बुधवार, 20 मई 2015

टेढ़ी नज़र पर सीधा चश्मा

पिछले कई दिनों से एक चश्मे ने गुल-गपाड़ा मचा रखा है।  बात, बात न रह कर बतंगड़ बन गयी है। अपने यहां की परिपाटी के अनुसार बात चाहे सही हो या गलत उस के पक्ष-विपक्ष में लोग खड़े हो कर जाने कहां-कहां के दबे मुर्दे उखाड़ने लगते हैं। 

सोचा था पिछले दिनों छत्तीसगढ़ में घटे चश्मा प्रकरण पर कोई टीका-टिप्पणी नहीं की जाएगी।  बिना मतलब की बहसबाजी का क्या मतलब। पर कल कई दिनों बाद ठाकुर जी का आगमन हुआ। चाय-नाश्ते के साथ ही न चाहते हुए फिर वही बात उठ खडी हुई। वैसे ठाकुर जी आए उसी मकसद से ही थे। बोले, शर्मा जी, पिछले कई दिनों से एक चश्मे ने गुल-गपाड़ा मचा रखा है।  बात, बात न रह कर बतंगड़ बन गयी है। अपने यहां की परिपाटी के अनुसार बात चाहे सही हो या गलत उस के पक्ष-विपक्ष में लोग खड़े हो कर जाने कहां-कहां के दबे मुर्दे उखाड़ने लगते हैं। 

बात देश के एक छोटे से राज्य के एक शहर के कलेक्टर की है, जब उसका परिचय देश के प्रधान मंत्री से करवाया जाता है तो उसका कीमती चश्मा अपनी जगह नहीं छोड़ता।  देखा जाए तो इसमें कोई हर्ज नही है। पर यदि वह भला आदमी आधे मिनट के लिए चश्मा उतार ही लेता तो बड़ाई उसी की होती, होती की नहीं ?

मैं चुप ही रहा।  ठाकुर जी मुझसे किसी प्रतिक्रिया की आशा कर रहे थे पर मेरी चुप्पी देख बोले, कुछ खब्ती दिमाग वाले तो ये यह कहने से भी बाज नहीं आए हैं कि जब चीन में हमारे प्रधान मंत्री टेराकोटा म्यूजियम देखने गए थे तो उन्होंने भी चश्मा नहीं उतारा था। ऐसे लोग सिर्फ भड़ास निकालना जानते हैं, उन्हें जगह और मौके से कोई मतलब नहीं होता। आप ही बताइये दोनों बातों में कोई तुक है या सिर्फ विद्वेष ? ऐसे ही लोगों का कहना है कि धूल-धक्क्ड़ और सूर्य की खतरनाक किरणों से आँखों पर बुरा असर पड़ता है इसीलिए चश्मा नहीं उतारना अपनी जगह ठीक है। पर किसी ने किसी को पूरा दिन तो चश्मा उतारने को नहीं कहा था सिर्फ आधे-एक-मिनट की बात थी, इससे ज्यादा समय तो चश्मे के कांच को साफ करने में लग जाता है। और फिर क्या अपने यहां धूल-धक्कड़ सिर्फ दिन में ही रहता है ? तो क्या आप रात को भी चश्मा चढ़ा कर बाहर निकलते हैं? आप क्या कहते हैं ?

मैं क्या कहूँ ! पर ठाकुर जी बात ऐसी है कि यदि आँखों में कोई तकलीफ हो तो अलग बात है पर साधारण शिष्टाचार या विवेक तो यही कहता है कि अपने से बड़े, चाहे उम्र में हों या ओहदे में, आंखों पर से काला पर्दा उतार कर ही बात करनी चाहिए। एकदम निश्चित नहीं है न ही बहस की बात है, फिर भी धूप का  चश्मा पहन कर किसी से बात करने पर ऐसा समझा जाता है कि आप अपने सामने वाले को गंभीरता से नहीं ले रहे या फिर उसमें आप को रूचि नहीं है, या फिर आप थोड़े से अहम भाव से ग्रस्त हैं। वैसे भी वार्तालाप करते समय सामने वाले की आँखों में देखते हुए ही बात करनी चाहिए न कि इधर-उधर ताकते हुए और गहरे रंग का चश्मा दो बात करने वालों के बीच एक पर्दा सा तो डाल ही देता है। इसलिए कभी भी किसी से भी बात करते समय यह आदमी के अपने विवेक पर निर्भर करता है कि उसे उस समय कैसा व्यवहार करना चाहिए।  

ठाकुर जी शायद मेरी बात से सहमत थे या शायद उन्हें देर हो रही थी इसलिए फिर आने का वादा कर वे रुखसत हो गए।      

3 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (22-05-2015) को "उम्र के विभाजन और तुम्हारी कुंठित सोच" {चर्चा - 1983} पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक
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dj ने कहा…

वाकई कठिन है सही या गलत कहना
आँखों की सुरक्षा की दृष्टि से सही लगता है
शिष्टाचार विरोध करता है
समय और स्वविवेक पर ही निर्भर है
अच्छी पोस्ट

Tushar Rastogi ने कहा…

सटीक