सोमवार, 18 अगस्त 2014

एक बार फिर अवतार लो मेरे देवा

हे प्रभू आज हमें तुम्हारी ज्यादा जरूरत है। एक बार सिर्फ एक बार अपने सुंदर, सजीले, उतंग शिखरों वाले मंदिरों से बाहर आकर आप अपनी मातृभूमि की हालत देखो। तुम तो अंतर्यामी हो, दीनदयाल हो, सर्वशक्तिमान हो, तुम्हारे लिए तो कुछ भी अगम नहीं है।

हे श्री कृष्ण,
कोटिश: प्रणाम।
तुम्हारा जन्म दिवस फिर आया है। चारों ओर उल्लास छाया हुआ है। भक्तिमय वातावरण है। पूजा अर्चना जोरों पर है। पर यह सब भी आज के भौतिक युग की बाजारू संस्कृति का ही एक अंग है। एक बहुत छोटा
सा प्रतिशत ही होगा जो सच्चे मन से तुम्हें याद कर रहा होगा। आधे से ज्यादा लोग तो सिर्फ तुम्हारे नाम से मिलने वाले आज के अवकाश से खुश हैं। कुछ लोगों की दुकानदारी है और कुछ लोगों की तुम्हारे नाम की आड़ में अपनी रोटी सेकने का बहाना।


तुम्हारे जन्म दिवस का तो सब को याद है, पर तुम्हारे उपदेश, तुम्हारे त्याग, तुम्हारे आदर्शों, तुम्हारी मर्यादा, तुम्हारे चरित्र, तुम्हारी बातों का इस देश से तिरोधान होता जा रहा है।

तुमने बड़ों की बातों को आज्ञा मान शिरोधार्य किया, आज-कल के तो माँ-बाप ड़रे रहते हैं कि ऐसा कुछ मुंह से निकल जाए जिससे उनके कुलदीपक को कुछ नागवार गुजरे। आज माँ-बाप की बात मानना तो दूर उनकी बात सुननी भी बच्चे गवारा नहीं करते। तुमने नारी का सम्मान करने की बात कही तो आज यहां हालात ऐसे हैं कि जन्म से पहले ही कन्या को परलोकगमन की राह दिखा दी जाती है। नारी उद्धार के पीछे अपना उद्धार करने के लिए लोग कटिबद्ध हैं आज के समाज के कर्णधार। तुमने भाईयों को एकजुट रहने की सलाह दी आज अपने लिए लोग भाईयों को त्यागने में नहीं हिचकते। तुमने अपनी शरण में आनेवाले का सदा साथ दिया चाहे उसके लिए कोई भी कीमत चुकानी पड़ी हो पर आज मुसीबत में पड़े लोगों से भी कीमत वसूली जाती है। तुमने कर्म को प्रधानता दी, फल गौण रखा.  आज फल को सामने रख कर्म किए जाते हैं.  धन-दौलत-एश्वर्य, आज यही प्रतिष्ठा का माध्यम हैं। तुम्हारे समय में शिक्षा, आध्यात्म, मोक्ष आदि पाने का जरिया होता था ऋषि, मुनियों का सान्निध्य, जिसमें वे आदरणीय पुरुष अपना जीवन लगा देते थे, आज के बाबा अपने एश्वर्य, भोग, लिप्सा के लिए दूसरों का जीवन ले रहे हैं। तुमने अपने धुर-विरोधियों को भी सम्मान दिया आज लोग अपने विरोधियों को मिटा देने में ही विश्वास करते हैं।

हे प्रभू आज हमें तुम्हारी ज्यादा जरूरत है। एक बार सिर्फ एक बार अपने सुंदर, सजीले, उतंग शिखरों वाले मंदिरों से बाहर आकर आप अपनी मातृभूमि की हालत देखो। तुम तो अंतर्यामी हो, दीनदयाल हो, सर्वशक्तिमान हो, तुम्हारे लिए तो कुछ भी अगम नहीं है।

एक बार सिर्फ एक बार फिर अवतार लो मेरे देवा !!!!!!

गुरुवार, 7 अगस्त 2014

आना फगवाड़े के नूरे का दिल्ली, किस्मत आजमाने।

चुटकुलों को यदि जोड़ा जाए तो अच्छी भली कहानी बन सकती है. इसी ख्याल से यह प्रयास किया है।  आपकी राय की प्रतीक्षा रहेगी.  

