बुधवार, 1 अक्टूबर 2014

कोलकाता की "सफ़ेद-पोश" पुलिस

पश्चिम -बंगाल देश का अकेला राज्य है जहां की पुलिस के लिए दो तरह के रंग की "ड्रेस" निर्धारित की गयी है। महानगरीय पुलिस के लिए सफेद तथा बाक़ी के लिए खाकी।  


पश्चिम-बंगाल और कोलकाता प्रवास के दौरान बाहर से आए पर्यटकों ने वहां की पुलिस में कुछ को खाकी और कुछ को सफेद रंग की वर्दी  में देखा होगा। देश के बाक़ी हिस्सों में रहने वालों के मन में भी फिल्मों में कोलकाता की पुलिस दिखाई जाते समय उसके खाकी के बदले सफेद कपड़ों के बारे में शायद ही जिज्ञासा उत्पन्न हुई हो। पर जब देश के सारे हिस्सों में खाकी-वर्दी का बोल-बाला है तो कोलकाता की पुलिस सफेद-पोश क्यों ?  ज्यादातर लोग इस बात पर गौर नहीं करते।  पर इसका भी  कारण है।    

जब कभी घूमने-फिरने की बात आती है तो कोलकाता का नाम बाकी जगहों के काफी बाद आता है। जबकी अंग्रेजों के राज में हर बात में अग्रणी बंगाल का यह भव्य नगर  1911 तक  देश की राजधानी रहा था। यह कहावत काफी दिनों तक लोगों की जुबान पर रही थी कि वर्तमान में जो  बंगाल सोचता है वही भविष्य में देश की सोच होती है। गुलामी का समय था, पर बंगाली नौजवानों ने अंग्रेजों की नाक में दम कर रखा था। उन्हें देश छोड़ने को बाध्य करने के लिए हिंसक और अहिंसक दोनों मार्ग अख्तियार किए जाते रहे थे। फिर भी अराजकता की स्थिति होने के बावजूद अंग्रेजों ने राजधानी "कलकत्ता" की शानो-शौकत को बढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी।  आज भी उस जमाने के बनी महलनुमा इमारतें दर्शनीय हैं। इसीलिए कोलकाता को "महलों का शहर" भी कहा जाता है।  
सहायक के रूप में 
इसके व्यवस्थित और संस्थागत रख-रखाव के लिए उन्नीसवीं सदी के मध्य में 1856 में पुलिस विभाग में भी कई आमूल-चूल परिवर्तन किए गए। लंदन पुलिस की तरह गुप्तचरों को भर्ती किया गया। पुलिस को शांति-व्यवस्था बनाए रखने के लिए ख़ास अधिकार भी दिए गए। उसी समय प्रदेश की पुलिस से कलकत्ता पुलिस को अलग कर उसे एक अलग संगठन का रूप दे दिया गया तथा उस समय के मुख्य न्यायाधीश को इसका पहला कमिश्नर बनाया गया। इस तरह तब से कोलकाता में दो पुलिस फोर्स काम कर रहीं हैं, पहली वेस्ट-बेंगाल पुलिस तथा दूसरी कोलकाता पुलिस। कोलकाता पुलिस के अंतर्गत महानगरीय इलाका आता है जबकि वेस्ट-बेंगाल पुलिस बाकी इलाकों की देख-भाल करती है।       
प. बंगाल की खाकी वर्दी 
उसी समय कलकत्ता पुलिस को प्रदेश की पुलिस से अलग पहचान देने के लिए, खाकी के बदले सफेद वर्दी याने यूनिफार्म प्रदान की गयी।  बंगाल देश का अकेला राज्य है जहां की पुलिस के लिए दो तरह की "ड्रेस" निर्धारित की गयी है। यहां की यातायात पुलिस को एक और सुविधा मिली हुई थी जो देश की किसी अन्य पुलिस को उपलब्ध नहीं थी, और वह है कमर की बेल्ट में छाते को लगाने की सुविधा। जिससे यातायात नियंत्रण के लिए हाथ भी खाली रहते थे  और सूर्य की तीखी रौशनी से भी बचाव हो जाता था।  पता नहीं देश के अन्य प्रदेशों की पुलिस के आला अफसर अपने जवानों को यह सुविधा क्यों नहीं प्रदान करते ? 

