इस ब्लॉग में एक छोटी सी कोशिश की गई है कि अपने संस्मरणों के साथ-साथ समाज में चली आ रही मान्यताओं, कथा-कहानियों को, बगैर किसी पूर्वाग्रह के, एक अलग नजरिए से देखने, समझने और सामने लाने की ! इसके साथ ही यह कोशिश भी रहेगी कि कुछ अलग सी, रोचक, अविदित सी जानकारी मिलते ही उसे साझा कर ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाया जा सके ! अब इसमें इसको सफलता मिले, ना मिले, प्रयास तो सदा जारी रहेगा !
सोमवार, 5 अप्रैल 2010
इंसान तो इंसान जानवर भी "शोले" देखने के लिए आतुर थे
बात बहुत पुरानी है। पर दिमाग के कोल्ड स्टोर में होने की वजह से आज भी ताजा और बामजा है। करीब 35 साल पहले फिल्म “शोले” ने रीलीज हो कर कैसे बाक्स आफिस मे आग लगाई थी, यह तो उस समय उसकी तपिश का मजा लेने वालों को आज भी याद होगा। उस समय उसका जादू सर चढ कर बोलता था। लोग पगलाये रहते थे उसको देखने के लिये। एक बार, बार-बार। सिनेमा घरों के सामने इतनी लंम्बी लाईने लगती थीं कि अंतिम छोर पर खड़े लोगों को तीन-तीन, चार-चार घंटे लग जाते थे खिड़की तक पहुंचने में, फिर भी टिकट मिल ही जाएगी इसका विश्वास नहीं होता था। लोग किसी खास शो के लिये लाईन नहीं लगाते थे वे तो जिस दिन का भी हो, जिस किसी शो का भी हो, बस मिल जाए इसलिये खड़े होते थे। आप सोच रहे होंगे कि क्या लोगों के पास काम-धाम नहीं था, तो यह बतला दूं कि यह उस महानगर की बात है जहां क्रिकेट के किसी भी फार्मेट के मैच के लिए लोग रात में ही लाईन मे आ खड़े होते थे। देर से आने वालों के लिये जगह भी बिकती थी। यहां तक कि टेस्ट मैच के पहले दिन भी 60-70 हजार की भीड़ जुट जाना मामुली बात थी। जी हां आज के कोलकाता और तब के कलकत्ता की बात कर रहा हूं।
बात हो रही थी “शोले” की। यह शायद पहली फिल्म थी जिसके संवादों तक की कैसटें भी बनाई गयी थीं और उनकी बिक्री भी बेहिसाब हुए थी। इतनी कैसटें बिकी थीं कि आधी से ज्यादा आबादी गब्बर सिंह बन गयी थी। हर गली मोहल्ले में ,”तेरा क्या होगा कालीया”, “कितने आदमी थे”, “अब गोली खा” जैसे संवादों का लोग पारायण करने लग गये थे। अपने ताऊजी भी तो शायद उन दिनों कलकत्ते मे ही थे , उन्हें तो याद ही होगा उस समय का माहौल, क्यों बड़े भाई सच कह रहा हूं ना?
