मंगलवार, 22 मार्च 2011

इस सीख के लिए बंदरों को ही क्यों चुना गया ?

बहुत दिनों से बहुत बार यह बात मन में आती रही थी कि जब छोटे से छोटे "कार्टून कैरेक्टर" का भी कोई नाम होता है तो गांधी जी के तीन बंदरों का भी कोई नाम तो जरूर होगा। पर ख्याल आ कर ऐसे ही चला जाता था।आज अचानक उनसे परिचय हो गया तो सोचा उन प्रसिद्ध हस्तियों का आपसे भी परिचय करवा दूं।
चीन में हजारों सालों से प्रचलित उपदेशों को करीब पांच सौ साल पहले जापान में मूर्त रूप दिया गया तीन बंदरों के द्वारा। जो अपना आंख, कान तथा मुंह ढक कर यह संदेश देते हैं कि बुरा मत देखो, बुरा मत सुनो और बुरा मत कहो। इनके नाम क्रमश: इस तरह हैं :-
# मिज़ारू (बुरा मत देखो)
# कीकाजारु (बुरा मत सुनो)
# इवाज़ारु (बुरा मत कहो)

पर एक बात जो समझ में नहीं आई वह यह है कि इस उपदेश के लिए बंदरों को ही क्यों चुना गया ? आप को ज्ञात हो तो !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!

शुक्रवार, 18 मार्च 2011

इसके पहले कि "होली" हो ले

होली का त्यौहार कबसे शुरू हुआ यह कहना बहुत ही मुश्किल है। पुराणों व पुराने कथानकों में इससे संबंधित अनेकों कथाएं मिलती हैं।

महाभारत मं उल्लेख है कि ढोढा नामक एक राक्षसी ने अपने कठोर तप से महादेवजी को प्रसन्न कर अमर होने का वरदान प्राप्त कर लिया था। अंधेरे में रहने के कारण उसे रंगों से बहुत चिढ थी। उसने अपने स्वभावानुसार चारों ओर अराजकता फैलानी शुरू कर दी। तंग आकर लोग गुरु वशिष्ठजी की शरण में गये तब उन्होंने उसे मारने का उपाय बताया। उन्होंने कहा कि सिर्फ निष्पाप बच्चे ही उसका नाश कर सकते हैं। इसलिये यदि बच्चे आग जला कर उसके चारों ओर खूब हंसें, नाचें, गाएं, शोर मचाएं तो उससे छुटकारा पाया जा सकता है। ऐसा ही किया गया और ढोढा का अंत होने पर उसके आतंक से मुक्ति पाने की खुशी में रंग बिखेरे गये। तब से दुष्ट शक्तियों के नाश के लिये इसे मनाया जाने लगा।

दूसरी कथा ज्यादा प्रामाणिक लगती है। कहते हैं कि हमारे ऋषि-मुनियों ने देवताओं, सूर्य, इंद्र, वायू, की कृपा से प्राप्त नये अन्न को पहले, धन्यवाद स्वरूप, देवताओं को अर्पित कर फिर ग्रहण करने का विधान बनाया था। जाहिर है नया अन्न अपने साथ सुख, स्मृद्धि, उल्लास, खुशी लेकर आता है। सो इस पर्व का स्वरूप भी वैसा ही हो गया। इस दिन यज्ञ कर अग्नि के माध्यम से नया अन्न देवताओं को समर्पित करते थे इसलिये इसका नाम ”होलका यज्ञ” पड़ गया था। जो बदलते-बदलते होलिका और फिर होली हो गया लगता है।

एक और उल्लेख भी मिलता है। जिसके अनुसार वैदिक काल में एक अनुष्ठान किया जाता था, जिसे सोमयज्ञ कहते थे। यह अपने आप में अनूठा तथा विशेष प्रकार का यज्ञ होता था। इसे संपन्न करवाने के लिए कर्मकांडी वेद पाठी दूर-दूर से बुलाए जाते थे। जो करीब साल भर कठोर नियमों से बंधे रह कर इसे पूरा करते थे। इसे पूरा करने के नियम बहुत कठोर हुआ करते थे जिनमें भूल और छूट की कोई गुंजाइश नहीं होती थी। इसीलिए इस यज्ञ के सफलता पूर्वक पूर्ण होने पर खूशी का माहौल बनता था और इतने दिनों तक नियम-कायदे से बंधे लोग अपनी शारीरिक और मानसिक थकान मिटाने के लिए सारे वातावरण को उल्लास और आनंद से भर देते थे।

इस पर्व का नाम होलका से होलिका होना भक्त प्रह्लाद की अमर कथा से भी संबंधित है। जिसमें प्रभु भक्त प्रह्लाद को उसके पिता हिरण्यकश्यप के जोर देने पर उसकी बुआ होलिका उसे गोद में ले अग्नि प्रवेश करती है पर प्रह्लाद बच जाता है।

इसी दिन राक्षसी पूतना का वध कर व्रजवासियों को श्री कृष्ण जी ने भयमुक्त किया था। जो त्यौहार मनाने का सबब बना।

पर इतने उल्लास, खुशी, उमंग, वैमन्सय निवारक त्यौहार का स्वरूप आज विकृत होता या किया जा रहा है। हंसी-मजाक की जगह अश्लील गाने, फूहड़ नाच, कुत्सित विचार, द्विअर्थी संवाद, गंदी गालियों की भरमार, काले-नीले ना छूटने वाले रंगों के साथ-साथ वैर भुनाने के अवसर के रूप में इसका उपयोग कर इस त्यौहार की पावनता को नष्ट करने की जैसे साजिश चल पड़ी है। समय रहते कुछ नहीं हुआ तो धीरे-धीरे लोग इससे विमुख होते चले जायेंगे।

गुरुवार, 17 मार्च 2011

जापानियों, तुम्हें सलाम है.

