रविवार, 27 सितंबर 2015

बढ़ते पंडाल घटती श्रद्धा

कुछ मंडप तो ऐसे भी देखने को मिलते हैं जहां आयोजक अपने "किसी जरुरी काम" से नदारद रहते हैं और निपट अकेले बैठे प्रभू भक्तों की बाट जोहते नज़र आते हैं। ऊपर से अखबारों और मिडिया की अनुकंपा से अस्तित्व में आई  #ग्रुफियों ने बंटाधार कर रखा है, जिसमे बप्पा को एक तरह से पूरी तरह दरकिनार कर अपनी ही अपनी फोटुएं उतारी जाती हैं। विघ्नहर्ता भी सोचते होंगे कि कहां दस दिनों के लिए आ फंसा। 

त्योहारों के मौसम का श्री गणेश, गौरी पुत्र गणपति बप्पा की स्थापना के साथ हो चुका है। भिन्न-भिन्न रूपों में
जगह-जगह, गली-गली विघ्नेश्वर विराजे हैं। ऐसा लगता है जैसे होड़ मच गयी हो इनके स्वागत की। इस बार मेरे इलाके के आधा की. मी. के दायरे में ही आठ-नौ सार्वजनिक पंडाल हैं। घरो की बात तो छोड़ ही दी जाए, हर तीसरे-चौथे घर से सुबह-शाम आरती की आवाजें सुनी जा सकती हैं। पता नहीं लोग सचमुच धार्र्मिक या श्रद्धालु हो गए हैं या कोई और बात है !

अतीत में झांका जाए तो सार्वजनिक मूर्ती स्थापना की परंपरा सबसे ज्यादा बंगाल में चली रही है। जहां भव्य दुर्गोत्सव के बाद माँ काली, देवी लक्ष्मी, जगद्धात्री माता की मूर्तियों की सार्वजनिक पंडाल में पूजा की जाती रही है। छोटे-बड़े कारखानों में विश्वकर्मा जी की प्रतिमा भी स्थापित कर पूजन होता रहा है। उधर महाराष्ट्र में सदा गणेशोत्सव की धूम रही है। 

समय की करवट के साथ जीवन-यापन की तलाश में लोग प्रदेश-प्रदेश आने-जाने लगे तो अपने साथ अपनी संस्कृति, अपने संस्कार, अपने रीति-रिवाज भी लेते आए। जिससे हर जगह हर तरह के त्यौहार मनाने का चलन शुरू हो गया। इंसान होता ही उत्सव प्रिय है, कुछ दिनों के लिए ही सही देश भर में मौज-मस्ती-उल्लास
का समा बनने लगा। लोग एक-दूसरे से मिलने लगे, एक-दूसरे के रीति-रिवाजों को समझने और अपनाने लगे। इन दिनों एक खुशनुमा माहौल छाता नज़र आने लगता है। 

पर जैसे दिन के साथ रात, ख़ुशी के साथ गम, अच्छाई के साथ बुराई जुडी होती है ठीक वैसे ही इस सामाजिक कृत्य के साथ कुछ असामाजिक कुकृत्य भी पनपने लगे। ठीक वही हुआ जो वर्षों पहले बंगाल में हुआ था। पंडालों की सजावट और उसमे इनाम पाने की होड़ ने गलत प्रतिस्पर्द्धा को जन्म दे दिया। बढे हुए खर्च के लिए लोगों से जबरन चंदा उगाही होने लगी। फिर उस अपार तथा अबाध धन राशि को देख नियतों में फर्क आने लगा। चढ़ावे की बिन हिसाब की राशि भी आपसी मन-मुटाव का कारण बनने लगी।  कुछ असामाजिक तत्वों ने इसे अपनी आर्थिक जरूरतों को पूरा करने का जरिया बना डाला। लाखों के बजट  के खेल को देख नेता गण भी मैदान में उतर आए। बस सार्वजनिक आयोजन अतिसार्वजनिक हो गया और अति तो हर चीज की बुरी होती है, जो समारोह लोगों को कभी एकजुट करते थे वही विघटन का कारण बनने लगे। मौहल्ले बंट गए, गलियां  बंट गयीं, लोग बंट गए और इसके साथ श्रद्धा घटती चली गयी। 

