मंगलवार, 1 सितंबर 2015

उनका धुआँ हमारे धुएँ से सस्ता क्यों ?

दबे पाँव आ पैर पसारने वाली, आपका कानून भी नहीं मानती और टैक्स की भी चोरी कर रही है। उस पर यह आशंका सदा बनी रहती है कि कम कीमत पर बाहर से आई यह वस्तु ज्यादा हानिकारक भी हो सकती है........ 

ये नीतियां कैसे बनती हैं, क्यों बनती हैं, कौन बनाता है और क्या देख समझ कर बनाता है, नहीं पता यह सब  कभी-कभी  गडबडझाला सा लगता है। समझ में ही नहीं आता कि इससे क्या लाभ होगा या क्या परिणाम होगा या कहीं इसने करवट बदल ली तो क्या अंजाम होगा। पर एक बात तो है नीतियां बनाने वाले या वालों को कभी कोई फर्क शायद ही पड़ता हो पर फल सदा जनता को ही भुगतना पड़ता है।  
भारतीय ब्रांड 

अभी एक खबर पढ़ी कि चीन की बनी सिगरेटों ने भी भारतीय बाज़ार पर कब्जा करना शुरू कर दिया है। अपने देश में बनी सिगरेटों की कीमत चीन वाली बहनों से पांच गुनी ज्यादा है। एक तरफ तो सरकार लाखों रुपये यह समझाने में खर्च कर रही है कि सिगरेट-बीड़ी पीना सेहत के लिए कितना खतरनाक है,   वहीं वह तंबाखू परिशोधन करने 
वालों से मिलने वाले करोड़ों रुपयों का लालच भी नहीं छोड़ पा रही। देशवासियों की सेहत से ज्यादा कीमती तो कुछ भी नहीं होना चाहिए फिर भी यदि एक बार मान भी लें कि सिगरेट फैक्ट्रियां बंद करने में बहुत सारी अडचने हैं तो यह दूसरे देश, वह भी सबसे ताकतवर प्रतिद्वंदी, से इस प्रकार की हानिकारक जींस मंगवा कर और उसे इतनी सस्ती दर पर बे-रोक-टोक बिकते जाने की इजाजत किसने दी ?



यह तो  चौ-तरफा नुक्सान है।  एक तरफ तो आप चिल्ला-चिल्ला कर मना करते हो कि मत पी ! यह धुँआ तेरी जान ले लेगा !!  इसी भय को हौआ बना सिगरेट कंपनियों से मनमाना राजस्व वसूलते हो।  दूसरी तरफ एक के बदले पांच-पांच सिगरेटें उपलब्ध करवाते हो ! दबे पाँव आ पैर पसारने वाली, आपका कानून भी नहीं मानती और टैक्स की भी चोरी कर रही है। उस पर यह आशंका सदा बनी रहती है कि कम कीमत पर बाहर से आई यह वस्तु ज्यादा हानिकारक भी हो सकती है। यह कैसी नीति है जो अपनी फैक्ट्रियों को नुक्सान भी पहुंचाती हो और लोगों की सेहत से भी खिलवाड़ करने की पूरी छूट देती हो ? 

शनिवार, 29 अगस्त 2015

रक्षाबंधन, भाई-बहन ही नहीं और भी कई रिश्ते गुथे हैं इसमें

रक्षाबंधन, जिसका उपयोग अपनी सुरक्षा या किसी चीज की अपेक्षा करने वाले का रक्षा करने वाले को अपनी याद दिलाते रहने के लिए एक प्रतीक चिन्ह प्रदान किया जाता रहा है। अनादिकाल से चले आ रहे इस रिवाज ने धीरे-धीरे अब एक पर्व का रूप ले लिया है.......      

