मंगलवार, 26 सितंबर 2017

.....बच बच के, बच के कहाँ जाओगे !

लोग बसों से आते-जाते थे, उसके किराए बढ़ा दिए गए ! लोग ने चुप रह मेट्रो का रुख किया तो उसकी कीमतें भी बढ़ा दी गयीं ! तर्क ये कि सालों से इसका किराया नहीं बढ़ा है ! गोयाकि सालों से नहीं बढ़ा है सिर्फ इसीलिए बढ़ाना जरुरी है; भले ही वह फायदे में चल या चलाई जा सकती हो ! पर नहीं सबसे आसान तरीका सब को यही सूझता है कि मध्यम वर्ग की जेब का छेद बड़ा कर दिया जाए.........
#हिन्दी_ब्लागिंग
एक पुरानी फिल्म, यकीन, का गाना है, "बच बच के, बच के, बच बच के, बच के कहाँ जाओगे" ! जो आज पूरी तरह देश के मध्यम वर्ग पर लागू हो फिर मौंजूं है ! उस गाने के बोलों को बिना जुबान पर लाए, आजमाया जा रहा है, देश के इस शापित वर्ग पर।  देश की जनता समझ तो सब रही है ! फिलहाल चुप है। पर उसकी चुप्पी को अपने हक़ में समझने की भूल भी लगातार की जा रही है। आम-जन के धैर्य की परीक्षा तो ली जा रही है, पर शायद यह सच भुला दिया गया है कि हर चीज की सीमा होती है। नींबू चाहे कितना भी सेहत के लिए मुफीद हो, ज्यादा रस पाने की ललक में अधिक निचोड़ने पर कड़वाहट ही हाथ लगती है....। 

किसके बूते ?
अभी बैंकों की सर्कस चल ही रही है।  जिसके तहत पैसे जमा करने, रखने, कितने रखने, निकालने, कितने निकलने जाइए करतब दिखाए जा रहे हैं। तंग हो कर भी लोगों ने शो चलने दिया है ! क्योंकि रोजी-रोटी की कशमकश के बाद थके-टूटे इंसान के पास यह सब सोचने का समय ही कहाँ छोड़ा गया है ! पर विरोध का ना होना भी अन्याय का समर्थन ही है। इसी विरोध के ना होने से साथ ही बारी आ गई किरायों की; लोग बसों से आते-जाते थे, उसके किराए बढ़ा दिए गए ! लोग ने चुप रह मेट्रो का रुख किया तो उसकी कीमतें भी बढ़ा दी गयीं ! तर्क ये कि सालों से इसका किराया नहीं बढ़ा है ! गोयाकि सालों से नहीं बढ़ा है सिर्फ इसीलिए बढ़ाना जरुरी है;
भले ही वह फायदे में चल या चलाई जा सकती हो ! पर नहीं सबसे आसान तरीका सब को यही सूझता है कि मध्यम वर्ग की जेब का छेद बड़ा कर दिया जाए। आम नागरिक फिर कड़वा घूंट पी कर रह गया। लोगों ने इसका तोड़, कार-स्कूटर पूल कर निकाला तो फिर इस बार सीधे पेट्रोल पर ही वार कर दिया गया। उस पर तरह-तरह के टैक्स, फिर टैक्स पर टैक्स, फिर सेस, पता नहीं क्या-क्या लगा उसकी कीमतों को अंतर्राष्ट्रीय कीमतों से भी दुगना कर दिया गया। हल्ला मचा तो हाथ झाड़ लिए !

सरकारी, गैर-सरकारी कंपनियों की कमाई कहाँ से आती है; मध्यम वर्ग से ! देश भर में मुफ्त में अनाज, जींस, पैसा बांटा जाता है उसकी भरपाई कौन करता है; मध्यम वर्ग। सरकारें बनाने में किसका सबसे ज्यादा योगदान रहता है; मध्यम वर्ग का। फिर भी सबसे उपेक्षित वर्ग कौन सा है; वही मध्यम वर्ग !! अब तो उसे ना किसी चीज की सफाई दी जाती है नाहीं कुछ बताना गवारा किया जाता है। तरह-तरह की बंदिशों के फलस्वरूप इस वर्ग के अंदर उठ रहे गुबार को अनदेखा कर उस पर  धीरे-धीरे हर तरफ से शिकंजा कसा जा रहा है कि कहीं बच के ना निकल जाए ! ऐसा करने वाले उसकी जल्द भूल जाने वाली आदत और भरमा जाने वाली फितरत से पूरी तरह वाकिफ हैं, इसीलिए अभी निश्चिंत भी हैं। पर कब तक ???

8 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (27-09-2017) को
निमंत्रण बिन गई मैके, करें मां बाप अन्देखी-; चर्चामंच 2740
पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Digamber Naswa ने कहा…

माध्यम वर्ग ही जाओ जो मध्य में रह के पिस्ता है और पिस्ता रहेगा ...
जाने कब बदलेगा माहोल ...

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

शास्त्री जी,
स्नेह बना रहे

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

नासवा जी,
विडंबना देखिए, जो सब चला रहा है वही मार खा रहा है !

sweta sinha ने कहा…

सच है एकदम हम बिल्कुल सहमत है सबसे ज्यादा परेशान मध्यमवर्गीय परिवार ही होता है इन सब झमेलो से।
आभार समसामयिक सुंदर लेख लिखा आपने गगन जी।

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

श्वेता जी,
हार्दिक धन्यवाद।

HARSHVARDHAN ने कहा…

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन महान समाज सुधारक राजा राममोहन राय जी और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

हर्ष जी,
आभार !

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