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मंगलवार, 30 मार्च 2021

लक्ष्मण झूला, ऋषिकेश का

इसको देखने का अनुभव जरूर अलग है पर इसकी दशा देख दुःख होता है। लोगों की भीड़ इस पर सदा जमी रहती है। दसियों फोटोग्राफर अपनी रोजी-रोटी के लिए दर्शकों को यहीं बांधे रखते हैं ! दो-तीन मवेशी भी लोगों के द्वारा खाए-अधखाए-छूटे हुए खाद्य-पदार्थों की खोज में वहीं मंडराते रहते हैं ! सुबह से शाम तक हर वक्त 100-150, इससे ज्यादा ही, लोगों का भार दिन भर झेलते, यह कितने दिन निकाल पाएगा, कहा नहीं जा सकता.......!

#हिन्दी_ब्लागिंग 
लक्ष्मण झूला ! ऋषिकेश में गंगा नदी पर बना हुआ यह एक पुल है, जिसे खंभों पर नहीं बल्कि लोहे के मोटे तारों के सहारे बनाया गया है। पहले यह लोगों के और हवा के चलने से झूले की तरह डोलता था इसीलिए इसे झूला नाम दिया गया था। पर अब इसकी उम्र और लोगों के बढ़ते आवागमन को देखते हुए इसे फिक्स कर दिया गया है, अब यह सिर्फ पैदल पथ के रूप में ही प्रयोग किया जाता है। यह गंगा नदी के पश्चिमी किनारे के तपोवन और पूर्वी किनारे पर बसे गांव जोंक को आपस में जोड़ता है। 



पौराणिक कथाओं के अनुसार रावण वध की सफलता के लिए श्री राम ने लक्षमण जी के साथ यहीं आ कर तपस्या की थी। ऐसी मान्यता है कि आज जहां यह पुल है, उसी जगह से लक्ष्मण जी रस्सियों के सहारे गंगा नदी पार किया करते थे। इसीलिए उस जगह बने पुल का नाम उनके नाम पर पड गया। बहुत पहले यहां लोग छींके या टोकरी में बैठ, रस्सियों के सहारे नदी पार किया करते थे। फिर सन् 1889 में उसकी जगह कलकत्ते के एक धार्मिक, दानी सज्जन सूरजमल जी के द्वारा लोहे के मजबूत तारों से दूसरा पुल बनवाया गया। लेकिन लोहे के तारों से बना वह मजबूत पुल 1924 की एक भीषण बाढ़ में बह कर नष्ट हो गया। इस हादसे के बाद नदी से करीब 70 फीट ऊपर, आज का यह मजबूत एवं आकर्षक, 450 फीट लम्बा और 5 फीट चौड़ा पुल 1929 में बन कर तैयार हुआ, जिसे 11 अप्रैल 1930 में लोगों के लिए खोल दिया गया।


आज रख-रखाव की कुछ कमी और पर्यटकों के बढ़ते दवाब के कारण नब्बे साल से भी ऊपर के इस पुल के अस्तित्व पर खतरा मंडराने लगा है। हालांकि इसके विकल्प के रूप में नदी पार करने के लिए और पुल भी बन गए हैं पर अपनी प्रसिद्धि के कारण यह अभी भी लोगों के आकर्षण का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। इसको देखने का अनुभव जरूर अलग है पर इसकी दशा देख दुःख होता है। लोगों की भीड़ इस पर सदा जमी रहती है। दसियों फोटोग्राफर अपनी रोजी-रोटी के लिए दर्शकों को यहीं बांधे रखते हैं ! दो-तीन मवेशी भी लोगों के द्वारा खाए-अधखाए-छूटे हुए खाद्य-पदार्थों की खोज में वहीं मंडराते रहते हैं ! सुबह से शाम तक हर वक्त 100-150, इससे ज्यादा ही, लोगों का भार दिन भर झेलते, यह कितने दिन निकाल पाएगा, कहा नहीं जा सकता ! 


पुल तक पहुंचने के लिए तक़रीबन 40-45 सीधी सीढ़ियां उतरनी पड़ती हैं। जो बुजुर्गों के लिए बहुत सुरक्षात्मक नहीं कही जा सकतीं ! इसके अलावा इस तक का पहुंच मार्ग भी सुविधाजनक नहीं है। असमतल सड़कें, बढ़ती दुकानें, जगह घेरते फेरी वाले, आस-पास मंडराते पशु, पर्यटकों के लिए खासी असुविधा उत्पन्न करते हैं। स्थानीय लोगों का व्यापार तो खूब बढ़ रहा है पर बाहर से आने वाले लोग सहजता महसूस नहीं कर पाते। ऐसे विश्व प्रसिद्ध स्थानों का तो विशेष रूप से रख-रखाव और ध्यान रखा जाना जरुरी है। जिससे आने वालों और स्थानीय लोगों, दोनों का मकसद और ध्येय पूरा हो सके।    

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