रक्षाबंधन, आज भले ही यह त्यौहार करीब-करीब भाई-बहन के पवित्र रिश्ते तक सिमट कर रह गया है पर पौराणिक और ऐतिहासिक कथाओं और लेखों में भी इस कच्चे सूत के बंधन का विवरण उपलब्ध है।  जिसका उपयोग अन्य कारणों में भी किए जाने का उल्लेख मिलता है। जहां अपनी सुरक्षा या किसी चीज की अपेक्षा करने वाले का रक्षा करने वाले को अपनी याद दिलाते रहने के लिए एक प्रतीक चिन्ह प्रदान किया जाता रहा है। अनादिकाल से चले आ रहे इस रिवाज ने धीरे-धीरे अब एक पर्व का रूप ले लिया है ।

पौराणिक काल पर नज़र डालें तो राजा बली की कथा में इसका विवरण मिलता है, जो शायद इसका सबसे पहला उल्लेख है। जब राजा बली को वरदान स्वरूप भगवान विष्णु उसकी रक्षार्थ स्वर्ग छोड़ पाताल में रहने लगे थे तब लक्ष्मी जी ने बली की कलाई पर सूत का धागा बांध उससे उपहार स्वरूप अपने पति को वापस मांग लिया था।

पुराणों के अनुसार देवासुर संग्राम में देवताओं के पक्ष को कुछ कमजोर देख इन्द्राणी ने इंद्र की सुरक्षा के लिए उसकी कलाई पर एक मंत्र पूरित धागा बांधा था। जो रक्षा बंधन ही था।
   
एक बहुचर्चित कथा श्रीकृष्ण और द्रौपदी की है जब द्रौपदी ने अपनी साडी के टुकड़े से श्रीकृष्ण की घायल उंगली पर पट्टी बांधी थी जिसके फलस्वरूप भरी सभा में चीरहरण के समय उसकी रक्षा हो पाई थी।

एक अप्रचलित कथा श्री गणेश के साथ जुडी हुई है। इसके अनुसार जब गणेश के पुत्रों शुभ और लाभ ने मनसा माता को गणेश जी को राखी बांधते देखा तो उन्होंने भी खुद को राखी बंधवाने के लिए बहन की मांग की तो श्री गणेश ने अग्नि की सहायता से एक कन्या को उत्पन्न किया जिसे संतोषी माता का नाम मिला।

इतिहास के दर्पण में झांकें तो राणा सांगा के देहावसान के बाद गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह ने चित्तौड़ पर हमला किया तो रानी कर्णावती ने  हुमायूँ को अपनी सुरक्षा की गुहार के साथ राखी भिजवाई थी। यह अलग बात है कि हुमायूँ की सेना के देर से पहुंचने के कारण उन्हें जौहर करना पड़ गया था।

आज भी ब्राह्मण पुरोहित इस दिन अपने यजमानों को मौली बांध कर दक्षिणा प्राप्त करते हैं। जो एक तरह से उन्हें मिलने वाली सुरक्षा का ही एक रूप है। जनेऊ धारण करने वाले लोग भी इसी दिन अपना पुराना जनेऊ त्याग नया धारण करते हैं।


जो भी हो सावन की पूर्णिमा को मनाए जाने वाले इस त्यौहार का भाई-बहनों को साल भर इन्तजार रहता है। जो दूर-दराज रहने वालों को इसी बहाने मिलने का अवसर मुहैय्या करवा रिश्तों में फिर गर्माहट भर देता है। पर आज कहां बच पा रहा है "ये राखी धागों का त्यौहार".  आधुनिकीकरण के इस युग में बाजार की कुदृष्टि हर भारतीय त्यौहार की तरह इस पर भी पड़ चुकी है जो सक्षम लोगों को मंहगे-मंहगे उपहार, जिनकी कीमत करोड़ों रुपये लांघ जाती है, खरीदने को उकसा कर इस पुनीत पर्व की गरिमा और पवित्रता को ख़त्म करने को उतारू है।

गुरुवार, 27 अगस्त 2015

कम पड़ती जगह के कारण पार्कों में गाड़ियां पार्क होने लगीं !!