ऐसे आयोजन अब ज्यादातर मौज-मस्ती मनाने का अवसर बन गए हैं। युवाओं के लिए घर से बाहर ज्यादा समय गुजारने का जरिया बन गए हैं। अब भक्ति-भावना तिरोहित हो चुकी है। ज्यादातर ठियों पर माहौल बदला-बदला सा नज़र आता है। पुरानी समितियों और जिम्मेदार आयोजनों की बात छोड़ दें पर गली-गली उग आए छोटे-छोटे तंबुओं में सिर्फ अपना शौक पूरा करने के लिए ऐसा करने वालों का उत्साह दो-तीन दिनों बाद ही ठंडा पड़ जाता है। फिर कई जगहों पर एक तरफ अकेले चौकी पर विराजे बप्पा नज़रंदाज़ हो टुकुर-टुकुर अपने सामने बैठे भक्तो को विदेशी पकवान उदरस्त करते और "हौजी" खेलते देखते रहते हैं। कुछ मंडप तो ऐसे भी देखने को मिलते हैं जहां आयोजक अपने "किसी जरुरी काम" से नदारद रहते हैं और निपट अकेले बैठे प्रभू भक्तों की बाट जोहते नज़र आते हैं। ऊपर से अखबारों और मिडिया की अनुकंपा से अस्तित्व में आई  "ग्रुफियों" ने बंटाधार कर रख दिया है। जिसमे बप्पा को एक तरह से पूरी तरह दरकिनार कर अपनी ही अपनी फोटुएं उतारी जाती हैं। विघ्नहर्ता भी सोचते होंगे कि कहां दस दिनों के लिए आ फंसा।      

पता नहीं इस ओर उन लोगों की नज़र क्यूं नहीं जाती जिनकी भावनाएं ज़रा-ज़रा सी बात पर ठेस खा-खा कर समाज की ऐसी की तैसी करती रहती हैं। 

शुक्रवार, 25 सितंबर 2015

जहां भारतीयों का प्रवेश निषेद्ध है, एक कड़वी सच्चाई

सारे मामलों में एक बात जो शर्मनाक है वह है विदेशी महिलाओं को लेकर भारतीयों पर की गयी टिप्पणियां। विश्लेषण तो हमें खुद ही करना पड़ेगा !!!

बड़ों से सुनने में आता रहा है कि अंग्रेजों के समय के कलकत्ते में एस्प्लेनेड (धर्मत्तल्ला ) के चौरंगी रोड, जिसे
ग्रैंड होटल 
आज जवाहर लाल नेहरू मार्ग के नाम से जाना जाता है, उसके फुटपाथ पर हिंदुस्तानियो का चलना मना था, खासकर "ग्रैंड होटल" वाले हिस्से पर। अंग्रेजों का राज था इसलिए डर के मारे विरोध नहीं हुआ होगा उस वक्त। पर आज के समय जब हम आजाद हैं तब भी हमारे देश में विदेशियों द्वारा बनाई या उपयोग में लाई जाने वाली  कुछ जगहें ऐसी हैं जहां भारतीयों का प्रवेश निषेद्ध है, है ना अचंभे की बात !  पर यह एक कड़वी सच्चाई है कि आजादी के इतने सालों के बाद भी कई स्थानों पर हमारा जाना मना है। इससे एक सवाल यह भी उठता है कि क्या हम इतने बेअदब, बद्तमीज या बेशऊर हैं कि हमे लोग देखना तक गवारा नहीं करते !!   
वे कुछ स्थान ये हैं -                            

1.  पॉन्डेचेरी और गोवा के समुद्री तट पर बनी कुछ निजी आरामगाहें, जिनके मालिकों का सरे-आम कहना है
कि उन्होंने  भारतीयों की विदेशियों को घूरने की आदत पसंद न होंने के कारण ऐसा किया है। तो क्या यह आदत सिर्फ भारत में पाई जाती है ?