आज आपको एक प्यारे से भोले से बंदे के बारे में बताता हूं। इनका नाम है नूरा। ये पंजाब के सतनाम पुर जिले के फगवाड़ा शहर के पास के एक गांव उच्चा पिंड के रहने वाले हैं। इनकी खासीयत है कि ये जो भी काम हाथ में लेते हैं, चाहे कुछ भी हो जाए, उसे पूरा जरूर करते हैं। चाहे लोग मजाक बनाएं या हसीं उड़ाएं ये अपने में मस्त रहते हैं।

तो जनाब एक बार नूराजी के कोई संबंधी दिल्ली के मूलचंद अस्पताल में भर्ती थे। तो इन्हें दिल्ली आना पड़ा था। ये नई दिल्ली स्टेशन से पूछते-पूछाते क्नाट प्लेस आए और वहां एक आफिस जाते भले आदमी ने इन्हें बताया कि 342 नं की बस मूलचंद अस्पताल जाएगी। शाम को उसी आदमी ने अपने दफ्तर से लौटते हुए इनकी खास भेषभूषा की वजह से इन्हें पहचान और वहीं खड़े देख पूछा कि आप अभी तक यहीं खड़े हो तो इन्होंने खुश हो कहा कि बस 340 बसें निकल गयी हैं मेरी वाली भी आती ही होगी। नूरा जी अपनी जगह ठीक थे क्योंकि ये जहां रहते हैं वहां यात्री बस दिन में चार बार ही गुजरती है तो लोग बस को उसके नंबर से नहीं उनके क्रम से ही उन्हें अपनी सुविधानुसार काम में लेते हैं। पहली, दूसरी, तीसरी ईत्यादि के रूप में। वही बात इन्होंने यहां भी अपनाई थी।

इनके भोलेपन के ऐसे ही क्रिया-कलापों को भाई लोगों ने चुटकुलों का रूप दे, जगह और किरदार बदल-बदल कर सैंकड़ों बार सैंकड़ों जगह फिट कर दिया है।

अपने नूरा भाई पैदाईशी भोले हैं। युवावस्था का सूर्य उदय होते-होते इन्हें एक कन्या अच्छी लगने लगी थी। पर वह इनके भोलेपन का फायदा उठा  अपना मतलब निकालती रहती थी। पर जब इनके प्रस्ताव बढने लगे तो उसने एक फरमाइश रख दी कि मुझे "क्रोकोडाइल बूट" ला कर दो तब मैं तुम्हारी बात सुनुंगी। अब क्या था नूराजी चल दिए जंगल के दलदल की ओर। एक दिन, दो दिन हफ्ता बीत गया। घर में हड़कंप मच गया कि लड़का गया तो कहां गया। खोज खबर हुई तो बात का पता चला। सब लोग जंगल पहुंचे तो देखते क्या हैं कि आठ-दस मगरमच्छ मरे पड़े हैं और नूरा एक और पर निशाना साधे बैठा है। लोगों ने कहा अरे तू कर क्या रहा है ? तो पता है इन्होंने क्या जवाब दिया, अरे मुझे इनके बूट चाहिये थे और ये सारे के सारे नंगे पैर ही घूम रहे हैं। अब बताइये इतना भोला पर लगन का पक्का इंसान आपने देखा है कभी। 

इधर जब से हमारा नूरा दिल्ली घूम कर अपने पिंड़ लौटा है तब से उसे शहर में कुछ करने का कीड़ा काट गया है। कहां, वहाँ की रौनक, खुशहाली और कहां गांव का सूनापन, सुस्त आलम. रातदिन अब नूरा की आँखों में शहर समाया रहने लगा है। पर अकेले वहां जाने की हिम्मत भी नहीं हो रही थी, सो गांव के अपने तीन लंगोटियों के साथ माथा-पच्ची करने के बाद वे चारों इस नतीजे पर पहुंचे कि मां-बाप पर बोझ बनने से अच्छा है कि एक बार चल कर किस्मत आजमाई जाए। हिम्मत है, लगन है, पैसा है, मेहनती हैं, भगवान जरूर सफल करेगा। पर सामने सवाल था कि करेंगे क्या? इसमें भी नूरे का ही अनुभव काम आया, शहर जो जा आया था। उसने बताया कि दिल्ली में इतनी गाड़ियां हैं कि आदमी तो दिखता ही नहीं। गाड़ी पर गाड़ी चढी बैठी है। समझ लो जैसे अपने खेतों में धान की बालियां। अब जैसे खेतों में  पानी का पंप होता है वैसे ही वहां गाड़ियों के लिए पेट्रोल पंप होते हैं। अरे लाईनें लग जाती हैं, नम्बर नहीं आता। हम पेट्रोल पंप खोलेंगे।
पर लायसेंस कैसे मिलेगा ?  एक सवाल उछला। घबड़ाने की बात नहीं है। वहां सिन्धिया हाऊस में मेरे मामाजी रहते हैं। बहुत पहुंच है उनकी,  वे सारा काम करवा देंगे। जवाब भी साथ-साथ आया।

