आती है कि अंदाजे के बावजूद सब कुछ वैसे ही बदस्तूर चला आ रहा है, सुधार की कोई कोशिश ही नहीं होती। 
सही दिशा निर्देश ना होने के कारण कल कनेक्शन कटवाने के लिए मुझे तीन घंटे और उनके दफ्तर के चार चक्कर लगाने पड़े। थोड़ी गलती तो थी, सो पहले फाफाडीह स्थित दफ्तर चला गया क्योंकि ज्यादातर काम वहीँ से होते हैं। वहां से बिन कुछ पूछे जय स्तंभ चौक का रास्ता  दिखाया गया, वहां पता चला कि मैं सिविल लाइन के क्षेत्र में पड़ता हुँ। वहां आधी कार्यवाही के बाद फिर  जय स्तंभ चौक आना पड़ा। वहां एक महिला कर्मचारी से मिली थोड़ी मदद की राहत तब तिरोहित हो गयी जब मेरे द्वारा जमा किया हुआ फार्म वहीँ के सज्जन से इधर-उधर होने पर वैसी ही क्लियरेंस को दोबारा सिविल लाइन से लाने को कहा गया।  इसके पहले कि खोपड़ी सटकती, कागज़ तो मिल गया पर डेढ़ बज गए। अब यह तो सबको पता है कि लंच टाइम में तो सरकारी आदमी अपनी भी नहीं सुनता !  सो मजबूरी थी। वह तो अच्छा है कि "भ्रामरी प्राणायाम" से दिमाग थोड़ा शांत रहने लग गया है। सज्जन ने  दो बजे की बजाए  पौने तीन बजे आ कर लोगों को उपकृत किया। पर इसी बीच वहां बैठी समय की पाबंद महिला ने मेरे काम की, जो महज दो-तीन मिनट का था, खानापूर्ति कर दी थी। दोनों महिलाओं को धन्यवाद दे, दफ्तर को कोहनी से हाथ जोड़ वापस आ गया। 

बार-बार प्रमाणित होती बात फिर एक  बार बता गयी कि क्यों निजी कंपनियां हर क्षेत्र में सफल हैं !! जिम्मेदार लोग क्यों ध्यान नहीं देते इस ओर ?  क्यों सरकारी महकमों में हर काम को जटिल बना कर रखा जाता है ? क्यों जो काम निजी कंपनियों में पांच मिनट में निपट जाता है उसमे सरकारी दफ्तर में चार घंटे लग जाते हैं ? क्यों  जो काम एक ही खिड़की से निपट सकता है उसके लिए आम आदमी को चार जगह दौड़ाया जाता है ? क्यों लंच समय को समय के बाहर तक खींचा जाता है ?

मंगलवार, 29 सितंबर 2015

अतीत के कुछ निर्णय, पता नहीं मैं सही था कि गलत !

कुँए में तो मैं उतर रहा था, भाई लोग तो दोनों हाथों में लड्डू लिए ऊपर जगत को पकड़े अंदर झांकते हुए मौका ताड़ रहे थे । व्यवसाय जम गया तो नाम और दाम का बड़ा हिस्सा उनका नहीं जमा तो अभी का जमा-जमाया काम तो है  ही। और हुआ वही जो ऐसे जुओं में होता आया है, सारे प्लान चारों खाने चित्त रहे थे .....

ज्यादातर देखा गया है कि अपने अतीत से गौरवांतित होने की प्रथा रही है, चाहे देश हो, समाज हो, लोग हों। मुझ में भी है ! पर कभी अकेले में बैठ कर मन विवेचन करता है तो अपने कई निर्णय बेतुके और नादानी भरे लगते हैं जो तथाकथित मित्रों के बहकावे में आ कर ले लिए थे।