2.  चेन्नई में एक भूतपूर्व नवाब की हवेली, जिसे होटल का रूप दे दिया गया है, उसमे प्रवेश तब ही मिलता है जब आगंतुक के पास विदेशी पासपोर्ट हो।  इसके संचालकों का ऐसा करने
के तर्क भी अजीब हैं उनके अनुसार भारतीय लोग झगड़ालू और शोर-शराबा मचाने वाले होते हैं जिसके कारण विदेशियों को असुविधा होती है। फिर इस लॉज में स्नानागार वगैरह "कॉमन" होने की वजह से विदेशी महिलाओं को घूरती भारतीय निगाहें रास नहीं आतीं।  इसलिए वे लोग सिर्फ  "चुनिंदा" लोगों को ही प्रवेश की इजाजत देते हैं। विडंबना यह है कि यहां के कर्ता-धरता खुद हिन्दुस्तानी हैं।

3.  आइये चलते हैं बंगलुरु।  यहाँ 2012 में जापानी कंपनी निप्पोन ने शहर में जापानियों की बढ़ती संख्या को देख कर अपना एक "उनो-इन-होटल" खोल दिया। ध्येय था पहली बार भारत आने वाले जापानियों को घरेलू माहौल मिल सके। पर कुछ ही दिनों बाद ऐसी शिकायतें आने लगीं कि वहां के स्टाफ द्वारा सिर्फ जापानियों को ही प्रवेश दिया जा रहा
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है। ऐसा पता चलते ही प्रशासन ने उसे बंद करवा दिया।

4.  अब तक बात हुई चेन्नई, बेंगलुरु, गोवा जैसे शहरों की जो तथाकथित "मॉडर्न" नगरों में गिने जाते हैं पर पहाड़ों में भी एक जगह है जहां देसी लोगों से पराया व्यवहार होता है। हिमाचल प्रदेश की पार्वती घाटी में बसा
एक गाँव, कसोल। वहां है एक काफी हाउस नाम है "फ्री कसोल कैफे" जहां देसी लोगों के आने-जाने पर आनाकानी की जाती है। इसका मालिकाना हक़ भी एक रहस्य ही बना हुआ है। स्थानीय लोगों के अनुसार इसका मालिक कोई इजरायली है जबकि कैफे चलाने  वाला किसी भारतीय महिला का नाम बतलाता है। पर
 फ्री कसोल कैफे
लगता है बात तब की है जब हिमाचल में हिप्पियों का जमावड़ा हुआ करता था, तब इजरायल से भी काफी युवक मौज-मस्ती के लिए यहां आते थे। यह रेस्त्रां तभी की देंन हो सकता है। चूँकि स्थानीय निवासी हुड़दंग पसंद नहीं करते थे इसलिए यहां आने से कतराते होंगें तो एक चलन सा बन गया होगा यहां सिर्फ विदशियों का आना और वह एक दस्तूर बन गया होगा। जो भी हो, है तो सोचने और विचारने की बात।

सारे मामलों में एक बात जो शर्मनाक है वह है विदेशी महिलाओं को लेकर भारतीयों पर की गयी टिप्पणियां। विश्लेषण तो हमें खुद ही करना पड़ेगा !!!

शनिवार, 19 सितंबर 2015

कदी-कदी एवंई ख्याल आंदा ए :

आज  कल आने वाली इंसानों की खेप को देख महसूस हो रहा है। लगता है जैसे सारा काम किसी रसूखदार के ठेके पर चल रहा हो। कोई ध्यान देने वाला, टोकने वाला ना हो। त्रिदेव भी जैसे ऊब गए हों इस काम से।


करोड़ों साल हो गए सदियां बीत गयीं। ऊपर से जीवों की सप्लाई होने और फिर एक्सपायरी के बाद वापस ले जाना बदस्तूर जारी है। दूसरे जंतुओं का तो पता नहीं पर इतने समय बाद भी इंसानी पुतलों की बेहतर गुणवत्ता पर ध्यान नहीं दिया गया। उसकी मिट्टी में ईर्ष्या, द्वेष, लालच, घमंड, अहंकार, जलन जैसे घातक विकारों की मिलावट सदियों से बदस्तूर वैसे ही सिर चढ़ कर बोलती चली आ रही है। मानकीकरण के लिए यदि दो-चार अच्छाइयां मिलाई भी जाती हैं तो वे भी समय के साथ बेअसर हो जाती हैं। बात ऐसी है कि इस काम के सर्वाधिकारों पर एकाधिकार है वहां वालों का, कोई प्रतिस्पर्धा नहीं है। पर निर्माणाधीन वस्तु की कमियां तो दूर होनी चाहिएं। नहीं तो एक ना एक दिन खामियाजा तो भुगतना ही पड़ता है। एक छोटा सा उदहारण अपने यहाँ बनने वाली "एम्बैसडर" कार का लिया जा सकता है, जिसका निर्माता वर्षों तक एक ही मॉडल को ज़रा-जरा से  बदलाव के साथ बाज़ार में धकेलता रहा। कमियों पर कभी ध्यान न देने का फल है कि आज उसका कोई नामलेवा नहीं है।