रविवार, 21 सितंबर 2014

शिक्षा के 'ग्यारह' बजाने वाले

इसका हल तो तभी निकल सकता है जब शिक्षा विभाग की बाग-डोर राजनयिकों के हाथ से निकाल कर शिक्षा के सही जानकारों को सौंप दी जाए और उन पर किसी लाल-पीले-नीले फीते की बंदिश न हो।  नहीं तो आने वाले समय में इस देश में इतने पढ़े-लिखे अनपढ़ हो जाएंगे जो अपने आप  में ही एक समस्या होंगे।   


खबर है कि राष्ट्रीय चैनल दूरदर्शन ने चीनी राष्ट्रपति के नाम "शी जिनपिंग" के पहले नाम "Xi" को रोमन गिनती का नंबर समझ उसे "इलेवन" पढने वाली एंकर को  बर्खास्त कर दिया है। अब वहाँ के जिम्मेदार लोग सफाई देते फिर रहे हैं कि वह तो "कैजुएल" कर्मी थी। वर्तनी की ऐसी गलतियां इस चैनल पर होना आम है पर आज  दूरदर्शन पर चीनी राष्ट्रपति का नाम जिस तरह पढ़ा गया वह तो "ब्लंडर" था। ऐसे समय जब किसी राष्ट्राध्यक्ष, वह भी ऐसे अहम देश के, बारे में बुलेटिन हो तब तो ख़ास एहतियात बरती जानी बहुत जरूरी थी। पर हुआ इसका उल्टा, तो फिर इस विशेष अवसर को "कैजुएली" लेते हुए एक "कैजूएल" वाचक को वहाँ बैठने की अनुमति देने वाले को भी उतना ही दोषी माना जाना चाहिए।                      

कहते हैं और सुनने में आता है कि समाचार वाचक जो कैमरे के रूबरू हो कर समाचार पढ़ते हैं वे भाषा में पारंगत होते हैं तथा पढ़ते समय सौ प्रतिशत शुद्ध उच्चारण के प्रति प्रतिबद्ध होते हैं। ऐसे लोगों से अच्छे सामान्य ज्ञान, समसामयिकी के बोध और प्रत्युत्पन्नमति होने की भी अपेक्षा रहती है। यहां तक कि छात्रों को सलाह दी जाती है कि वे खबरें सुन अपनी भाषा सवारें। पर आज तक जिस तरह हर चैनल पर भाषा की बेकद्री हो रही है तो कोई क्या सीखेगा और क्या समझेगा। 
आठवीं कक्षा तक बिना किसी रुकावट के और उसके बाद भी प्रतिस्पर्धा नहीं के बराबर होने का परिणाम क्या निकलेगा यह कभी गंभीरता से सोचा भी है नीतियां निर्धारित करने वालों ने।    
देखा जाए तो क्या फर्क है अंगूठा लगाने और सिर्फ तीन-चार अक्षरों का नाम लिख लेने में, जबकि अपने हस्ताक्षर करने वाले को यही मालुम न हो कि वह जिस कागज़ पर अक्षर जोड़-जोड़ कर अपना नाम लिख रहा है उसका मजमून क्या है। आज छात्रों को College और Collage या Principal और Principle में फर्क नहीं पता। अंग्रेजी को तो छोड़ें हिंदी तक में स्नातक स्तर  के छात्र ढंग से एक प्रार्थना-पत्र तक नहीं लिख पाते। 
कहावत है कि नींव मजबूत होने पर ही इमारत बुलंद हो सकती है. पर जहां नींव ही हवा में हो वहाँ क्या आशा की जा सकती है।  यही कारण है कि तरह-तरह के प्रलोभन दे बच्चों को हांक कर स्कूल तो ले आया जाता है पर जैसे-जैसे ऊंची कक्षाएं सामने आती हैं बच्चों की संख्या नीची होती जाती है.
पत्र अपनी कहानी खुद कह रहा है 
इसी के साथ देश में खुली सैंकड़ों-हजारों पढ़ाई की दुकाने कैसे शिक्षार्थीयों का उत्पादन कर रही हैं उस पर भी शिक्षा विभाग को ध्यान देने की जरूरत है। ज्यादातर इन रट्टू तोतों के हाथ में किसी भी तरह हासिल की गयी विश्व-विद्यालयों की सिर्फ कागज की डीग्री होती है शिक्षा नहीं। इनका एक ही मकसद होता है येन-केन-प्रकारेण सरकारी नौकरियों को हथियाना, क्योंकि प्रायवेट लिमिटेड कंपनियों के यहां इनकी दाल नहीं गलती। हर साल हजारों लाखों इंजीनियर, एम. बी. ए., पोस्ट ग्रैजुएट, बी. एड. पैसों के बदले उपाधियां जुगाड नौकरियों के लिए धक्के खाते दिख जाते हैं। क्या यह सब हमारी शिक्षा प्रणाली का दोष नहीं है ? क्या शिक्षा को तमाशा बनाने वाले तथाकथित शिक्षा विदों से इस बेकारी का जवाब मांगा जाता है ?  क्या हर साल इस पर प्रयोग करने वालों ने कभी देश के भविष्य के बारे में सोचा है ? जवाब एक ही है, नहीं !!! और सोचेगा भी कौन जबकि दुधारू गाय बन गया है यह शिक्षा का व्यवसाय और अधिकाँश संस्थान खुद नेताओं द्वारा स्थापित किए गए हैं।  इसीलिए अधिकांश फैसले देश को नहीं अपनी कुर्सी को मद्दे-नज़र रख किए जाते हैं। आज अंग्रेजी के फैशन के चलते न तो कोई ढंग से हिंदी बोल-लिख पाता है ना ही अंग्रेजी। सरकार को भी साक्षर की परिभाषा बदलने की जरूरत है।देखा जाए तो क्या फर्क है अंगूठा लगाने और सिर्फ तीन-चार अक्षरों का नाम लिख लेने में, जबकि अपने हस्ताक्षर करने वाले को यही मालुम न हो कि वह जिस कागज़ पर अक्षर जोड़-जोड़ कर अपना नाम लिख रहा है उसका मजमून क्या है। आज छात्रों को College और Collage या Principal और Principle में फर्क नहीं पता। अंग्रेजी को तो छोड़ें हिंदी तक में स्नातक स्तर के छात्र ढंग से एक प्रार्थना-पत्र तक नहीं लिख पाते। 