महानगरों में बेतहाशा बढ़ते वाहनों को रखने-खड़ा करने की समस्या ने सर उठाना ही था लोगों ने अपनी सहूलियत या कहिए मजबूरीवश उद्यानों में भी गाड़ियां खड़ी करनी शुरू कर दीं हैं । जो थोड़ी-बहुत जगह बाकी परिवेश से कुछ साफ थी वह भी अपनी अंतिम सांसे गिनने पर मजबूर हो गयी। देश की दूसरी समस्याओं की तरह इसमें भी शायद न्यायालय को ही हस्तक्षेप करना होगा नहीं तो आने वाले समय की भयावह तस्वीर अभी से डराने लगने लगी है।                      
कहावत है कि आवश्यकता आविष्कार की जननी होती है। पर धीरे-धीरे इंसान की आवश्यकताएं सुरसा के मुंह की तरह बढ़ती ही चली गयीं और उसके अनुसार आविष्कार की परिभाषा भी बदल कर सहूलियत हो गयी। इसी सहूलियत के चलते बढ़ती आबादी के दवाब में इंसानों के रहने की जगह बनाने के लिए जंगलों की बली चढ़ी। अब कहने को तो यह पर्यावरण को क्षति पहुंचाने वाला कदम था पर मजबूरी भी तो थी, जगह ना हो तो इंसान रहे कहां ? सो जंगल कटे, आदमी बसे, पर अन्य जीव-जंतु बेघर हो गए। फिर आवश्यकता की भूख जंगल की आग बन गयी,    इंसान तथाकथित उन्नति करता गया, उसकी सुख-सुविधा की सामग्रियाँ जुटती चली गयीं,  प्रकृति का दोहन होता गया। उसके दुष्परिणाम भी सामने आते गए। ऐसा नहीं था कि इस ओर किसी ने ध्यान नहीं दिया कुछ जागरूक लोगों ने सांमजस्य बनाने की कोशिश कभी नहीं छोड़ी। हरियाली बढ़ाने की चेष्टाओं के तहत पेड़-पौधे लगाने तथा घने रिहाइशी इलाकों में पार्क-उद्यान बनाने और उनकी साज-संभाल-देख-रेख की परिक्रिया भी जारी रही पर बेतहाशा बढ़ती आबादी, ख़ास कर महानगरों की, के सामने ये सारे उपकम नगण्य साबित होते रहे ।
 सुख-सुविधा के लिए जुटाए गए उपकरण मुसीबतों का पहाड़ भी साथ ले आए। हालात फिर बेकाबू होने की कगार पर हैं।
 वातानुकूलन यंत्रों ने वातावरण को ही दूषित बना डाला है। कही आने-जाने में समय की बचत के लिए ली गयी
गाड़ियों ने सडकों पर ऐसा कोहराम मचाया कि चलते रहने की बजाए एक ही जगह घंटों खड़े रह जाना पड़ने लगा। फिर धीरे-धीरे इन वाहनों को रखने-खड़ा करने की समस्या ने सर उठाया और फिर इस आवश्यकता ने वर्षों की मेहनत से बने उद्यानों की ऐसी की तैसी तब कर डाली जब लोगों ने अपनी सहूलियत या कहिए मजबूरीवश वहां भी गाड़ियां खड़ी करनी शुरू कर दीं। जो थोड़ी-बहुत जगह सारे परिवेश से कुछ साफ थी वह भी अपनी अंतिम सांसे गिनने पर मजबूर हो गयी। पर बात वही है कि जान-बूझ कर नहीं मजबूरी-वश यह सब करना पड़ रहा है। जब सरकार ने वर्षों पहले ऐसे मकानों की योजना बनाई थी  तब तो आम इंसान के पास सायकिल होना ही बहुत बड़ी बात थी।  तब 25-40 गज की बसाहट में कार कल्पना से भी परे थी। अब वहीं एक-एक घर में दो-दो गाड़ियां हैं। इसी हिसाब और इतनी आसानी से यदि सरकारें और कंपनियां चौपहिए उपलब्ध करवाती रहीं तो शायद देश की दूसरी समस्याओं की तरह इसमें भी न्यायालय को ही कोई ठोस कदम उठाना होगा नहीं तो आने वाले समय की भयावह तस्वीर अभी से डरावनी लगने लग रही है।                                    