बात तय हो गयी। चारों चौलंगे पहुंच गये दिल्ली। दौड़ भाग शुरु हुई, पता चला कि स्वतंत्रता सेनानी कोटे में एक पंप का आवंटन बचा है। सारे खुश। तैयारी कर पहुंचे गए इंटरव्यू देने। पता नहीं सरकारी अफसरों ने क्या देखा, क्या समझा, या फिर इनकी तकदीर का जोर था कि सारी औपचारिकताएं फटा-फट निपट गयीं और इन चारों भोले बंदों की मनचाही मुराद पूरी हो गयी. नूरा पार्टी को अपने लाभ से ज्यादा जनता का ख्याल था सो उनके हितों को मद्दे नज़र रख ऐसा इंतजाम किया गया कि इनके काम से सड़क वगैरह जाम ना हो और पंप खोल दिया गया। पर हफ्ता भर बीत गया, एक भी ग्राहक नहीं आया।
ऐसा क्यूं ?  क्योंकि भोले बंदों ने पंप पहली मंजिल पर खोला था। जिंदगी के पहले काम में ही असफलता।पर जो हिम्मत हार जाए वह नूरा कैसे कहलाए। उद्यमी बंदों ने सोच विचार कर उसी जगह एक रेस्त्रां का उद्घाटन कर दिया। पर भगवान की मर्जी यह भी ना चला। अब हुआ यह था, कि नए काम के उत्साह में ये लोग पेट्रोल पंप का बोर्ड़ हटाना ही भूल गये थे। बोर्ड़ बदला जा सकता था। पर जिद। जिस काम ने शुरु में ही साथ नहीं दिया वह काम करना ही नहीं। यह जगह ही मनहूस है। 


पर अब करें क्या गांव वापस जा हंसवाई तो करवानी नहीं थी. तभी मामाजी ने सुझाव दिया कि यहां टैक्सियों का कारोबार ज्यादातर अपने लोगों के हाथ में है वे तुम्हारी सहायता करेंगे, तो तुम लोग टैक्सी डाल लो. सुझाव सबको पसंद आया और सब बेच-बाच कर इस बार चारों ने एक सुंदर सी मंहगी गाड़ी खरीद ली।  गाड़ी आ गयी पूजा-पाठ कर सड़क पर उतार भी दी गयी। पर दिनो पर दिन बीत गये इन्हें एक भी सवारी नहीं मिली। कारण ?  चारों भोले बंदे, दो आगे, दो पीछे बैठ कर ग्राहक ढूंढने निकलते रहे थे। 

हर बार निराशा हाथ लगने से नूरे का दिमाग फिर गया.  हद हो गयी, यह शहर शरीफों का साथ ही नहीं देता। ईमानदारी से इतने काम करने चाहे, किसी में भी कामयाबी नहीं मिली। ठीक है, हमें भी टेढी ऊंगली से घी निकालना आता है। अब हम दिखाएंगे कि हम क्या कर सकते हैं.

चारों मित्रों ने मश्विरा कर उलटे काम करने की ठान ली। सारा आगा-पीछा सोच दूसरे दिन रात को प्लान बना अपने घर की पिछली गली से एक लड़के को अगवा कर उसे बुद्धा गार्डन ले गए. वहाँ जा कर उससे कहा कि वह अपने घर जाए और अपने बाप से चार लाख रुपये देने को कहे ऐसा ना करने पर तेरी जान ले ली जाएगी यह भी बता देना।
लड़का घर गया, अपने बाप को सारी बात बता दी। लड़के के बाप ने पैसे भी भिजवा दिए।
अरे!!!!  ये कैसे हो गया ?
ऐसा इसलिए क्योंकि लडके का बाप भी तो भोला बंदा ही था ना। :-) :-) :-)

शुक्रवार, 1 अगस्त 2014

शिवलिंग पर बेल पत्र ही क्यों चढ़ाए जाते हैं ?