ऐसा ही कुछ आज  कल आने वाली इंसानों की खेप को देख महसूस हो रहा है। लगता है जैसे सारा काम किसी रसूखदार के ठेके पर चल रहा हो। कोई ध्यान देने वाला, टोकने वाला ना हो। त्रिदेव भी जैसे ऊब गए हों इस काम से।  तभी तो संसार में शायद ही कोई ऐसी जगह बची हो जहां शांति हो, लोग चैन से रहते हों, जीवन दुश्वार न हो गया हो, स्वभाव में असहिष्णुता न समा गयी हो, भाईचारा न ख़त्म हो गया हो। लोग बेवजह धर्म-जाति-भाषा-रंग भेद पर मर-मिटने पर उतारू ना हो जाते हों। ज़रा-जरा सी बात पर कत्ले-आम न हो जाता हो, पडोसी एक-दूसरे को दुश्मन न समझते हों। ऐसा ही रहा तो उन लोगों की बेहतरीन कृति इंसान और इंसानियत लगता नहीं संसार में ज्यादा समय रह पाएंगे। 

अभी भी हालात सुधर सकते हैं, यदि निर्माण के दौरान वहीँ सुधार हो जाए, कमियां वहीं दूर कर दी जाएं। मिलावट का प्रतिशत न्यूनतम कर दिया जाए, वहां के उत्पादन का परिक्षण धरा  पर ना किया जाए, कसौटी पर कसने के लिए संसार को परिक्षण केन्द्र ना बनाया जाए। तो उसका एक फ़ायदा और भी हो सकता है, इन विकारों से उपजी व्याधियों, विघ्नों, दुखों, कष्टों को दूर करने, मिटाने के लिए जो बार-बार कभी प्रभू को अवतार लेना पड़ता है, कभी माँ को समय निकालना पड़ता है तो कभी विघ्नेश्वर को आना पड़ता है उस आने-जाने से बचने वाले समय का अपनी ही कृतियों की भलाई में उपयोग हो सकता है। क्योंकि उद्देश्य तो अपने बच्चों को खुश रखने का है नाकि उन्हें दंडित करने का !!!

गुरुवार, 17 सितंबर 2015

भले ही गुलगुले से परहेज करें पर गुड़ जरूर खाएं

ढेर सारे गुणों के बावजूद शहरवासी या तथाकथित आधुनिक युवा उचित जानकारी के अभाव में गुड़ का उपयोग करने से कतराते हैं। जबकि यह चीनी से कहीं ज्यादा सुरक्षित और फायदेमंद है। तो अब बेझिझक गुड़ खाएं भले ही गुलगुले से परहेज करें। 

प्रकृति और इंसान के आपसी ताल-मेल की अद्भुत उपज है, गुड़। धरा ने आदमी की मेधा की परख के लिए द्रव्य रूप में अमृत रूपी रस को डंडों में भर खेतों में उपजाया तो इंसान ने उसे ठोस रूप दे एक बहुगुणी वस्तु की शक्ल दे दी। वस्तु भी कैसी, जिसका उपयोग वर्षों तक शादी-ब्याह, तीज-त्यौहार, तथा शुभ अवसरों पर मिठाई के रूप में होता रहा। हालांकि इसके और शुद्ध रूपों की ईजाद, शक्कर तथा चीनी के रूपों में हुई पर उनमे इसके लाभकारी गुणों का समावेश नहीं हो पाया। 

