गुरुवार, 26 जुलाई 2018

एक था सम्पाती  !

महाकाव्य रामायण में  कुछ अहम पात्र ऐसे भी हैं जिनका कथा में योगदान तो बहुत महत्वपूर्ण है पर उनके बारे में  विस्तृत जानकारी नहीं मिलती।  ऐसा ही एक पात्र है, सम्पाती ! जिसने सीताजी के लंका में रावण की कैद में होने के बारे में सही दिशा निर्देश दे, श्री राम जी की सहायता की थी। कौन था यह सम्पाती ?       

#हिन्दी_ब्लागिंग 
ऋषि कश्यप और विनीता के दो पुत्र थे, गरुड़ और अरुण। गरुड़, भगवान विष्णु के वाहन बने और पक्षीराज  
कहलाए। उधर अरुण सूर्यदेव के रथ के सारथी बने। इन्हीं अरुण के दो पुत्र हुए सम्पाती और जटायू। जटायु से राजा दशरथ का परिचय पंचवटी में एक आखेट के दौरान हुआ था। तभी से वे दोनों मित्र बन गए थे। दोनों भाइयों जिनमें सम्पाती बड़ा और जटायु छोटा था। ऐसा माना जाता है कि इनका जन्म गृद्धराज पर्वत पर हुआ था। इस जगह का उल्लेख हमारे ग्रंथों में कई बार मिलता है, जो आजके मध्यप्रदेश के सतना जिले में पड़ता है। आज भी यह जगह देश में ही नहीं विदेशों में भी गिद्धों के प्राकृतवास के रूप में जानी जाती है।

सम्पाती और जटायू दोनों वृहदाकार और अत्यंत बलशाली थे। विंध्याचल पर्वत की तलहटी में रहते हुए ये दोनों
निशाकर ऋषि की सेवा करते हुए संपूर्ण दंडकारण्य क्षेत्र में विचरण करते रहते थे। इनका सामना करने की हिम्मत किसी में नहीं थी इसलिए ये आपस में ही स्पर्द्धा करते रहते थे। ऐसे में  ही  दिन दोनों ने सूर्यदेव का पीछा करने की ठानी और आकाश में उडते हुए उनके नजदीक चले गए परिणामस्वरुप इनकी त्वचा जलने लगी, छोटे भाई को बचाने खातिर सम्पाती ने अपने पंखों से जटायू को तो ढक कर बचा दिया पर खुद बुरी तरह जल गया और शक्तिहीन हो विंध्य पर्वत के पास धरा पर जा गिरा। ऋषि चन्द्रमा की  चिकित्सा से वह कुछ ठीक तो हो गया पर पहले जैसी शक्ति और सौंदर्य न पा सका। ऋषि ने उसे आश्वासन दिया कि राम वन गमन पर जब वह उनकी सहायता करेगा तो उसे पूर्ण निरोगिता प्राप्त हो जाएगी।  इसलिए वह वहीँ समुंद्र किनारे एक गुफा में रहने लग गया। उसके आहार और देख-भाल वगैरह उसका बेटा सुपार्श्व किया करता था। ऐसे ही वह समय भी आ गया जब जामवंत, अंगद और हनुमान जी के साथ वानर सेना सीताजी को ढूंढते हुए सम्पाती की गुफा तक आ पहुंची। इतने सारे जीवों को एक साथ देख सम्पाती बड़ा खुश हुआ कि भगवान ने कई दिनों के लिए उसके भोजन की व्यवस्था कर दी। जैसे ही वह उन्हें खाने के लिए लपका, उसके विशाल शरीर को देख वानरों में खल-बली मच गयी पर तभी जामवंत जी बोले, भगवान् की माया देखो, एक यह गिद्ध है जो हम थके, लाचार लोगों को अपना आहार बनाना चाहता है: दूसरा वह जटायू था जिसने एक लाचार स्त्री को बचने के लिए अपनी जान दे दी ! सम्पाती ने जैसे ही जटायू का नाम सुना वह थम गया और इनसे पूरी बात बताने को कहा। जैसे ही उसे रावण
द्वारा जटायू वध और सीता हरण की बात का पता चला वह निढाल औरअत्यंत दुखी हो बैठ गया। कुछ देर बाद उसने रुंधे गले से बताया कि मैं उसी जटायू का भाई सम्पाती हूँ; बताओ मैं तुम लोगों की क्या सहायता कर सकता हूँ ? मुझे गरुड़ जी की कृपा से सैंकड़ों योजन तक देख पाने की क्षमता प्राप्त है। जामवंत जी ने उससे सीताजी का पता लगाने में सहयोग माँगा। सम्पाती ने अपनी दिव्य-दृष्टि से पता लगा बताया कि सीताजी यहां से सौ योजन दूर सागर के बीच स्थित लंका में एक वाटिका में रावण की कैद में हैं। उसने इन सब को वहाँ जाने लिए प्रोत्साहित भी किया। जैसे ही उसने यह बात बताई पूरी वानर सेना ख़ुशी से उछल पड़ी।
उधर जैसे ही सम्पाती ने सीताजी का पता लगा राम काज में सहयोग किया वैसे ही उसमें शक्ति का संचार होना आरंभ हो गया तथा इसके साथ-साथ उसका शरीर भी फिर पंखों से ढकने लग गया।   


@चित्र अंतरजाल के सौजन्य से 

2 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (28-07-2018) को "ग़ैर की किस्मत अच्छी लगती है" (चर्चा अंक-3046) पर भी होगी।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

शास्त्री जी, हार्दिक आभार !

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