दुनिया में बहुत सारे ऐसे वृक्ष हैं जो बहुउपयोगी होने के साथ-साथ पवित्र भी माने जाते हैं, पर शिव अराधना के समय खासकर सावन में शिवलिंग पर बेल पत्र ही चढ़ाए जाते हैं। सब को छोड़ कर बिल्व के पत्ते ही क्यों यह सम्मान पाते हैं? 

बेल वृक्ष 
सावन का महीना आते ही शिव जी की आराधना के लिए जन समूह उमड़ पड़ता है. होड़ लग जाती है उन पर जल चढाने की. जगह-जगह, तरह-तरह के द्रव्यों से अभिषेक किया जाने लगता है. पर पूजा में सबसे प्रमुख जो वस्तु मानी गयी है वह है बेल पत्र या बिल्व पत्र। पुराणों के अनुसार यह भोले भंडारी को अत्यंत प्रिय है। जिसके बिना पूजा अधूरी समझी जाती है। ऐसा क्यों और क्या खासियत है इस बेल पत्र में जो इसे इतना महत्वपूर्ण समझा जाता है ?  दुनिया में बहुत सारे ऐसे वृक्ष हैं जो बहुउपयोगी होने के साथ-साथ पवित्र भी माने जाते हैं, पर उन्हें छोड़ कर बिल्व के पत्ते ही क्यों यह सम्मान पाते हैं?  इसके लिए इस वृक्ष को जानना जरूरी है।


बेल का फल 
स्कन्द पुराण के अनुसार एक बार माँ पार्वती मंदराचल पर्वत पर ध्यान लगाए बैठी थीं तभी उनके मस्तक से पसीने की कुछ बूँदें जमीन पर गिरीं, जिनसे बेल वृक्ष की उत्पत्ति हुई। ऐसी मान्यता है कि इस वृक्ष में माँ अपने सभी रूपों के साथ विद्यमान रहती हैं. गिरिजा के रूप में इसकी जड़ों में, माहेश्वरी के रूप में इसके तने में, दक्षयानी के रूप में इसकी डालियों में, पार्वती के रूप में इसके पत्तों में, माँ गौरी के रूप में इसके पुष्पों में और कात्यायनी के रूप में इसके फलों में माँ निवास करती हैं। इन शक्ति रूपों के अलावा माँ लक्ष्मी भी इस पवित्र और पावन वृक्ष में वास करती हैं. चूंकि माँ पार्वती का इस वृक्ष में निवास है इसीलिए भगवान शंकर को यह अत्यंत प्रिय है. जन धारणा तो यह है कि यदि कोई स्त्री या पुरुष इस पेड़ को छू भर लेता है तो उसी से उसके सारे पापों का नाश हो जाता है। इसके साथ ही इस शिव-प्रिय पत्र के बारे में यह भी कहा जाता है कि कोई भी नर या नारी शिव जी का सच्चे मन से ध्यान कर यदि बेल वृक्ष का एक भी पत्ता शिव लिंग को अर्पित करता है तो उसके कष्टों का शमन हो उसकी सारी इच्छाएं पूरी हो जाती हैं.   
बेल पत्र 

बिल्व पेड़ की पत्तियां तीन के समूह में होती हैं. जिनके बारे में विद्वानों की अपनी-अपनी मान्यताएं हैं। कुछ इन्हें ब्रह्मा-विष्णु-महेश का रूप मानते हैं. कुछ इसे शिव जी के तीन नेत्रों का भी प्रतीक मानते हैं. कुछ लोग इसे परमात्मा के सृष्टि, संरक्षण और विनाश के कार्यों से जोड़ते हैं और कुछ इसे तीनों गुणों, सत, राजस और तमस के रूप में देखते हैं.  


हमारे धार्मिक ग्रंथों और आयुर्वेद में बेल वृक्ष के अौषधीय गुणों का उल्लेख मिलता  है। इसकी जड़, छाल, पत्ते, फूल और फल सभी बहुत उपयोगी होते हैं तथा तरह-तरह के रोग निवारण में काम आते हैं. शिव जी तो खुद बैद्यनाथ हैं शायद इसलिए भी उनको यह वृक्ष इतना प्रिय है.  