दूसरा विश्वयुद्ध लाया था जापान के लिए तबाही और सिर्फ़ तबाही। हिरोशिमा तथा नागासाकी जैसे शहर तबाह हो गये थे। सारे देश की व्यवस्था छिन्न-भिन्न हो चुकी थी। किसी भी संस्था के पास अपने कर्मचारियों के लिये पूरा काम न था। इसलिए एक निर्णय के तहत काम के घंटे 8 से घटा कर 6 कर दिए गये तथा साप्ताहिक अवकाश भी एक की जगह दो दिनों का कर दिया गया। नतीजा क्या हुआ: अगले दिन ही सारे कर्मचारी अपनी बांहों पर काली पट्टी लगा काम पर हाजिर हो गये। ऐसा विरोध ना देखा गया ना सुना गया। उनकी मांगें थीं कि देश पर विप्पतियों का पहाड टूट पडा है तो हम घर मे कैसे बैठ सकते हैं। इस दुर्दशा को दूर करने के लिए काम के घंटे घटाने की बजाय बढा कर दस घंटे तथा छुट्टीयां पूरी तरह समाप्त कर दी जाएं। सब की एक ही हार्दिक इच्छा थी कि हम सब को मिल कर अपने देश को फिर सर्वोच्च बनाना है। यही भावना थी, जिससे जापान गर्व से सिर उठा कर फिर खड़ा हो सका था।
आज फिर वैसी ही आपदा का सामना कर रहा है जापान। फर्क यह है कि इस बार प्रकृति विनाश पर उतारू है। आग, हवा, पानी, जैसे सारी दैवीय शक्तियाँ परीक्षा लेने पर आमादा हैं। पर सारी दुनिया को विश्वास है कि यह जुझारू देश फिर उठ खडा होगा सारी परेशानियों, मुसीबतों की धूल झाड कर। जापानी कभी हार नहीं मानते, इसका प्रमाण उन्होंने बार-बार दिया है। फिर इस बार तो सारा विश्व उनके साथ है।

मंगलवार, 15 मार्च 2011

"हर क्षेत्र में" महिलाओं को बराबरी का दर्जा हासिल है. कोई शक? :-)

कुछ दिनों पहले एक पोस्ट डाली थी, जिसमें एक 'सज्जन' द्वारा प्लेन की महिला पायलट होने के कारण सफर से इंकार कर दिए जाने की खबर थी। काफी लानत-मलानत भी हुई थी उस यात्री की। पर आज की एक और चौंका देने वाली खबर ने तो बहुतों के होश उड़ा कर रख दिए होंगे और वे भी ऐसी पायलट वाली उड़ान से तौबा करने की सोचने लगे होंगे, जब उन्हें पता चला होगा कि एक महिला फर्जी अंकशीट लेकर हवाई नौकरी कर रही थी। पता नहीं कबसे सैंकड़ों लोगों की जान को दांव पर लगा कर। एक उसकी ही हमपेशा फरार है।

तो क्या उस यात्रा ना करने वाले महाशय को पता था इन कारस्तानियों का? :-)

क्या अब भी किसी को शक है कि हमारे देश में महिलाओं को बराबर का दर्जा नहीं दिया जाता या वे "किसी भी क्षेत्र में" " पुरुषों से कमतर हैं।

शनिवार, 12 मार्च 2011

मैं कुछ नहीं कहना चाहता !! आप भी कुछ न कहें !!!

एक चौथी-पांचवीं का बच्चा भी जब स्कूल में परीक्षा देने जाता है तो पूरी तैयारी से जाता है। उसे पता होता है कि उसे किस विषय की परीक्षा देनी है और क्या लिखना है।

एक युवक जब नौकरी के लिए साक्षात्कार के लिए जाता है तब वह भी काम से संबंधित हर संभावित विषय की पूरी तैयारी कर घर से निकलता है।

इनकी तो छोड़िए, एक साधारण गृहिणी भी घर का सामान लेने बाहर जाती है तो उसके दिमाग में लेने वाली वस्तुओं और अपने बजट का पूरा खाका बना कर ही चलती है।

पर क्या कहेंगें प्रवर्तन निदेशालय (Enforcement Directorate) के जिम्मेदार अफसरों को जो साठ अरब के करीब के घोटाले का पर्दाफाश करने कोर्ट में साठ रुपये का केस भी ना पेश कर सके। कोर्ट की लताड़ तो मिलनी ही थी।
माननीय जज महोदय ने झुंझलाते हुए उनकी जमानत ना देने की अर्जी पर कहा "आप लोग कोई एक, सिर्फ एक केस तक तो बना नहीं पा सके तो किस बिना पर उसे रिमांड पर रखना चाहते हैं? किस बात की तफ्तीश करना चाहते हैं?

फिर पूरे फिल्मी लहजे में घोड़ों और भू-संपत्ति का विवादित व्यवसायी हसन अली खान, जिस पर इस सदी के सबसे बड़े घोटाले का केस दर्ज है, मुस्कुराते हुए अपनी चमचमाती कार में बैठ ये गया वो गया।
अब अंग्रजों के जमाने के जासूस खोजते रहें फिर से सबूत।

शुक्रवार, 11 मार्च 2011

इस (भ्रष्ट)अचार का स्वाद लेना चाहेंगे ?

अभी-अभी ई-मेल से यह अचार मिला है। सोचा आप भी चटकारा लगा लें।


इस अचार का निर्माता भारतीय मतदाता।








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