कॉलेज से निकलते ही एक अच्छी-खासी नौकरी के झोली में आ पड़ने से एक लापरवाही और अति-आत्मविश्वास मन में घर कर गया था। जिसका फायदा मेरे दोस्त (?) और उसके घर वालों को मिला।  अपने बाबूजी के लाख समझाने के बावजूद, जिन्होेंने इजाजत देने के साथ ही कहा था कि बिना किसी अनुभव के व्यवसाय रूपी अंधे कुँए  में छलांग लगाने जा रहे हो। तब छोटी उम्र थी, समझ कम थी, इतना भी समझ नहीं आया कि दांव पर तो मेरा ही सब कुछ लग रहा है। कुँए में तो मैं ही उतर रहा हूँ, भाई लोग तो दोनों हाथों में लड्डू लिए जगत से झांकते हुए मौका ताड़ते रहेंगे। व्यवसाय जम गया तो नाम और दाम का बड़ा हिस्सा उनका नहीं जमा तो अभी का जमा-जमाया काम तो है  ही। और हुआ वही जो ऐसे जुओं में होता आया है, सारे प्लान चारों खाने चित्त रहे थे।      

इधर बलिहारी मेरी अक्ल की, कुछ ना होने के बावजूद लौटने पर विचार भी नहीं किया, जबकि चार-पांच  माह बीत जाने के बाद भी मेरा स्तीफ़ा मंज़ूर नहीं किया गया था। नौकरी भी कैसी जहां सिर्फ कपडे और बर्तन आपके बाकी सारा कुछ, टहल के लिए बंदों के साथ सब कुछ कंपनी का। पर लौटने पर लोग क्या कहेंगे जैसी बेबुनियादी बातों और अपने को सिद्ध करने अड़ ने दिशा बदलने नहीं दी।

समय एक सा तो रहता नहीं, मौका सब को देता है। कुछ समय बाद जब कुछ स्थायित्व आता नज़र आया तो फिर एक बार उठा-पटक हो गयी। इस बार माध्यम बने अभिभावक। संयुक्त परिवार मुझे सदा लुभाता रहा है चाहे किसी का भी हो मुझे उस पर ईश्वर की कृपा नज़र आती है। साथ रहने की ललक, फिर अभिभावकों की बढ़ती उम्र ने फिर एक बार अजीबोगरीब फैसला करवा डाला। स्थानांतरण हुआ, पर कुछ ही समय बाद एक-दो "हितैषियों" क बहकावा मेरे ऊपर कहर बन टूटा जिसका अंजाम बेहद नाख़ुशग़वार रहा। असलियत सामने आते तक बहुत देर हो चुकी थी। जिसका पछतावा बाबूजी को अपने अंत समय तक रहा। पर तब तक तो गंगा में ढेर सारा पानी बा ह चुका था। समय तो रुकता नहीं, जिंदगी भी बढ़ती चली जाती है पर गया समय तो किसी भी तरह वापस नहीं पाया जा सकता ना !

आज सब इसलिए दिमाग के चित्रपट पर कौंध रहा है क्योंकि अब एक बार फिर इतिहास दोहराई की बेला आन पड़ी है। माध्यम बना है बच्चों के प्रति कुछ फर्ज, उनकी मजबूरियां और अपनी उम्र का तकाजा, जिसे ना चाहते हुए भी किसी सहारे की जरुरत तलब होने लगती  है। इस बार-बार की उठा-पटक को ज्योतिषी लोग शनि का प्रकोप कहते हैं। जिससे स्थायित्व नहीं आ पाता जिंदगी में। पर मुझे लगता है कि यह सब इतना बुरा भी तो नहीं रहा। दसियों जगहें देखीं, सैकड़ों लोगों से मिलना हुआ, हज़ारों तरह के अनुभवों की प्राप्ति हुई। और ऐसा सिर्फ मेरे साथ ही थोड़े ही हुआ होगा मेरे जैसे हज़ारों-लाखों लोगों को ऐसे अनुभवों से गुजरना पड़ा होगा।
तो क्यों एवईं परेशान होना, जो होगा अच्छा होगा। अभी तो सोया जाए ..........एक बज रहा है रात का !!    

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