कलकत्ता अजब शहर है। वहां आईन (कानून) और लाईन का बड़ा महत्व है। वहां का हर वाशिंदा दूसरे से आईन मुताबिक चलने की अपेक्षा करता है और लाईन तो वहां के रोजमर्रा के कामों का एक हिस्सा हैं। दुर्गा पूजा के दिनों में जूते के साथ चप्पल मुफ्त, 500 बंदे खड़े हैं लाईन में, आसाम की चाय का नया ब्रांड आया है 378 भद्रपुरुष घर जाने के पहले लाईन में लगे हैं, मोहनबागान का ईस्टबंगाल से फुटबाल का मैच है 7000 की भीड़ लाईन में लगी है, किसी भी मशहूर हीरो की नयी रीलीज है घंटों लोग लाईन लगाये हैं। आलू सस्ता लाईन लगी है, बरसात आनेवाली है छाता लेने के लिये लाईन में खड़े रहो, भले ही पानी बरस कर भिगो जाय। टिकट लेना है तो लाईन, राशन लेना है तो लाईन, चढना है तो लाईन ,उतरना है तो लाईन। यहां तो मर कर भी लाईन से पीछा नहीं छूटता, विश्वास ना हो तो नीमतल्ला घाट का नजारा देख लें।
इसी लाईनदार शहर मेंएक दिन “वेलिंगटन” की तरफ जाते हुए मुझे, उस व्यस्ततम सड़क के किनारे से लगी एक लाईन का सिरा नजर आया। वहां ऐसा कुछ नहीं था जो लाईन लगानी पड़े सो मैने पूछा कि किस बात की लाईन है तो पता चला कि “ज्योति”सिनेमा में लगी शोले के टिकट के लिये बंदे खड़े हैं। मैं चकित ज्योति हाल तो वहां से कम से कम एक नहीं तो पौन की मी तो दूर था ही। चकित सा मैं आगे बढ कर हाल के पास पहुंचा तो वहां तो कुंभ का मेला लगा हुआ था। गेट के सामने से गुजरने की जगह ही नहीं थी। मेरे देखते-देखते कैइयों के एक्स्ट्रा टिकट जेब से बाहर आते-आते ही चिंदियों मे बदल गये। टिकट दिखते ही लोग उस हाथ पर गिद्धों की तरह लपकते और टिकट “था” हो जाता। मैं किनारे खड़ा तमाशा देख ही रहा था कि एक लड़का मेरे पास आ धीरे से मेरे कान में बंगला में फुसफुसाया, “भाई पिक्चर देखोगे? मैंने कहा नहीं मैं देख चुका हूं। पर वह फिर बोला, दोबारा देख लो। मेरे पास समय था, मैंने कहा , चलो, ठीक है, टिकट दो, वह महौल से इतना ड़रा हुआ था कि टिकट निकालने में डर रहा था और टिकट के पैसे भी जाया नहीं होने देना चाहता था, बोला टिकट नहीं निकालूंगा, आप मेरे साथ भीतर चलो। उस दिन पिक्चर देख पता चला कि शोले 35मी मी के साथ साथ 75मी मी में भी बनाई गयी थी तथा इसके दो अंत थे।
यह सारी भूमिका मैने इस लिये बयान की है क्योंकि यह दुनिया की पहली फिल्म थी जिसे देखने के लिये इंसान तो इंसान जानवर भी आतुर थे।
मजाक थोड़े ही कर रहा हूँ, अगले अंक में बताऊँगा कि दो कुत्तों ने भी शोले देखी थी।
रविवार, 4 अप्रैल 2010
न कोई सार न ही तत्व, सिर्फ सनसनाहट
गर्मी दरवाजे पर दस्तक देने लग गयी है। कहीं-कहीं तो दरवाजे खुल भी गये हैं। अब जब सर पर आ पड़ी है तो उससे निपटने के तरह-तरह के इंतजामात भी किये जा रहे हैं। टी।वी. ने तो अपको इस मौसम मे तरोताजा रखने के लिये जैसे कमर ही कस ली है। लगता है यह ना होता तो शायद सब गर्मी की भेंट चढ जाता। तन को, मन को दिमाग को ठंड़ा रखने के उपाय हर पांच मिनट बाद आप को समझाए जा रहे हैं। वहीं साथ ही साथ प्यास बुझाने के लिये तरह-तरह के शीतल पेय आपकी सेवा में हाजिर किए जाते जा रहे हैं। हैं। अब कोई बार-बार इसरार करेगा तो आप मना भी तो नहीं कर सकते। खास कर बच्चे तो इनके आकर्षण में फंस ही जाते हैं। फिर माँ-बाप भी पीछे नहीं रहते अपने लाड़लों की इच्छओं को पूरा करने में। शौक पूरा करना अलग बात है पर उसकी आदत पड़ जाना तो खतरे की घंटी है।