बुधवार, 26 अगस्त 2015

अपनी कार की हिफाजत खुद ही करनी पड़ती है :-)

सवाल यह था कि कुत्तों ने कार ले भी ली तो वे उसकी देख-रेख-हिफाजत तथा पार्क कहां करेंगे ? लोगों ने तो अपनी कारें खड़ी करने के लिए पार्कों -उद्यानों तक की ऐसी की तैसी कर डाली है, तो ये बिना घर-बार वाले उन्हें कहाँ महफूज रख पाएंगे ?  पर एक दिन अचानक मुझे इन सब बातों का हल दिख गया। तब पता चला कि मेरी चिंता कितनी निर्रथक थी.…… 

एक विज्ञापन  के अनुसार कुत्तों को भी कारें खरीदने का मौका और जगह उपलब्ध हो गयी है। विज्ञापन में एक प्यारा सा कुत्ता, जिसे अपनी खुद की कार लेने और चलाने की इच्छा है, कार पाने के लिए सडकों पर गाड़ियों के पीछे दौड़ता रहता है क्योंकि उसे यह नहीं मालुम कि कारें कैसे और कहाँ से मिलती हैं ! फिर उसकी मुलाकात एक "बॉस" टाइप तजुर्बेदार कुत्ते से होती है, जिसकी अपनी कार है और वह उसे चलाता भी खुद है, वह बतलाता है कि हर तरह की चाहे जैसी भी कार लेनी हो उसे फलानी जगह से लिया जा सकता है। फिर क्या था अपना वह मासूम सा कुत्ता भी कार ले आता है और बिंदास सडकों पर दौड़ाता है। अभी तक यह पता नहीं चला है कि उस पर किसी ट्रैफिक संभालने वाले की नज़र पड़ी है कि नहीं।           


चलो ठीक है अपुन को क्या लेना-देना कि विज्ञापन यह क्यों नहीं बताता कि उस जगह से क्या सिर्फ कुत्ते ही कार खरीद सकते हैं ? या पेमेंट कैसे होगा ? पर यह सवाल काफी परेशान कर रहा था कि इंसानों की कारें तो उनके घरों से चोरी हो जाती हैं तो इन बेचारों ने कार ले भी ली तो वे उसकी हिफाजत, देख-रेख तथा पार्क कहां करेंगे ? और अभी कोई ऐसी खबर भी नहीं है कि इन लोगों के लिए कोई "हाउज़िंग सोसाइटी" भी बन गयी है। उधर लोगों ने तो अपनी कारें खड़ी करने के लिए पार्कों -उद्यानों तक को नहीं बक्शा है ! खैर पार्किंग तो आपसी समझ-बुझ से ये अपनी गलियों में ही कर लेंगे क्योंकि वहां के तो ये शेर होते हैं, पर सवाल यह है कि बिना घर-बार वाले ये प्राणी अपनी गाड़ियों को महफूज कैसे रख पाएंगे  ?  पर एक दिन अचानक मुझे उसका हल दिख गया। तब पता चला कि मेरी चिंता कितनी निर्रथक थी। अरे जो पूरे मोहल्ले भर की चौकसी-निगरानी कर सकता है वह अपनी कार नहीं संभाल पाएगा, विश्वास न होता हो तो खुद ही देख लीजिए !!! 

इस तरह कई मसले भी एक साथ सुलझ जाते हैं, जैसे कार मालिक होने का गरूर, दूसरे उसकी हिफाजत और तीसरे खुद ओढ़ी हुई मोहल्ले की निगरानी की जिम्मेदारी :-)

शनिवार, 22 अगस्त 2015

ये लोग आस्तिक हैं या नास्तिक

  1. इन तथाकथित बाबा या स्वयंभू संतों का मकड़जाल ठीक तालाबों में उगी जलकुंभी की तरह होता है जो देखने में तो बहुत खूबसूरत होती है पर उसका प्रभाव जल और जलजीवों के लिए जानलेवा होता है।  सवाल यह है कि ऐसे लोग किस श्रेणी में आते हैं, आस्तिक या नास्तिक। 