सोमवार, 28 जुलाई 2014

बरसात भारी न पड़े

सब अपने में मस्त थे पर शरीर साफ सुन पा रहा था बरसात के साथ आने वाली बिमारियों की पदचाप।इसी आवाज को हम सब को भी सुन स्वस्थ रहते हुए स्वस्थ रहने की प्रकृया शुरु कर देनी चाहिये।

इस बार गर्मी ने कुछ ज्यादा ही लंबी मेहमानी करवा ली. जाने के समय भी बिस्तर बांधने में अच्छा खासा समय ले लिया. वो तो भला हो इंद्र देवता का जिनकी इजाजत से बरखा रानी ने धरती पर अपने कदम रखे। मौसम सुहाना होने लगा। पेड़-पौधों ने धुल कर राहत की सांस ली. किसानों की जान में जान आयी। कवियों को नयी कविताएं सुझने लगीं। हम जैसों को भी चाय के साथ पकौड़ियों की तलब लगने लगी। सब अपने में मस्त थे पर शरीर साफ सुन पा रहा था बरसात के साथ आने वाली बिमारियों की पदचाप। इसी आवाज को हम सब को भी सुन स्वस्थ रहते हुए स्वस्थ रहने की प्रकृया शुरु कर देनी चाहिये। क्योंकि बिमार होने के बाद स्वस्थ होने से अच्छा है कि बिमारी से बचने का पहले ही इंतजाम कर लिया जाये।
इस मौसम में जठराग्नि मंद पड़ जाती है।  सर्दी, खांसी, फ्लू, डायरिया, डिसेन्टरी, जोड़ों का दर्द और न जाने क्या-क्या, अपने-अपने ढोल-मंजीरे ले शरीर के द्वार पर दस्तक देने लगते हैं। वैसे तो अधिकाँश लोग अपना ख्याल रखना जानते हैं, फिर भी हिदायतें सामने दिखती रहें तो और भी आसानी हो जाती है, क्योंकि उनके प्रयोग से लाभ ही होता है बुराई कुछ भी नहीं है. मेरे एक मित्र वैद्य हैं उन्हीं के परामर्श को बाँट रहा हूँ  :-

इस मौसम में जठराग्नि मंद पड़ जाती है। इसलिए रोज एक चम्मच अदरक और शहद की बराबर मात्रा सुबह लेने से फायदा रहता है।

खांसी-जुकाम में एक चम्मच हल्दी और शहद गर्म पानी के साथ लेने से राहत मिलती है।

इस मौसम में दूध, दही, फलों के रस, हरी पत्तियों वाली सब्जियों का प्रयोग कम कर दें।

नीम की पत्तियों को उबाल कर उस पानी को अपने नहाने के पानी में मिला कर नहायें। इसमें झंझट लगता हो तो पानी में डेटाल जैसा कोई एंटीसेप्टिक मिला कर नहायें। बरसात में भीगने से बचें, मजबूरी में शरीर गीला हो ही जाए तो जितनी जल्दी हो उसे सुखाने की जुगत करें.  

आज कल तो हर घर में पानी के फिल्टर का प्रयोग होता है। पर वह ज्यादातर पीने के पानी को साफ करने के काम में ही लिया जाता है। भंड़ारित किये हुए पानी को वैसे ही प्रयोग में ले आया जाता है। ऐसे पानी में एक फिटकरी के टुकड़े को कुछ देर घुमा कर छोड़ दें। पानी की गंदगी नीचे बैठ जायेगी।

तुलसी की पत्तियां भी जलजनित रोगों से लड़ने में सहायक होती हैं। इसकी 8-10 पत्तियां रोज चबा लेने से बहुत सी बिमारियों से बचा जा सकता है। घर में पीने के पानी में इसकी आठ-दस पत्तियां डाल दें, ये बखूबी आपकी हिफाजत करेंगी.  

खाने के बाद यदि पेट में भारीपन का एहसास हो तो एक चम्मच जीरा या अजवायन पानी के साथ निगल लें। आधे घंटे के अंदर ही राहत मिल जायेगी।            

अचार, तले हुए, मसालेदार खाद्य पदार्थों के साथ-साथ बाहर के खाने-पीने से इन दिनों दूरी बनाये रखें। ज्यादा देर के कटे फल, सलाद और बासी भोजन का उपयोग ना ही करें तो बेहतर है।

