शनिवार, 17 सितंबर 2016

प्रतिमा का अनादर न हो

आज भी आम आदमी अपने घर में श्रद्धा-भक्ति के साथ अपने आराध्य को इस आस्था व मान्यता के साथ स्थापित करता है जैसे कि उसके इष्ट साक्षात उसके घर पधारे हैं। इसीलिए विदाई वाले दिन उसकी आँखों के आंसू रुकते नहीं हैं। खाने का एक कौर उसके गले से नीचे नहीं उतरता।  उसको फिर वापस  आने की याद दिलाते उसकी जीभ नहीं थकती। वहीँ  दूसरी ओर बड़े, विशाल, भव्य धार्मिक आयोजनों की वुकत वैसी ही रह गयी है जैसे नाटक-नौटंकी, सर्कस, मेले-ठेलों की होती है।  फ़िल्मी गाने, अनियंत्रित खाना-पीना, असंयमित व्यवहार आम बात हो गयी है। यही कारण कि प्रेम भाव से उन्हें विसर्जित नहीं किया जाता फेंक कर छुटकारा पाया जाता है  

हर साल चाहे दुर्गा पूजा हो, काली पूजा हो या गणेश जी की आराधना, निश्चित अवधि के बाद विसर्जन की ऐसी-ऐसी तस्वीरें सामने आती हैं जिन्हें देख कर लगता है कि क्या सचमुच हम भक्ति-भाव, आस्था, प्रेम के साथ आराधना करते हैं या यह पूजा-अर्चना एक तरह का चलन हो गया है या फिर परिपाटी चली आ  रही है या फिर शुद्ध धन कमाने का जरिया बन  गया है।  

हमारे यहां वर्षों से अलग-अलग जगहों में भिन्न-भिन्न देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना होती रही है। पर सबसे ज्यादा ख्याति बंगाल की दुर्गा पूजा की और महाराष्ट्र के गणपति पूजन की ही रही है। पहले देश के
किसी भी क्षेत्र का रहवासी वहीँ बने रह कर अपना जीवन व्यतीत कर देता था। बहुत कम लोग रोजगार  अपना इलाका छोड़ते थे। पर समय के साथ जब रोजगार के अवसर बढे तो जीवन-यापन, काम-धंधे के लिए विभिन्न क्षेत्रों के लोग देश के अन्य हिस्सों में जा वहाँ के लोगों के साथ अपनी संस्कृति, अपने रीती-रिवाज, अपने तीज-त्यौहारों के साथ घुल-मिल गए। धीरे-धीरे माँ दुर्गा की पूजा, गणपति बप्पा की आराधना, राम लीला, दही मटकी लूट, कांवर यात्रा, गरबा नृत्य इत्यादि अपने-अपने क्षेत्र से निकल आए, सारी हदें ख़त्म हो गयीं। हर त्यौहार हरेक का हो सारे देश में सार्वजनिक तौर पर मनाया जाने लगा। देश के उत्सव-प्रिय लोगों को
ऐसे धार्मिक मनोरंजन खूब रास आने लगे। लोगों की भीड़ बेतहाशा बढ़ने लगी। ज्यादा भीड़, ज्यादा आमदनी। लोगों को अपनी ओर खींचने के लिए
प्रतिस्पर्द्धा बढ़ी। पैसे के लालच ने एक ही इलाके में दसियों पंडालों को खड़ा कर दिया। मेले-ठेलों की भरमार हो गयी। स्पर्द्धा ने आयोजनों को भव्य बनाने की होड़ मचा दी। लोगों को आकर्षित करने के नए-नए रास्ते अपनाए जाने लगे। प्रतिमाएं गौण हो गयीं, पंडालों और अन्य विधाओं पर करोड़ों खर्च होने लगे। आकर्षण बढ़ाने के लिए बड़े-बड़े कलाकारों को जिनकी फीस ही करोड़ों में होती है, बुलाया जाने लगा। अध्यक्ष पद के लिए रसूखदार लोगों का आह्वान होने
लगा। पूजा-अर्चना, भक्ति-भाव हाशिए पर चले गए, दिखावा, शोर-शराबा अन्य बुराइयों के साथ हावी हो गए। धीरे-धीरे यहां ऐसे लोगों की पैठ होती चली गयी जिनका आस्था, संस्कृति, धर्म, पूजा-अर्चना, भक्ति-भाव से कुछ लेना-देना नहीं था उनका सिर्फ एक ही लक्ष्य था, पैसा।

एक तरफ आज भी आम आदमी अपने घर में श्रद्धा-भक्ति के साथ अपने आराध्य को स्थापित कर पूरे मनोयोग से अपनी हैसियत के अनुसार
यथासाध्य विधि पूर्वक पूजता है। उसकी आस्था व मान्यता होती है कि उसके इष्ट साक्षात उसके घर पधारे हैं।
इसीलिए विदाई वाले दिन उसकी आँखों के आंसू रुकते नहीं हैं। खाने का एक कौर उसके गले से नीचे नहीं उतरता। उसे ऐसा  लगता है जैसे उसके घर का कोई प्रिय सदस्य दूर जा रहा हो। उसको फिर वापस  आने की याद दिलाते उसकी जीभ नहीं थकती। वहीँ  दूसरी ओर बड़े, विशाल, भव्य धार्मिक आयोजनों की वुकत वैसी ही रह गयी है जैसे नाटक-नौटंकी, सर्कस, मेले-ठेलों की होती है।  फ़िल्मी गाने, अनियंत्रित खाना-पीना, असंयमित व्यवहार आम बात हो गयी है। यही कारण कि विसर्जन के समय हमें प्रतिमाओं की दुर्दशा का साक्षी बनना पड़ता है। नदी, तालाब, सागर में उन्हें विसर्जित नहीं किया जाता फेंक कर छुटकारा पाया जाता है।