अभी कुछ दिनों पहले देश के बाहर से मेरी एक रिश्तेदार आईं थीं। साथ में उनकी 10-12 साल की बिटिया भी थी। बच्ची जितने दिन भी यहां रही वह "फैंटा" नामक शीतल पेय ही पीती रही। उसकी 'मम्मी' को बहुतेरी बार समझाने की कोशीश की कि यह ठीक नहीं है, पर खुद यहां पली, बढी वर्षों यहां का टनों पानी पीने के बाद भी भली, चंगी तंदरुस्त रहने वाली उस महिला को यहां के पानी पर एतबार नहीं था।
यह बताने का मतलब यही था कि हम ही बच्चों में उल्टी-सीधी आदतें ड़ालने के लिए जिम्मेदार हैं। यहां भी मेरी छोटी भाभी के बच्चों के हाथ में कोई भी नया विज्ञापित खाद्य का पैकेट उसका दूसरी बार विज्ञापन आने के पहले आ जाता है। नतीजा भी सामने है, बच्चों की भूख कम हो गयी है, घर का खाना अच्छा नहीं लगता, आए दिन तबियत ढीली रहती है, पर मां का प्यार पैकटों में भर-भर कर आना जारी है। कहीं भी बाहर आना जाना हो तो बच्चों के लिये शीतल पेय की बड़ी बोतल सफर का एक अभिन्न अंग होती है।
सब पढे-लिखे हैं। अच्छा-बुरा समझने की ताकत भगवान ने दी है तो ऐसे किसी भी पेय को हाथ लगाने से पहले सोच तो सकते हैं कि क्या पानी, प्यास बुझाने का इससे बेहतर विकल्प नहीं है? पानी जिसमें ना कोई कैलोरी होती है ना कोई गैस ना मिलावटी रंग। इसके विपरीत कोला में कार्बन डाई आक्साइड, इथीलीन आक्साइड पालीमर चीनी या सैक्रीन के साथ साथ कैफीन भी होती है। सेहत चिंतकों के लिये चिंता बढाने वाली कैलोरी की मात्रा भी 95-100 के लगभग रहती है। ऐसे पेय पीने से कुछ देर के लिये प्यास बुझती सी लगती है क्योंकि इसमें स्थित गैसें पेट पर दवाब ड़ाल ऐसा एहसास दिला देती हैं। कोला में कैफीन की मात्रा भी काफी होती है जो किसी की सेहत के लिये भी ठीक नहीं होती। ऐसे पेय पदार्थों में कोई “Food Value" नहीं होती, उल्टे बच्चों के द्वारा इनका ज्यादा उपयोग करने से उनका हाजमा तो बिगड़ता ही है उनकी भूख भी मर जाती है।कोला के अलावा जो दूसरे पेय पदार्थ टी वी पर आ-आ कर लुभाने की कोशिश करते हैं वे भी पूरी तरह दोष मुक्त नहीं होते। उनमें भी साईट्रिक एसिड़ के साथ-साथ रंगों, गंधों और जायकों का मिश्रण पीने वाले की सेहत से खिलवाड़ करने का पूरा ताम-झाम समेटे रहता है।
सो इन गर्मियों में अपने घरेलू, हानिरहित, पारंपरिक सचमुच ठंडक प्रदान करने वाले पेय का ही इस्तेमाल करें और बच्चों को भी समझा कर असलियत बता कर उसकी आदत ड़लवाएं।
शनिवार, 3 अप्रैल 2010
नदी ने कहा जब तक तुझमें मिठास न आ जाए !!!
* जीवन में कामयाब होने के लिए तीन कारखाने लगाने की जरूरत है :-
1) दिमाग में बर्फ का कारखाना।
2) जुबान पर चीनी का कारखाना।
3) दिल में प्यार का कारखाना।
* एक दिन सागर ने नदी से पूछा, "कब तक मिलती रहोगी मुझ खारे पानी वाले से?"
नदी ने जवाब दिया, "जब तक तुझ में मिठास न आ जाये तब तक" !!!
