शुक्रवार, 23 अक्तूबर 2015

रावण दहन की आग पर सिकना रोटियों का

जगह हो न हो छोटे-छोटे पार्कों में ही खतरा मोल ले तीन-तीन पुतलों का दहन किया जाने लगा है। एक बात और हो सकता है कुछ लोगों को अखरे भी, पर सच्चाई यही दिख रही है कि ये आयोजन कुछ लोगों के अहम को पूरा करने या फिर भविष्य का मंच तैयार करने के लिए करे या करवाए जाते हैं। इसी बहाने उन्हें अपनी दूकान सजाने का भी अवसर जो मिल जाता है। 

दशहरा, देश के बड़े त्योहारों में से एक। बुराई पर अच्छाई की प्रतीतात्मक जीत को दर्शाने का माध्यम। रामलीला का मंचन, धूम-धड़ाका, आतिशबाजी, हाट-मेला-बाज़ार, भीड़-भाड़, लोगों का रेला, मौज-मस्ती,
उत्साही बच्चे। ऊँचे से ऊँचे पुतले बनाने की होड़, दिन ब दिन बढ़ते आयोजन, छुटभइये नेताओं को भी मिलते अवसर। 

एक समय था दिल्ली में जगह-जगह माता के जगराते हुआ करते थे। ज्यादातर टैक्सी या त्रि-चक्र स्कूटर स्टैंडों के सदस्य इस तरह के आयोजन किया करते थे या फिर दशहरे पर सार्वजनिक पुतला दहन, वह भी कहीं-कहीं आयोजित होता था। पर अब तो चाहे कोई भी उत्सव हो, चाहे गणेशोत्सव हो, दुर्गा पूजा हो, दशहरा हो, होली-दिवाली मिलन हो, इन सब के कार्यक्रम हर गली-मौहल्ले में होने लगे हैं। जैसा कि अभी दशहरे के पुतला दहन का आयोजन।  एक ही कालोनी में दो-तीन जगह पुतले खड़े कर दिए गए दिखे। जगह हो न हो छोटे-छोटे पार्कों में ही खतरा मोल ले तीन-तीन पुतलों का दहन किया गया। एक बात और हो सकता है कुछ लोगों को अखरे भी, पर सच्चाई यही दिख रही है कि ये आयोजन कुछ लोगों के अहम को पूरा करने या फिर भविष्य का मंच तैयार करने के लिए करे या करवाए जाते हैं। इसी बहाने उन्हें अपनी दूकान सजाने का भी अवसर जो मिल जाता है। प्रभू राम तो गौण होते जा रहे हैं। भीड़ के लिए आज का दिन या तो रावण के नाम रहता है, जिसके पुतलों की भव्यता पर ज्यादा ध्यान दिया जाने लगा है, उसका किरदार निभाने वाले कुछ ख़ास और जाने-माने नामों को चुना जाने लगा है या फिर आज उन छुटभइये नेताओं की निकल पड़ती है जिन्हें भारी-भरकम नेताओं के सामने खड़े होने का भी अवसर नहीं मिलता। वे भी भीड़ के सामने आ अपनी पहचान करवाने का मौका पा जाते हैं। उनके शुभ चिंतक बार-बार उनका नाम ले-ले कर जबरदस्ती तालियां बजवा कर अपने लिए भी कहीं जगह बनवाने की जुगाड़ कर लेते हैं।  
                          
बड़े आयोजनों को ही देख लें। श्रीराम पक्ष के कुछ किरदारों की आरती-तिलक कर अौपचारिकता पूरी होते ही सब का ध्यान पधारे हुए विशिष्ट जनों पर केंद्रित हो जाता है। जितनी आव-भगत उन में से हरेक की होती है उतनी तो पूरे राम-दल की भी नहीं होती। फिर उनमें भी होड़ सी करवा दी जाती है रावण के पुतले पर तीरों की बौछार करवाने में। ऊपर बैठा रावण भी हाथ जोड़ कर कहता होगा, हे प्रभू, उस समय तो अपने कर्मों के कारण आपने मेरा वध किया था, वह सम्मानजनक अंत था मेरा। तब  मुझे उतनी तकलीफ नहीं हुई थी पर इस अपमानजनक स्थिति से हर साल दो-चार होने में बहुत कष्ट होता है।  किसी तरह मुझे निजात दिलवाइए इन भक्तों के चंगुल से !        

3 टिप्‍पणियां:

जसवंत लोधी ने कहा…

जय हो पृभू ।Seetamni. blogspot. in

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (25-10-2015) को "तलाश शून्य की" (चर्चा अंक-2140) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Onkar ने कहा…

उम्दा रचना