सवाल यह उठता है कि आयोजन इतना भारी-भरकम क्यों किया जाता है, जिसमें बेहिसाब खर्च आए ?  क्यों इतनी विशाल प्रतिमाएं बनाई जाती हैं कि जिन्हें संभालना भारी पड़ जाए ? क्यों विज्ञ-जनों के प्रवचनों और भजन सन्ध्या की जगह चलताऊ गायक और गानों को प्राथमिकता दे कर धार्मिक भावनाओं को तिरोहित किया जाता है।  आज जरुरत है इस फिजूल-खर्ची पर रोक की। धार्मिक आयोजनों को व्यवसाय न बनने देने की। अपनी संस्कृति, अपने रीती-रिवाजों को बचाने की।  अपने तीज-त्योहारों की गरिमा को अक्षुण रखने की। ऐसा तभी संभव हो पाएगा, जब हम, सब चलता है की मानसिकता से उबर कर, एकजुट हो इधर ध्यान देंगे।  

18 टिप्‍पणियां:

अजय कुमार झा ने कहा…

हां इस मुद्दे को हमने सोशल नेटवर्किंग साइट पर भी बहुत प्रमुखता से देखा था अपने देवी देवताओं का विसर्जन के बाद ऐसी दशा में देखना बड़ा ही दुखद लगता है इन चीज़ों में सुधार लाया जाना बहुत जरूरी ऐसी

yashoda Agrawal ने कहा…

आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" सोमवार 19 सितम्बर 2016 को लिंक की गई है.... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

जमशेद आज़मी ने कहा…

आपका यह लेख देश में व्‍याप्‍त एक ज्‍वलंत समस्‍या पर आ‍धारित है। हमारे देश में जिन प्रतिमाओं की पूजा की जाती है, वहीं अज्ञानता वश अनादर भी किया जाता है। अनादर से बचने के लिए हमें प्रतिमाओं का सम्‍मान करना सीखना होगा। अच्‍छा लेख प्रस्‍तुत किया है आपने।

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

अजय जी,
पेड़ों के नीचे, चबूतरों पर, धूल फांकती पुरानी मूर्तियां, तस्वीरें, देवी-देवताओं की फोटो वाले कैलेण्डर आदि का आधी-अधूरी जानकारी के कारण दुर्दशा को प्राप्त होना भी बहुत अखरता है। इनके किए धार्मिक संस्थाओं, विद्वानों, पण्डितों द्वारा मार्ग दर्शन होना चाहिए। एक-दो बार दो-एक लोगों से पूछा तो बहता पानी ही सुझाया गया जो आजकल संभव नहीं है !!

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

यशोदा जी,
आभार

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

जमशेद जी,
आधी-अधूरी जानकारी भी एक वजह हो सकती है।

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (19-09-2016) को "नमकीन पानी में बहुत से जीव ठहरे हैं" (चर्चा अंक-2470) पर भी होगी।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

शास्त्री जी, आभार

ब्लॉग बुलेटिन ने कहा…

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, "छोटा शहर, सिसकती कला और १४५० वीं ब्लॉग बुलेटिन“ , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

देवेन्द्र पाण्डेय ने कहा…

उत्सव मनाने में कोई हर्ज नहीं है. भव्यता भी समाज अपने पुरुषार्थ से, स्वेच्छा से करे..इसमें भी आपत्ति नहीं है. उत्सव होने चाहिए. आपत्ति बस इसके मनाने के और विसर्जन में बरती गई लापरवाही पर किया जाना चाहिए. इसमें सुधार की आवश्यकता है. पूजा पंडाल में कोई शराब पीकर अश्लील फ़िल्मी धुन पर, संस्कृति के नाम पर हुडदंग मचाये..यह अगर कहीं होता है तो बंद होना चाहिए.

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

पर्यावरण के साथ रहने और चलने के साथ उससे जीना सिखाने सीखने के पारिवारिक पाठों का लुप्त होना भी एक कारण है। बहुत सुन्दर लेख ।

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

ब्लॉग बुलेटिन का आभार

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

देवेन्द्र जी, उत्सव तो हमारे जीवन का अभिन्न अंग हैं उनसे तो अलग हुआ ही नहीं जा सकता, पर उन्हें अपने स्वार्थ का माध्यम बनाया जाना गलत है।

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

सुशील जी, सदा स्वागत है। स्नेह बना रहे।

Kavita Rawat ने कहा…

मन की बात लिख दी आपने.... त्योहारों की ख़ुशी में
निश्चित ही दिखावा बहुत अखरता है...

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

कविता जी, दुख होता है यह सब देख कर

Mamta ने कहा…

अच्‍छा लेख

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

ममता जी, धन्यवाद

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