* एक पेड़ से एक लाख माचिस की तीलियां बन सकती हैं। पर सिर्फ एक माचिस की तीली एक लाख पेड़ों को जला कर राख कर सकती है। उसी तरह एक नकारात्मक सोच सैकड़ों सपनों का नाश कर देती है।
इसलिये सदा सकारात्मक सोच को दिमाग में जगह दें।
* एक दोस्त ने मुझसे पूछा ,तुम सबको ई-मेल भेजते हो ? तुम्हे क्या मिलता है? मैंने हंस कर कहा, देना लेना तो व्यापार है, जो देकर कुछ न मांगे, वो ही तो प्यार है।
* अपने गम को अपने चेहरे की मुस्कान के पीछे छुपाओ,
बातें करो पर अपना दुख ना बताओ,
खुद ना रूठो कभी पर सब को मनाओ,
यही राज है जिंदगी का बस ऐसे ही जीते जाओ।
शुक्रवार, 2 अप्रैल 2010
जो सब को मारे वह भगवान
G :- Generator
O :- Operator
D :- destroyer
कुछ अलग सा :-
१, जो किसी एक को मारे - खूनी
सारा समाज, क़ानून, सारे लोग उसके विरुद्ध खड़े होते हैं।
२, जो किन्हीं दस को मारे - पुलिस
उनके काम पर भी ऊंगलियाँ उठती हैं। उन्हें अपने कृत्य की सफाई में कई पापड बेलने पड़ते हैं।
३, जो सौ को मारे - फौजी या सैनिक
सारे संसार की नजरें रहती है। भले-बुरे का जवाब देना और भुगतना पड़ता है।
४, जो सब को मारे - भगवान
कुछ भी हो जाए, दुनिया तहस-नहस हो जाए। फिर भी पूजा-अर्चना में कमी न आ कर और बढोत्तरी ही होती है।
गुरुवार, 25 मार्च 2010
तीन टायलेटी चुटकले।
1, ट्रेन में बैठे श्रीमान जी काफी परेशान थे। बार-बार कसमसा कर पहलू बदल रहे थे। चेहरे पर बैचैनी साफ झलक रही थी। उनकी हालत देख सहयात्री ने पूछा, परेशान लग रहे हैं, कोई तकलीफ है?
हां, टायलेट जाना है। श्रीमान जी ने जवाब दिया।
तो जाते क्यों नहीं? साथ वाले ने पूछा ।
ट्रेन जो चल रही है। श्रीमान जी बोले।
तो उससे क्या होता है? सहयात्री कुछ समझ ना पाया।
वहां लिखा है, चलती गाड़ी मे अपने शरीर का कोई अंग बाहर ना निकालें। श्रीमान जी ने अपनी परेशानी का कारण बताया।
2, बंता ट्रेन में टायलेट जाकर लौटा तो बदहवास था। सहयात्री ने पूछा, क्या हो गया?
बंता बोला टायलेट के छेद से मेरा पर्स नीचे गिर गया।
अरे, तो चेन खींचनी थी ना। सहयात्री ने कहा।
दो बार खींची पर हर बार पानी बहने लगा।
3, रेलगाड़ी में एक बुजुर्गवार अपनी सीट से बार-बार उठ कर टायलेट जा रहे थे। कुछ परेशान भी थे। सहयात्री बार-बार उनके आने-जाने से तंग आ चुका था। अंत में उसने चिढ कर कह ही दिया, कि बाबा आपको "चैन" नहीं है?
है तो सही बेटा पर खुल नहीं रही है।
बुधवार, 24 मार्च 2010
सचिन इसीलिए कुछ अलग सा है.
आई पी एल नामक क्रिकेट के तमाशे में सम्मिलित टीमों के नामों पर गौर किया है आपने?
चलिए मान लेते हैं कि ऐसी हुल्लड़ भरी नौटंकियों में भाग लेना है तो नाम भी ऐसे, वैसे, कैसे, कैसे ही होंगे, लोगों को रोमांचित व उत्तेजित करने के लिए, बिल्कुल WWF की कुश्तियों की तरह।
आईए जरा नामों पर गौर करें :- (लिप्यान्तरण पर ज्यादा ध्यान न दें)
1, Chennai Super Kings :- राजाओं के राजा।
२, Bangalore Royal Challengers :- शाही चुन्नौति पेश करने वाले।
3, Deccan Chargers :- तेज तर्रार युद्ध के घोड़े।
4, Delhi Dare Davils :- खतरनाक शैतान।
5, Kings XI Punjab :- राजाओं का जमावड़ा।
6, Kolkata Knight Riders :- नाईट की उपाधि प्राप्त घुड़सवार।
7, Rajasthan Royals :- राजसी लोगों का समूह।
8, Mumbai Indians :- मुम्बई के भारतीय या हिंदोस्तानी।
मुम्बई की टीम भी कोई ऐसा नाम रख सकती थी जैसे - मुम्बई डान, मुम्बई मोनार्क, मुम्बई एलीट, मुम्बई थ्रस्टर या ऐसा ही कुछ।
पर जैसा उसका कप्तान है, धीर, गंभीर, शांत, मितभाषी। वैसा ही उसकी टीम का नाम भी है। जाहिर है नाम रखते समय कप्तान की सहमति भी जरूर ली गयी होगी।
पर इस तमाशे, नौटंकी की चकाचौंध में भी तेंदुलकर ने अपने देश और देशवासियों को याद रखा। यही उसका बड़्ड़पन है, उसकी महानता है। यही सोच उसे औरों से कुछ अलग करती है।
हे श्रीराम, आज हमें तुम्हारा जन्मदिन नहीं, तुम्हारा सान्निध्य चाहिए.