गुड़ की भेली 
चिकित्सा शास्त्र भी मानता है कि गुड़ इंसान के अलावा जानवरों के लिए भी गुणकारी है। यह स्वादिष्ट होने के साथ-साथ सेहत का भी ख्याल रखता है । गुड का सेवन करने से पाचन तंत्र सही रहता है । यह गन्ने के रस से तैयार किया जाता है, जिसकी फसल जाड़ों में होती है, उसी समय गुड बनाया जाता है। वैसे तो यह सर्दियों का मेवा है और इसकी तासीर भी गर्म होती है फिर भी उचित मात्रा में इसका सेवन साल भर किया जा सकता है। इसमे पाए जाने वाले महत्वपूर्ण खनिजों के कारण इसके अनेकों औषधीय लाभ हैं। 

इसका उचित मात्रा में सेवन पाचन तंत्र को दुरुस्त रखता है। भोजन को पचाने में सहायता करता  है। भूख बढ़ाता है। पेट की व्याधियों से मुक्ति दिलाता है। इसका लौह-तत्व शरीर को अनीमिया से बचाता है। यादाश्त तेज करता है। खून को साफ कर रक्त-चाप सामान्य बनाए रखने में सहायता करता है। आँखों के लिए भी बहुत फायदेमंद है।हड्डियों को मजबूती प्रदान करता है। यह ऊर्जा का स्रोत है। ठंड में शरीर का तापमान बनाए रखता है। सर्दी-खांसी, दमा और एलर्जी में भी फायदेमंद है। कहते हैं कि हर रोज़ गुड के साथ अदरक का सेवन करने से जोड़ो के दर्द में आराम मिलता है। इसे खा कर दूध पिया जा सकता है पर दूध में मिला कर पीने की मनाही है। वैद्याचार्यों के अनुसार रात के भोजनोपरांत इसकी एक तोला मात्रा ले लेने से इसके फायदे प्राप्त हो जाते हैं। 
खजूर का गुड़ 

गुड़ का स्वाद, गुण, और विशेषता बहुत कुछ इसको बनाने वाले की कार्यकुशलता पर निर्भर करती है। नहीं तो इसका हाल भी "सौदागर" फिल्म की पद्मा खन्ना के बनाए गुड़ जैसा हो जाता है। वैसे तो ईख के रस से बने गुड का ही ज्यादातर उपयोग होता है, पर हल्की या कुछ कम मिठास को पसंद करने वालों के लिए खजूर के रस से बना गुड़ बेहतरीन विकल्प है। अपने यहां यह ज्यादातर बंगाल और दक्षिणी भारत में बनाया जाता है। जहां इसका उपयोग त्यहारों इत्यादि पर खूब किया जाता है।    

प्राचीनता का इतिहास और इतने सारे गुणों के बावजूद शहरवासी या तथाकथित आधुनिक युवा उचित जानकारी के अभाव में इसका उपयोग करने से कतराते हैं। जबकि यह चीनी से कहीं ज्यादा सुरक्षित और फायदेमंद है। तो अब बेझिझक गुड़ खाएं भले ही गुलगुले से परहेज करें।    

सोमवार, 14 सितंबर 2015

निर्मला, जिसका कहा बिगड़ैल हाथी भी मानते हैं

निर्मला जानवरों से नफ़रत नहीं करती बल्कि इंसान और जानवर दोनों को बचाने में उसने अपना जीवन समर्पित कर दिया है। स्थानीय तथा उसे जानने वाले लोग उसे "एलिफेंट व्हिस्परर" कहने लगे हैं।       

बचपन में पढ़ी-सुनी कहानियों में अक्सर ऐसे लोगों का जिक्र आता था जो पशु-पक्षियों की आवाज समझ बोल लेते थे। ऎसी बातें सुन आनंद भी आता था और संभव न होते हुए भी वैसा कर पाने या ऐसे लोगों से मिलने की इच्छा भी होती थी। वर्षों बाद आज जाने-माने वरिष्ठ पत्रकार एन. रघुरामन जी के सौजन्य से एक अद्भुत जानकारी प्राप्त हुई।    