बुधवार, 23 जुलाई 2014

वर्षा की बूँदें, कुछ रोचक तथ्य

ऐसी धारणा भी है कि वर्षा की बूंदें आंसुओं की तरह गोल होती हैं, पर ऐसा न हो कर उनका आकार ऐसा होता है जैसे एक वृत्त को ठीक बीच में से काट दिया जाए तो ऊपर वाले हिस्से का  जो रूप बनेगा वैसा ही आकार वर्षा की बूँदों का होता है। ऊपर से गोल नीचे  चपटा।  ठीक "पाव-भाजी" के "पाव" जैसा।
देर से ही सही   इंद्रदेव की नाराजगी दूर हुई.   झुलसाती गर्मी धीरे - धीरे अपना दामन छुड़ा विदा हुई,   गगन से अमृत झरा, धरा की प्यास मिटी, हलधरों के चहरे पर संतोष दिखने लगा। हर साल देर-सबेर ऐसा ही चक्र चलता रहता है इसलिए हमारा ध्यान इस की विशेषताओं पर नहीं जाता, जो अपने आप में अजूबा है :-  

यह सभी जानते हैं कि धरती के सागर, नदी-नालों, सरोवरों-झीलों से लगातार पानी का वाष्पीकरण होता रहता है. वही दूषित पानी जब ऊपर जा फिर वर्षा के रूप में धरती पर वापस आता है तो वह प्रकृति में उपलब्ध जल का सर्वाधिक शुद्ध रूप होता है। इस ऊपर-नीचे आने-जाने की क्रिया में वह सैंकड़ों की. मी. की दूरी तय कर लेता है। हम सभी को लगता है, और ऐसी धारणा भी है कि वर्षा की बूंदें आंसुओं की तरह गोल होती हैं, पर ऐसा न हो कर उनका आकार ऐसा होता है जैसे एक वृत्त को ठीक बीच में से काट दिया जाए तो ऊपर वाले हिस्से का  
जो रूप बनेगा वैसा ही आकार वर्षा की बूँदों का होता है। ऊपर से गोल नीचे से चपटा। ठीक "पाव-भाजी" के "पाव" जैसा। ऐसा इनके नीचे गिरते समय हवा के दवाब के कारण  होता है।धरती के वातावरण में ये दस दिनों तक बने रह सकते हैं। करीब .02 से .031 इंच के आकार की वर्षा की बूँदें तकरीबन 35 की.मी. की रफ्तार से जमीन की ओर आती हैं। तुलनात्मक रूप से देखा जाए तो पहाड़ों पर होने वाली बर्फबारी की रफ्तार तीन-चार की.मी. ही होती है। अमूमन एक घंटे में .30 इंच या उससे ज्यादा की बरसात को ही भारी बारिश का होना माना जाता है। छोटी या महीन बूँदों वाली वर्षा को "झींसी" (drizzling) पड़ना कहते हैं। इन्हें संभालने वाले छोटे बादलों की औसत उम्र 10 से 15 मिनट की ही होती है।  इतनी ही देर में ये नीचे जल-थल कर देते हैं. बरसात के साथ जो आंधी-तूफान उठते हैं, उनसे उत्पन्न होने वाली बिजलियां, जो करीब 100 की. मी. की दूरी तक जा सकती हैं, हर सेकंड में करीब सौ बार धरा को छूती हैं। जिनकी कड़क और लपक देख-सुन कर कलेजा मुंह को आ जाता है उनसे लाखों में सिर्फ तीन बार दुर्घटना की आशंका बनती है।

वर्षा की बूँदों के कमाल के कारण ही बारिश के बाद बनने वाला इंद्र-धनुष प्रकृति की एक और अनुपम कला और रचना है। जो सूर्य की विपरीत दिशा में  वातावरण में स्थित पानी की छोटी सी बूँद, जो वहां "प्रिज्म" का काम करती है, में से उगते या अस्त होते सूर्य की किरणों के गुजरने से बनता है। जमीन से एक अर्द्ध वृत्त के रूप में नजर आने वाले इस अजूबे को यदि हवाई-जहाज से देखा जाए तो यह पूर्ण गोलाकार रूप में भी दिखाई पड़ सकता है।                   

शुक्रवार, 18 जुलाई 2014

छौंक, तड़का या बघार का वैज्ञानिक आधार है

बघार से न केवल स्वाद और सुगंध में बढ़ोत्तरी होती है बल्कि भोजन भी दोष रहित तथा सुपाच्य बन जाता है. कहते हैं एक राजा के रसोइये ने राजा के खाने पर आने में विलंब करने के कारण अपनी बघारी हुई दाल को एक सूखे पेड़ की जड़ों में डाल दिया था, जिससे वह पेड़ कुछ दिनों बाद फिर हरा-भरा हो गया था।  

