मंगलवार, 10 अक्तूबर 2017

मंदिर, जहां अमिताभ के जूते पूजे जाते हैं !!

इस क्लब के कुछ मेंबर इससे असंतुष्ट भी हैं जिसका कारण इस मूर्ति का प्रारूप फिल्म "सरकार तीन" के सुभाष नागरे जैसा तथा उसके सिंहासन का अमिताभ की एक और फिल्म "अक्स" की हरे रंग की कुर्सी का होना है। दोनों ही चीजें मन में एक नकारात्मक सोच उत्पन्न करती हैं। ये लोग उनके जबरदस्त प्रशंसक तो हैं पर उन्हें भगवान मानने से हिचकते हैं....... 
#हिन्दी_ब्लागिंग       
कोलकाता में बालीगंज के तिलजला इलाके का एक संकरा सा मार्ग श्रीधर राय रोड। यहीं के एक अपार्टमेंट में रहता है संजय पाटोदिया परिवार। इस परिवार के लोग "ऑल बेंगाल अमिताभ बच्चन फैंस एसोसिएशन (ABABF) के मेंबर हैं और इनके घर में भगवान की नहीं एक इंसान की पूजा की जाती है जो और कोई नहीं हिंदी फिल्म जगत के प्रसिद्ध अभिनेता अमिताभ बच्चन हैं। इन लोगों का मानना है कि कोई अलौकिक शक्ति तो जरूर है अमिताभ में, जिसके कारण तक़रीबन पचास साल (48) से वे सबके चहते बने हुए हैं। इसीलिए यहां उनकी पूजा की जाती है।   

हालांकि कोलकाता में ही अधिकाँश लोगों को इस जगह का पता नहीं है, इसके साथ ही, देश में एकाधिक व्यक्तियों के मंदिर होने के बावजूद, लोग व्यक्ति पूजा को उचित नहीं मानते और इसे पागलपन या मजाक का विषय समझते हैं। पर इन सब से किसी की रूचि को तो बदला नहीं जा सकता ! शायद इसीलिए पाटोदिया परिवार ने अपने घर के एक हिस्से में एक मंदिर नुमा म्यूजियम बना रखा है जिसमें अमिताभ की एक प्रतिमा स्थापित है। अमिताभ की रियल लम्बाई से भी कुछ ऊँची, फायबर से बनी 25 किलो की इस मूर्ति को सुब्रत बोस नाम के कारीगर ने तीन महीने में बनाया है। इसकी लागत करीब एक लाख रुपये आई है।

पर इस क्लब के कुछ मेंबर इससे असंतुष्ट भी हैं जिसका कारण इस मूर्ति का प्रारूप फिल्म "सरकार तीन" के सुभाष नागरे जैसा तथा उसके सिंहासन का अमिताभ की एक और फिल्म "अक्स" की हरे रंग की कुर्सी का होना है। दोनों ही चीजें मन में एक नकारात्मक सोच उत्पन्न करती हैं। ये लोग उनके जबरदस्त प्रशंसक तो हैं पर उन्हें भगवान मानने से हिचकते हैं। 

पर इस सब से पाटोदियों को कोई फर्क नहीं पड़ता। उनके मंदिर के द्वार पर फ्लोरोसेंट लाइट से "जय अमिताभ बच्चन" जगमगाता रहता है और अंदर किसी देवता की तरह झांझ-मजीरे-घंटियों के साथ उनके भजन और आरती पूरे विधि-विधान व अनुष्ठान और पूरे जोशो-खरोश के साथ गयी जाती है। संजय पाटोदिया ने तो पूरे नौ पेज की अमिताभ चालीसा भी लिख रखी है, जिसका "हर-हर अमिताभ" और "जय श्री अमिताभ" छपा शाल ओढ़ कर, सस्वर पाठ किया जाता है। इन सब के बाद प्रसाद का वितरण भी होता है।                               

मंदिर के अगले हिस्से की दीवारें, वाल-पेपर पर लिखे "जय अमिताभ" से पटी हुई हैं जिन पर अमिताभ की फिल्मों के पोस्टर, उनकी तस्वीरों की भरमार है। इसी के साथ वहीँ एक कांच के बॉक्स में फिल्म "अग्निपथ" में उनके द्वारा पहने गए सफ़ेद चमड़े के जूते भी रखे हुए हैं, जिन्हें इन लोगों के अनुसार अमिताभ ने इनके निवेदन पर यहां भिजवाया था। ये लोग इसकी तुलना भरत की खड़ाऊं से करते हैं। रोज की पूजा-अर्चना के साथ-साथ इनकी भी पूजा की जाती है। साल में दो दिन यहां ख़ास कार्यक्रम भी होते हैं। पहला 11 अक्टूबर, अमिताभ के जन्म दिन पर और दुसरा, 2 अगस्त, जब फिल्म "कुली" के हादसे के बाद उन्होंने स्वास्थ्य लाभ किया था।  जिसे उनका दुसरा जन्म माना जाता है। इस दिन ख़ास पूजा वगैरह के बाद रक्त दान के साथ-साथ  वस्त्र वितरण तथा अमिताभ से जुडी प्रतियोगिताएं भी आयोजित की जाती हैं।    