निर्मला 
झारखंड के सिमडेगा जिले के सिहारजोर गांव में उड़िया भाषी निर्मला नाम की एक युवती रहती है जिसमें हाथियों से संवाद स्थापित करने की अद्भुत ईश्वर प्रदत्त क्षमता है। मात्र 16-17 साल की यह कन्या अपनी  इस नेमत का उपयोग कर वह वर्षों से इंसान और उनकी संपत्ति को जंगल से भटक कर गांवों में चले आए हाथियों से बचाती चली आ रही है। हाथी चाहे कितने भी आक्रोश में हों वे निर्मला के मधुर संगीत और इशारों से शांत हो वापस जंगल की ओर लौट जाते हैं। ठीक उनके सामने खड़े हो, उनकी आँखों में आँखें डाल निर्मला अपने गाने द्वारा उनसे प्रार्थना तो करती ही है पर डांटने से भी नहीं चूकती। उसके संगीत का अर्थ होता है कि, "हमें आप से प्रेम है, आपकी परवाह है, हम किसी को नुक्सान या दुःख देना नहीं चाहते। पर आप हमारी शांति भंग कर रहे हैं।  कृपया यहां से चले जाएं।" आश्चर्य है कि हर बार हाथी उसकी बात मान वापस चल देते हैं। अब यह पता नहीं है कि वे निर्मला के शब्द समझते हैं या यह संगीत का जादू है। यह कला निर्मला को अपने पिता से विरासत में मिली है, जिनकी मौत गांव को हाथियों से बचाते-बचाते ही हुई थी। फिर भी निर्मला जानवरों से नफ़रत नहीं करती बल्कि इंसान और जानवर दोनों को बचाने में उसने अपना जीवन समर्पित कर दिया है। स्थानीय तथा उसे जानने वाले लोग उसे "एलिफेंट व्हिस्परर" कहने लगे हैं। इस सब के बावजूद गांव वाले हाथियों को हटाने के लिए अपने पुराने तौर-तरीके जैसे ढोल बजाना या पटाके फोड़ने के साथ-साथ मशाल वगैरह का उपयोग भी करते हैं। वैसे भी स्कूल की छात्रा निर्मला खुद को स्नातक करना चाहती है जिससे उसका परिवार आज की गरीबी से
पार्वती 
कुछ हद तक निजात पा सके।

  

इसके पहले आसाम की पार्वती बरुआ का नाम जरूर सुना था, जो शायद देश ही नहीं संसार की पहली और अकेली महिला महावत हैं। उन्हें भी हाथियों को काबू करने और सिखाने की महारत हासिल है, उनके इस काम में उनके प्रशिक्षित हाथी भी सहायता करते हैं, पर निर्मला तो अपनी इस दैवीय शक्ति के कारण जीते-जी किवदंती बन चुकी है।  चुपचाप अपने काम से मतलब रखने वाली इन महिलाओं को कितने लोग जानते है ?                

शुक्रवार, 11 सितंबर 2015

क्या हो जाता है मनुष्य को जीवन के अंतिम पड़ाव में

यह कोई ठाकुर जी की दादी जी के साथ ही नहीं हो रहा था, यह तो शायद दुनिया के निन्यानवें प्रतिशत लोगों के साथ घटती अवस्था है। एक समय के बाद इंसानी कल-पुर्जे इसी तरह का व्यवहार करना आरंभ कर देते हैं। समझ नहीं आ रहा था की प्रकृति के इस स्थाई भाव से कैसे किसी को उबारा जाए .......

इंसान की जीने की लालसा, अदम्य इच्छा, मोह-माया, मन की कामनाएं, लिप्साएं, वृत्तियां भले ही खत्म ना हों पर बढती उम्र काफी पहले से उसे आईना दिखाना शुरू कर देती है। इसमें कोई भेद-भाव नहीं होता चाहे आदमी संपन्न हो या विपन्न। जर्जर होती काया, कमजोर होती इन्द्रियां, अवसाद ग्रस्त दिलो-दिमाग, पारिवारिक सदस्यों की अपनी व्यवस्तता के कारण बढ़ता अकेलापन, अपनी निष्क्रियता के कारण उपजती हीन भावना, सब मिला कर आदमी अपने-आप को परिवार में अनचाहा सा समझने लगता है। हालांकि ऐसा होता नहीं है, परिवार वाले उसका ख्याल भी रखते हैं, उसे चाहते भी हैं पर हर घडी उसके पास बने रहना संभव नहीं हो पाता और यही न हो पाना इंसान के मन में घर कर जाता है। वैसे एक कड़वी सच्चाई यह भी है कि कुछ घरों में बुजुर्ग एक बेकार से सामान की तरह घर के एक कोने में टिका दिए जाते हैं और उन्हें दो समय खाना दे बाकी लोग अपने फर्ज की इतिश्री समझ लेते हैं। इन सब कारणों से आपस में तल्खी, चिड़चिड़ापन, तनाव आदि उपजते हैं जिससे निजात पाने के लिए एक ही रास्ता निकलता है जो वृद्धाश्रम की और जाता है। पर वह ना ही तो कोई इन परिस्थितियों से निकलने का उपाय है नहीं मानवता। ये जरूर है कि कुछ ऐसे लोग जिनका कोई भी पारिवारिक सदस्य न हो वे वहां हम-उम्र लोगों का साथ पा सकते हैं। 