विडंबना है कि शिक्षित करने का जिम्मा इनका रहेगा 
सिर्फ अपना नाम लिख लेने से ही कोई साक्षर नहीं हो जाता, जैसा दिखा-दिखा कर कर सरकारी महकमे अपनी पीठ थपथपाते रहते हैं।
कहावत है कि नींव मजबूत होने पर ही इमारत बुलंद हो सकती है. पर जहां नींव ही हवा में हो वहां क्या आशा की जा सकती है? यही कारण है कि तरह-तरह के प्रलोभन दे बच्चों को हांक कर स्कूल तो ले आया जाता है पर जैसे-जैसे ऊंची कक्षाएं सामने आती हैं बच्चों की संख्या नीची होती जाती है. साथ दिए दोनों पत्र आज के स्नातक और भावी शिक्षकों की पोल खोल रहे हैं।   

इसका हल तो तभी निकल सकता है जब शिक्षा विभाग की बाग़-डोर राजनयिकों के हाथ से निकाल कर शिक्षा के सही जानकारों को सौंप दी जाए और उन पर किसी लाल-पीले-नीले फीते की बंदिश न हो।  नहीं तो आने वाले समय में इस देश में इतने पढ़े-लिखे अनपढ़ हो जाएंगे जो अपने आप  में ही एक समस्या होंगे।   

शुक्रवार, 12 सितंबर 2014

सिर्फ पीसा की मीनार ही झुकी हुई नहीं है




पीसा के अलावा दसियों ऐसी इमारतें हैं जो सीधी न हो कर किसी एक तरफ झुकी हुई हैं। वे पीसा जितनी ना सही पर अपने आप में अजूबा जरूर हैं। अपने देश में भी है एक अनोखा शिव मंदिर। यह  विश्व का अकेला  मंदिर है जो एक तरफ झुका हुआ है।  

हुमा मंदिर, उड़िसा  
आम धारणा है कि इटली में स्थित पीसा की मीनार ही दुनिया में अकेली झुकी हुई इमारत है। जबकि सच्चाई यह है कि  उसके अलावा भी दर्जनों ऐसे निर्माण हैं जो धरती पर सीधे न खड़े रह पा कर किसी एक ओर झुक गए हैं। इसका कारण चाहे भूकंप हो, चाहे उस स्थान की सतह में कोई गड़बड़ी हो या फिर वातावरण का असर हो।  हालांकि आज की उन्नत तकनीक के कारण उनका संरक्षण असंभव नहीं रह गया है।  अब तो खुद इंजीनियर और वास्तुकार भी इमारतों को अलग रूप देने के लिए उन्हें टेढ़ा-मेढ़ा, चक्राकार या झुका हुआ रूप देने लगे हैं। पीसा के अलावा दसियों ऐसी इमारतें हैं जो सीधी न हो कर किसी एक तरफ झुकी हुई हैं। वे पीसा जितनी ना सही पर अपने आप में अजूबा जरूर हैं।                      