  2. मोटे तौर     पर नास्तिक    उन लोगों को    कहा जाता है जो   भगवान  या  किसी  परा-शक्ति के अस्तित्व पर विश्वास नहीं करते।   उनके अनुसार यह सब मनुष्य द्वारा गढ़ित मान्यताएं ही हैं।    ऐसे लोग किसी भी संप्रदाय के हो सकते हैं। इस मामले में लोगों को  दो  भागों में बांटा जा सकता है, पहले वो जो ईश्वर में विश्वास करते हैं और    दूसरे वो जो उसके अस्तित्व को सिरे से ही नकार देते हैं। बहस का मुद्दा यह नहीं है कि भगवान है या नहीं, बात यह है कि  उन ढोंगी व पाखंडी लोगों को हम क्या कहेंगे जो भगवान की आड़ लेकर जिंदगी की परेशानियों से त्रस्त  इंसानों की भावनाओं का फायदा उठा अपनी रोटी को घी से तर-बतर करते रहते हैं। 
  3. विडंबना तो यह है कि ऐसे लोगों की पोल खुलने के बावजूद अच्छे-भले पढ़े-लिखे लोग भी  किसी चमत्कार की आशा में उनके जाल में फसते चले जाते हैं। इनका व्यक्तित्व, इनका सम्मोहन, इनकी कलाकारी इतनी जबरदस्त होती है कि जैसे भंवरा फूल की कैद में खुद को फंसा लेता है वैसे ही लोग इन के वश हो जाते हैं।  इन तथाकथित बाबा या स्वयंभू संतों का मकड़जाल ठीक तालाबों में उगी जलकुंभी की तरह होता है जो देखने में तो बहुत खूबसूरत होती है पर उसका प्रभाव जल और जलजीवों के लिए जानलेवा होता है। 
  4. सवाल यह है कि ऐसे लोग किस श्रेणी में आते हैं, आस्तिक या नास्तिक। आस्तिक तो ये हो नहीं सकते क्योंकि जो भी आस्तिक होगा उसकी भगवान के प्रति प्रेम, आस्था और श्रद्धा होगी। वह कोई भी गलत काम करने से पहले एक बार सोचेगा जरूर। किसी को हानि पहुंचाते वक्त एक अपराध बोध से जरूर ग्रसित होगा। हाँ नास्तिक के लिए ऐसी कोई अड़चन नहीं होती। उसके अनुसार तो ऐसा कोई है ही नहीं जो उसके कर्मों का लेखा-जोखा रख सके वह तो खुद ही अपनी मर्जी का मालिक होता है। ऐसे लोग खुद को भगवान का प्रतिनिधि और कभी तो खुद को ही भगवान साबित करने में गुरेज ना कर  प्रभू के प्रति लोगों के मन में वर्षों से जमे  विश्वास, आस्था तथा समर्पण जैसी भावनाओं का भरपूर इस्तेमाल कर उनका हर प्रकार का शोषण करने से बाज नहीं आते। मजे की बात यह है कि शोषित भी अपने नुक्सान को प्रभुएच्छा मान अपने तथाकथित गुरु को दोषी नहीं मानता। ऐसे नास्तिक लोग आस्तिकता का जामा पहन आस्तिक लोगों को नास्तिकता का डर दिखा अपना उल्लू सीधा करते हैं और करते रहेंगें।  

गुरुवार, 20 अगस्त 2015

उनकी लियाकत मुझे उनको कभी भूलने नहीं देती

देबू उस दिन मूड में था, उसने बताया कि उसकी कहीं पहुँच वगैरह नहीं हैं। वह तो पंद्रह-बीस छात्रों से पैसा लेकर कहीं घूमने निकल जाता है। उन पंद्रह-बीस में से आधे से ज्यादा तो जैसे-तैसे खुद ही पास हो जाते हैं, उन पर अपना रुआब जता उनके पैसे रख लेता हूँ और जो बिल्कुल ही निक्खद्ध होते हैं उन पर एहसान जता उनके पैसे वापस कर देता हूँ।    
                   