ये सारी बातें इस लिए महसूस कर रहा हूँ क्योंकि कल ठाकुर जी बहुत दिनों बाद मेरे यहां आए थे कुछ परेशानी की हालत में। बातों-बातों में बात उनकी दादी जी के बारे में चल निकली, जिन्हें मैं भी अच्छी तरह से जानता हूँ और जो इस समय उम्र के नवें दशक को पार करने के मुकाम पर हैं, कि उनके स्वभाव में पिछले सात-आठ सालों से मंथर गति से एक स्थाई बदलाव आता जा रहा है। कैसा भी खुशगवार माहौल हो, कुछ पल छोड़ दें, तो उन्हें खुश नहीं कर पाता। हर समय सोच नकारात्मक बनी रहती है। घर-परिवार की तो छोड़ें पास-पड़ोस पर भी नकारात्मक टिप्पणियाँ करना आम हो चला है। जबकि ये वही शख्शियत है जिनके घर के रख-रखाव, सुघड़ता, कार्य-कुशलता, आचार-व्यवहार की लोग मिसाल दिया करते थे।  जिन्होंने कभी किसी जरूरतमंद को निराश जाने नहीं दिया। अपने देवर-भाभी, भाई-बहनों की सदा सहायता की। सभी के आड़े वक्त में सहारा बन खड़ी हुईं। पर अब पूरी की पूरी शख्शियत ही बदल सी गयी है। सब भरसक कोशिश करते हैं कि उनके मुंह से निकलने  पहले उनकी इच्छा पूरी हो जाए पर फिर भी कहीं न कहीं गफलत हो ही जाती है। 

कुछ देर हम दोनों चुप बैठे रहे। यह कोई ठाकुर जी की दादी जी के साथ ही नहीं हो रहा था, यह तो शायद दुनिया के निन्यानवें प्रतिशत लोगों के साथ घटती अवस्था है। एक समय के बाद इंसानी कल-पुर्जे इसी तरह का व्यवहार करना आरंभ कर देते हैं। समझ नहीं आ रहा था की प्रकृति के इस स्थाई भाव से कैसे किसी को उबारा जाए हालांकि हम अपनी तरफ से पूरी कोशिश करते हैं पर क्या कभी मनुष्य कायनात का सामना कर पाया है?            

गुरुवार, 3 सितंबर 2015

हताश-निराश युवाओं को लिंकन की जीवनी जरूर पढनी चाहिए

आज के युवा जो किसी कारणवश अपने लक्ष्य से दूर रह हताश हो बैठ जाते हैं, ज़रा सी असफलता मिलते ही तनावग्रस्त हो अपनी जान तक देने पर उतारू हो जाते है, जो समझ नहीं पाते कि एक हार से जिंदगी ख़त्म नहीं हो जाती, उन्हें एक बार अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति की जीवनी जरूर पढनी चाहिए जो एक पूर्ण कर्मयोगी थे। पर क्या हर इंसान इतना मजबूत बन सकता है ? शायद हां ! इसी  "हां " को समझाने के लिए भगवान ने इस धरा पर गीता का संदेश दिया था  ……                        
अब्राहम लिंकन ने गीता तो शायद नहीं पढी होगी, पर उनका जीवन पूरी तरह एक कर्म-योगी का ही रहा। वर्षों-वर्ष असफलताओं के थपेड़े खाने के बावजूद वह इंसान अपने कर्म-पथ से नहीं हटा, इतनी हताशा, इतनी निराशा, इतनी असफलताऐं तो ऋषि-मुनियों का भी मनोबल तोड़ के रख दें, पर धन्य था वह इंसान जिसने दुनिया के सामने एक मिसाल कायम की। अंत में तकदीर को ही झुकना पड़ा उसके सामने।

