शुक्रवार, 20 नवंबर 2015

क़ुतुब जैसी, दिल्ली के ही हस्तसाल की मीनार

क़ुतुब मीनार विश्व प्रसिद्ध है पर उसके निर्माता कुतुबुद्दीन ऐबक को कम ही लोग जानते हैं, वहीँ शाहजहाँ को कौन नहीं जानता पर उसके द्वारा बनवाई गयी मीनार को उसी के शहर के लोग नहीं जानते !!

समय की मार 
#हस्तसाल,दिल्ली के पश्चिमी इलाके में स्थित शहर में तब्दील होता एक गांव। यहां मुग़ल बादशाह शाहजहां के हाथियों की देख-रेख की जाती थी इसीलिए इस जगह का नाम हस्तसाल पड गया। यहीं पर शाहजहां ने 1650 में अपनी शिकारगाह में शिकार में सहूलियत के लिए एक मीनार बनवायी थी। क़ुतुब की तर्ज पर बनी इस मीनार में भी लाल पत्थरों का उपयोग किया गया है। पर आज जहां दिल्ली की पहचान बन चुकी क़ुतुब दुनिया भर में मशहूर है वहीँ यह "हस्तसाल की लाट" गुमनामी और उपेक्षित हालात में बदहाली के आंसू बहा रही है। इत्तेफ़ाक़ देखिए क़ुतुब मीनार विश्व प्रसिद्ध है पर उसके निर्माता कुतुबुद्दीन ऐबक को कम ही लोग जानते हैं, वहीँ शाहजहाँ को कौन नहीं जानता पर उसके द्वारा बनवाई गयी मीनार को उसी के शहर के लोग नहीं जानते !!
द्वार 
हस्तसाल के एक तरफ विकासपुरी और दूसरी ओर नजफगढ़ रोड से लगा उत्तम नगर का इलाका है। यहीं एक संकरी गली में 17 मीटर यानी करीब 56 फिट ऊंची यह तीन मंजिला मीनार आज भी मुग़ल काल के वैभव की याद दिलाती खड़ी है। इसे ईंटों और लाल बलुई पत्थरों से बनाया गया है। हालांकि यह मीनार क़ुतुब जैसी भव्य नहीं है फिर भी अपने आप में इतिहास तो संजोए हुए है ही। जैसा की बताया जाता है कि इसे पांच मंजिला बनाया गया था जिस पर ऊपर एक छतरी भी लगी थी जो 1803 में आए भूकंप से जमींदोज हो गयी। अब इस मीनार की तीन मंजिलें ही बची हैं। क़ुतुब की तरह ही इसमें भी वर्तुलाकार सीढ़ियां बनी हुई हैं वैसे ही हर मंजिल पर दरवाजा भी बना है 

बुलंदी 
फिलहाल अभी सुरक्षा की दृष्टि से इसको बंद रखा गया है। पर जैसे हमारे हर शहर में अवैध कब्जे की बिमारी घुन की तरह फैली हुई है, यहां भी इसी तरह से चारों ओर से हथियाई जाती सिकुड़ती जमीन के कब्जों ने इस ऐतिहासिक इमारत की अच्छी-खासी, लम्बी-चौड़ी जगह को ख़त्म कर रख दिया है। इसके चारों ओर फैला मलबा और कूड़े ने इसको ऐसा घेर रखा है कि इस तक पहुँचना भी दूभर हो गया है। दिल्ली सरकार की करीब 250 ऐसी इमारतों, जिन्हें सुरक्षा की जरुरत है में इसका नाम होने के बावजूद इसके अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है। कभी-कभी कोई चौकीदार या गार्ड आ कर यहां सफाई वगैरह कर खानापूर्ति कर जाता है नहीं तो गांव वालों की मेहरबानी पर ही इसका भाग्य निर्भर हो कर रह गया है। 
ऊपर जाने की सीढियाँ 
कूड़े भरा पहुँच मार्ग       

सिकुड़ती जगह 

बदहाली 




गंदगी भरा परिसर 

  सेल्फ़ी तो बनती है :-) 


अतीत के गौरव के रूप में नहीं पर इसकी बदहाली देखने के लिए रोहतक रोड से नांगलोई या फिर नजफगढ़ रोड से उत्तम नगर होते हुए हस्तसाल पहुंचा तो जा सकता है पर मीनार तक जाने के लिए जद्दोजहद करनी पड़ती है। संकरी गली में एक तरफ ढहना शुरू कर चुकी यह उपेक्षित यह मीनार खड़ी है। इसके मुख्य द्वार पर तो ताला जड़ा हुआ है पर पीछे से टूटी-ढही दीवाल के रास्ते इसके पास जाया जा सकता है। पर गुमनामी का यह हाल है कि रिक्शा चालकों को भी इसके बारे में कुछ पता नहीं है सो मुझे पैदल ही भटकते हुए इस तक पहुँचना पड़ा था। यहां के रहवासियों को इस बात का तो गुमान है कि यहां विदेशों से भी लोग इसे देखने पहुंचते हैं पर ना उन्हें ना उनके द्वारा चुने हुए प्रतिनिधियों को यह एहसास है कि इसे देखने के बाद वे अपने मन में यहां की कैसी छवि ले कर जाते होंगे। सरकार द्वारा फिलहाल कोई पहल न भी हो रही हो तो और कुछ नहीं तो इस ऐतिहासिक जगह को साफ़-सुथरा तो रखा ही जा सकता है।         

3 टिप्‍पणियां:

HARSHVARDHAN ने कहा…

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन ब्लॉग बुलेटिन - कवियित्री निर्मला ठाकुर जी की प्रथम पुण्यतिथि में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (21-11-2015) को "काँटें बिखरे हैं कानन में" (चर्चा-अंक 2168) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Asha Saxena ने कहा…

जानकारी देता बढ़िया लेख |