बचपन या युवावस्था के कुछ लोग ता-उम्र याद रहते हैं। मुझे भी ऐसे दो बंदे कभी नहीं भूलते। हालांकि वे मेरे कोई जिगरी दोस्त नहीं थे पर उनकी लियाकत ने उनको  कभी भूलने नहीं दिया। उनमें से एक गुजराती था, कल्पेश पटेल तथा दूसरा बंगाली, देव बनर्जी, जिसे सब देबू कह कर बुलाते थे।  अलग समाज, अलग परिवेश, अलग संस्कृति में पले-बढे पर एक बात समान थी दोनों में, वह थी व्यवसायिक बुद्धि। ऐसा माना जाता है कि गुजराती भाईयों में व्यवसायिक अक्ल जन्मजात होती है पर देबू तो एक ऐसे समाज से था जहां के लोग नौकरी को सदा तरजीह देते आए हैं। एक बात और दोनों में समान थी, उनकी शारीरिक बनावट, दोनों सींकिया पहलवान थे। शरीर से कमजोर पर दिमाग के धनी। कल्पेश के और मेरे बाबूजी एक ही जगह काम करते थे। हम दोनों बचपन में साथ ही पले-बढे। देबू से कॉलेज में क्रिकेट टीम में साथ होने की वजह से जान-पहचान हुई।   

पहले बात कल्पेश की, उच्च-मध्यम वर्गीय परिवार का युवावस्था में कदम रखता लड़का। उसने करीब चालीस साल पहले कल्पना कर ली थी कि यदि किसी "हेयर कटिंग सेलून" को वातानुकूलित बना दिया जाए तो बंगाल की तकलीफदेह उमस से राहत दिलाने के कारण उसकी आमदनी में दस गुना वृद्धि हो सकती है। हम सब ने इस बात को सिर्फ कपोल-कल्पना समझ हंसी में उड़ा दिया था। यह बात तब की है जब ए.सी. युक्त होना बहुत बड़ी बात मानी जाती थी। उस समय कलकत्ता में गिने-चुने सिनेमाघर या बहुत बड़ी कंपनियों के ऑफिस ही इस नियामत से लैस हुआ करते थे। आज जब दो कुर्सी वाली हज्जाम की दुकान को भी वातानुकूलित देखता हूँ तो  कल्पेश को सलाम करने की इच्छा होती है। वैसे आज वह गुजरात में एक सफल व्यावसायिक के रूप में जाना जाता है।                

रही बात देबू की। उसकी बुद्धि में थोड़ी ठगी का तड़का लगा हुआ था।  आज की तरह ही उस समय भी अक्ल के अधूरे गाँठ के पूरे छात्रों की स्कूल-कालेजों में कमी नहीं हुआ करती थी। ऐसे ही बकरे, निम्न मध्यम वर्गीय देबू की जिंदगी की गाडी को खींचने में परोक्ष रूप से उसके सहायक हुआ करते थे। उसने दबे-छिपे और कुछ-कुछ पोशीदाई का मुल्लमा चढ़ा, अपने चमचों द्वारा कॉलेज में यह बात फैला रखी थी कि युनिवर्सिटी में उसकी बहुत ऊंची पहुँच है और वह किसी को भी पास करवा सकता है चाहे पेपर कितना भी खराब हुआ हो। उस जमाने में पांच सौ रुपये एक अच्छी-खासी रकम हुआ करती थी जिसे वह प्रति छात्र लिया करता था। उसका दावा था कि यदि किसी कारण से कोई छात्र पास नहीं होता है तो उसकी पूरी रकम वापस कर दी जाएगी और अपने वादे से कभी न टलने के कारण उसकी दुकानदारी कभी भी मंदी नहीं पड़ती थी। 

