pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

रविवार, 1 मार्च 2009

महाबलीपुरम में क्यूं नहीं हैं गणेश जी की प्रतिमाएँ

जैसा कि सुब्रमणियन जी ने बताया कि महाबलीपुरम के शिव मंदिरों में गणेश जी की प्रतिमा नहीं मिलती तो मेरे ख्याल से इसके लिये शायद वह पौराणिक घटना जिम्मेवार हो सकती है जिससे कार्तिकेय जी नाराज हो गये थे। कथा तो बहुत से लोगों को मालुम होगी फिर भी प्रसंगवश दिये दे रहा हूं :-
पुराणों के अनुसार एक बार कार्तिकेय और गणेश जी में इस बात पर बहस हो गयी कि उन दोनों में कौन श्रेष्ठ तथा माता-पिता को ज्यादा प्रिय है। फैसला करवाने दोनों भाई शिव जी तथा माता पार्वती जी के पास पहुंचे और इस गुत्थी को सुलझाने के लिये कहा। शिव जी तथा मां पार्वती दोनों पेशोपेश में पड़ गये फिर भी उन्होंने एक रास्ता निकाला और कहा कि जो पूरी पृथ्वी का चक्कर लगा पहले आएगा वही श्रेष्ठ कहलायेगा। इतना सुनते ही कार्तिकेय जी अपने वाहन मयूर पर सवार हो निकल पड़े। इधर गणेश जी कभी अपने भारी भरकम शरीर को देखें और कभी अपने वाहन छोटे से चूहे को, जिस पर सवार हो पूरी यात्रा करने में उन्हें महिनों लग जाने थे। तभी उनकी तीव्र बुद्धी ने उन्हें एक मार्ग सुझाया कि सारे ब्रह्मांड़ से बड़ा और श्रेष्ठ मां-बाप का पद होता है। फिर क्या था उन्होंने झट अपने माता-पिता की सात प्रदक्षिणाएं कीं और हाथ जोड़ दोनों की स्तुति कर उनके चरणों में बैठ गये। उनकी इस चतुराई से दोनों जने बहुत खुश हुए और उन्हें श्रेष्ठ होने का पुरस्कार प्रदान कर दिया।
उधर जब पूरी पृथ्वी का चक्कर लगा कार्तिकेय लौटे तो उन्हें इस बात की जानकारी से बहुत दुख हुआ और वे नाराज हो विंध्य पर्वत के पार कभी भी लौट कर ना आने की कसम ले चले गये। उनके इस तरह नाराज हो चले जाने से अब तक दोनों भाईयों की बहस को बच्चों की झड़प मानने वाले शिव तथा पार्वती जी ने बात की गंभीरता को समझा और वे तुरंत अपने बड़े बेटे को मनाने निकल पड़े, पर तब तक बात बहुत बिगड़ चुकी थी। कार्तिकेय को न मानना था और न वह माने। हां उन्होंने अपने माता-पिता की बात रखते हुए अपनी नाराजगी तो दूर कर ली और पर साथ ही यह भी कहा कि मैं तो कैलाश नहीं आउंगा पर आप मुझसे मिलने इधर विंध्य पार जरूर आते रहें। तब से ही दक्षिण में कार्तिकेय जी, जिन्हें वहां मुरुगन जी के नाम से भी जाना जाता है, के मंदिरों की बहुतायद है।
हो सकता है कि यही कारण हो जो यहां के मंदिरों में गणेश जी की प्रतिमाएं नहीं पायी जातीं।
* एक छोटी सी जिज्ञासा, यदि ऐसा हुआ था तो क्या यह कार्तिकेय जी, जिन्होंने माता-पिता की आज्ञा को शिरोधार्य कर उनके आदेश को सर्वोपरि माना, उनका रूठना क्या जायज नहीं था ?
पर ऐसा भी हो सकता है कि अपने-अपने देवों को प्रमुखता देने के लिये भक्तों ने अपनी-अपनी तरफ से कथाएं गढ ली हों। ऐसा पाया भी गया है और इसकी संभावना भी बहुत है।

शुक्रवार, 27 फ़रवरी 2009

एनिवर्सरी :- सिल्वर, गोल्ड, डायमंड के अलावा भी नाम हैं.