प्रणाम।
आज तुम्हारा जन्म दिवस है। चारों ओर उल्लास छाया हुआ है। भक्तिमय वातावरण है। पूजा अर्चना जोरों पर है। पर यह सब भी आज के भौतिक युग की बाजारू संस्कृति का ही एक अंग है। एक बहुत छोटा सा प्रतिशत ही होगा जो सच्चे मन से तुम्हें याद कर रहा होगा। आधे से ज्यादा तो आज के अवकाश से खुश हैं। कुछ लोगों की दुकानदारी है और कुछ लोगों की तुम्हारे नाम की आड़ में अपनी रोटी सेकने का बहाना।
तुम्हारे जन्म दिवस का तो सब को याद है, पर तुम्हारे आदर्शों, तुम्हारी मर्यादा, तुम्हारे चरित्र, तुम्हारी बातों का इस देश से तिरोहण होता जा रहा है।
तुमने माँ-बाप की आज्ञा शिरोधार्य की, आज के माँ-बाप ड़रे रहते हैं कि ऐसा कुछ ना हो जाए जिससे उनके कुलदीपक को कुछ नागवार गुजरे। माँ-बाप की बात मानना तो दूर उनकी बात सुननी भी बच्चे गवारा नहीं करते। तुमने नारी के सम्मान करने की बात कही तो आज यहां हालात ऐसे हैं कि जन्म से पहले ही उन्हें परलोकगमन की राह दिखा दी जाती है। नारी उद्धार के पीछे अपना उद्धार करने पर कटिबद्ध हैं आज के समाज के कर्णधार। तुमने भाईयों के लिए सर्वत्याग किया आज अपने लिए लोग भाईयों को त्यागने में नहीं हिचकते। तुमने अपनी शरण में आनेवाले का सदा साथ दिया चाहे उसके लिए कोई भी कीमत चुकानी पड़ी हो पर आज मुसीबत में पड़े लोगों से भी कीमत वसूली जाती है। तुमने दीन-हीन-दुखियारे-पिछड़ों को सदा गले लगाया, उन्हें सम्मान का हकदार बनाया। आज ऐसे ही लोगों के कंधों का सहारा लेकर मतलबपरस्त अपनी पीढीयों का भविष्य सवारने में लगे हैं। तुमने धन-दौलत-एश्वर्य को सदा हेय समझा आज यही प्रतिष्ठा का माध्यम हैं। तुम्हारे समय में तो एक ही रावण था जिसे मार कर तुमने इस धरा को भयमुक्त किया था। पर आज तो घट-घट में रावण विराजमान हैं जो अपनी अभेद्य लंकाओं में बैठे-बैठे जाने कितनी सीताओं को अपमानित, लांछित तथा प्रताड़ित करने के बावजूद समाज में प्रतिष्ठित एवं सम्मानित हैं। तुम्हारे समय में शिक्षा, आध्यात्म, मोक्ष आदि पाने का जरिया होता था ऋषि, मुनियों का सान्निध्य, जिसमें वे आदरणीय पुरुष अपना जीवन लगा देते थे, आज के बाबा अपने एश्वर्य, भोग, लिप्सा के लिए दूसरों का जीवन ले रहे हैं। तुमने तो अपने शत्रु की अच्छाईयों को अपनाने में भी कभी देर नहीं की आज ऐसा करने की कोई सोचता भी नहीं है उल्टा उसके लिए कोई भी बुराई अपनाने में लोग नहीं हिचकते। तुमने अपने धूर विरोधियों को भी सम्मान दिया आज लोग अपने विरोधियों को मिटा देने में विश्वास करते हैं।
हे प्रभू आज हमें तुम्हारी ज्यादा जरूरत है। एक बार सिर्फ एक बार अपने सुंदर, सजीले, उतंग शिखरों वाले मंदिरों से बाहर आकर आप अपनी मातृभूमी की हालत देखो। तुम तो अंतर्यामी हो, दीनदयाल हो, सर्वशक्तिमान हो, तुम्हारे लिए तो कुछ भी अगम नहीं है.
एक बार सिर्फ एक बार फिर अवतार लो मेरे देवा !!!!!!
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