हमारे अपने देश में भी इस तरह की एक इमारत है। जो ओडिसा राज्य के संबलपुर जिले से 23 की.
मंदिर में बिंबलेश्वर महादेव 
मी. दूर गांव हुमा में महानदी के किनारे स्थित है। यह एक शिव मंदिर है जहां शिव जी का विम्बलेश्वर रूप स्थापित है। यह मंदिर एक  200 x 120 फिट के चबूतरे पर बना हुआ है। वर्षों पहले इसने अपनी नींव से उत्तर-पूर्व की और बहने वाली नदी की ओर  झुकना शुरू किया था पर आश्चर्यजनक रूप से पिछले पचास सालों से यह स्थिर बना हुआ है। इसका झुकना और थमना अभी भी एक रहस्य बना हुआ है।  सबसे चमत्कृत करने वाली बात यह है कि उस परिसर की चीज झुकी हुई अवस्था में है पर जिधर मंदिर झुका है उसकी विपरीत दिशा में। फिर वह चाहे छोटे मंदिर हों या फिर चारदीवारी। यहां दूर-दूर से लोग आते हैं और मार्च के महीने में शिव-रात्रि पर भव्य मेला भी लगता है।   

   
 ऐसी ही एक ईंटों से बनी मीनार है, रूस के कजान शहर में वोल्गा नदी के तट के पास जो पीसा की मीनार से भी दो मीटर ऊंची है। इसे Soyembika  मीनार के नाम से जाना जाता है। छह मंजिला, 58 मीटर ऊंची यह इमारत करीब  1. 87 मीटर झुकी हुई है।  समय के साथ कमजोर होती इस मीनार की नींव में पंपों के जरिए कंक्रीट भर कर इसे मजबूती प्रदान की गयी, जिससे इसके गिरने का खतरा टल गया। इसको रूसी जार इवान द टेरीबल ने अपनी प्रेमिका के लिए जल्दबाजी में तैयार करवाया था।     
 रूस के ही NEVYANSK शहर में एक ऎसी इमारत है जो अपनी नींव से दाहिनी तरफ करीब सात फुट तक झुकी हुई है। 57. 6 मीटर ऊंची, सैंकड़ों टन के वजन वाली इस मीनार के झुकने का कारण इसके नीचे स्थित जल-परवाह को माना जाता है जिसके कारण इसकी नींव का छरण होने की वजह से यह एक और को झुक गयी। समय रहते इसको बचाने के प्रयासों के कारण इसे संरक्षित करना संभव हो पाया।  इसे किस लिए बनाया गया था इसके बारे में तरह-तरह की अटकलें प्रचलित हैं। कोई इसे  "वाच टॉवर" और कोई  कैदखाना बताता है। जो भी हो यह है अपने आप में  एक नमूना है।  

झुकी हुई इमारतों की श्रेणी में सर्वोपरि है जर्मनी का एक चर्च जिसे  Suurhusen Tower के नाम से जाना जाता है।  गिनीज रेकार्ड के अनुसार तेरहवीं शताब्दी में बनी यह विश्व की सबसे ज्यादा झुकी हुई, 90 फिट ऊंची इमारत है जो अपनी नींव से करीब 5.19 डिग्री का कोण बना चुकी है। इसकी नींव लकड़ी से बनाई गयी थी जो जमीन की नम मिट्टी के कारण अपने भार को संतुलित न कर पाई और एक ओर झुकती चली गयी।  पर स्थानीय निवासियों और इंजीनियरों की मेहनत से आज यह चर्च सर उठाए खड़ा  है।    

ऐसी कई इमारतें और मीनारें हैं जो इस तरह की अवस्था में सैलानियों को आकर्षित करती हैं पर उतनी विख्यात नहीं हैं जितनी पीसा की झुकी मीनार। उनकी खोज-खबर फिर कभी।    

शुक्रवार, 5 सितंबर 2014

गणेश जी को भेजे गए पत्रों को पहुंचाने के लिए नियुक्त है एक डाकिया

जब श्री कृष्ण जी और रुक्मणी का विवाह निश्चित हुआ तो भूल-वश गणेश जी को निमंत्रण नहीं भेजा जा सका। इससे उनके वाहन मूषक को क्रोध आ गया और मूषक सेना ने बारात के पूरे रास्ते को ऐसा काट-कुतर दिया कि उस पर चलना असंभव हो गया। 