एनिवर्सरी या वार्षिकोत्सव ज्यादातर 25वीं सिल्वर या रजत, 50वीं गोल्ड या स्वर्ण और 60वीं डायमंड के रूप में ही जानी जाती हैं जब कि इनका नामकरण 'पहली' से निम्नानुसार जाना जाता है। जैसे :-
First : Paper, Second : Calico,
Third : Leather, Fourth : Silk,
Fifth : Wood, Sixth : Iron
Seventh : Sandle wood, Eighth : Bronze
Ninth : Pottery, Tenth : Tin
Fifteenth : Crystal, Twentieth : China
Twe.fifth : Silver, Thirtieth : Pearl
Thi.fifth : Jade, Fortieth : Ruby
F. fifth : Sapphire, Fiftieth : Gold
F. fifth : Emerald, Sixtieth : Diamond
इस बारे में और ज्यादा जानकारी हो तो जानना चाहूंगा।

बुधवार, 25 फ़रवरी 2009

समाधी, तथ्य क्या है?

बहुत बार सुनने में आता है कि किसी जादुगर ने जमीन के नीचे इतना समय बिताया या किसी साधू ने भूमि में समाधी लगाई। तो आश्चर्य चकित रह जाते हैं लोग। कोई इसे दैवी शक्ति बताता है और कोई कुछ और। पर विज्ञान क्या कहता है देखें -------
भू समाधी के लिये सबसे बड़ी जरूरत होती है अभ्यास की। इसके लिये एक कमरेनुमा स्थान बनाया जाता है, जिसमें आराम से बैठा जा सके। कमरे को पानी से सींच कर दिवारें चूने से पोत दी जाती हैं। फिर उसमें दीया जला कर आक्सीजन गैस की मात्रा देख ली जाती है। समाधी लेने वाले के प्रवेश के बाद गड्ढे की छत को बांस-टाट आदि से ढ़क कर मिट्टी गोबर आदि से पोत दिया जाता है।
वैज्ञानिक आकलन के अनुसार दस फिट लंबे, दस फिट चौडे तथा दस फिट गहरे (10x10x10) गड़्ढे में 1000 घन फिट हवा रहती है। जबकि एक स्वस्थ आदमी को एक घंटे में सिर्फ 5 घन फिट हवा की जरूरत पड़ती है। जिसका सीधा अर्थ है कि उस आकार के गडढे में एक इंसान 200 घंटे यानि 8 दिन तक रह सकता है। इसके साथ-साथ विश्राम की अवस्था में श्वसन में भी कम वायू की जरूरत होती है। इसके अलावा कमरे की मिट्टी भी भुरभुरी रहती है जिससे सुक्ष्म मात्रा में ही सही, वायू का आवागमन बना रहता है। सो समाधी के लिये दृढ इच्छाशक्ति और अभ्यास के साथ-साथ मानसिक संतुलन बनाए रखना जरूरी होता है।
समाधी की तुलना अंतरिक्ष यात्रियों, टैंक में बैठे फौजियों तथा पनडुब्बियों में रहने वाले सैनिकों से की जा सकती है। काम कठिन है पर अभ्यास से संभव है।