वे लगातार 28-30 सालों तक असफल होते रहे, जिस काम में हाथ ड़ाला वहीं असफलता हाथ आई। पर उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। लोगों के लिए मिसाल पेश की और असफलता को कभी भी अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया। लगे रहे अपने कर्म को पूरा करने में, जिसका फल भी मिला, दुनिया के सर्वोच्च पद के रूप में।

उनकी असफलताओं पर नज़र डालें तो हैरानी होती है कि कैसे उन्होंने तनाव को अपने पर हावी नहीं होने दिया होगा। 20-22 साल की आयु में घर की आर्थिक स्थिति संभालने के लिए उन्होंने व्यापार करने की सोची, पर कुछ ही समय में घाटे के कारण सब कुछ बंद करना पड़ा। कुछ दिन इधर-उधर हाथ-पैर मारने के बाद फिर एक बार अपना कारोबार शुरु किया पर फिर असफलता हाथ आयी। 26 साल की उम्र में जिसे चाहते थे और विवाह करने जा रहे थे, उसी लड़की की मौत हो गयी। इससे उनका मानसिक संतुलन बिगड़ गया, पर फिर उन्होंने अपने आप को संभाला और स्पीकर के पद के लिए चुनाव लड़ा पर वहां भी हार का सामना करना पड़ा। 31 साल की उम्र में फिर चुनाव में हार ने पीछा नहीं छोड़ा। 34 साल में कांग्रेस से चुनाव जीतने पर खुशी की एक झलक मिली पर वह भी अगले चुनाव में हार की गमी में बदल गयी। 46 वर्षीय लिंकन ने हार नहीं मानी पर हार भी कहां उनका पीछा छोड़ रही थी फिर सिनेट के चुनाव में पराजय ने अपनी माला उनके गले में डाल दी। अगले साल उपराष्ट्रपति के चुनाव के लिए खड़े हुए पर हार का भूत पीछे लगा ही रहा। अगले दो सालों में फिर सिनेट पद की जोर आजमाईश में सफलता दूर खड़ी मुस्काती रही। पर कब तक भगवान परीक्षा लेता रहता, कब तक असफलता मुंह चिढाती रहती, कब तक जीत आंख-मिचौनी खेलती। दृढ प्रतिज्ञ लिंकन के भाग्य ने पलटा खाया और 51 वर्ष की उम्र में उन्हें राष्ट्रपति के पद के लिए चुन लिया गया। ऐसा नहीं था कि वह वहां चैन की सांस ले पाते हों वहां भी लोग उनकी बुराईयां करते थे। वहां भी उनकी आलोचना होती थी। पर लिंकन ने तनाव-मुक्त रहना सीख लिया था। उन्होंने कहा था कि कोई भी व्यक्ति इतना अच्छा नहीं होता कि वह राष्ट्रपति बने, परंतु किसी ना किसी को तो राष्ट्रपति बनना ही होता है। तो यह तो लिंकन थे जो इतनी असफलताओं का भार उठा सके, पर क्या हर इंसान इतना मजबूत बन सकता है? शायद हां। इसी 'हां' को समझाने के लिए भगवान ने इस धरा पर गीता का संदेश दिया था। क्योंकि वे जानते थे कि इस 'हां' से आम-जन को परिचित करवाने के लिए, उसकी क्षमता को सामने लाने के लिए उसे मार्गदर्शन की जरूरत पड़ेगी।

विशिष्ट पोस्ट

जिसने सबसे ज्यादा विभिन्न रोगग्रस्त पात्रों का किरदार निभाया

अनेकों बार  Autism, Dyslexia, Progeria, Paraplegia, Alzheimer, Amnesia, Schizophrenia जैसी अनेक  बीमारियों पर, जिनका नाम भी आम लोगों ने सुना...