हमारे देश में लोगों में सर्वोच्च सत्ता के प्रति जितनी आस्था है, विश्वास है, समर्पण है वैसा शायद और किसी देश में नहीं होगा. ऐसा इसलिए क्योंकि हमारे दूरदर्शी विद्वान पूर्वजों ने शायद आने वाली नस्लों की उच्श्रृंखलता का अंदाज लगा लिया होगा इसीलिए प्रकृति और मानवता को बचाने के लिए उन्होंने उसी समय से तरह-तरह के उपायों की घुट्टी किस्से-कहानियों, उपदेशों व शिक्षा के जरिए पिलानी शुरू कर दी
त्रिनेत्र गणेश 
थी। उसी का परिणाम है की आज हम पशु-पक्षियों में, पेड़-पौधों में, नदी-समुद्र में, यहां तक कि  चित्रों-मूर्तियों में भी प्रभू की मौजूदगी को मानते हैं। अपने दुःख-सुख में उन्हें भागीदार बनाते हैं। हर तरफ से निराश-हताश हो जाने पर या किसी अनहोनी से सुरक्षा पाने के लिए उनकी शरण में शांति की गुहार लगाते हैं। हमारे इतने विशाल देश में जितनी तरह की संस्कृतियां, रस्मो-रिवाज तथा मान्यताएं हैं, उतनी ही तरह की उन्हें पूरा करने और मनाने की विधियां और आस्थाएं हैं। ऐसी ही एक अनोखी और अनूठी परंपरा है, राजस्थान के रणथम्भोर किले में स्थित श्री गणेश जी को विवाहोत्सव पर पहला निमंत्रण देने की। फिर वह चाहे खुद जा कर दिया जाए या फिर पत्र द्वारा। खुद उपस्थित हो कर हजारों श्रद्धालू अपना प्रेम तो प्रगट करते ही हैं पर यह शायद दुनिया का अकेला मंदिर है जहां देश और दुनिया भर से रोज हजारों की संख्या में गणेश जी को निमंत्रण देने के लिए डाक से पत्र भी आते हैं और यह सिलसिला सालों-साल से चला आ रहा है। इन पत्रों को गणेश जी तक पहुंचाने के लिए भारतीय डाक विभाग ने अलग से एक डाकिया नियुक्त किया हुआ है जो रोज तकरीबन दस किलो भार के निमंत्रण पत्र मंदिर तक पहुंचाता है। मंदिर में पहुंचते ही यदि पत्र हिंदी या अंग्रेजी में हो तो पुजारी जी उसे खुद पढ़ कर गणेश जी को सुनाते हैं पर यदि किसी और भाषा में पत्र लिखा गया हो तो उसे खोल कर गणेश जी के सामने रख दिया जाता है।  ऐसी मान्यता है कि गणेश जी को निमंत्रित करने से विवाह बिना किसी विघ्न के पूर्ण हो जाता है।  
गणेश मंदिर, रणथम्भोर 


ऐसी परंपरा क्यों शुरू हुई उसकी एक कथा है। कहते हैं जब श्री कृष्ण जी और रुक्मणी का विवाह निश्चित हुआ तो भूल-वश गणेश जी को निमंत्रण नहीं भेजा जा सका। इससे उनके वाहन मूषक को क्रोध आ गया और मूषक सेना ने बारात के पूरे रास्ते को ऐसा काट-कुतर दिया कि उस पर चलना असंभव हो गया। इस विघ्न को दूर करने के लिए विघ्न-हर्ता से प्रार्थना की गयी और उन्हें प्रसन्न करने के पश्चात ही विवाह संपन्न हो पाया। कहते हैं तब से गणेश जी को पहला निमंत्रण भेजने की यह प्रथा चली आ रही है।

रोज आने वाले इन हजारों लाखों पत्रों का क्या किया जाए यह भी एक विचारणीय प्रश्न था मंदिर की समिति के सामने।  उन्हें ऐसे ही नष्ट नहीं किया जा सकता था, हजारों-लाखों लोगों की आस्था जुड़ी हुई थी उन पत्रों से। फिर इसका उपाय निकाला गया।  साल भर तक तो उन पत्रों को संजो कर रखा जाता है फिर उनकी लुग्दी बना विभिन्न क्रियाओं से गुजार कर फिर कागज़ बना लिया जाता है। 

