मंगलवार, 15 जुलाई 2014

छात्र-वृत्ति खैरात नहीं, लियाकत का फल हो

हितग्राही को यह जरूर महसूस होना चाहिए कि मुझे जो सहायता मिल रही है वह खैरात नहीं है बल्कि मेरी लियाकत की वजह से है. मेरी मेहनत के फलस्वरूप है। क्योंकि खैरात की कीमत नहीं आंकी जाती, उसका मोल नहीं समझा जाता।

अभी कुछ दिनों पहले मध्य प्रदेश के मुख्य मंत्री जी ने सार्वजनिक रूप से घोषणा की है कि परीक्षा में 85 % अंक पाने वाले छात्र को सरकार की तरफ से प्रोत्साहन राशि दी जाएगी। यह एक सराहनीय तथा अनुकरणीय कदम माना जाना चाहिए.  यह उन राज्यों की सरकारों के लिए एक मिसाल होनी चाहिए जो जाति-गत आधार पर करोड़ों रुपये छात्र-वृत्ति के नाम पर खर्च कर डालती हैं बिना उसका हश्र जाने. चनों की तरह हर साल बांटे जाने वाले इन पैसों से होने वाले नफे-नुक्सान का आकलन सरकार को स्कूल-कालेजों से मांगना चाहिए जिससे यह पता चल सके कि टैक्स देने वालों की खून-पसीने की कमाई का कैसा उपयोग हो रहा है ? उस पैसे से छात्र का भविष्य संवर रहा है या मॉल-बाजारों का. सरकारों को यह जानने की कोशिश करनी चाहिए कि इन पैसों से लाभान्वित होने वाले कितने बच्चों ने अपनी पढ़ाई पूरी की ? कितनों ने उसमें लियाकत हासिल की ? कितनों ने प्रथम श्रेणी हासिल की कितने दूसरी या तीसरी श्रेणी में पास हुए और कितने सिर्फ पैसा ले किनारे हो गए ? 

पढ़ाई में मेधावी छात्र को पैसा ही नही हर तरह की सहूलियत मिलनी चाहिए। जीवन में कुछ कर-गुजरने वाले हर किशोर और युवा को अपने लक्ष्य की ओर अग्रसर होने का मौका देने के लिए उसे और उसके परिवार को हर चिंता से मुक्त किया जा सके तो इससे अच्छी बात और क्या हो सकती है. पर इसके लिए किसी भेद-भाव की गुंजायश नहीं होनी चाहिए इसलिए छात्र-वृत्ति को जातिगत बंधन से मुक्त कर मेधा-गत दायरे में लाया जाए तो देश हित में और बेहतर परिणाम मिल सकते हैं. हितग्राही को यह जरूर महसूस होना चाहिए कि मुझे जो सहायता मिल रही है वह खैरात नहीं है बल्कि मेरी लियाकत की वजह से है. मेरी मेहनत के फलस्वरूप है। क्योंकि खैरात की कीमत नहीं आंकी जाती, उसका मोल नहीं समझा जाता, यह पिछले दिनों सिद्ध भी हो चुका है, जब राज्य सरकारों द्वारा बांटे गए छोटे पाम-टॉप यानी  "टैबलेट"  बाज़ार में अौने-पौने दामों पर बेचे जाते पाए गये. सरकार की मंशा कुछ भी हो, वह अलग विषय है, पर इस "रेवड़ी"  की बाँट में, मुफ्त की चीज को पाने के लिए ऐसे-ऐसे संपन्न लोगों को भी झगड़ते और बहस करते देखा गया जिनके घरों में दो-दो कारें और कीमती कम्प्यूटर पहले से विद्यमान थे। पर उनकी सोच थी जब मुफ्त में मिल रहा है तो क्यों न लें ? 

जरूरतमंद को चीज मिले तो सबको संतोष होता है पर उस चीज को सिर्फ अपने हक़, जिद या शौक के लिए हथियाना कहाँ तक उचित है।  आज वैसे बांटे गए सैंकड़ों गैजेट अफ़रात रूप से सिर्फ "गेम" खेलने के काम में लिए जा रहे हैं.                

यह धारणा भी गलत साबित हो चुकी है कि इस तरह की दरियादिली से लोगों को आकर्षित कर सत्ता पाई जा सकती है. यदि ऐसा होता तो कई राज्यों का भाग्य किसी और ही रूप में सामने आया होता।  आज जब देश को दुनिया का सामना करने के लिए एक सक्षम पीढ़ी की आवश्यकता है तो समाज को, सरकार को, हम सब को जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र जैसी संकीर्ण सोच से ऊपर उठ राष्ट्र हित को ध्यान में रख कर ही अपनी दिशा निश्चित करनी होगी तभी देश को जगद्गुरु या जगद-नायक का दर्जा दिलाया जा सकेगा।   

1 टिप्पणी:

Aaryan Sekh ने कहा…

Aap bilkul thik keh rhe hain. Humara tax haram mein jata hai. Saadar abhaar.