शनिवार, 7 मार्च 2015

गंगा की लहरों पर कुछ पल

मनुष्य के जन्म लेते ही उसके वहां पहले से मौजूद लोगों से रिश्ते बन जाते हैं। ऐसे रिश्ते खून के रिश्ते कहलाते हैं। फिर जैसे-जैसे वह उम्रदराज होता जाता है वैसे-वैसे उसके दुनियादारी के और संबंध भी बनते चले जाते हैं। कभी-कभी ऐसे रिश्ते खून के रिश्तों से भी ज्यादा प्रेमिल और प्रगाढ़ होते हैं। ऐसे ही चार-चार पीढ़ियों से चले आ रहे कुछ बंधन कोलकाता में मेरा इंतज़ार करते रहते हैं।    
शिव मंदिर 
पिछले दिनों भूटान से लौटते हुए कोलकाता में सुबह सात से रात आठ तक, एक दिन रुकना हुआ तो पुरानी यादें ताजा करने का सुयोग मिल गया। चिरंजीव मनोज और शंकर समझ नहीं पा रहे थे कि इस समय का सदुपयोग कैसे किया जाए। जिससे दोनों घरों के सदस्य भी कुछ बतिया सकें, इतने दिनों बाद आए भैया से। दोनों घर एक-डेढ़ कि. मी. की आपसी दूरी के साथ गंगा के किनारे ही हैं। इसलिए यही तय पाया गया कि गंगा की "फेरी" का आनंद लेते हुए आस-पास की जगहों में हुए परिवर्तन का लेखा-जोखा इकट्ठा कर घर वापस आ जाते हैं।                         

नित्यकर्म निपटाते, बतियाते दोपहर हो गयी थी। साढ़े बारह के ऊपर हो रहा था जब हम नीमतल्ला घाट के समीप अहीरीटोला के फेरी-घाट पर पहुंचे। नीमतल्ला घाट, आबादी के बीचो-बीच, गंगा किनारे स्थित कोलकाता का सबसे पुराना और व्यस्ततम श्मशान घाट है। कहते हैं इसके निर्माण से आज तक, वह भी आजादी के पहले, सिर्फ एक दिन ऐसा हुआ था जब   यहां एक भी चिता नहीं जली थी। उस दिन ख़ुशी में कार्पोरेशन ने मिठाई बंटवाई थी। यहां भगवान शंकर का मंदिर है जो "बाबा भूतनाथ" के नाम से  सुविख्यात है। हर सोमवार को यहां श्रद्धालुओं का अपार सैलाब उमड़ता है जिससे पैर रखने की जगह भी नहीं बच पाती। 
स्टीमर के अंदर 

आजकल कोलकाता में गंगा नदी पर स्टीमरों की सेवा बहुत अच्छी और विभिन्न रूटों के लिए हो गयी है। जहां पहले घूम कर हावड़ा पुल से स्टेशन जाने में पौना घंटा लग जाता था और जाम लग जाने से गाड़ी छूट जाने का डर अलग से   सताता रहता था वहीँ अब बिना किसी तनाव के 15 से 20 मिनटों में लोग प्लेटफार्म पर पहुंच जाते हैं। यहां के स्टीमर अहिरीटोला घाट से चलते हैं। यहां ज्यादातर हिंदी भाषी लोग बसते हैं। पर भाषा का हाल बेहाल ही है।
माँ गंगा 

हमलोगों ने यहां से  उस पार स्थित बांधा-घाट-सल्किया का "लांच" लिया। इस समय नदी में ज्वार आया हुआ था। पानी के बहाव की तेजी के कारण स्टीमर कुछ धीरे चल पा रहा था फिर भी उसने करीब बीस मिनटों में हमें उस पार पहुंचा दिया।
जेटी 
घाट से मुख्य सड़क को जोड़ने वाली पतली संकरी गली से होते हुए बाजार की तरफ आते हुए पाया कि गलियां, सड़कें जगह की कमी के कारण वर्षों से जस की तस हैं फिलहाल उन्हें एकतरफा बना कुछ राहत पा ली गयी है। अलबत्ता पुराने मकानों की जगह नए सुरुचिपूर्ण भवनों ने ले ली है। जबसे हावड़ा को कोलकाता से अलग कर नया जिला बना दिया गया है तबसे इधर काफी सुधार होता दिख रहा है। वहीं स्थित पुराने सिनेमा हॉल "अशोक" को देख शोक भी
ज्वार से भरी नदी 
हुआ, जो जर्जरावस्था में बंदहाली की अवस्था में अपने बीते हुए समय को याद करता खड़ा था। इसी तरह कुछ पुराने मंदिर, पार्क, भवनों में बीता काल-खण्ड खोजते देखते पाया कि धूप तेज हो रही है, तीन के ऊपर समय भी हो रहा था सो घाट पर जा फिर फेरी का सहारा ले वापस हो लिए। ज्वार अभी भी नहीं उतरा था। घर पर बात-चीत में कब समय निकल गया पता ही नहीं चला। 

रात को हावड़ा से मुंबई मेल लेनी थी, जो सुबह साढ़े नौ के आस-पास रायपुर पहुंचा देती है। पर कहते हैं न कि "तेरे मन कुछ और है दाता के मन कछू और" तो क्या पता था कि हावड़ा से रायपुर पहुंचने में पूरे पैंतालीस घंटे लग जाएंगे, कुछ लोगों के अपनी मांगें मनवाने के लिए पटरियों पर धरना देने की वजह से।                      

4 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (09-03-2015) को "मेरी कहानी,...आँखों में पानी" { चर्चा अंक-1912 } पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस की
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

Shastri ji,
Aabhar

Kailash Sharma ने कहा…

कोलकत्ता की पुरानी यादें ताज़ा कर दीं...रोचक प्रस्तुति..

KAHKASHAN KHAN ने कहा…

बहुत ही रोचक और अच्‍छा लेख प्रस्‍तुत किया है आपने। इस लिंक पर मेरी नई पोस्‍ट मौजूद है।