दर्शन करने और निमंत्रण देने आए भक्त 
गणेश जी का यह प्राचीन मंदिर सवाई माधोपुर से बारह कि. मी. दूर रणथम्भोर के किले में स्थित है। कहते हैं कि 1299 में राजा हम्मीर और अल्लाउद्दीन ख़िलजी में जब युद्ध शुरू हुआ तो हम्मीर ने प्रजा और सेना की जरूरतों को देखते हुए ढेर सा खाद्यान और जरूरत की वस्तुओं को सुरक्षित रखवा लिया था।  पर युद्ध लंबे अरसे तक खिच जाने की वजह से हर चीज की तंगी होने लगी थी।  राजा, जो गणेश जी का भक्त था,  हताश और परेशान हो उठा। तभी रात को उसे स्वप्न में गणेश जी ने दर्शन दे कहा कि चिंता मत करो कल युद्ध समाप्त हो जाएगा।  दूसरे दिन सुबह गणेश जी की एक तीन नेत्रों वाली आकृति किले की दिवार पर उभर आई और आश्चर्य जनक रूप से  उसी समय युद्ध भी समाप्त हो गया, जब ख़िलजी की सेना अपनी घेराबंदी ख़त्म कर वापस लौट गयी। राज्य फिर से धन-धान्य से परिपूर्ण हो गया। हम्मीर ने 1300 में भगवान गणेश के इस मंदिर का निर्माण करवाया। जिसमें गणेश जी के अलावा उनकी पत्नियों ऋद्धि-सिद्धि तथा
उनके पुत्रों शुभ-लाभ के साथ-साथ उनके वाहन मूषक की भी प्रतिमा स्थापित की गयी है।

यहां जाने के लिए देश के हर हिस्से से सुविधा उपलब्ध है। उसके लिए सवाई माधोपुर पहुँचना होता है। जहां के लिए रेल सुविधा के अलावा बढ़िया सड़क मार्ग भी उपलब्ध है। यहां से रणथम्भोर की दूरी सिर्फ ग्यारह कि. मी. की है। इसके अलावा कोटा से भी आसानी से यहां जाया जा सकता है।         

गुरुवार, 28 अगस्त 2014

क्या आँखों देखा सदा सच होता है ?

सदा से धारणा रही है की कानों सुनी पर विश्वास नहीं करना चाहिए, जब तक कि आँखों से देख नहीं लिया जाए. पर क्या आँखें सदा सच दिखलाती हैं ?  नीचे दिए चित्र तो कुछ और ही बताते हैं :-

लगता नहीं कि मोहतरमा जादुई कालीन पर खड़े हो भाषण दे रही हैं ? 


ये क्या ?  इतना धुँआ वह भी मूर्ती के बिगुल से ?

गजब! मुंह से इन्द्रधनुष 



ये कौन है भाई ? अर्द्ध घोडीश्वर 
तो अब क्या विचार है ?  

शुक्रवार, 22 अगस्त 2014

यह कहानी है "टूथ पेस्ट" की


जब कोई  वस्तु आसानी से उपलब्ध हो तो उस पर या उसकी उत्पत्ति पर ध्यान नहीं जाता। पर किन हालात में उसका आविष्कार कैसे, क्यों और कब हुआ, यदि यह सोचा जाए तो काफी कुछ नयी जानकारी मिल जाती है। आज सुबह मुंह में झाड़ू लगाते समय ऐसे ही ख्याल आया कि "टुथ पेस्ट" का जन्म क्यों, कैसे और कब हुआ होगा ? पेस्ट के पहले मुंह साफ करने के लिए सूखे चूर्ण का उपयोग शुरू हुआ था। जिसमें अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग तत्व काम में लाए जाते रहे थे। अपने देश की बात करें तो यहां सदियों से सुबह सबसे पहले मुख साफ करने की प्रथा का विवरण मिलता है। चाहे वह विभिन्न वृक्षों की पतली टहनियों से बनाई गई दातौन हो या फिर नमक, फिटकरी, मिट्टी या कोयले की राख के  मंजन हों। विदेशों में हड्डी के चूरे के उपयोग का भी विवरण मिलता है. पर ये सब सूखे चूर्ण के रूप में ही काम में लाए जाते थे। फिर सहूलियत को देखते हुए पेस्ट की ईजाद हुई होगी। हो सकता है पहला "पेस्ट" जो दांतों और मसूढ़ों को निरोग रखने के लिए प्रयोग में लाया गया हो वह अपने अौषधीय गुणों के कारण शहद हो, जिसने सूखे चूर्ण की जगह ली हो। वैसे हजारों साल पहले चीन, भारत और मिस्र में "टूथ पेस्ट" के चलन का विवरण मिलता है। चीन में नरम कोपलों, नमक, हड्डी के चूर्ण और सुगंधित फूलों की पंखुड़ियों को पीस कर  पानी में मिला गाढ़ा पेस्ट बना दाँतो को साफ करने का चलन था।  तरह-तरह के प्रयोग करते हुए उन्होंने इसमें जिनसेंग, जड़ी-बूटियों तथा नमक इत्यादि का भी खूब उपयोग किया।   