खेलों के दौरान जब उससे कुछ आत्मीयता बढ़ी तो मैंने एक दिन उसकी सफलता का राज पूछ ही लिया। उसने जो बताया उसे जान मैं तो भौंचक्का सा उसे देखता ही रह गया ! देबू उस दिन मूड में था, किसी और को ना बताने की शर्त पर उसने बताया कि उसकी कहीं पहुँच वगैरह नहीं हैं। वह तो पंद्रह-बीस छात्रों से पैसा लेकर कहीं घूमने निकल जाता है। उन पंद्रह-बीस में से आधे से ज्यादा तो जैसे-तैसे खुद ही पास हो जाते हैं, उन पर अपना रुआब जता उनके पैसे रख लेता हूँ और जो बिल्कुल ही निक्खद्ध होते हैं उन पर एहसान जता उनके पैसे वापस कर देता हूँ। साफ-सुथरा काम। ना कोई झमेला ना किसी तरह की सिरदर्दी। 

सोचता हूँ आजकल के तथाकथित बाबा लोग धर्म, जादू-टोने की आड़ में तरह-तरह के प्रपंच रच लोगों को बेवकूफ बनाने की जो नौटंकी कर रहे हैं वह तो वर्षों पहले की देबू के दिमाग की खेती है ! पता नहीं आज वह कहाँ होगा पर जहां भी होगा उसका धंदा, मंदा नहीं पड़ा होगा।              

बुधवार, 19 अगस्त 2015

बाहुबली का सम्मोहन बल

इतना प्रचार, इतनी प्रशंसा, इतनी लोकप्रियता वह भी एक दूसरी भाषा से हिंदी में "डब" की गयी फ़िल्म की। आखिरकार सोचा कि उतर जाए उसके पहले देख ही लिया जाए सो पिछले गुरुवार को "बाहुबली" के अंतिम शो का आचमन कर ही डाला। फ़िल्म सचमुच भव्यता की मिसाल है। इसकी जान आधुनिक तरीके से फिल्माया गया उच्च कोटि का फिल्मांकन है जो किसी भी फ़िल्म से उन्नीस नहीं ठहरता। दर्शक कैमरे और कंप्यूटर की   जुगलबंदी में सम्मोहित हो कर रह जाता है।  इसका सबसे बड़ा उदाहरण यही है कि धर्म के नाम पर  बखेड़ा खड़ा कर अपनी रोटी सेकने वालों को भी किसी दृश्य पर कोई आपत्ति नहीं  हुई। 

हॉल में बैठे हुए लगता है जैसे आप कैमरे से फ़िल्म देख रहे हों। सिर्फ यही बात दर्शकों को बांधे रखती है। रही कहानी की बात तो भारत ही नहीं विश्व के राजघरानों में इस तरह के षड्यंत्रों पर दसियों बार भव्य पिक्चरों का निर्माण हो चुका है। बाहुबली के लिए इसके लेखक श्री विजयेंद्र प्रसाद ने पौराणिक और इतिहास की घटनाओं से प्रेरित हो इसकी पटकथा का ताना-बाना बुन डाला है। फ़िल्म देखते हुए किसी पात्र को देख भीष्म पितामह की याद आती है,  तो नायक का भाग्य कर्ण से मिलता-जुलता नज़र आता है। कभी पन्ना धाय का पात्र सजीव होता लगता है कभी "बेनहर" की रथ दौड़ जेहन में छा जाती है तो युद्ध की कल्पना हेमू और बाबर की सेनाओं की असमानता को दर्शाती है, यही नहीं बाबर ने जैसे अपनी हार की कगार पर खड़ी पस्त सेना में अपने जोशीले भाषण से जान फूंक कर विजय हासिल की थी ठीक वही क्षण फिर साकार कर दिए गए हैं। पर इस सब के बावजूद फ़िल्म के पात्र आपके साथ घर तक चले ही आते हैं। जो इसके दूसरे भाग तक आप को फिर खींच कर ले जाएंगे।      

विशिष्ट पोस्ट

जिसने सबसे ज्यादा विभिन्न रोगग्रस्त पात्रों का किरदार निभाया

अनेकों बार  Autism, Dyslexia, Progeria, Paraplegia, Alzheimer, Amnesia, Schizophrenia जैसी अनेक  बीमारियों पर, जिनका नाम भी आम लोगों ने सुना...