बघार 
भारतीय रसोईघरों में सब्जियों और दालों वगैरह को छौंक लगाने की प्रथा पीढ़ी दर पीढ़ी वर्षों से चली आ रही है. समय के साथ खाना बनाने और खाने का तरीका भले कितना ही बदल गया हो पर छौंकने या बघारने की महत्ता अपनी जगह बरकरार है. इससे न केवल स्वाद और सुगंध में बढ़ोत्तरी होती है बल्कि भोजन भी दोष रहित तथा सुपाच्य बन जाता है. सेहत और पाचन के लिए भी यह विधी बहुत फायदेमंद रहती है। कहते हैं एक राजा के रसोइये ने राजा के खाने पर आने में विलंब करने के कारण अपनी बघारी हुई दाल को एक सूखे पेड़ की जड़ों में डाल दिया था, जिससे वह पेड़ कुछ दिनों बाद फिर हरा-भरा हो गया था।  

हमारे देश में जहां अलग-अलग मौसम, वातावरण और खान-पान के तरीके भिन्न-भिन्न हैं वहीं बघार देने की वस्तुओं में भी खाद्य पदार्थ की प्रकृति के अनुसार घट-बढ़ और बदलाव होता जाता है. हमारी रसोई में कुछ रोजमर्रा के खाद्य और उनमें लगने वाले बघार कुछ इस तरह के हैं :-

लहसुन 
* सरसों के साग और मक्की की रोटी ने कब की पंजाब की सीमाएं लांघ सारे देश के लोगों को अपना मुरीद बना लिया है. पर सरसों का साग वायु विकार को पेट में जगह देता है, जिससे बचने के लिए इसमें प्याज, लहसुन और अदरक का तड़का लगा इसे सुपाच्य तो बनाया ही जाता है इससे उसके स्वाद में भी बढ़ोत्तरी हो जाती है। 

* राजमा, उड़द, सफेद चने, फूल गोभी यह सब देर से पचने वाले खाद्य पदार्थ हैं तथा इनसे वायु-विकार की भी संभावना रहती है, इसलिए इनके इन दोषों को दूर करने के लिए इनमें  लहसुन-अदरक का बघार दिया जाता है. 

* कढ़ी जो अत्यंत लोकप्रिय खाद्य तो है पर इससे बादी होने का डर भी बना रहता है इसीलिए बनाने के बाद उसमें मेथी-दाना, राई, तेज-पात और मीठी नीम का छौंक लगाया जाता है. जिससे यह सुपाच्य हो जाती है।  

छौंक में प्रयुक्त होने वाले विभिन्न मसाले 
* देर से पचने वाली सब्जियों जैसे सीताफल या कद्दू , अरबी, भिन्डी इत्यादि को मेथी के दानों या अजवायन का तड़का  लगा सुपाच्य बना लिया जाता है।   

* वायु तथा कफ उत्पन्न करने वाली दालों में जीरे और हींग का छौंक लगाने की परम्परा रही है।  

हमारे मनीषियों ने समाज और परिवार को सुचारू रूप से चलाने के लिए कई उपाय ईजाद किए थे उन्हीं में
खान-पान के तरीके तथा भोजन द्वारा स्वस्थ रहने के नुस्खे भी शामिल हैं. यदि हम अपना खान-पान दुरुस्त रखें तो कई तरह की दवाईयों से छुटकारा मिल सकता है, जो पाचन दुरुस्त करने  के नाम पर हमारे शरीर पर विपरीत असर डालती हैं।        

गुरुवार, 17 जुलाई 2014

हम पर छाते, "छाते"

सबसे ज्यादा सुंदर, कलात्मक और आधुनिक छाते चीन में बनाए जाते हैं जहां इसको बनाने वाले हजारों कारखाने दिन-रात काम करते हैं. पर इसकी इसकी बिक्री में अमेरिका सबसे आगे है जहां लाखों छाते हर साल खरीदे-बेचे जाते हैं. 