दुनिया भर में पेस्ट बनाने में तरह-तरह के तत्व काम में लाए गए।  अच्छी-बुरी हर वस्तु को आजमाया गया।यहां तक कि साबुन को भी इसमें मिलाया गया। क्योंकि उद्देश्य सिर्फ दांत साफ करना ही नहीं था बल्कि दुर्गन्धित सांस से छुटकारा पाने की भी इच्छा इसके पीछे थी। आज उपलब्ध पेस्ट का पितामह, पर्शियन संगीतकार "जिराइब" द्वारा ईजाद एक गाढ़े पदार्थ को माना जा सकता है। उसे किन चीजों से बनाया गया था यह जानकारी तो आज उपलब्ध नहीं है। पर वह चीज अपने उद्देश्य में खरी उतरती थी इसलिए अपने समय में काफी लोक-प्रिय थी। इस पर शोध होते रहे, अलग-अलग लोगों ने अलग-अलग जगहों पर इसे और लोकप्रिय बनाने का काम जारी रखा। पर पेस्ट को पूरा ध्यान 1850 में मिलना शुरू हुआ। उस समय पेस्ट को डिब्बों में भर कर बेचा जाता था, जिसे "Creme Dentifrice" नाम दिया गया था। इसी समय 1873 में कोलगेट का मंच पर अवतरण हुआ, जिसने व्यावसायिक तौर पर बड़े पैमाने में पेस्ट बनाने की शुरुआत की। इसी ने सबसे पहले 1890 में पेस्ट को ट्यूब में रख बाजार में उतारा। जिसका नाम "रिबन डेंटल क्रीम" रखा था, क्योंकि यह ट्यूब से रीबन की तरह निकलती थी। चूँकि यह ब्रश पर आसानी से लग जाती थी इसलिए ये बहुत जल्दी लोकप्रिय हो गयी। यह अपने आप में एक अनोखा आविष्कार था। पर आज जिस तरह की लचीली ट्यूब में हम पेस्ट को पाते हैं उसकी खोज सबसे पहले 1892 में वाशिंगटन शेफील्ड ने की थी। धीरे-धीरे पेस्ट को सुगंधित करने के साथ-साथ उसमें औषधीय गुणों वाले पदार्थों को भी सम्मिलित किया जाने लगा, जिससे मुंह की सफाई के साथ-साथ दांतों की बीमारियों और उनके पीलेपन से भी निजात मिल सके। समय के साथ-साथ बहुतेरी कंपनियां बाज़ार में अपने-अपने दावों के साथ आ दटीं और दुनिया भर के पेस्ट बाज़ार में उपलब्ध होने लगे। लोगों को लुभाने के लिए तरह-तरह के वादे किए जाने लगे, साथ ही रंग-बिरंगे पेस्ट के साथ जेल जैसा उत्पाद भी बाज़ार में आ गया। पहली बार दांत साफ करने वाले बच्चों के लिए भी बाज़ार में पेस्ट उपलब्ध है जो निगले जाने पर भी नुकसानदेह नहीं होता। जान कर आश्चर्य  होना स्वाभाविक है कि इसकी ईजाद "नासा" ने अंतरिक्ष यात्रियों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए की थी।  

समय के साथ-साथ लोगों का रुझान प्राकृतिक वस्तुओं की तरफ होने लगा है जिसको देखते हुए कंपनियों ने जड़ी-बूटियों से बने "हर्बल" पेस्ट भी बाज़ार में उतार दिए हैं।  धार्मिक ज्ञान या योग विद्या सिखाने वाली संस्थाएं इस तरह के उत्पादनों को बाज़ार में उतार चुकी हैं। वैसे इनमें से कई लाभप्रद भी साबित हुए हैं। अब तो घरेलू और पालतू जानवरों के लिए भी मुंह-दांत साफ करने के उत्पाद बाजार में उपलब्ध हैं।    

यानी पेस्ट अनंत, पेस्ट कथा अनंता हो गयी है।      

सोमवार, 18 अगस्त 2014

कौन थे वे छह शिशु जिन्हें कंस ने श्री कृष्ण के जन्म के पहले मारा था ?

आज उस महानायक का जन्म-दिवस है, जिसने पूरी दुनिया को अधर्म और अन्याय के खिलाफ खड़े होना सिखाया। जीवन-दर्शन का संदेश और ज्ञान गीता के द्वारा समझाया, भ्रमितों को राह दिखाई. दुखियों को न्याय दिलवाया। इसके लिए भारी कीमत भी चुकाई। जन्म लेते ही माँ-बाप से अलग होना पड़ा, जहां पला-बढ़ा, उस स्थान को भी छोड़ना पड़ा. बचपन से लेकर जीवन पर्यंत कठिन परिस्थितियों का सामना करने के बावजूद उसे बदनाम होना पड़ा, लांछन झेलने पड़े यहां तक कि  श्रापग्रस्त भी होना पड़ा. अपने जीवन काल में ही अपने वंश की दुर्दशा का सामना करना पड़ा पर इस सबके बावजूद चेहरे की मधुर मुस्कान को तिरोहित नहीं होने दिया। कभी अपने दुखों की काली छाया अपने भक्तों की आशाओं पर छाने नहीं दी. क्योंकि सभी का कष्ट हरने के लिए ही तो अवतार लिया था.     