मंगलवार, 24 फ़रवरी 2009

हँसना नहीं है तो मुस्कुराईये तो सही

पोता दादा जी से जिद कर रहा था सर्कस दिखाने की। चलिए ना दादा जी सर्कस में नयी-नयी चीजें दिखा रहे हैं। हाथी और गैंडा फुटबाल खेलते हैं। जोकर बहुत हंसाते हैं। पर दादा जी मान ही नहीं रहे थे, क्या बिटवा वही सब पुराने खेल हैं। पोता भी कहां मानने वाला था बोला सुना है इस में ढेर सारे घोड़े ताल में नाचते हैं। दादा जी भी नहीं मान रहे थे बोले देख तो रहे हो मेरी तबीयत ठीक नहीं लग रही है। पर पोता भी अड़ा हुआ था, बताने लगा, उपर झूले में एक साथ दस जने झूलते हैं और अबकी चीन से लड़कियां आयीं हैं जो छोटे-छोटे कपड़ों में पोल डांस करती हैं।
दादा जी उठे बोले चल इतनी जिद करता है तो चले चलता हूं। मैने भी घोड़ों को ताल पर नाचते नहीं देखा है।
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गांव के गरीब किसान दुखीराम की दस लाख की लाटरी निकल आयी। ये खबर ले कर आने वाला एजेंट सोच रहा था कि इतनी बड़ी राशि मिलने की बात सुन कर कहीं दुखीराम को हार्ट अटैक ना हो जाये इस लिये उसने एक योजना बनाई।
दुखीराम के पास जा कर उसने कहा कि दादा यदि आप को एक लाख रुपये मिल जायें तो क्या करोगे ? दुखीराम बोला भाई घर का छप्पर ठीक कराउंगा, एक-दो बैल ले लुंगा। अच्छा दादा पांच लाख मिले तो क्या करोगे ? बिटिया की शादी कर दूंगा। अच्छा दादा यदि तुम्हें दस लाख रुपये मिल जायें तो क्या करोगे ? दस लाख!!! दुखीराम बोला, दस लाख मिल जायेंगे तो आधे तुम्हें दे दूंगा।
इतना सुनना था कि एजेंट का हार्ट फेल हो गया।

सोमवार, 23 फ़रवरी 2009

लोहार्गल, जहाँ पांडवों के हथियार गले थे.

महाभारत युद्ध समाप्त हो चुका था, पर पांडव स्वजनों की हत्या के पाप से व्यथित थे। श्री कृष्ण के निर्देश पर वह सभी तीर्थ स्थलों के दर्शन करते भटक रहे थे। श्री कृष्ण ने उन्हें बताया था कि जिस तीर्थ में तुम्हारे हथियार पानी में गल जायेंगे वहीं तुम्हारा मनोरथ पूर्ण होगा। घूमते-घूमते पांण्ड़व लोहार्गल आये तथा जैसे ही उन्होंने यहां के सूर्य कुंड़ में स्नान किया उनके सारे हथियार गल गये। उन्होंने इस स्थान की महिमा को समझ इसे तीर्थ राज की उपाधी से विभूषित किया। फिर शिव जी की आराधना कर मोक्ष की प्राप्ति की।
राजस्थान के शेखावटी इलाके के झुंझुनूं जिले से 70 कि. मी. दूर आड़ावल पर्वत की घाटी में बसे उदयपुरवाटी कस्बे से करीब दस कि.मी. की दूरी पर स्थित है लोहार्गल। जिसका अर्थ होता है जहां लोहा गल जाए। पुराणों में भी इस स्थान का जिक्र मिलता है। पहले यहां सिर्फ साधू-सन्यासी ही रहा करते थे, पर अब गृहस्थ लोग भी रहने लगे हैं। यहां एक बहुत विशाल बावड़ी है जो महात्मा चेतन दास जी ने बनवाई थी, यह राजस्थान की बड़ी बावड़ियों में से एक है। साथ के पहाड़ पर प्राचीन सूर्यमंदिर बना हुआ है। साथ ही वनखंड़ी जी का मंदिर है। कुंड़ के पास ही प्राचीन शिव मंदिर, हनुमान मंदिर तथा पांड़व गुफा स्थित है। इनके अलावा चार सौ सीढियां चढने पर मालकेतु जी के दर्शन किये जा सकते हैं। यहां समय-समय पर मेले लगते रहते हैं। हज़ारों नर-नारी यहां आ कुण्ड़ में स्नान कर पुण्य लाभ प्राप्त करते हैं।
लोहार्गल एक प्राचीन, धार्मिक, ऐतिहासिक स्थल है। लोगों की इसके प्रति अटूट आस्था भी है। भक्तों का यहां आना-जाना लगा रहता है फिर भी इस क्षेत्र की हालत सोचनीय है। सरकार की ओर से पूर्णतया उपेक्षित इस जगह पर प्राथमिक सुविधाएं भी उपलब्ध नहीं हैं। चारों ओर गंदगी का आलम है। पशु-मवेशी खुले आम घूमते रहते हैं। सड़कों की हालत दयनीय है। नियमित बस सेवा भी उपलब्ध नहीं है। रहने खाने का भी कोई माकूल इंतजाम नहीं है। यदि इस ओर थोड़ा सा भी ध्यान पर्यटन विभाग दे तो यहां देशी-विदेशी पर्यटकों का आना शुरु हो सकता है।

