रविवार, 8 नवंबर 2015

वैसे लोगों को आजकल बेवकूफ समझा जाता है - द्वितीय किस्त

कुछ सहज होने के बाद मुझे उन्होंने गोद में लिया और समझाया कि वह उपहार नहीं रिश्वत थी जिसकी आड़ में वह मुझ पर कुछ भी गलत करने का जोर डाल सकता था। उस समय तो बात समझ में आ गयी पर आज जब खुले आम बेशर्मी से रिश्वत लेते-देते देखता हूँ तो कुछ सही-गलत समझ में नहीं आता।

कुछ यादें जो जीवन भर धूमिल नहीं होतीं। ऐसी ही स्मृतियाँ हैं अपने दादाजी की उम्र के डागा जी की, जो बाबूजी के भी बॉस थे, जिनके गुण सदा याद रहते हैं। पिछली पोस्ट में उनकी कर्तव्य निष्ठा के बारे में लिखा था। उनसे जुड़ा एक और वाकया है जो कभी नहीं भूलता।

मील के विशाल परिसर में रहने वाले अफसर ग्रेड के परिवारों को अनगिनत सहूलियतें उपलब्ध होती थीं। जैसे जलाने के लिए और संयुक्त गीजरों के लिए कोयला। टॉयलेट संबंधी विम, फिनायल, डस्टर, फ्लीट। उस समय फ्रिज उतने आम नहीं थे तो ढेरों बर्फ और घरेलू सहायक इत्यादि-इत्यादि। उन दिनों खाना कोयले के चूल्हे पर ही बना करता था। उसके लिए कोयले के ठीक से जलने तक चूल्हे बाहर खुले में रख दिए जाते थे। धुआं ख़त्म होने के बाद उन्हें घरों के अंदर ले जाया जाता था। उस समय रसोई गैस नई-नई बाज़ार में आई थी, जिसको ले कर लोगों में एक डर और आशंका भी बनी हुई थी।

बात शायद 1964-65 की होगी। विशाल आवास-गृहों की बाहर से रंग-पोताई हुई थी जिस पर करीब 18-20 हजार रुपये खर्च हुए थे, जो उस समय एक बहुत बड़ी रकम हुआ करती थी। ऐसे में एक दिन शाम को एक चूल्हा अपने पूरे शबाब के सा धुआं उगल रहा था जो फ्लैटों को अंदर-बाहर से लपेटता हुआ ऊपर उठा जा रहा था। उधर से डागा जी आफिस से लौट रहे थे। जैसे ही उन्होंने दीवारों पर धुएं को रेंगते देखा तुरंत उन्होंने गार्ड को बुलवाया और चूल्हे को उठवा कर सामने नदी में फिंकवा दिया और उलटे पाँव वापस आफिस गए और एक साथ बीस गैस कनेक्शनों का अर्जेंट आर्डर पास कर दिया।  घंटे भर में सभी फ्लैटों में गैस पहुँच गयी। यह अलग बात है कि लोग हफ़्तों उसे काम में लाने में झिझकते रहे। पर बात एक आफिसर के निर्णय की है जिसने तुरंत एक ऐसा समाधान खोजा जिससे दोनों पक्षों को लाभ मिला।     

ऐसी ही एक अमिट याद मेरे बाबूजी से जुड़ी है जो नसीहत बन सदा मेरे साथ बनी रहती है। एक दिन बाबूजी अभी काम से लौटे नहीं थे कि एक आदमी पंद्रह सेर का देसी घी का टीन ले कर घर आया और माँ के सामने रख दिया, पूछने पर बोला कि साहब को उपहार के लिए है। उस समय इतना छल-कपट नहीं हुआ करता था।  माँ ने सहज भाव से उसे रख लिया।  अभी वह आदमी गया ही था कि बाबूजी आ गए, सामने ही टीन पड़ा था देखते ही पूछने पर सब बात जैसे ही पता चली तुरंत गार्ड को दौड़वाया और उस आदमी को बुलवाया। जैसे ही वह आया और कुछ बोलता कि उसे डाँटते हुए टीन को ले जाने के लिए कहा नहीं तो फिकवा देने की बात कही। उसके जाने के बाद माँ ने कहा कि बेचारा कितने आदर-मान से कुछ लाया था उसे बेकार में इतना डांट दिया ! मैं भी कुछ ऐसा ही भाव लिए दुबका खड़ा था। बाद में कुछ सहज होने के बाद मुझे उन्होंने गोद में लिया और समझाया कि वह उपहार नहीं रिश्वत थी जिसकी आड़ में वह मुझ पर कुछ भी गलत करने का जोर डाल सकता था। उस समय तो बात समझ में आ गयी पर आज जब खुले आम बेशर्मी से रिश्वत लेते-देते देखता हूँ तो कुछ सही-गलत समझ में नहीं आता। बस यही लगता है कि अब जो हो रहा है वही शायद समय की मांग हो क्योंकि ना तो वैसा समय रहा ना हीं वैसे लोग !!!   

3 टिप्‍पणियां:

राजेंद्र कुमार ने कहा…

आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (10.11.2015) को "दीपों का त्योंहार "(चर्चा अंक-2156) पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ, सादर...!

ब्लॉग बुलेटिन ने कहा…

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, तीन साधू - ब्लॉग बुलेटिन , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

Rushabh Shukla ने कहा…


सुन्दर रचना ......
मेरे ब्लॉग पर आपके आगमन की प्रतीक्षा है |

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