समय द्वापर का था. बड़ी भीषण परिस्थितियां थीं. राज्याध्यक्ष उच्श्रृंखल हो चुके थे। प्रजा परेशान थी. न्याय माँगने वालों को काल कोठरी नसीब होती थी। अराजकता का बोल-बाला था. भोग-विलास का आलम छाया हुआ था। उस समय मथुरा का राज्य कंस के हाथों में था। वह भी निरंकुश व पाषाण ह्रदय नरेश था. वैसे तो वह अपनी बहन देवकी से बहुत प्यार करता था पर जबसे उसे मालूम हुआ था कि देवकी का आठवां पुत्र उसकी मृत्यु का कारण बनेगा तभी से उसने उसे काल कोठरी में डाल रखा था. किसी भी तरह का खतरा मोल न लेने की इच्छा के कारण कंस ने देवकी के पहले छह पुत्रों की भी ह्त्या कर दी। 
कौन थे वे अभागे शिशु ?                 

मथुरा जन्म भूमि 
ब्रह्मलोक में स्मर, उद्रीथ, परिश्वंग, पतंग, क्षुद्र्मृत व घ्रिणी नाम के छह देवता हुआ करते थे. ये ब्रह्माजी के कृपा पात्र थे. इन पर  ब्रह्मा जी की कृपा और स्नेह दृष्टि सदा बनी रहती थी. वे इन छहों की छोटी-मोटी बातों  और गलतियों पर ध्यान न दे उन्हें नज़रंदाज़ कर देते थे. इसी कारण उन छहों में धीरे-धीरे अपनी सफलता के कारण घमंड पनपने लग गया. ये अपने सामने किसी को कुछ नहीं समझने लग गए. ऐसे में ही एक दिन इन्होंने बात-बात में ब्रह्माजी का भी अनादर कर दिया. इससे ब्रह्माजी ने क्रोधित हो इन्हें श्राप दे दिया कि तुम लोग पृथ्वी पर दैत्य वंश में जन्म लो। इससे उन छहों की अक्ल ठिकाने आ गयी और वे बार-बार ब्रह्माजी से क्षमा याचना करने लगे. ब्रह्मा जी को भी इन पर दया आ गयी और उन्होंने कहा कि जन्म तो तुम्हें दैत्य वंश में लेना ही पडेगा पर तुम्हारा पूर्व ज्ञान बना रहेगा.

समयानुसार उन छहों ने राक्षसराज हिरण्यकश्यप के घर जन्म लिया. उस जन्म में उन्होंने पूर्व जन्म का ज्ञान होने के कारण कोई गलत काम नहीं किया. सारा समय उन्होंने ब्रह्माजी की तपस्या कर उन्हें प्रसन्न करने में ही बिताया. जिससे प्रसन्न हो ब्रह्माजी ने उनसे वरदान माँगने को कहा. दैत्य योनि के प्रभाव से उन्होंने वैसा ही वर माँगा कि हमारी मौत न देवताओं के हाथों हो, न गन्धर्वों के, नहीं हम हारी-बीमारी से मरें. ब्रह्माजी तथास्तु कह कर अंतर्ध्यान हो गए.


इधर हिरण्यकश्यप अपने पुत्रों से देवताओं की उपासना करने के कारण नाराज था. उसने इस बात के मालुम होते ही उन छहों को श्राप दे डाला की तुम्हारी मौत देवता या गंधर्व के हाथों नहीं एक दैत्य के हाथों ही होगी. इसी शाप के वशीभूत उन्होंने देवकी के गर्भ से जन्म लिया और कंस के हाथों मारे गए और सुतल लोक में जगह पायी.

कंस वध के पश्चात जब श्रीकृष्ण माँ देवकी के पास गए तो माँ ने उन छहों पुत्रों को देखने की इच्छा प्रभू से की जिनको जन्मते ही मार डाला गया था. प्रभू ने सुतल लोक से उन छहों को लाकर माँ की इच्छा पूरी की. प्रभू के सानिध्य और कृपा से वे फिर देवलोक में स्थान पा गए.

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