अब तो हम भी आस्कर वाले हो गए हैं

चलो आखिर आस्कर मिल ही गया। उनको भी सकून मिलेगा जो शहर के अंदेशे से परेशान रहते थे। उनको भी जिन्हें इसके अब तक छलने का गम होता रहता था। वे तो बहुत ही खुश होंगे जिनके लिये हर बेहतरीन चीज तब तक कोई पहचान नहीं रखती जब तक पश्चिम का ठप्पा ना लग जाए।
फिर भी रहमान और गुलज़ार साहब को उनकी मेहनत, समर्पण, लगन तथा उत्कृष्टता के लिये सम्मान मिला, पहचान मिली विश्व स्तर पर, तो हम भी तो गौर्वान्वित हुए ही हैं। ये आस्कर वाले वर्षों से हमें पूर्वाग्रहों के कारण नकारते चले आ रहे थे पर प्रतिभा को कब तक नज़रंदाज़ किया जा सकता है।
जय हो, जय हो

"आप सब को महा शिवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएं"

रविवार, 22 फ़रवरी 2009

जल चिकित्सा, कई रोगों का आसान इलाज.

आज जबकि किसी भी रोग की चिकित्सा कराना दिनों-दिन मंहगा होता चला जा रहा है, वहीं दसियों साल पहले "जापानी रोग संघ" द्वारा एक सरल, सुलभ तथा तकरीबन मुफ्त की चिकित्सा विधि बतलाई गयी थी। जिसका नाम है "जल-चिकित्सा"। संघ द्वारा प्रकाशित लेख में बताया गया है कि यदि जल-उपचार को विधिपूर्वक किया जाए तो बहुत से कठिन रोगों से छुटकारा पाया जा सकता है।
विधी :- सबेरे सोकर उठते ही बिना ब्रश किये या मुंह धोये एक साथ चार गिलास, करीब ड़ेढ लीटर, पानी पीना होता है। इसके बाद 40-45 मिनट तक कुछ भी खाना या पीना नहीं नहीं चाहिए। हां ब्रश वगैरह कर सकते हैं। इस उपचार के दौरान किसी भी भोजन (नाश्ता, दोपहर या रात्रि भोजन) के बाद कम से कम दो घंटे तक पानी नहीं पीना चाहिए। इसके अलावा सोने के पहले कुछ भी खाने की मनाही है। दिन भर अपनी जरूरत के अनुसार जल ग्रहण किया जा सकता है।
जो लोग एक साथ चार गिलास पानी नहीं पी सकते हों उन्हें एक या दो गिलास से शुरु कर धीरे-धीरे चार गिलास तक पहुंचना चाहिए। पर प्रक्रिया को बीच में खत्म नहीं करना चाहिए। इस उपचर को कोई भी अपना सकता है वह चाहे स्वस्थ हो या बीमार। यह एक साधारण उपचार विधि है, जिस पर कोई लागत नहीं आती। चार गिलास पानी पीने से कोई विपरीत प्रभाव भी नहीं पड़ता। केवल प्रकृति की पुकार बढ जाती है वह भी 2-3 बार के लिए, फिर वह आदत में शुमार हो जाती है।
जापानी रोग संघ के अनुसार निम्न रोगों को समाप्त होने में दिया गया संभावित समय लगता है - -
1, उच्च रक्तचाप :- 1 माह,
2, मधुमेह :- 1 माह,
3, कैंसर :- 1 माह,
4, आमाशायी रोग :- 10 दिन,
5, कब्ज :- 10 दिन,
6, क्षय रोग :- 3 माह,
आज तो हर चिकित्सक ज्यादा से ज्यादा पानी पीने की सलाह देता है, तो एक बार आजमाने में कोई दिक्कत भी नहीं है सिर्फ नियम बद्ध हो कर और थोड़ा विश्वास रखते हुए शुरु करने भर की देर है। मैं तो शुरु हूं आप भी हो जाईये।

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