काफी इंतजार करवाने के बाद बरखा रानी मेहरबान हुई हैं।  अब जब वह अपना जलवा बिखेर रही है तो हमें अपनी बरसातियां, छाते याद आने लगे हैं. बरसातियां तो खैर बहुत बाद में मैदान में आईं, पर छाते तो सैंकड़ों सालों से हम पर छाते रहे हैं. छाता जिसे दुनिया में ज्यादातर "umbrella" के नाम से जाना जाता है, उसे यह नाम लैटिन भाषा के "umbros" शब्द, जिसका अर्थ छाया होता है, से मिला है. समय के साथ इसका चलन कुछ कम जरूर हुआ है. पहले ज्यादातर लोग पैदल आना-जाना करते थे तब धूप और बरसात में इसकी सख्त जरूरत महसूस होती थी. पर फिर बरसातियों के आगमन से या कहिए कि मोटर गाड़ियों की सर्वसुलभता के कारण इसकी पूछ परख कुछ काम हो गयी. वैसे मौसम साफ होने पर यह एक भार स्वरूप भी लगाने लगता था फिर भी हजारों सालों से यह हमारी आवश्यकताओं में शामिल रहने के लिए जी-तोड़ कोशिश करता रहा और सफल भी रहा ही है.     

खोजकर्ताओं का मानना माना है कि मानव ने आदिकाल से ही अपने को तेज धूप से बचाने के लिए वृक्षों के
बड़े-बड़े पत्तों इत्यादि का उपयोग करना शुरू कर दिया होगा। आज के छाते के पर-पितामह का जन्म कब हुआ यह कहना कठिन है, फिर भी जो जानकारी मिलती है वह हमें 4000 साल पहले तक ले जाती है। उस समय छाते सत्ता और धनबल के प्रतीक हुआ करते थे और राजा-महाराजाओं की शान बढ़ाने का काम करते थे। शासकों और धर्मगुरुओं के लिए छत्र एक अहम जरूरत हुआ करती थी। धीरे-धीरे इसे आम लोगों ने भी अपनाना शुरू कर दिया। 

ऐसा माना जाता है कि सबसे पहले चीन ने करीब तीन हजार साल पहले पानी से बचाव के लिए जलरोधी छतरी बनाई थी। समय के साथ-साथ छोटे छातों का चलन शुरू हुआ तो उसमें भी फैशन ने घुस-पैठ कर ली, खासकर  ग्रीस और रोम की महिलाओं के छातों में, जो उनके लिए एक जरूरी वस्तु का रूप इख्तियार करती चली जा रही थी. उस समय छाते को महिलाओं के फैशन की वस्तु ही समझा जाता था. ऎसी मान्यता है कि किसी पुरुष द्वारा सार्वजनिक स्थान पर सबसे पहले इसका उपयोग अंग्रेज पर्यटक और मानवतावादी "जोनास हानवे" ने करना आरंभ किया था. जिसकी देखा-देखी अन्य लोगों ने भी पहले इंग्लैण्ड और बाद में सारे संसार में इसका उपयोग करना शुरू कर दिया.  

लोगों की पसंद और इसकी उपयोगिता को देखते हुए इस पर तरह-तरह के प्रयोग भी होने शुरू हो गये. इसका
रंग-रूप बदलने लगा. इसके कई तरह के "फोल्डिंग" प्रकार भी बाजार में छा गए. जिनका आविष्कार 1969 में हुआ.  इसकी यंत्र-रचना और इसमें उपयोग होने वाली चीजों में सुधार तथा बदलाव आने लगा. सबसे ज्यादा ध्यान इसके कपडे पर दिया गया जिसे आजकल टेफ्लॉन की परत चढ़ा कर काम में लाया जाता है, जिससे कपड़ा पूर्णतया जल-रोधी हो जाता है. 

धीरे-धीरे छाता जरुरत के साथ-साथ फैशन की चीज भी बनता चला गया. आजकल इसके विभिन्न रूप यथा पारम्परिक, स्वचालित, फोल्डिंग, क्रच (जिसे चलते समय छड़ी की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है) इत्यादि  तरह-तरह के आकारों तथा रंगों में उपलब्ध हैं. इसके साथ ही इसका उपयोग नाना प्रकार के अन्य कार्यों जैसे फोटोग्राफी, सजावट या किसी  वस्तु की तरफ ध्यान 
आकर्षित करवाने के लिए भी किया जाने लगा है. सबसे ज्यादा सुंदर, कलात्मक और आधुनिक छाते चीन में बनाए जाते हैं जहां इसको बनाने वाले हजारों कारखाने दिन-रात काम करते हैं. पर इसकी इसकी बिक्री में अमेरिका सबसे आगे है जहां लाखों छाते हर साल खरीदे-बेचे जाते हैं. 

अपने यहां छाते की लोकप्रियता बंगाल में 80 के दशक तक चरम पर थी जब दफ्तर जाते समय बंगाली बाबू के पास एक थैले, छाते और अखबार का होना निश्चित सा होता था.   

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