संजय पाटोदिया अपने-आप को अमिताभ का फैन नहीं भक्त कहलाना पसंद करते हैं। उनका जनून तो इतना बढ़ गया है कि उन्होंने मंदिर में लिख रखा है कि "हे प्रभू ! क्षमा करें ! हम आपसे ज्यादा अमिताभ को पूजते हैं।" उनके अनुसार कोलकाता में अमिताभ की हर फिल्म की रिलीज  पर वह उसकी  सफलता  के लिए प्रार्थना करते

हैं, उनके जैसे कपडे पहन कर हॉल पर जा मिठाई का प्रसाद बांटते हैं। अमिताभ की हर एक गतिविधि का लेखा-जोखा रखा जाता है। इन लोगों के लिए उनकी हर बात प्रभू का आदेश है सिवा इसके कि उनको इंसान माने भगवान नहीं।

कोलकाता के लोगों के मन में एक प्रश्न अक्सर सर उठता है कि पाटोदिया परिवार का यह सारा ताम-झाम कहीं खुद को प्रचारित करने के लिए तो नहीं ? कुछ ऐसा अलग सा करना कि देश-विदेश में नाम हो ? लोग जानें, जगह-जगह उनकी चर्चा हो ! जिसमें वे पूरी तौर पर तो नहीं पर कुछ तो सफल हो ही गए हैं। क्योंकि कोई भी हस्ती पूजा करवाने की हद तक तब पहुंचती है, जब बिना अपने स्वार्थ के उसका समाज के उत्थान में बहुत बड़ा हाथ हो, देश के लिए परिवार समेत समर्पण हो, बहुत ही ख़ास आध्यात्मिक, चारित्रिक या बौद्धिकता की मिसाल कायम की गयी हो ! शायद अमिताभ जी को भी तथाकथित मंदिर को लेकर यहां के अधिकाँश लोगों में उसके बारे में उनकी सोच, मानसिकता और उदासीनता का पता है, इसीलिए दसियों साल बीत जाने पर भी उन्होंने अभी तक यहां आना उचित नहीं समझा है !  आगे की भगवान् जाने !!!     

9 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (11-10-2017) को
होय अटल अहिवात, कहे ध्रुव-तारा अभिमुख; चर्चामंच 2754
पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
--
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

शास्त्री जी, स्नेह बना रहे

राजीव कुमार झा ने कहा…

बहुत रोचक और दिलचस्प भी.वैसे साउथ में रजनीकांत के भी मंदिर हैं.लेकिन उत्तर भारत में ऐसा देखने को नहीं मिलता.

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

राजीव जी,
दक्षिण के कलाकारों की बात कुछ अलग है, समाज के लिए उनका बहुत योगदान रहता है ! पर ..........!!!

sweta sinha ने कहा…

गगन जी,हाँ इस बाबत थोड़ा पढ़े थे टर आज आपके लेख से सब स्पष्ट हो गया,मेरे मतानुसार सबकी अपनी भावनाएँ होती है किसी भी व्यक्ति को पसंद और नापसंद करने में,किंतु व्यक्तिगत,इस तरह से आडंबर करने से पीछे सिवाय बनावटीपन के कुछ नज़र नहीं आता।
समाज में हरतरह के प्राणी है आपके द्वारा स्पष्ट हुआ।

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

श्वेता जी,
सही है हर कोई स्वतंत्र है अपने मनानुसार चलने को। पर कुछ अलग तरीके से प्रसिद्धि पाने की कामना भी हो सकती है इस सब के पीछे ! वैसे अमिताभ ने भी 15-16 साल हो जाने के बावजूद कोई ख़ास तवज्जो नहीं दी है इस ओर !

HARSHVARDHAN ने कहा…

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन लोकनायक जयप्रकाश नारायण और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

हर्ष जी,
आभार

संजय भास्‍कर ने कहा…

बनावटीपन

विशिष्ट पोस्ट

कोई तो कारण होगा, धर्म स्थलों में प्रवेश के प्रतिबंध का !!

अभी कुछ दिनों पहले कुछ तथाकथित आधुनिक महिलाओं ने सोशल मिडिया पर गर्व से यह  स्वीकारा था कि माह के उन  कुछ ख़ास दिनों में भी वे मंदिर जात...